फिल्म समीक्षा: कहानी
कुछ फिल्मों की नायक उनकी पटकथा होती है। पटकथा, नायक इसलिए होती है क्यों कि यह पटकथा किसी भी चरित्र के साथ भेदभाव नहीं करती। कहानी में यदि दर्शकों को विद्या बागची प्रभावित करती हैं तो उन्हें अडिय़ल खान और शर्मीले राना भी याद रहते हैं। ऐसे फिल्मी पात्रों को शिद्दत के साथ लिखा और फिल्माया जाता है। फिल्म कहानी का सबसे सशक्कत हिस्सा कसी हुई पटकथा ही है। कहानी कहने के सही अंदाज में। फिल्म के निर्देशक को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि फिल्म के प्रमोशन के दौरान उत्साह में उनसे फिल्म की कहानी लीक नहीं हुई। फिल्म के अंतिम चंद लम्हों में फिल्म अचानक यू टर्न लेती है। यह यू-टर्न वाकई शॉकिंग है। कहानी तो वैसे है अलग अंदाज की फिल्म पर कहीं-कहीं यह भारत की सस्पेंस फिल्मों जैसी लगती है। फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी उसकी सिनेमेटोग्राफी है। कोलाकाता की लाइफ स्टाईल, तौर-तरीके, जीवन जीने का अंदाज सभी कुछ फिल्म की कहानी का हिस्सा है। कहानी दरअसल विद्या बालन की नहीं निर्देशक सुजॉय घोष की फिल्म है। विद्या तो अच्छा अभिनय करती ही हैं। पीपली लाइव में पत्रकार और पान सिंह तोमर में डकैत बने नवाजुद्दीन शिद्दकी दीपक डोबरियाल और प्रशांत नारायण जैसी संभावनाएं जगाते हैं।
Friday, March 9, 2012
Friday, March 2, 2012
नायक, नायक तभी बनता है जब खलनायक हो
फिल्म समीक्षा: पान सिंह तोमर
आमिर खान के मरहूम पिता ताहिर हुसैन साहब एक बड़े फिल्म निर्माता थे। हुसैन साहब के पास जब कोई निर्देशक फिल्म की स्क्रिप्ट के साथ आता तो वह उससे बड़े इत्मिनान से पूंछते कि मियां बताओ की आप की कहानी उठती कहां से है, तनाव कहंा हैं और तनाव स्खलित कैसे होगा। तिंग्माशु धुलिया यदि पान सिंह तोमर की स्क्रिप्ट लेकर ताहिर साहब के पास जाते तो ताहिर साहब शायद यह कहते दिखते कि और तो ठीक है मियां पर आपकी फिल्म में तनाव फिल्म खत्म होने के ३५ मिनट पहले ही स्खलित हो गया है। आगे की फिल्म दर्शक क्यों देखेगा। तिंग्माशु धूलिया की इस महात्वाकांक्षी और भव्य फिल्म की एकमात्र खराबी यह है कि इंटरवल के १५ मिनट बाद फिल्म अपना चार्म खो देती है। आमतौर पर फिल्मों में नायक का इंतकाम फिल्म के आखिरी रील में पूरा होता है। आखिरी रील से पहले उस इंतकाम तक पहुंचने की पटकथा बुनी होती है। पान सिंह तोमर में नायक के पास इतना बड़ा अवरोध नहीं है कि वह उसे एक हीरो के रूप में खड़ा कर दे। जिस अवरोध को दर्शक अवरोध मानते हैं वह फिल्म खत्म होने के करीब ३५ मिनट पहले बहुत ही साधारण तरीके से खत्म हो गया होता है। एक धावक के डाकू बनने की कहानी असाधारण है पर डाकू बन जाने के बाद उसके मरने तक की कहानी भटकी हुई। यह इरफान का अभिनय और संजय चौहान के संवाद ही थे कि खत्म होने से पहले खत्म हो चुकी इस फिल्म को पूरा करने के लिए दर्शक सीट पर बैठे रहते हैं। थोड़ी ईमानदारी से कहें तो इस बार संजय चौहान भी अपने संवादों में वैसा जाूद नहीं घोल पाए जैसा उन्होंने साहब बीवी और गैंगस्टर में किया था। तिंग्माशु की पिछली दो फिल्मों शार्गिद और साहब बीवी के उलट इस फिल्म में उतराद्र्ध के बाद नाटकीय घटनाक्रम भी नहीं रहे। पान सिंह तोमर एक भव्य फिल्म है पर यह फिल्म, फिल्म होने की कई सारी शर्ते नहीं पूरी करती। अपने पिता की कथित असफलता को परिभाषित करते हुए आमिर खान ने एक बार कहा था कि निर्देशक को बाजार के प्रति उतना ही जवाबदेह होना चाहिए जितना कि वह अपनी कला के प्रति होता है।
आमिर खान के मरहूम पिता ताहिर हुसैन साहब एक बड़े फिल्म निर्माता थे। हुसैन साहब के पास जब कोई निर्देशक फिल्म की स्क्रिप्ट के साथ आता तो वह उससे बड़े इत्मिनान से पूंछते कि मियां बताओ की आप की कहानी उठती कहां से है, तनाव कहंा हैं और तनाव स्खलित कैसे होगा। तिंग्माशु धुलिया यदि पान सिंह तोमर की स्क्रिप्ट लेकर ताहिर साहब के पास जाते तो ताहिर साहब शायद यह कहते दिखते कि और तो ठीक है मियां पर आपकी फिल्म में तनाव फिल्म खत्म होने के ३५ मिनट पहले ही स्खलित हो गया है। आगे की फिल्म दर्शक क्यों देखेगा। तिंग्माशु धूलिया की इस महात्वाकांक्षी और भव्य फिल्म की एकमात्र खराबी यह है कि इंटरवल के १५ मिनट बाद फिल्म अपना चार्म खो देती है। आमतौर पर फिल्मों में नायक का इंतकाम फिल्म के आखिरी रील में पूरा होता है। आखिरी रील से पहले उस इंतकाम तक पहुंचने की पटकथा बुनी होती है। पान सिंह तोमर में नायक के पास इतना बड़ा अवरोध नहीं है कि वह उसे एक हीरो के रूप में खड़ा कर दे। जिस अवरोध को दर्शक अवरोध मानते हैं वह फिल्म खत्म होने के करीब ३५ मिनट पहले बहुत ही साधारण तरीके से खत्म हो गया होता है। एक धावक के डाकू बनने की कहानी असाधारण है पर डाकू बन जाने के बाद उसके मरने तक की कहानी भटकी हुई। यह इरफान का अभिनय और संजय चौहान के संवाद ही थे कि खत्म होने से पहले खत्म हो चुकी इस फिल्म को पूरा करने के लिए दर्शक सीट पर बैठे रहते हैं। थोड़ी ईमानदारी से कहें तो इस बार संजय चौहान भी अपने संवादों में वैसा जाूद नहीं घोल पाए जैसा उन्होंने साहब बीवी और गैंगस्टर में किया था। तिंग्माशु की पिछली दो फिल्मों शार्गिद और साहब बीवी के उलट इस फिल्म में उतराद्र्ध के बाद नाटकीय घटनाक्रम भी नहीं रहे। पान सिंह तोमर एक भव्य फिल्म है पर यह फिल्म, फिल्म होने की कई सारी शर्ते नहीं पूरी करती। अपने पिता की कथित असफलता को परिभाषित करते हुए आमिर खान ने एक बार कहा था कि निर्देशक को बाजार के प्रति उतना ही जवाबदेह होना चाहिए जितना कि वह अपनी कला के प्रति होता है।
Friday, February 24, 2012
इस बार साउथ के औसत हीरो लगे हैं माधवन
फिल्म समीक्षा: जोड़ी ब्रेकर्स
साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हसन को भी हिंदी दर्शकों ने उतना प्यार नहीं दिया जितना कि आर माधवन को। माधवन की बॉडी लैंग्वेज और उनकी फिल्मों का चुनाव कहीं से भी साउथ के पैटर्न लार्जर दैन लाइफ जैसा नहीं लगता। वह हिंदी पट्टी के हीरो लगते हैं। तनु वेड्स मनु, १३बी, थ्री इडियट्स, गुरू और रंग दे बसंती फिल्में देखिए। ऐसे समय में जब निर्देशक-निर्माता एक हीरो को लेकर फिल्म बनाने के जोखिम से बचने लगे हैं अश्वनी धीर ने वाकई साहस का काम किया है। यह साहस ही फिल्म को फ्लाप की ओर मोड़ देता है। जोड़ी ब्रेकर्स देखते वक्त हर समय यह लगता है कि इस फिल्म में दो नायक और दो नायकिओं की कहानी होती तो बेहतर होता। भले ही वह दूसरी जोड़ी श्रेयस तलपड़े, तुषार कपूर, आशीष चौधरी, कुणाल केमू या अशरद वारसी जैसे फिलर कलाकारों की होती। बोमन इरानी या अनुपम खेर भी होते तो अच्छा था। जोड़ी ब्रेकर्स में माधवन इस बार वह मुंबईया हीरो नहीं लगे हैं जो अकेले दम फिल्म को पार लगा दे। कई बार अच्छी अदाकारी, औसत संवाद और पटकथा को छिपा ले जाती है। इस फिल्म में ऐसा नहीं हुआ है। बिपाशा बसु के पास एक जैसी अदाएं हैं तो माधवन इस बार साउथ के हीरो जैसे लगे हैं। देखने में भी और बोलने में भी। इस सपाट कहानी को रोचक बनाने के लिए जो मोड़ दिए गए हैं वह दर्शकों को उलझाते भर हैं उनका मनोरंजन नहीं करते। फिल्म का संगीत भी औसत दर्जे का है। माधवन और विपाशा को शायद ही दर्शक सोलो हीरो या हीरोईन के रूप में फिर कभी देखें। प्रतिभाशाली कलाकारों की लंबी लाइन लगी है दोस्तों।
साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हसन को भी हिंदी दर्शकों ने उतना प्यार नहीं दिया जितना कि आर माधवन को। माधवन की बॉडी लैंग्वेज और उनकी फिल्मों का चुनाव कहीं से भी साउथ के पैटर्न लार्जर दैन लाइफ जैसा नहीं लगता। वह हिंदी पट्टी के हीरो लगते हैं। तनु वेड्स मनु, १३बी, थ्री इडियट्स, गुरू और रंग दे बसंती फिल्में देखिए। ऐसे समय में जब निर्देशक-निर्माता एक हीरो को लेकर फिल्म बनाने के जोखिम से बचने लगे हैं अश्वनी धीर ने वाकई साहस का काम किया है। यह साहस ही फिल्म को फ्लाप की ओर मोड़ देता है। जोड़ी ब्रेकर्स देखते वक्त हर समय यह लगता है कि इस फिल्म में दो नायक और दो नायकिओं की कहानी होती तो बेहतर होता। भले ही वह दूसरी जोड़ी श्रेयस तलपड़े, तुषार कपूर, आशीष चौधरी, कुणाल केमू या अशरद वारसी जैसे फिलर कलाकारों की होती। बोमन इरानी या अनुपम खेर भी होते तो अच्छा था। जोड़ी ब्रेकर्स में माधवन इस बार वह मुंबईया हीरो नहीं लगे हैं जो अकेले दम फिल्म को पार लगा दे। कई बार अच्छी अदाकारी, औसत संवाद और पटकथा को छिपा ले जाती है। इस फिल्म में ऐसा नहीं हुआ है। बिपाशा बसु के पास एक जैसी अदाएं हैं तो माधवन इस बार साउथ के हीरो जैसे लगे हैं। देखने में भी और बोलने में भी। इस सपाट कहानी को रोचक बनाने के लिए जो मोड़ दिए गए हैं वह दर्शकों को उलझाते भर हैं उनका मनोरंजन नहीं करते। फिल्म का संगीत भी औसत दर्जे का है। माधवन और विपाशा को शायद ही दर्शक सोलो हीरो या हीरोईन के रूप में फिर कभी देखें। प्रतिभाशाली कलाकारों की लंबी लाइन लगी है दोस्तों।
Friday, February 10, 2012
देखिए कितना रास आता है यह फिलासफिकल सिनेमा
फिल्म समीक्षा: एक मैं और एक तू
यह फिल्म उन दर्शकों को थोड़ी निराश करती है जिन्हें अग्निथ या अग्निथ जैसी लार्जर दैन लाइफ फिल्में पसंद आती हैं। यकीन भी नहीं आता कि अग्निथ और एक मैं और एक तू एक ही समय और एक ही निर्माता की बनाई हुई फिल्में हैं। यह फिल्म दरअसल फिलासफिकल सिनेमा देखने वाले दर्शकों को रास आ सकती है। यह उन्हीं मुट्ठी भर अरबन दर्शकों के लिए बनाई गई फिल्म है जिनके लिए वेक अप सिड, गुलाल, शोर इन द सिटी, प्यार का पंचनामा और जिंदगी न मिलेगी दोबारा जैसी फिल्में बनाई गई हैं। ऐसा सिनेमा जो हल्के-फुल्के मूड में कई जटिल विषयों के उत्तर छोडऩे के साथ कई प्रश्न भी खड़ा कर जाता है। दर्शक यदि सीखना चाहें तो ऐसी फिल्मों से सीख कर निकलते हैं। बॉलीवुड को यह बात अच्छी तरह से समझ आने लगी है कि किसी भी प्रेम का सबसे बेहतरीन अंत सिर्फ शादी नहीं होता। हर संबंध को शादी में लाकर खत्म कर देना वाला सिनेमा अब शादी से अलग भी संपूर्णता खोजना शुरू कर चुका है। शुभ संकेत। यह फिल्म इमरान खान और करीना कपूर के लिए इसलिए भी याद रखी जाएगी क्यों कि इन दोनों कलाकारों ने अपनी इमेज किरदार पर हावी नहीं होने दी। करीना कपूर हर कहीं से कहानी वाली रैयना ब्रेंगजा लगती हैं और इमरान राहुल कपूर। इस फिल्म की यूएसपी इसकी सिचुवेशनल कॉमेडी है। फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं जो बगैर किसी संवाद के आपको हंसाते हैं। हंसने के साथ-साथ बगैर किसी हो-हल्ले और चीख चिल्लाहट के हम पात्रों के दुखों को समझने लगते हैं। न तो बिना मतलब के आंसू और न ही बिना मतलब की ओवरऐक्टिंग। परंपरागत सिनेमा देखने और उसके आदी हो चुके दर्शक संभव है कि इस पूरी फिल्म को ही नकार दें।
यह फिल्म उन दर्शकों को थोड़ी निराश करती है जिन्हें अग्निथ या अग्निथ जैसी लार्जर दैन लाइफ फिल्में पसंद आती हैं। यकीन भी नहीं आता कि अग्निथ और एक मैं और एक तू एक ही समय और एक ही निर्माता की बनाई हुई फिल्में हैं। यह फिल्म दरअसल फिलासफिकल सिनेमा देखने वाले दर्शकों को रास आ सकती है। यह उन्हीं मुट्ठी भर अरबन दर्शकों के लिए बनाई गई फिल्म है जिनके लिए वेक अप सिड, गुलाल, शोर इन द सिटी, प्यार का पंचनामा और जिंदगी न मिलेगी दोबारा जैसी फिल्में बनाई गई हैं। ऐसा सिनेमा जो हल्के-फुल्के मूड में कई जटिल विषयों के उत्तर छोडऩे के साथ कई प्रश्न भी खड़ा कर जाता है। दर्शक यदि सीखना चाहें तो ऐसी फिल्मों से सीख कर निकलते हैं। बॉलीवुड को यह बात अच्छी तरह से समझ आने लगी है कि किसी भी प्रेम का सबसे बेहतरीन अंत सिर्फ शादी नहीं होता। हर संबंध को शादी में लाकर खत्म कर देना वाला सिनेमा अब शादी से अलग भी संपूर्णता खोजना शुरू कर चुका है। शुभ संकेत। यह फिल्म इमरान खान और करीना कपूर के लिए इसलिए भी याद रखी जाएगी क्यों कि इन दोनों कलाकारों ने अपनी इमेज किरदार पर हावी नहीं होने दी। करीना कपूर हर कहीं से कहानी वाली रैयना ब्रेंगजा लगती हैं और इमरान राहुल कपूर। इस फिल्म की यूएसपी इसकी सिचुवेशनल कॉमेडी है। फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं जो बगैर किसी संवाद के आपको हंसाते हैं। हंसने के साथ-साथ बगैर किसी हो-हल्ले और चीख चिल्लाहट के हम पात्रों के दुखों को समझने लगते हैं। न तो बिना मतलब के आंसू और न ही बिना मतलब की ओवरऐक्टिंग। परंपरागत सिनेमा देखने और उसके आदी हो चुके दर्शक संभव है कि इस पूरी फिल्म को ही नकार दें।
Saturday, January 28, 2012
लो लौट आया अंधा कानून का युग
फिल्म समीक्षा: अग्निपथ
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हेंं देखते वक्त आप सिर्फ फिल्म के बारे में सोचते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद एक सेकेंड नहीं। अग्निपथ वैसी ही फिल्म है। लगभग सवा तीन घंटे की यह फिल्म आपको एक अलग दुनिया में ले जाकर खड़ा कर देती हैं। जहां पर आपके तर्क चुप होकर फिल्म का मजा ले रहे होते हैं। आप तार्किक मस्तिष्क यह जानता है कि किसी भी देशकाल में मुंबई में सरेआम लड़कियां बेचने का बाजार नहीं सजा, आप जानते हैं कि कोई कांचा नाम का व्यक्ति किसी को यूंही फांसी नहीं चढ़ा सकता। आप यह भी जानते हैं कि कि तीन बार चाकू पेट से निकलने के बाद फाइट नहीं की जा सकती, फिर भी हम ऐसे दृश्यों पर विश्वास करते हैं। यह निर्देशक और अभिनेताओं की जीत है, कि हम उनके दुख और सुख को लेकर जज्बाती होते हैं। नायक को पडऩे वाला तमाचा हमे लगता है। अग्निथ ९० के दशक की अंधा कानून टाइप फिल्मों की याद दिलाती हैं जिन्हें देखकर जब दर्शक सिनेमाघरों से बाहर निकलता था तो उसका लगता था कि दुनिया उतनी बुरी नहीं जितनी कि दिखाई गई है। शोषण और बदले का स्वांग अरसे बाद किसी मुख्य धारा की फिल्म में इतनी भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया है। कुछ नया सिनेमा रचने और देखने की ख्वाहिश रखने वाले मुट्ठी पर लोग ऐसी फिल्मों की अपार सफलता से दुखी हो सकते हैं। डर इस बात का होगा कि कहीं ऐसी फिल्मों की कतार न लग जाए। इस अग्निथ में यह कहीं नहीं दर्शाया गया कि फिल्म का देशकाल क्या है। ब्लैक एंड व्हाइट अखबार, और दूरदर्शन देखकर यह अंदाजा भर लगता है कि फिल्म आज से करीब ३० बरस पहले की है। १९९० में जब यश जौहर ने अमिताभ बच्चन को लेकर यह फिल्म बनाई थी तब फिल्म का ढांचा उतना नकली और फिल्मी नहीं लगा होगा जितना की अब लगता है। फिल्म का सबसे प्रभावकारी पक्ष अभिनय है। अभिनय के मामले में संजय दत्त और रितिक रोशन से ऊपर का दर्जा ऋषि कपूर को दिया जाएगा। जितनी देर वह पर्दे पर रहते हैं वही छाए रहते। चिकनी चमेली अच्छी लगी हैं। फिल्म का सबसे खराब पक्ष संपादन है। तीस मिनट आराम से काटे जा सकते थे। अब चंूकि फिल्म चल रही इसलिए इस बात की चर्चा नहीं होगी। यदि आप टाइमपास के लिए फिल्म देखते हैं तो फिल्म आपके लिए है।
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हेंं देखते वक्त आप सिर्फ फिल्म के बारे में सोचते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद एक सेकेंड नहीं। अग्निपथ वैसी ही फिल्म है। लगभग सवा तीन घंटे की यह फिल्म आपको एक अलग दुनिया में ले जाकर खड़ा कर देती हैं। जहां पर आपके तर्क चुप होकर फिल्म का मजा ले रहे होते हैं। आप तार्किक मस्तिष्क यह जानता है कि किसी भी देशकाल में मुंबई में सरेआम लड़कियां बेचने का बाजार नहीं सजा, आप जानते हैं कि कोई कांचा नाम का व्यक्ति किसी को यूंही फांसी नहीं चढ़ा सकता। आप यह भी जानते हैं कि कि तीन बार चाकू पेट से निकलने के बाद फाइट नहीं की जा सकती, फिर भी हम ऐसे दृश्यों पर विश्वास करते हैं। यह निर्देशक और अभिनेताओं की जीत है, कि हम उनके दुख और सुख को लेकर जज्बाती होते हैं। नायक को पडऩे वाला तमाचा हमे लगता है। अग्निथ ९० के दशक की अंधा कानून टाइप फिल्मों की याद दिलाती हैं जिन्हें देखकर जब दर्शक सिनेमाघरों से बाहर निकलता था तो उसका लगता था कि दुनिया उतनी बुरी नहीं जितनी कि दिखाई गई है। शोषण और बदले का स्वांग अरसे बाद किसी मुख्य धारा की फिल्म में इतनी भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया है। कुछ नया सिनेमा रचने और देखने की ख्वाहिश रखने वाले मुट्ठी पर लोग ऐसी फिल्मों की अपार सफलता से दुखी हो सकते हैं। डर इस बात का होगा कि कहीं ऐसी फिल्मों की कतार न लग जाए। इस अग्निथ में यह कहीं नहीं दर्शाया गया कि फिल्म का देशकाल क्या है। ब्लैक एंड व्हाइट अखबार, और दूरदर्शन देखकर यह अंदाजा भर लगता है कि फिल्म आज से करीब ३० बरस पहले की है। १९९० में जब यश जौहर ने अमिताभ बच्चन को लेकर यह फिल्म बनाई थी तब फिल्म का ढांचा उतना नकली और फिल्मी नहीं लगा होगा जितना की अब लगता है। फिल्म का सबसे प्रभावकारी पक्ष अभिनय है। अभिनय के मामले में संजय दत्त और रितिक रोशन से ऊपर का दर्जा ऋषि कपूर को दिया जाएगा। जितनी देर वह पर्दे पर रहते हैं वही छाए रहते। चिकनी चमेली अच्छी लगी हैं। फिल्म का सबसे खराब पक्ष संपादन है। तीस मिनट आराम से काटे जा सकते थे। अब चंूकि फिल्म चल रही इसलिए इस बात की चर्चा नहीं होगी। यदि आप टाइमपास के लिए फिल्म देखते हैं तो फिल्म आपके लिए है।
Friday, January 13, 2012
सिर्फ अभिनय के बूते फिल्म ढोने की असफल कोशिश
फिल्म समीक्षा: चालीस चौरासी
यह फिल्म इंटरवल के बाद आपको अच्छी लगनी शुरू हो सकती है पर तब तक देर हो चुकी होती है। ह्रदय शेट्टी निर्देशित यह फिल्म पहली निगाह में आपको अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया या सुधीर मिश्रा टाइप की फिल्म लग सकती है। अच्छी बात यह है कि दबंग, बॉडीगार्ड और रॉ-वन जैसी फिल्मों के साथ चालीस चौरासी, यह साली जिंदगी, साहब बीवी और गैंगस्टर जैसी फिल्में भी बन रही हैं। पर ऐसी फिल्में बना भर लेने से ऐसी फिल्म बनाने का जोखिम लेने वालों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। इस फिल्म के साथ ऐसा ही हुआ है। चालीस चौरासी के निर्देशक ने चार ऐसे कलाकार तो चुने जो वाकई ऐक्टिंग कर लेते हैं। समस्या कहानी और पटकथा स्तर की है। दरअसल निर्देशक के पास जो कहानी थी वह ३० मिनट की थी। यह तीस मिनट क्लाइमेक्स के हैं और बेहतर हैं। फिल्म के बाकी बचे १ घंटे तीस मिनट इन अच्छे ३० मिनटों पर भी पानी फेर देते हैं। बिना अच्छी पटकथा के सिर्फ अभिनय के बूते कोई फिल्म नहीं चलाई जा सकती है यह बात तो निर्देशक को समझनी चाहिए थी। पर कर्मिश्यल फिल्मों से निकल कुछ अलग बनाने बनाने की खुशफहमी निर्देशक पर इतनी ज्यादा थी कि वह और कुछ सोच नहीं पाए।
यह फिल्म इंटरवल के बाद आपको अच्छी लगनी शुरू हो सकती है पर तब तक देर हो चुकी होती है। ह्रदय शेट्टी निर्देशित यह फिल्म पहली निगाह में आपको अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया या सुधीर मिश्रा टाइप की फिल्म लग सकती है। अच्छी बात यह है कि दबंग, बॉडीगार्ड और रॉ-वन जैसी फिल्मों के साथ चालीस चौरासी, यह साली जिंदगी, साहब बीवी और गैंगस्टर जैसी फिल्में भी बन रही हैं। पर ऐसी फिल्में बना भर लेने से ऐसी फिल्म बनाने का जोखिम लेने वालों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। इस फिल्म के साथ ऐसा ही हुआ है। चालीस चौरासी के निर्देशक ने चार ऐसे कलाकार तो चुने जो वाकई ऐक्टिंग कर लेते हैं। समस्या कहानी और पटकथा स्तर की है। दरअसल निर्देशक के पास जो कहानी थी वह ३० मिनट की थी। यह तीस मिनट क्लाइमेक्स के हैं और बेहतर हैं। फिल्म के बाकी बचे १ घंटे तीस मिनट इन अच्छे ३० मिनटों पर भी पानी फेर देते हैं। बिना अच्छी पटकथा के सिर्फ अभिनय के बूते कोई फिल्म नहीं चलाई जा सकती है यह बात तो निर्देशक को समझनी चाहिए थी। पर कर्मिश्यल फिल्मों से निकल कुछ अलग बनाने बनाने की खुशफहमी निर्देशक पर इतनी ज्यादा थी कि वह और कुछ सोच नहीं पाए।
Friday, January 6, 2012
बहुत दिन बाद दिखे शोले वाले रमेश सिप्पी
फिल्म समीक्षा प्लेयर्स
प्लेयर्स के बारे में यह चर्चा थी कि यह हॉलीवुड फिल्म द इटालियन जॉब का रीमेक है। इस चर्चा से अब्बास-मस्तान वाकई दुखी हुए होंगे। क्यों कि सच्चाई यह है कि प्लेयर्स हॉलीवुड फिल्म का हिंदी रीमेक होने के साथ-साथ कई हिंदी फिल्म निर्देशकों के प्रिय दृश्यों का कॉकटेल भी है। फिल्म में इन दृश्यों का छिडक़ाव किया गया है। इस फिल्म में जहां-जहां कॉमेडी हुई है डेविड धवन याद आए हैं, जहां इमोशन हैं वहां करन जौहर और क्लाइमेक्स में शोले वाले रमेश शिप्पी। शोले की तर्ज पर यहां खलनायक को हीरो नहीं मारता उसे फिल्म की नायिका मारती है क्यों कि उसे अपने बाप की मौत का बदला लेना होता है। फिल्म में सोना लूटो अभियान समिति के सदस्य मास्को की चलती ट्रेन से सोना लूटते हैं। सोना लूट लिया जाता है। यह इंटरवल तक की कहानी है। इंटरवल के बाद की कहानी बेहद घटिया और फिल्मी फॉर्मूलों के साथ आगे बढ़ती है। एक-दूसरे के साथ धोखा, डबल क्रास जैसे दृश्य और कहानी हम ढेर सी फिल्मों में देख चुके हैं। प्लेयर्स में ऐसा कुछ भी नया नहीं है। अभिनय पक्ष इस फिल्म का सबसे गंदा पक्ष है। अभिषेक बच्चन धूम में किए गए अभिनय की जेरॉक्स कॉपी जैसे दिखते हैं और विपाशा बसु अजनबी फिल्म जैसी। सोनम कपूर आयशा या आयत बनकर ही अच्छी लगती हैं। इस फिल्म वह कायदे से संवाद भी नहीं बोल पाईं हैं। नील नितिन मुकेश को इतनी बड़ी और प्रभावी भूमिका मिलना चौंकाता है। ओमी वैद्य अभी थ्री इडियट्स के खुमार से नहीं निकल पाए हैं। बिचारे कम बोलने वाले बॉबी देओल को सोना लूटते ही सुला दिया गया। चुप रहकर बढिय़ा ऐक्टिंग कर रहे थे वह।
प्लेयर्स के बारे में यह चर्चा थी कि यह हॉलीवुड फिल्म द इटालियन जॉब का रीमेक है। इस चर्चा से अब्बास-मस्तान वाकई दुखी हुए होंगे। क्यों कि सच्चाई यह है कि प्लेयर्स हॉलीवुड फिल्म का हिंदी रीमेक होने के साथ-साथ कई हिंदी फिल्म निर्देशकों के प्रिय दृश्यों का कॉकटेल भी है। फिल्म में इन दृश्यों का छिडक़ाव किया गया है। इस फिल्म में जहां-जहां कॉमेडी हुई है डेविड धवन याद आए हैं, जहां इमोशन हैं वहां करन जौहर और क्लाइमेक्स में शोले वाले रमेश शिप्पी। शोले की तर्ज पर यहां खलनायक को हीरो नहीं मारता उसे फिल्म की नायिका मारती है क्यों कि उसे अपने बाप की मौत का बदला लेना होता है। फिल्म में सोना लूटो अभियान समिति के सदस्य मास्को की चलती ट्रेन से सोना लूटते हैं। सोना लूट लिया जाता है। यह इंटरवल तक की कहानी है। इंटरवल के बाद की कहानी बेहद घटिया और फिल्मी फॉर्मूलों के साथ आगे बढ़ती है। एक-दूसरे के साथ धोखा, डबल क्रास जैसे दृश्य और कहानी हम ढेर सी फिल्मों में देख चुके हैं। प्लेयर्स में ऐसा कुछ भी नया नहीं है। अभिनय पक्ष इस फिल्म का सबसे गंदा पक्ष है। अभिषेक बच्चन धूम में किए गए अभिनय की जेरॉक्स कॉपी जैसे दिखते हैं और विपाशा बसु अजनबी फिल्म जैसी। सोनम कपूर आयशा या आयत बनकर ही अच्छी लगती हैं। इस फिल्म वह कायदे से संवाद भी नहीं बोल पाईं हैं। नील नितिन मुकेश को इतनी बड़ी और प्रभावी भूमिका मिलना चौंकाता है। ओमी वैद्य अभी थ्री इडियट्स के खुमार से नहीं निकल पाए हैं। बिचारे कम बोलने वाले बॉबी देओल को सोना लूटते ही सुला दिया गया। चुप रहकर बढिय़ा ऐक्टिंग कर रहे थे वह।
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