Monday, February 24, 2014

'हाइवे' की आलोचना करना बहुत आसान है, गलती आपकी है भी नहीं...


कोई फिल्‍म जब छूटती है तो उस समय मल्टीप्लेक्सों के कॉरीडोर या गलियारे उस फिल्म की चर्चाओं से पटे होते हैं। आमतौर पर उस समय मुंह से निकलने वाली टिप्पणियां स्वाभाविक होती हैं। शुक्रवार की रात एक मल्टीप्लेक्स में जब हाइवे का हाऊसफुल शो खत्म हुआ तो नजारा ऐसा नहीं था। लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वह इस फिल्म की तारीफ करें या घनघोर बुराई।

सभी एक-दूसरे की की टिप्पणी का इंतजार कर रहे थे। उनका मन यह जज नहीं कर पा रहा था कि फिल्‍म अच्छी है या बुरी। दर्शक इस फिल्‍म पर सोचे हुए को ही सोचना चाहते थे। कोई आकर कह दे कि अच्छी है तो उनके पास अच्छे के लिए तर्क थे और कोई कह दे कि बुरी है तो बुरे के लिए तर्क।

यह दुविधा सिर्फ दर्शकों में नहीं रही। फिल्म समीक्षक भी इस भ्रम से घिरे नजर आए। शुरुआती प्रतिक्रियाएं यह आईं कि फिल्म बुरी है। बुरी होने के पीछे ठोस धाराणाएं नहीं थी। खराब होने के पीछे तर्क यह थे कि फिल्म स्लो है और ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें कही गईं। वह भी आलिया भट्ट के मुंह से। फिर कहीं से तारीफ का स्वर छूटे और लोग तारीफें करने लगे।

हाइवे दरअसल दो फिल्मों का एक संयुक्त गठबंधन है। और यह बेमेल गठबंधन है। फिल्म की कमजोरी यही है कि यह गंठबधंन कहीं से मेल नहीं खाता। थोड़ा सब्जेक्टिव बात करते हैं। जो लोग यह फिल्‍म देख चुके हैं उन्हें यह बात आसानी से समझ आ जाएगी कि यदि 'शुक्ला अंकल वाला चैप्टर' पूरी तरह से फिल्म से निकाल भी दिया जाए तो फिल्म की सेहत पर फर्क नहीं पड़ता। या इस तर्क पर भी बात की जा सकती है कि शुक्‍ला अंकल वाला चैप्टर फिल्म में डाला ही क्यों गया। लेकिन क्या कुछ कथित गैरजरूरी दृश्यों की वजह से फिल्म खारिज की जा सकती है।

फिल्म को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं इसलिए आईं क्योंकि मन अच्छे होने या बुरे होने का आकलन अपने पिछले अनुभव से करता है। हाइवे की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि यह फिल्म अपनी बनावट और क्रॉफ्ट दोनों में ही नई शैली की फिल्‍म है।

मुझे तो नहीं याद आ रहा है कि हिंदी फिल्‍मों में कोई ऐसी कहानी आज तक दिखी है जिसमें नायक और नायिका के बीच आकर्षण तो हो लेकिन यह आकर्षण प्रेमी वाला आकर्षण न हो। मुझे यह भी याद नहीं आ रहा है कि रणदीप हुड्डा जैसे सख्त चेहरे और जरूरत से ज्यादा कमसिन और मासूम आलिया की जोड़ी इसके पहले कभी फिल्मों में बनी हो। सड़क के इर्द-गिर्द सिमटी स्वाभाविक खूबसूरती को कभी इस तरह से नहीं देखा गया।

लोगों को इस खारिज या स्वीकार्य करने में तब शायद ज्यादा सुविधा होती कि आलिया उस खूनी ट्रक वाले से प्यार कर लेतीं और वह ट्रक वाला चुन-चुनकर ऐसे लोगों को मारता ‌जिसने आलिया को कष्ट दिए थे। इम्तियाज ने ऐसा नहीं किया और बहुत लोगों को फिल्‍म के बारे में राय रखने के लिए भ्रम में डाल दिया। 

हाइवे के क्लाइमेक्स से मुझे सालों पहले आई ओमकारा फिल्‍म का क्लाइमेक्स याद आता है। क्लाइमेक्स सीन में मरी पड़ी करीना के ऊपर झूले में मरे हुए अजय देवगन का शरीर झूल रहा होता है। दर्शक इस फिल्म के क्‍लाइमेक्स पर भी तय नहीं कर पाए थे कि इस रचनाशीलता को गाली दें या इस पर मर मर मिटें।

हाइवे फिल्‍म कई बातों के साथ अपने अलग किस्म के सेंस ऑफ ह्रयूमर के लिए भी याद रखी जाएगी। सिनेमेटोग्राफी पर तो काफी कुछ कहा ही जा चुका है। हो सकता है कि यह फिल्‍म कुछ लोगों के बीच इम्तियाज अली के साहस के लिए भी याद की जाए। आमतौर पर लोग लोकप्रिय होने को ही अच्छा होना मान लेते हैं ऐसे लोगों को इम्तियाज ने करेक्ट किया है।

Thursday, February 6, 2014

चलो, सब मिलकर जय हो के साथ 'सलमान परिवार' की तारीफ करते हैं


अरबाज खान के बाद जिस दिन सोहेल खान ने निर्देशक बनने का फैसला लिया था उसी दिन से मुझे सलीम खान की किस्मत से एक किस्म की ईष्या होनी शुरू हो गई थी। तीन लड़के और तीनों ही इतने होनहार।

सलमान खान जिस तरह का अर्थपूर्ण अभिनय करते हैं वह खुद में ऐतिहासिक है। कमर ‌हिलाना, धूम के चश्मे को पीठ पर टांगना, तौलियो को दोनों पैरों के बीच से निकालकर आगे पीछे करने जैसे दृश्य हिंदी सिनेमा के इतिहास में कोई भी बड़े से बड़ा फिल्मकार अब तक करना तो दूर सोच भी नहीं कर पाया। यह सलमान खान का ही प्रताप था कि उन्होंने दबंग, दबंग 2 और बॉडीगार्ड जैसी कालजयी फिल्में दीं। देश को सलमान की अविश्वसनीय अभिनय क्षमता पर हमेशा से ही पूरा विश्वास रहा है।

क्या हुआ जो सलमान का दूसरा भाई अरबाज फिल्मों में हीरो के रूप में उतना सफल नहीं हो पाया। लेकिन हैलो ब्रदर जैसी फिल्मों में उसने भी दिखाया कि उसके अंदर एक बहुत बड़ा अभिनेता छिपा हुआ है। खैर हिंदी फिल्‍मों के दर्शक हमेशा से ही अच्छे अभिनेताओं की परख नहीं कर पाए हैं। इसका खामियाजा अरबाज को भुगतना पड़ा। लेकिन कहते हैं न कि अंगारे में छिपी आग को उस पर चढ़ी राख दबा नहीं सकती। कुछ ऐसा ही अरबाज के साथ हुआ। जब उसने दबंग 2 फिल्म का निर्देशन किया तो अचानक व्यवसायिक और कला सिनेमा बनाने वाले प्रतिष्ठित निर्देशकों को लगा कि वह अभी तक कर क्या रहे थे। इतना सक्षम फिल्मकार उनके बीच में था जिसको उन्होंने कभी नोटिस ही नहीं किया।

तीसरे भाई के साथ भी हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने कम जुल्म नहीं किया। सोहेल खान नाम के इस भाई को एक तो निर्देशकों ने कम ‌फिल्में दीं। सलमान के कहने पर उसको फिल्में तो दी गईं लेकिन उस अच्छे अभिनेता से साजिशवस खराब अभिनय कराया गया। प्रतिभा खुद को भीड़ से हमेशा निकाल लेती है। सोहेल ने भी ऐसा ही किया। उसने हिंदी सिनेमा में सितारों की भीड़ से खुद को अलग कर लिया। उसकी राहें उसे कहीं और बुला रही थीं। सोहेल एक ऐसा सिनेमा बनाना चाहता था कि जिसे युगों-युगों याद किया जाए। वह 70 के पर्दे पर ऐसे सीन रचना चाहता था कि जिसे देखकर दर्शक बस रो पड़े और रोते हुए ही घर जाएं। इन्हीं सब सोच को मिलाकर उसने जय हो फिल्म रची।

और आ गई जय हो

जब हिंदी सिनेमा का 1000 साल का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें श्रेष्ठ फिल्मों में जय हो का नंबर तीसरा या चौथा तो होगा ही। क्योंकि राम गोपाल वर्मा जैसे सक्षम फिल्मकार ने आग जैसी कालजयी फिल्म पहले ही बना दी थी। उस फिल्म तक को फिरोज खान की जानशीं भी नहीं पहुंच पाई। तुषार कपूर से जैसे वर्सेटाइल एक्टर की भी कुछ फिल्में भी हो सकता है कि जय हो को पिछाड़ दें। लेकिन मैने कहा न कि जय हो तीसरी या चौथी फिल्‍म तो बनेगी ही। जय हो के एक-एक फ्रेम में इतनी मेहनत की गई है कि उस एकमात्र फिल्‍म को देखकर निर्देशन की रुचि रखने वाले युवा निर्देशक बन सकते हैं। डेजी शाह की अभिनय क्षमता किसी भी महात्वाकांक्षी लड़की को यह दिखाएगी कि अभिनेत्री बनने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

आगे का पूरा महाकाब्य सलमान पर ही है

                                                                                                           जाइएगा नहीं जारी है

Saturday, January 18, 2014

पता नहीं क्या होता कि 'लगाओ लगाओ' के नारे सिसकियों में बदल जाते

 
(बेहतर होगा कि इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इस पोस्ट के नीचे वाली पोस्ट पढ़ ले, शायद बेहतर कांटीन्यूटी के लिए)

इस पहली फिल्‍म के आधे घंटे में ही मन कई सारी जिज्ञासाओं से भर उठा। मुझे समझ में नहीं आता कि जो लड़की पूरे कपड़े पहनकर एक बेहद संकरे बाथरूम में शॉवर ले रही थी वह तो फिल्म में कही थी ही नहीं। न ही वो भाई साहब जो एक महिला से सेक्स करने की चाहत तो रखते थे लेकिन उनके हाथ बढ़ते-बढ़ते फिर पीछे हो जाते। कपड़े वह भी कई बार पूरे ही पहने हुए होते इसलिए उतारने का शायद नैतिक साहस न रखते।

मैं यह पूछना तो चाह रहा था लेकिन मेरे अंदर की घबराहट और 'शराफत' ने मुझे ऐसा करने से रोका। उस पहली फिल्म में इंटरवल में किसी राजनीतिक पार्टी के चुनावी पंपलेट में लिपटे लगभग ठंडे समोसे का टेस्ट भी मुझे नहीं पता। करीब एक बजे शुरु हुई फिल्‍म 2 बजकर दस मिनट पर खत्म हो गई। ‌

सिनेमाहाल से निकलने पर वही सारी मॉकड्रील फिर करनी पड़ी जो जाते वक्त की थी। अलबत्‍ता हम सबके चेहरे मुरझाए हुए थे। मैं अंदर से उत्साहित जरूर था लेकिन ऐसा लगने नहीं देना चाहता था।

बाद में इन फिल्मों को लेकर भी एक टेस्ट डेवलप होता गया। कुछ वैसे ही जैसे सिगरेट या शराब पीने वाला आदमी शुरुआत किसी एक ब्रांड से करता है बाद में उस ब्रांड को लेकर उसमें टेस्ट विकसित होने शुरू होते हैं।

यह सी ग्रेड फिल्‍में मुझे तो मुख्यतः दो तरह की लगीं। पहली जिनका मूल थीम डर होता। सफेद मैक्सी या गाउन पहने हुए एक मोटी लड़की का बलात्कार ऐसा पुरुष करता था जिसके चेहरे पर टैमोटो शॉप चिपका हुआ होता था। कई बार उनके चेरहे पर लगा मुखौटा साफ-साफ दिख जाता। किसी घटिया होटल के उन कमरों के बल्ब बार-बार जलते बुझते। खिड़कियां खुलती बंद होतीं और बादल चमकते। इन अनुकूल माहौल के बीच बलात्कार हो रहा होता।

बलात्कार के बीच में या बाद में फिल्म का हीरो एम्बेस्डर या मारुती 800 जैसी किसी कार से आता। भूत उसका देखकर भाग जाता। फिर वह हीरो उस महिला के साथ वही करता जो भूत करने की इच्छा रखता। इन फिल्मों के नाम भी एक ही जैसे थे। सूनसान महल, मौत का दरवाजा, खूनी प्रेमिका, हवेली के पीछे, शैतानी ड्रैकूला जैसी फिल्मों की खासियत ये थी कि दिन में तो सबकुछ ठीक होता।

कई बार तो फिल्म की महिला नायिका कई सारी महिला सहेलियों के साथ कॉलेज पढ़ने भी जाती। लेकिन रात होते-होते अचानक ही सब कुछ बदल जाता। तेज हवाएं चलतीं। चमक-गरज के साथ छींटे पड़ते और भूत आ जाता।

इन सभी फिल्‍मों के भूत एक जैसे ही थे। कुछ शारीरिक बदलावों के साथ भूतनियां भी। खासियत यह होती कि जब भूत बलात्कार कर रहा होता और लड़की चिल्ला रही होती लेकिन भूत को अपने से परे नहीं हटाती तभी एक वीडियो चलने लगता। इस वीडियो में दो लोग कुश्ती जैसा कुछ लड़ रहे होते और सिनेमाहाल में सन्नाटा सा खिंच जाता। कही बार इसी दौरान इंटरवल की पट्टी लिखी आ जाती और हॉल समोसे और कोल्डड्रिंक के नारे से भर जाता।

कुछ समय के बाद मैने महसूस किया। कि इंटरवल के बाद हॉल कुछ खाली हो जाता है। मेरे दोस्त मेरी अज्ञानता पर मुस्कुराए। हमेशा की ही तरह मुझे खुद ही इसका उत्तर बाद में मिल गया।

दूसरी तरह की फिल्‍में अपने नाम से ही लोगों को आकृष्ट करने की कोशिश करतीं। बीवी नरम साली गरम, प्यारी पडोसन, रात की बात, 151 सहेलियां, दोस्त की बीवी, एक रात की बात, हवस की रात जैसे नामों वाली फिल्में यह स्पष्ट कर देतीं कि उनका मजमून क्या है। लेकिन अंदर ज्यादातर धोखा होता।

इन फिल्मों में न तो कहीं ठंडी बीवी होती और न ही गरम साली। इन फिल्मों में ज्यादातर प्रेम कहानी होती। कई बार इन फिल्‍मों का हीरो खंडाला या मसूरी जैसे किसी हिल स्टेशन में एक रोमांटिक गाना गाता और हीरोईन भरकस नाचने का प्रयास करती। यश चोपड़ा की फिल्‍मों की तरह ही मैने कुछ फिल्मों में प्रेम त्रिकोण भी देखे। रोमांस यहां भी होता लेकिन यश चोपड़ा से थोड़ा अलग।

बाद में जिस तरह का प्रैक्टिल रोमांस इमरान हाशमी ने किया कुछ उसी तरह के रोमांटिक सीन इन फिल्मों में भी होते। बस यहां किंग साइड बेडरूम में बिछे काले रंग के मखमली कंबल न होकर, किसी सस्ते होटल के कमरे में पीछे आयताकर डिजाइन वाले चादर होते। इन दृश्यों के आते ही सिनेमाहॉल के उस बदबूदार माहौल में रंगीनियां घुल जातीं जहां फिल्‍म की शुरुआत से ही 'लगाओ-लगाओ' के नारे उठ रहे होते।

                                                                                                           जारी है

Monday, January 13, 2014

आपको भी रह-रहकर याद आती हैं डर-डर के देखी गईं ये फिल्में




मन तो दसवीं क्लास से ही ऐसी फिल्मों को बस देख डालने का हुआ करता था। घर और स्कूल के आसपास दीवारों पर इन फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर लगते। इन पोस्टरों में एक मोटी सी लड़की नहाने जैसा कुछ उपक्रम कर रही होती। इनसेट में एक पुरुष लड़की के साथ कुछ करने की कोशिश में होता और एक इनसेट चुंबन जैसा कुछ दृश्यदिखा रहा होता। कई बार कोई भूत भी लड़की को डराता और लड़की ब्लाउज पहनकर डरने की ऐक्टिंग कर रही होती। पोस्टर देख मन लगातार मचलता। लेकिन उन दिनों फिल्म देखना ही संज्ञेय अपराध में शुमार था। फिर ऐसी फिल्म देखना के बारे में सोचना ही रुह कंपा देता। 

वक्त बदला, गंगा में कुछ और पानी बहा। फिर वह समय भी आया जब इन फिल्मों के लिए साहस जुटाने का साहन होने लगा। साहस इन पोस्टरों की वजह से ही हुआ। जुर्म करने की प्रेरणा इन फिल्मों के नामों ने दी। कच्ची जवानी, बरसात में जवानी, रंगीली भाभी, जवान साली जैसे नामों वाली यह फिल्में अंतश्‍ा तक कोहराम मचा रहीं थीं। इसके लिए कोई भी बगावत करने का मन हुआ।

12वीं की परीक्षाओं के लगभग दो महीने पहले की बात है। दोपहर हो जाने के बाद कोहरा छटा नहीं था। स्कूल के कोई ट्रस्टी मर गए थे जिसकी वहज से कांडोनेंस हुआ। मेरे कुछ मित्र फिल्म देखने का कार्यक्रम पहले ही बना चुके थे। यह वह मित्र थे जो लंबे समय से ऐसी फिल्में देख रहे थे और अब इस अपराध बोध से उबर भी चुके थे।

मैने उनको दबी जुबान में फिल्म देखने की इच्छा जताई थी। जहां तक मुझे याद आ रहा है फिल्म का नाम दूधवाली था। मैं होशियार था कि कहीं दूधवाली देखने की इच्छा मेरी इमेज पर प्रश्न न खड़े कर दे। पर वह मेरे सही मायने में दोस्त थे। उन्होंने मुझ पर अपराध बोध हावी नहीं होने दिया। उन्होंने ऐसा जताया कि मैं जय संतोषी मां या बार्डर सरीखी कोई फिल्म देखने जा रहा हूं। मुझसे मेरे हिस्से के 12 रुपए मांगे गए। मुझे संक्षेप में वहां पहुंचने का प्लान बताया गया। मैं सुन सबको रहा था लेकिन मेरे दिमाग से दूधवाली हट नहीं रही थी। हम साइकिलों से शार्टकर्ट रास्तों से दूधवाली फिल्म दिखाने वाले सिनेमाघर में पहुंच चुके ‌थे।

जैसे कि इन दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल मफलर बांधते हैं वैसे कई केजरीवाल चेहरे को मफलर से कसे हुए सिनेमाहॉल की लॉबी में टहलते पाए गए। सभी उत्साहित थे और लगभग सभी घबराए हुए। दर्शकों की संख्या 25 से 30 की थी। यहां मुख्य रूप से तीन तरह के लोग थे। एक हम जैसे स्कूली और कॉलेज के लड़के, दूसरे रिक्‍शे और ऑटो वाले और तीसरे अधेड़। सभी एक-दूसरे को भरपूर सम्मान दे रहे थे और कोई किसी की आंखों में झांक नहीं रहा था।

हम में से कुछ दर्शकों की अंर्ताआत्मा उन्हें यहां से चले जाने के लिए प्रेरित करती लेकिन यह दूधवाली का ही प्रताप था कि वह वहां जमे रहे। हम सभी ने 10 रुपए की दर वाले फर्स्ट क्लास के टिकट यह सोचकर लिए कि बैठना तो फैमिली में ही है। हम चार लोग तीन साइकिलों से गए थे। तीन रुपए साइकिल का किराया हुआ। लोग मुख्य गेट का शटर खुलवाने के परेशान थे। इसकी दो वजहें थीं पहली वजह दूधवाली की सम्मोहक बैठने की मुद्रा और दूसरा उन्हें बाहर टहलते हुए कोई भी देख सकता ‌था। करीब 12 बजकर 50 मिनट पर मुख्य गेट खुला।

गेट खुलते ही मेरे पेट में एक तरंग सी दौड़ गई। मुझे लगा कि मैं रोमांच के नए सागर में गोता लगाने जा रहा हूं। नए लोग तुरंत ही सिनेमाहॉल के अंदर घुसकर सीट लेने में उत्साहित दिखे पर कुछ अनुभवी हॉल के अंदर लगे छोटे-छोटे पोस्टरों में दूधवाली को करीब से देखने की कल्पना में थे। प्लानिंग के अनुसार हम फैमिली में ही बैठे और कोने की सीट लिया। पहलवान छाप साबुन के विज्ञापन के बाद फिल्म शुरु हुई। पूरे पर्दे पर नहीं बल्कि आधे पर्दे पर। फिल्म का कैनवास कुछ-कुछ साउथ का था। कुछ देर के बाद बालों से भरी पीठ, निकले हुए पेट और मूंछों वाले पुरुष एक मोटी लड़की का दमन कर रहे होते। दिखने को तो बस पुरुष की पीठ दिखती और उसका हिलना-डुलना दिखता। चूंकि पीछे से कुछ आवाजें आती रहतीं इसलिए मामला बहुत संगीन सा लगता रहा।
                                                                                                                    
                                                                                                                      जारी है...

Saturday, September 21, 2013

हमें फॉर्मूलों से इतना प्यार क्यूं हैं, कहीं ये सीमाएं तो नहीं हैं?


'फटा पोस्टर निकला हीरो' में एक मां है। वह ईमानदारी के साथ ऑटो चलाती है। वह चाहती है कि उसका बेटा एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर बने। लंबे और कोले ओवरकोट पहनकर भारी आवाज में गुर्रा-गुर्राकर बोलने वाला एक डॉन है। वह पता नहीं क्यूं मुंबई पर केमिकल हमला करना चाहता है। वह दुबई में है और उसके भारत में कुछ बेवकूफ गुर्गे हैं। वह डॉन अपनी सुविधा से कभी कॉमेडी कर देता है तो कभी खतरनाक बन जाता है।

जैसा कि होता है फिल्म में एक हीरो है जो हीरो बनना चाहता है। और जैसा कि हम आपको बता चुके हैं उसकी मां उसे पुलिस बनाना चाहती है। मतलब वह हर लिहाज से हीरो ही है। फिल्म है तो हीरोईन भी होगी। वह  शहर में कहीं भी घट रहे अपराध की रिपोर्ट उसी पुलिस वाले से करती है जो पुलिस में नहीं है लेकिन फिल्म का हीरो है। बाद में यही हीरो नायक बनकर उस केमिकल ब्लास्ट को रोकता है। इस बीच कुछ और बातें हैं जो इसलिए हैं क्योंकि क्लाइमेक्स ढाई घंटे के बाद होना होता है।

‌फिल्म में कुछ चीजें और भी होती हैं। जैसे कि जब नायक, नायिका से मिलता है तो एक गाना होता है। जब उनके बीच बिछड़ने का घटिया सा प्रसंग आता है तब भी नायक-नायिका गाना गाते हैं अंतर बस यह है कि इस बार इन्होंने चटख रंग के कपड़े नहीं पहने हैं और नाच नहीं रहे हैं। कुछ और गाने मौके-मौके पर होते हैं।

राजकुमार संतोषी की इस फिल्म को देखकर यह समझ में नहीं आता है‌ कि कुछ फिल्मकारों को फॉर्मूलों से इतनी मोहब्बत क्यों है। ऐसे फॉर्मूले जो एक नहीं दर्जनों बार चेहरे बदल-बदल कर आजमा लिए गए हैं। इन फॉमूलों को घिसा पिटा कहते हुए भी एक बासीपन का एहसास होता है।

एक निर्देशक से उम्मीद की जाती है जब वह अपनी एक फिल्म से एक लैंडमार्क तय कर दें तो कम से कम उसकी बाकी फिल्में घटिया और स्तरहीन तो न हों। फटा पोस्टर निकला हीरो घटिया फिल्म तो नहीं है लेकिन वह राजकुमार संतोषी की सीमाएं जरूर निर्धारित करती है।

फिल्म एक निर्देशक का माध्यम होता है। और शाहिद कपूर जैसा प्रतिभाशाली हीरो का यदि इस फिल्म से कमबैक नहीं कर पाता है तो इसमें शाहिद कपूर की उतनी गलती या कमजोरी नहीं है जितनी फिल्म निर्देशक की। इलियाना डीक्रूज की बर्फी को लेकर कुछ अच्छी इमेज अभी तक बनी थी। वह शायद इस फिल्म से टूटेगी।

फिल्म के कुछ गाने अच्छे हैं। सौरभ शुक्ला, जाकिर हुसैन और संजय मिश्रा के हिस्से जो भी दृश्य आए हैं उन्होंने अपने अभिनय के बूते उन संवादों को दर्शकों तक पहुंचा ‌दिया जो उनके डायरेक्टर ने उन्हें उपलब्‍ध कराए थे। इसमें गलती उनकी है भी नहीं।

Monday, August 26, 2013

मद्रास कैफे फिल्म इंडस्ट्री के जवां होने की कहानी कहती है




नौकरीपेशा लोगों को मुख्य रूप से दो कैटेगरी में बांटा जा सकता है। पहले वे जो नौकरी करते हैं। नौकरी के बने-बनाए फॉर्मेट को अपने डीएनए में समाकर नौकरी करना चाहते हैं। नौकरी करते-करते वह नौकरी करने के कुछ शॉर्टकट टूल खोज लेते हैं ताकि उनकी एक ढांचागत नौकरी थोड़ी सुविधाजनक और सुरक्षित हो जाए। एक और तरह के लोग भी नौकरी में होते हैं। इनकी संख्या थोड़ी ही होती है। वह उस प्रोफेशन को कुछ नया देने के मकसद उस इंडस्ट्री में आते हैं। चल रही विधाओं की तो उनमें समझ होती ही है वह कुछ नई विधाओं का इजात भी करना चाहते हैं। शायद अपने प्रोफेशन को आगे ले जाने के लिए। ऐसा करते-करते वह कई बार खुद को और अपनी नौकरी को भी असुरक्षित कर लेते हैं।

नौकरीपेशा लोगों की तरह फिल्म इंडस्ट्री के फिल्मकार भी है। बदले हुए प्रसंगों में कुछ इन्हीं फितरतों के साथ। जाहिर है कि पहली कैटेगरी की संख्या यहां भी ज्यादा है। ज्यादातर फिल्मकारों की सोच और प्राथमिकताएं चल रहे पैटर्न को ही अधिक सुविधाजनक और लोकप्रिय बनाकर पेश कर देने की होती है। चूंकि ज्यादातर लोग उसी मानसिकता पर चीजों को ग्रहण और खारिज करते हैं इसलिए यह फिल्में हिट भी होती हैं। पर कुछ फिल्मकार ऐसे भी होते हैं जो मद्रास कैफे बनाते हैं। जो शंघाई या गुलाल बनाते हैं। जो काइट के बाद बर्फी बनाते हैँ। शूजित सरकार की फिल्म मद्रास कैफे इंडस्ट्री को कुछ देकर जाने वाली सोच के साथ बनाई गई फिल्म है। यह फिल्म एक ऐसे समय पर बनाई गई है जब मल्टीप्लेक्सों में चेन्नई एक्सप्रेस और वंस अपॉन ए टाइम इन दोबारा जैसी फिल्में चल रही होती हैं। यह फिल्में हिट हैं। यानीकि सुविधाजनक और लोकप्रिय स‌िनेमा को रचने का फॉर्मेट पहले से ही तय है।

मुझे नहीं पता कि मद्रास कैफे उन बी‌वियों की शाम में मनोरंजन घोल पाएगी या नहीं जो पूरे हफ्ते शनिवार या रविवार की शाम का इंतजार किया करती हैं। एक फिल्म, कुछ शॉपिंग और उसके बाद डिनर का। मुझे यह भी नहीं पता कि स‌ाजिद खान जैसा ‌कोई निर्देशक इस फिल्म की खिल्ली उड़ाएगा या नहीं। लेकिन मुझे यह जरूर पता है कि यह ऐसी फिल्म है जिस पर हिंदी सिनेमा दर्शकों को बताने के साथ विश्‍व के सिनेमा को बता सकता है कि हम सिर्फ दबंग, जब तक है जान और बॉडीगार्ड ही नहीं रच रहें। हम कुछ ऐसी फिल्में भी बना लेते हैं जिन्हें फिल्में कहा जा सके।

मद्रास कैफे देखते वक्त जब यह फिल्म क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ रही थी तब मेरे ठीक बगल में बैठे 24-25 साल के दो युवा इंटरनेट पर राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़ी जानकारी अपने स्मार्टफोने में खंगाल रहे थे। मुझे नहीं याद पड़ता कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों कितनी ऐसी फिल्में बनती हैं जिन्हें देखते वक्त या देखने के बाद हमें कुछ पढ़ने का मन करे। उसे पढ़कर फिल्म के मूल को समझने का मन करे।

मद्रास कैफे पूरी तरह से न तो युद्घ फिल्म है और न ही राजनीतिक। यह फिल्म तो राजीव गांधी को भी पूर्व प्रधानमंत्री और प्रभाकरन को अन्ना कहकर अपने को बचाती हुई चलती है। जाहिर है कि यह फिल्म किसी भी विवाद में पड़े बिना कुछ ऐसी बातों की चर्चा करना चाहती थी जिनकी चर्चा 70 एमएम के पर्दे पर कम से कम इस अंदाज में तो नहीं हुई है।

एक फिल्म के रूप में मद्रास कैफे की कुछ कमियां निकाली जा सकती है। कुछ कलाकारों के चयन पर भी प्रश्‍न खड़े किए जा सकते हैं, नरगिस फाकरी के अंग्रेजी बोलने पर शुजीत सरकार की क्लीस ली जा सकती है। लेकिन जैसे ही हमारा दायरा इस फिल्म को लेकर विस्तृत होता है वैसे-वैसे यह कमियां खटकती तो हैं पर इन्हें अंडरलाइन करने का मन दर्शकों का नहीं होता है। फिल्म की सेनेमेटोग्राफी स्किप्ट की तरह ही खूबसूरत है। बैकग्राउंड स्कोर भी दृश्यो की भव्यता को बार-बार बढ़ाने का काम करते हैं। जॉन अब्राहम की यह फिल्‍म दिखाती है कि उन्हें गरम मसाला और देशी ब्वॉयज जैसी फिजूल की फिल्में नहीं करनी चाहिए।