Monday, August 26, 2013

मद्रास कैफे फिल्म इंडस्ट्री के जवां होने की कहानी कहती है




नौकरीपेशा लोगों को मुख्य रूप से दो कैटेगरी में बांटा जा सकता है। पहले वे जो नौकरी करते हैं। नौकरी के बने-बनाए फॉर्मेट को अपने डीएनए में समाकर नौकरी करना चाहते हैं। नौकरी करते-करते वह नौकरी करने के कुछ शॉर्टकट टूल खोज लेते हैं ताकि उनकी एक ढांचागत नौकरी थोड़ी सुविधाजनक और सुरक्षित हो जाए। एक और तरह के लोग भी नौकरी में होते हैं। इनकी संख्या थोड़ी ही होती है। वह उस प्रोफेशन को कुछ नया देने के मकसद उस इंडस्ट्री में आते हैं। चल रही विधाओं की तो उनमें समझ होती ही है वह कुछ नई विधाओं का इजात भी करना चाहते हैं। शायद अपने प्रोफेशन को आगे ले जाने के लिए। ऐसा करते-करते वह कई बार खुद को और अपनी नौकरी को भी असुरक्षित कर लेते हैं।

नौकरीपेशा लोगों की तरह फिल्म इंडस्ट्री के फिल्मकार भी है। बदले हुए प्रसंगों में कुछ इन्हीं फितरतों के साथ। जाहिर है कि पहली कैटेगरी की संख्या यहां भी ज्यादा है। ज्यादातर फिल्मकारों की सोच और प्राथमिकताएं चल रहे पैटर्न को ही अधिक सुविधाजनक और लोकप्रिय बनाकर पेश कर देने की होती है। चूंकि ज्यादातर लोग उसी मानसिकता पर चीजों को ग्रहण और खारिज करते हैं इसलिए यह फिल्में हिट भी होती हैं। पर कुछ फिल्मकार ऐसे भी होते हैं जो मद्रास कैफे बनाते हैं। जो शंघाई या गुलाल बनाते हैं। जो काइट के बाद बर्फी बनाते हैँ। शूजित सरकार की फिल्म मद्रास कैफे इंडस्ट्री को कुछ देकर जाने वाली सोच के साथ बनाई गई फिल्म है। यह फिल्म एक ऐसे समय पर बनाई गई है जब मल्टीप्लेक्सों में चेन्नई एक्सप्रेस और वंस अपॉन ए टाइम इन दोबारा जैसी फिल्में चल रही होती हैं। यह फिल्में हिट हैं। यानीकि सुविधाजनक और लोकप्रिय स‌िनेमा को रचने का फॉर्मेट पहले से ही तय है।

मुझे नहीं पता कि मद्रास कैफे उन बी‌वियों की शाम में मनोरंजन घोल पाएगी या नहीं जो पूरे हफ्ते शनिवार या रविवार की शाम का इंतजार किया करती हैं। एक फिल्म, कुछ शॉपिंग और उसके बाद डिनर का। मुझे यह भी नहीं पता कि स‌ाजिद खान जैसा ‌कोई निर्देशक इस फिल्म की खिल्ली उड़ाएगा या नहीं। लेकिन मुझे यह जरूर पता है कि यह ऐसी फिल्म है जिस पर हिंदी सिनेमा दर्शकों को बताने के साथ विश्‍व के सिनेमा को बता सकता है कि हम सिर्फ दबंग, जब तक है जान और बॉडीगार्ड ही नहीं रच रहें। हम कुछ ऐसी फिल्में भी बना लेते हैं जिन्हें फिल्में कहा जा सके।

मद्रास कैफे देखते वक्त जब यह फिल्म क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ रही थी तब मेरे ठीक बगल में बैठे 24-25 साल के दो युवा इंटरनेट पर राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़ी जानकारी अपने स्मार्टफोने में खंगाल रहे थे। मुझे नहीं याद पड़ता कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों कितनी ऐसी फिल्में बनती हैं जिन्हें देखते वक्त या देखने के बाद हमें कुछ पढ़ने का मन करे। उसे पढ़कर फिल्म के मूल को समझने का मन करे।

मद्रास कैफे पूरी तरह से न तो युद्घ फिल्म है और न ही राजनीतिक। यह फिल्म तो राजीव गांधी को भी पूर्व प्रधानमंत्री और प्रभाकरन को अन्ना कहकर अपने को बचाती हुई चलती है। जाहिर है कि यह फिल्म किसी भी विवाद में पड़े बिना कुछ ऐसी बातों की चर्चा करना चाहती थी जिनकी चर्चा 70 एमएम के पर्दे पर कम से कम इस अंदाज में तो नहीं हुई है।

एक फिल्म के रूप में मद्रास कैफे की कुछ कमियां निकाली जा सकती है। कुछ कलाकारों के चयन पर भी प्रश्‍न खड़े किए जा सकते हैं, नरगिस फाकरी के अंग्रेजी बोलने पर शुजीत सरकार की क्लीस ली जा सकती है। लेकिन जैसे ही हमारा दायरा इस फिल्म को लेकर विस्तृत होता है वैसे-वैसे यह कमियां खटकती तो हैं पर इन्हें अंडरलाइन करने का मन दर्शकों का नहीं होता है। फिल्म की सेनेमेटोग्राफी स्किप्ट की तरह ही खूबसूरत है। बैकग्राउंड स्कोर भी दृश्यो की भव्यता को बार-बार बढ़ाने का काम करते हैं। जॉन अब्राहम की यह फिल्‍म दिखाती है कि उन्हें गरम मसाला और देशी ब्वॉयज जैसी फिजूल की फिल्में नहीं करनी चाहिए।







Saturday, August 17, 2013

'दीवार' में नवीन निश्‍चल = 'वंस' में अक्षय कुमार

यश चोपड़ा जब 'दीवार' बना रहे थे तो उनके मन में इस फिल्म के लिए नवीन निश्चल और राजेश खन्ना के नाम थे। यह तय नहीं हुआ था कि छोटा कौन होगा और बड़ा कौन। फिल्‍म की स्क्रिप्ट सलीम-जावेद के पास थी। जब स्क्रिप्ट पूरी हुई तो सलीम और जावेद को महसूस हुआ कि बड़े भाई के रोल के लिए अमिताभ बच्चन फिट होंगे और छोटे के लिए शशि कपूर। यश चोपड़ा मान गए। इसके बाद अमिताभ और श्‍ाशि भी। दीवार आपके सामने है। कल्पना कीजिए जिन संवादों को अमिताभ बच्चन ने बोला था उन्हें नवीन निश्‍चल या राजेश खन्ना अपने चिरपरिचति अंदाज में बोल रहे होते। "जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ"। इस संवाद को पहले राजेश खन्ना के मुंह में डालकर देखिए फिर नवीन के। फिल्म का यह चेहरा सोचकर ही घबराहट होती है।

जो गलती यश चोपड़ा करते-करते बच गए थे वही गलती मिलन लूथरिया ने वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा में कर दी है। इस बार रजत अरोड़ा ने उन्हें रोका भी नही। वह सिर्फ इस खुमार में जीते रहे कि उनके लिखे डायलॉग इतने दमदार हैं कि वे किसी से भी बोलवा लिए जाए फिल्‍म में समां बांध देंगे। वंस अपान एक के बाद एक कई गलतियां करती है। पहली गलती कहानी की। आप एक ऐसे गैंगस्टर को क्लाइमेक्स में सड़क पर फाइट करते नहीं दिखा सकते जो भारत का मोस्ट वांटेड अपराधी हो। बची कसर गैंगस्टर के प्यार में पड़ जाने के बाद पूरी हो जाती है। पर फिल्म खराब इसलिए नहीं क्योंकि वह अतार्किक है।

अगर तार्किकता की वजह से भारत में फिल्में फ्लॉप होतीं तो जब तक है जान तीन करोड़ और चेन्नई एक्सप्रेस पांच करोड़ कमा रही होतीं। यानी कि मामला तार्किक होने या न होने का नहीं है। वंस अपॉन की मूल कमजोरी पात्रों को गलत तरीके से चुनकर उन्हें पर्दे पर पेश करने का है। उम्दा अभिनेता अक्षय कुमार गैंगस्टर की एक बिना मतलब वाली बॉडी लैंग्वेज के साथ पूरी फिल्म में डायलॉग डिलवरी करते रहे। समझ ही नहीं आता कि वह कब गुस्सा हैं और कब अपना सेंस ऑफ ह्रयूमर पिद्दी से नायक पर बखार रहे हैं। मिलन लूथरिया को यह बात शायद एडटिंग टेबल पर भी समझ नहीं आई कि ‌सिर्फ अक्षय कुमार के मुंह में अच्छे संवाद ठूस कर उगला देने से वह गैंगस्टर नहीं लगेंगे।

इससे बुरा हाल छोटे गैंगस्टर का रहा है। इमरान खान से फिलहाल जाने तू या जाने न और एक मैं हूं और एक तू जैसी फिल्में ही करायी जा सकती है। विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरू की बिजली का मनडोला यदि एक बड़ी फिल्म नहीं बन पाती है तो उसकी कमजोर कड़ी इमरान खान हैं। मटरू या वंस अपॉन जैसे रोल के लिए इंडस्ट्री के पास बेहतर अभिनेता हैं। वह ऐसा अभिनेता हैं जो शायद सिर्फ इन्हीं भूमिकाओं के लिए फिल्मों में बने हुए हैं।

सोनाक्षी सिन्हा इन दोनों से इसलिए बेहतर लग जाती हैं क्योंकि उनका किरदार उनके रोल के आसपास का था। यदि आप एक मैं हूं और एक तू फिल्म में करीना को हटाकर सोनाक्षी को कर दें तो उनकी भी हालत वंस अपॉन के इमरान जैसी हो जाएगी। अच्छे से अच्छा संवाद हमें तब अखरने लगता है जब उसके लिए खराब चरित्र चुना जाए। यही फिल्म के साथ लगातार होता है। यह फिल्म अपनी मिसमैच कॉस्टिंग के लिए हमेशा याद रखी जाएगी। साथ ही यह फिल्म ऐसी फिल्म के रूप में भी याद की जाएगी जिस फिल्म के पास हीरो था ही नहीं। था तो बस विलेन, नायिका और विलेन का हेल्पर।

Saturday, August 3, 2013

यह एडल्ट फिल्म सेक्स के प्रति हमारा मोहभंग करती है

यह फिल्मकारों का भारतीय दर्शकों की रुचि और उनकी प्राथमिकता पर पूर्वाग्रह और अविश्वास ही है कि उन्हें बीए पास जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण फिल्म को भी सेक्स फिल्म कहकर प्रचारित करना पड़ता है। यदि ऐसा न किया गया होता तो निश्चित ही रात 11 बजे का शो 50 फीसदी भरा न होता। सेक्स का रैपर दर्शकों को थिएटर तक खींचकर लाता है। लेकिन इस रैपर के खुलने के बाद अलग दुनिया है। यकीनन इस फिल्म का ढांचा सेक्स के इर्द-गिर्द ही बुना गया है, भले ही फिल्म के ज्यादातर दृश्य सेक्स और उसकी रूपरेखा में ही बीतते हो बावजूद इसके यह फिल्म एक जगह भी सेक्स को मजे के रूप में पेश नहीं करती। यह फिल्म सेक्स के प्रति दर्शकों की संवेदनाएं वहां भी नहीं जगाती जहां फिल्म का मजबूर नायक मजबूरी में ही सही पर हो रहे सेक्स में मजे के चंद पल तलाशता है। इस फिल्म में सेक्स से बड़ी नायक की दुश्‍वारियां हैं। दर्शक पर्दे पर सेक्स देखने जाते जरूर हैं लेकिन फिल्म खत्म होते-होते उन्हें उन पात्रों से नफरत होने लगती है जो सेक्स के मजे लूट रहे होते हैं। यह हिंदी की शायद पहली फिल्म है जो पुरुष वेश्या को इस तरह से पेश करती है। गिनाने को तो देशी ब्वॉयज सहित कुछ और फिल्में भी पुरुष वेश्या की कहानी अलग-अलग तरीकों से कह चुकी हैं। लेकिन उनमें क्या है यह बताने की जरूरत नहीं। फिल्म का अंत बहुत यथार्थपरक और कष्ट देने वाला है। हालांकि अंत को पूरी तरह से न दिखाकर भी फिल्म खत्म की जा सकती थी। जरूरी नहीं था कि हम नायक को खत्म होता ही दिखा देते। ऐसा भी हो सकता था हम नायक को कुछ न कर पाने वाले हालत में ही छोड़कर चले जाते। उसके फोन की घंटी बजाकर करती और पुलिस उसे चारो तरफ घेर हुए होती। सुखांत या ड्रामेटिक क्लाइमेक्स के आदी हो चुके दर्शकों को फिल्म का क्लाइमेक्स जड़ कर देता है। हॉल छोड़ने पर जब दर्शक अपनी निजी जिंदगी में आता है तो उसे इस बात की तसल्ली मिलती है कि ‌थैंक्स गॉड यह एक फिल्म थी और मेरी जिंदगी ऐसी नहीं हैं। फिल्म कुछ और बातों पर कुछ कहने की कोशिश करती है। खासकर सेक्स से अतृप्त अधेड़ महिलाओं की अवसरवादिता हमें मोहभंग की स्थिति तक ले जाती है। इस फिल्म के कलाकारों का अभिनय एक बार फिर बताता है कि फिल्म एक निर्देशक का माध्यम है। वह अपने अनुसार कलाकारों से अभिनय करवा लेता है। परिवार के अलग-अलग सदस्यों द्वारा अलग-अलग जरूरी तौर पर देखी जाने वाली एक वयस्क फिल्म

Saturday, July 13, 2013

समीक्षकों के लुटाए स्टारों पर न जाइए, यह फिल्म आपको मिल्‍खा सिंह का सरकारी विज्ञापन भी लग सकती है

'भाग मिल्‍खा भाग' बहुत मेहनत और ईमानदारी से बनायी हुई फिल्म है। ईमानदारी के साथ एक समस्या होती है। वह खूब सारी अच्छाईयों के साथ कुछ कमियां भी जुटा लेती है। जैसे कि जब हम ईमानदार होते हैं तब हम यह परवाह करना बंद कर देते हैं कि सामने वाला ईमानदारी से किए हुए हमारे काम को सराहेगा या नहीं। कुछ-कुछ ऐसा ही 'भाग मिल्‍खा भाग' के साथ होता है।
'भाग मिल्‍खा भाग' मिल्‍खा सिंह को बताने में इतनी ईमानदार हो जाती है कि वह भूल जाती है कि आखिरकार वो है एक फिल्म। दर्शक जब टिकट खरीद रहा होता है तो उसके जेहन में एक फिल्‍म होती है। दर्शक टिकट मिल्‍खा सिंह की जिंदगी को देखने को देखने के लिए नहीं बल्कि उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म देखने के लिए टिकट खिड़की पर खड़ा होता है। फिल्म में एकमात्र खटकन इस फिल्म में फिल्म में 'फिल्म' का न होना है। 'भाग मिल्‍खा भाग' कई जगहों पर मिल्‍खा सिंह का सरकारी विज्ञापन नजर आती है। मिल्‍खा सिंह से जुड़े हुए छोटे-छोटे किस्सों को ‌इतना डिटेल कर दिया है कि कहीं-कहीं पर लगता है कि यह हीरो हम पर थोपा जा रहा है। कि साहब मिल्‍खा सिंह पर ताली बजाइए। वह एक रेस और जीत आया है। हीरो को हीरो न दिखाकर भी उसे हीरो बनाने की तीन फिल्मों का जिक्र करता हूं। एक फिल्म राकेश मेहरा की 'रंग दे बसंती' ही है। आमिर खान उस फिल्म के हीरो होते हैं। फिल्म का मीटर आमिर ही तय कर रहे होते हैं लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि आमिर हम पर थोपे जा रहे हैं। दूसरी फिल्म राजकुमार हिरानी की है। आमिर यहां भी हैं। 'थ्री इडिट्स' का हीरो तमाम सारी खूबियां रखता है लेकिन फिल्म उसे हीरो के रूप में महिमामंडित नहीं करती। हीरो प्रतिभाशाली है लेकिन उसमें एक इंसान के रूप कई सारी कमियां हैं। 'पान सिंह तोमर' का हीरो भी हम पर थोपा नहीं गया। हम सहज की उसकी विवशताओं के संग हो लेते हैं और उसे हीरो बना देते हैं। 'भाग मिल्‍खा भाग' के कई सीन ऐसे हैं जहां हीरो को एक हीरो के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। कुछ किस्से हमें अच्छे लगते हैं, हम उनमें भावुक होते हैं और उस हीरो को नमन करते हैं, लेकिन हम हर बार उसे हीरो बनता नहीं देखना चाहते। तमाम अच्छाईयों के साथ 'भाग मिल्‍खा भाग' की एक कमी यह भी है कि यह फिल्म दर्शकों के रोमांच और जिज्ञासा के शिखर पर लाकर उन्हें स्‍खलित होने का सुख नहीं देती। यह फिल्म कभी रोमांच के पहाड़ को सतत न चढ़कर कहीं-कहीं बिल्कुल फ्लैट हो जाती है। चूंकि फिल्‍म का मुख्य विषय दौड़ ही है इसलिए कई जगह यह अपने को दोहराती भी है। 'मौसम' फिल्म की तरह इस फिल्म का संपादन करने वाले संपादक शायद राकेश ओमप्रकाश मेहरा के बौ‌द्घिक आतंक और आग्रह से घबराए रहे होंगे। यह फिल्म आसानी से 40 मिनट छोटी हो सकती थी। कुछ नयी उपकथाएं जोड़ी जा सकती थी। कुल मिलाकर भाग मिल्‍खा भाग एक अच्छी फिल्म है जो यदि ईमानदारी से संपादित की जाती तो मनोरंजक भी हो सकती थी। इस फिल्म को देखते वक्त आशुतोष गौरवीकर की 'खेलें हम जी जान से' याद आती है।