Thursday, October 6, 2011
अफसोस कि रासकल्स जैसी फिल्में आगे भी बनती रहेंगी
फिल्म समीक्षा: रासकल्स
आप किसी फिल्म के घटियापन के बारे में जितना सोच सकते हैं रासकल्स उससे दो नहीं सात-आठ कदम बढक़र साबित हुई। रासकल्स का निर्देशन डेविड धवन ने किया है। वह १९८९ यानी पिछले २२ सालों से फिल्म का निर्देशन करते आ रहे हैं। फिल्म में संजय दत्त प्रोड्यूसर होने के साथ एक्टर भी हैं वह १९८१ यानि कि तीस बरस से फिल्मों में एक्टिंग करते आ रहे हैं। फिल्म में अजय देवगन भी हैं वह १९९१ यानि की २० साल ऐक्टिंग करते आ रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री के इन तीनों महापुरुषों ने मिलकर यह फिल्म बनाई है। फिल्म के प्रोमो देखकर अंदाजा था कि फिल्म कैसी होगी पर अंदाज कभी कभी इतने बुरी तरीके से सही साबित हो सकते हैं इसका अंदाजा नहीं था। महेश मांजेकर और सतीश कौशिक ने आजकल सिर्फ ऐक्टिंग करना शुरू कर दिया है। फिल्में शायद अब इनसे बनती नहीं हैं। कोई उनसे बताए कि वह एक्टर और भी घटिया हैं। महेश मांजेरकर कितने बढिय़ा एक्टर हैं इसे आप दबंग में देख लीजिए और सतीश कौशिक को इस फिल्म में। कंगना रणावत को बख्श देना बेहतर हैं। उन्होंने दर्शकों जरूरत से ज्यादा दे दिया है। ऐक्टिंग के लिए इंडस्ट्री में दूसरी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियां मौजूद हैं यह बात वह जानती हैं।
दर्शकों का एक-एक पल तड़पाने वाली इस फिल्म का एक भी दृश्य ऐसा नहीं है कि उस पर मुस्कुराया जा सके। हालांकि ऑडी भरी हुई थी और कुछ दर्शक हंस भी रहे थे। इन्हीं दर्शकों के लिए रासकल्स जैसी फिल्में आगे भी बनती रहेंगी। बहुत सारे संजय दत्त ऐसी फिल्में प्रोड्यूस करेंगे और कई डेविड धवन उनको निर्देशित करेंगे। और पता नहीं किन वजहों से अजय देवगन जैसे कलाकार उसमें काम करते भी दिखेंगे।
Friday, September 30, 2011
मदहोश कर देने संवादों की एक उम्दा पेशकश
फिल्म समीक्षा: साहब बीवी और गैंगस्टर
तिंग्माशू धूलिया अपनी फिल्मों में हर चरित्र को स्थापित करते हैं। जब दर्शक उनकी फिल्म जिसके संवाद भी वह खुद लिखते हैं को देखकर निकल रहा होता है तो उसे किसी खास चरित्र से बेइंतहा मोहब्बत या नफरत हो जाती है। फिल्म में उस चरित्र को निभा रहे अभिनेता का पात्र से इतना गहरा जुडव कि देखकर लगे कि इस पात्र को बस वही निभा सकते हैं। यह धूलिया साहब की खासियत है कि वह जीवन की उन छोटी-छोटी चीजों और मनोवृति को पकड़ते हैं जिन्हें आमतौर पर फिल्मकार सोच नहीं पाते या उसे नजरंदाज कर देते हैं। साहब बीवी और गैंग्स्टार में हर पात्र का अपना एक मनोविज्ञान है। उस मनोविज्ञान को यादगार तरीके से दिखाना फिल्म की सबसे बड़ी खूबी। व्यंग्य की चाशनी में डूबे संवाद इतने चुटीले और अर्थपूर्ण कि दर्शक देर तक उसकी मदहोशी में डूबें रहे। यह संवाद ही हर पात्र को स्थापित करने का काम करते हैं। साहब बीवी और गैंगस्टर देखते हुए तिंग्माशू की कुछ पुरानी फिल्मों के कुछ पात्र याद आते हैं। जैसे शार्गिद के नाना पाटेकर या हासिल के इरफान खान। शार्गिद और साहब बीवी. . में एक समानता यह भी है कि अंत के कुछ मिनट एक-दूसरे पर अविश्वास के पल होते हैं। इस अविश्वास के माहौल में पात्रों का करवटें और आस्था बदलता देखना, सही-गलत व्याख्या बदली हुई स्थितियों के साथ करना इस फिल्म को खूबसूरत और फिल्मी बनाती है। हर तरह के दर्शक के लिए यहां कुछ न कुछ था। फिल्म में साहब का किरदार निभाने वाले जिमी शेरगिल जानते हैं कि यह उनकी अब तक सबसे यादगार भूमिका है। वह कितने बेहतर अभिनेता हैं दर्शक और फिल्म इंडस्ट्री अब जान पाई है। उत्तर प्रदेश का तराई इलाका फिल्म की प्रष्ठभूमि है। राजनीति का अपराध के साथ दिखाया गया गठजोड नया न होते हुए भी नया सा लगता है। यह साली जिंदगी के बाद विपिन शर्मा गेंदा सिंह की भूमिका में शानदार लगे हैं। फिल्म के गीत भी फिल्म की तरह ताजे और भदेस है। एक आवश्यक रुप से देखी जाने वाली फिल्म।
Friday, September 23, 2011
दर्शकों का कोई दोष नहीं यदि वह फिल्म को नकार दें।
फिल्म समीक्षा: मौसम
अच्छे और लोकप्रिय निर्देशक के बीच फर्क कर पाना कई बार वाकई कठिन होता है। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई निर्देशक है जो एक या दो फिल्में बनाने के बाद चिर खामोश हो गए। वह खामोश इसलिए हुए क्योंकि वह लोकप्रिय नहीं हो पाए। इन अच्छे निर्देशकों को अपनी कला और सृजन से अगाध प्रेम होता है। यह निर्देशक बहुत जी-जान लगाकर फिल्में बनाते हैं और यह मानते हैं कि दर्शक भी उसी श्रृद्धा के साथ फिल्म देखेगा। पर ऐसा होता नहीं। फिल्म का पहली बार निर्देशन कर रहे पंकज कपूर भी इसी लोकप्रिय सिनेमा की चाहत की भेंट चढ़ गए। पंकज की यह फिल्म लगभग तीन घंटे की है। कई सारे फिल्मी किस्सागोई, प्रपंच और ८० के दशक के संयोग फॉमूर्ले को समेटे हुए यह फिल्म उतनी आकर्षक, भव्य और जादुई नहीं बन पाई जितनी कि इसके बारे में कल्पना की गई थी। फिल्म ठीक से न तो हंसाती है, न भावुक कराती है और न ही रुलाती है। यह एक औसत से फिल्म निकली जिससे अपेक्षाएं अधिक कर ली गईं। कई कलाकारों को देखकर लगता है कि उन्हें यदि ज्यादा लंबा और प्रभावी रोल मिले तो वह बेहतर कर सकते हैं। शाहिद और सोनम कपूर इस धारणा को तोड़ते हैं। पूरी फिल्म शाहिद के ही कंधों पर थी। शाहिद ने अच्छा अभिनय किया पर उतने से बात नहीं बनती। फिल्म का ताना-बाना १९९० से लेकर २००२ के बीच तक का है। बाबरी बिध्वंस, मुंबई ब्लास्ट, कारगिल युद्ध और गोधरा कांड जैसी घटनाएं फिल्म की कहानी का हिस्सा हैं। फिल्म में दिक्कत यह है कि इन सारी आपदाओं से एक ही परिवार लगातार जूझता हुआ दिखाया गया है। फिल्म का शुरुआती घंटा पंजाब के एक गांव का है। यह हिस्सा मनोरंजक होने की वजह से आकर्षक लगता है। नायिका का स्काटलैंड और नायक का एयरफोर्स में चले जाने के बाद फिल्म की कहानी घसटती हुई और अपने को दोहराती हुई चलती है। सात साल बाद नायक-नायिका स्काटलैंड में मिलते हैं। यह दृश्य फिल्म का सबसे अच्छा दृश्य होना चाहिए पर होता बहुत रूटीन में है। नायिका का पंजाब से स्काटलैंड, वहां से फिर पंजाब, फिर अहमदाबाद, फिर अमेरिका, फिर स्काटलैंड जाना एक तरह की पुनरावृति लगती है। मौसम वस्तुत: प्रेम कहानी है। इस प्रेमकहानी में देश की घटनाएं अवरोध बनकर आती हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स कमजोर और सतही है। पंकज कपूर की इस फिल्म को देखा जा सकता है। यदि दर्शक इसे खराब और बोर कहें तो यह उन्हें अकेले दोष देना गलत होगा।
Tuesday, September 13, 2011
यह किस नायक की वापसी की बात कर रहे हैं हम
फिल्म समीक्षा: बॉडीगार्ड
सलमान खान की चुलबुल पांडेय टाइप फिल्मों की जब एक वर्ग ने आलोचना की थी तो यह कहकर उनका बचाव किया गया कि सलमान खान कि फिल्मों से नायक की पर्दे पर वापसी हो रही है। वांटेड, दबंग, रेडी के बाद अब बॉडीगार्ड में भी यही नायक पर्दे पर है। सीधा, समर्पित, ईमानदार और भोंदू। वह हथियार से लैस २५ से ३० लोगों को निहत्थे होकर भी मौत के घाट उतार देता है। वह चलती ट्रेन से कूद कर विपरीत दिशा में जा रही ट्रेन में सवार हो लेता है। कंधे पर गोली लगने के बाद भी दौडक़र किसी लडक़ी से मिलने के लिए रेलवे प्लेटफार्म में जाता है। यह बातें बिल्कुल उसे हीरो ही बनाती है। हीरो का दूसरा पहलू देखिए। यह हीरो मारपीट के अलावा जीवन के सारे प्रसंगों में एक मोटी बुद्धि के भोंदू युवक जैसा दिखता है। उसी घर में रह रही एक लडक़ी उससे बेपनाह मोहब्बत करती है वह उससे बेखबर है। दस से बीस फिट की दूरी पर वह लडक़ी उसको फोन करती है, हंसती है, रोती है पर बेचारा यह हीरो कुछ भी जान भी नहीं पाता। वह गल्र्स हॉस्टल में उस लडक़ी की खोज में लगा रहता है। अनजाने में जिस लडक़ी से उसकी शादी हो गई होती है वह एक डायरी लिखती है। कायदे से यह डायरी उस हीरो के हाथ में लगनी चाहिए। पर वह डायरी उसके पांच साल के बच्चे के हाथ में लगती है। मारपीट के अतिरिक्त उसे समझ में नहीं आता। यह २०११ में हमारे युवाओं का नायक है। यह उस महान हीरो की पर्दे पर वापसी है जो लड़कियों को शेर से कम नहीं समझता। उन्हें झूने में उसके हाथ कांपते हैं। लड़कियों के प्रेम, उनके झूठ, फरेब और प्रपंच को पढऩे समझने की उसके पास क्षमता नहीं है। वह अपने मालिक को उसके सामने भी मालिक ही कहकर बुलाता है। इस हीरो की वापसी पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री जश्न मना रही है। फिल्म में सुनामी सिंह नाम का एक किरदार जो सलमान की फिल्मों में अलग-अलग नामों के साथ अक्सर रहता है बॉडीगार्ड में दर्शकों को जमकर इरीटेट करता है। साउथ फिल्मों की नकल में एक सांवली और मांसल नौकरानी भी कोई कम कहर नहीं बरपाती। महेश मांजेकर को यदि ऐक्टिंग ही करनी है तो ढंग की करें।
कुछ अच्छी बातें:
सलमान खान मासूम और भोले युवक की अच्छी ऐक्टिंग कर लेते हैं। फिल्म का संगीत अच्छा है। करीना कपूर सुंदर लगी हैं। बहुत भावुक और दुख के दृश्यों में वह करिश्मा कपूर की नकल करते दिखती हैं। पोस्टर से मारपीट से भरी लगने वाली इस फिल्म में उतनी मारपीट नहीं है।
सलमान खान की चुलबुल पांडेय टाइप फिल्मों की जब एक वर्ग ने आलोचना की थी तो यह कहकर उनका बचाव किया गया कि सलमान खान कि फिल्मों से नायक की पर्दे पर वापसी हो रही है। वांटेड, दबंग, रेडी के बाद अब बॉडीगार्ड में भी यही नायक पर्दे पर है। सीधा, समर्पित, ईमानदार और भोंदू। वह हथियार से लैस २५ से ३० लोगों को निहत्थे होकर भी मौत के घाट उतार देता है। वह चलती ट्रेन से कूद कर विपरीत दिशा में जा रही ट्रेन में सवार हो लेता है। कंधे पर गोली लगने के बाद भी दौडक़र किसी लडक़ी से मिलने के लिए रेलवे प्लेटफार्म में जाता है। यह बातें बिल्कुल उसे हीरो ही बनाती है। हीरो का दूसरा पहलू देखिए। यह हीरो मारपीट के अलावा जीवन के सारे प्रसंगों में एक मोटी बुद्धि के भोंदू युवक जैसा दिखता है। उसी घर में रह रही एक लडक़ी उससे बेपनाह मोहब्बत करती है वह उससे बेखबर है। दस से बीस फिट की दूरी पर वह लडक़ी उसको फोन करती है, हंसती है, रोती है पर बेचारा यह हीरो कुछ भी जान भी नहीं पाता। वह गल्र्स हॉस्टल में उस लडक़ी की खोज में लगा रहता है। अनजाने में जिस लडक़ी से उसकी शादी हो गई होती है वह एक डायरी लिखती है। कायदे से यह डायरी उस हीरो के हाथ में लगनी चाहिए। पर वह डायरी उसके पांच साल के बच्चे के हाथ में लगती है। मारपीट के अतिरिक्त उसे समझ में नहीं आता। यह २०११ में हमारे युवाओं का नायक है। यह उस महान हीरो की पर्दे पर वापसी है जो लड़कियों को शेर से कम नहीं समझता। उन्हें झूने में उसके हाथ कांपते हैं। लड़कियों के प्रेम, उनके झूठ, फरेब और प्रपंच को पढऩे समझने की उसके पास क्षमता नहीं है। वह अपने मालिक को उसके सामने भी मालिक ही कहकर बुलाता है। इस हीरो की वापसी पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री जश्न मना रही है। फिल्म में सुनामी सिंह नाम का एक किरदार जो सलमान की फिल्मों में अलग-अलग नामों के साथ अक्सर रहता है बॉडीगार्ड में दर्शकों को जमकर इरीटेट करता है। साउथ फिल्मों की नकल में एक सांवली और मांसल नौकरानी भी कोई कम कहर नहीं बरपाती। महेश मांजेकर को यदि ऐक्टिंग ही करनी है तो ढंग की करें।
कुछ अच्छी बातें:
सलमान खान मासूम और भोले युवक की अच्छी ऐक्टिंग कर लेते हैं। फिल्म का संगीत अच्छा है। करीना कपूर सुंदर लगी हैं। बहुत भावुक और दुख के दृश्यों में वह करिश्मा कपूर की नकल करते दिखती हैं। पोस्टर से मारपीट से भरी लगने वाली इस फिल्म में उतनी मारपीट नहीं है।
Sunday, August 21, 2011
अच्छी नहीं पर एक अलग फिल्म
फिल्म समीक्षा: नाट ए लव स्टोरी
रामगोपाल वर्मा अपनी फिल्मों के बारे में यह सुनना ज्यादा पसंद करते हैं कि उन्होंने एक अलग फिल्म बनाई है बनस्पित इसके कि उन्होंने एक अच्छी फिल्म बनाई है। नाट एक लव स्टोरी उनकी अलग फिल्मों की श्रृंखलाओं में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गई है। फिल्म बहुत ही कम बजट और संसाधनों के बीच बनाई गई है। कलाकार भी दीपक डोबरियाल और माही गिल जैसे। इन आत्मविश्वासी और प्रतिभावान कलाकारों के लिए फिलहाल मेहनताना से अधिक इनके रोल की गंभीरता अधिक महत्वपूर्ण लगती है। २००८ में हुए नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर आधारित इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी वही है जो इसकी यूएसपी है। सत्य घटना से जुड़े होने की वजह से यदि इसका कथानक दर्शकों को बांधे रखता है तो इसे फिल्म के रूप में न पेश करना पाना सबसे बड़ी कमी के रूप में भी उभरता है। फिल्म थोड़ी फिल्मी होनी चाहिए थी। आमतौर पर जिस मोड़ पर फिल्मों में इंटरवल होता है यह फिल्म वहां आपको बाए-बाए बोल देती है। माही गिल अब तक के अपने सबसे लंबे रोल में दिखी है। रोल लंबा के बावजूद इस फिल्म में वह वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाती जैसा कि उन्होंने देव डी या गुलाल फिल्म के अपेक्षाकृत छोटे रोल में छोड़ा था। दीपक डोबरियाल के लिए अच्छे संवाद नहीं रखे गए। एक खीझे हुए आशक्त प्रेमी के रूप में वह उतना नहीं जमे जितनी की उनसे अपेक्षा की जाती है। पुलिस तहकीकात और न्यायालय में बहस के दृश्यों को बढ़ाए और प्रभावी बनाए जाने की जरूरत थी। अच्छी फिल्म के रूप में नहीं पर एक अलग फिल्म के रूप में नाट ए लव स्टोरी देखी जा सकती है।
Friday, August 12, 2011
फिल्म का नाम आरक्षण नहीं शिक्षा माफियाओं का गोरखधंधा होना चाहिए।
फिल्म समीक्षा: आरक्षण
आरक्षण देखकर समाज और फिल्म इंडस्ट्री के उस तबके की बात सही जान पड़ रही है जिसके अनुसार प्रकाश झा चाहते थे कि फिल्म प्रदर्शित होने से पहले विवादित हो जाए क्यों कि फिल्म वैसी नहीं है जैसा कि उसको लेकर पूर्वाग्रह बनाए गए हैं। फिल्म आरक्षण में आरक्षण विषय उतना और उसी तरह से है जितना भट्ट कैंप की फिल्मों में सेक्स होता है। दर्शक को थोड़ा बहुत बांधने के लिए। इंटरवल तक आरक्षण की प्रासंगिकता और उसके नुकसान पर चर्चा करने वाली यह फिल्म इंटरवल के बाद अचानक फैमिली ड्रामा हो जाती है। यह ड्रामा आरक्षण जैसे संवदेशनील विषय पर नहीं बल्कि एक नायक की अच्छाईयों और खलनायक की बुराईयों के बीच है। विषय जातिवाद से उठकर निजी कोचिंग संस्थानों के मनमानेपन और शिक्षा के व्यवसायीकरण की ओर हो चलता है। इंटरवल के बाद अमिताभ बच्चन एक तबेला में कोचिंग शुरू करते हैं और उनके प्रतिद्धंदी मनोज बाजपेई की कोचिंग की साख गिरने लगती है। इंटरवल के पहले तक वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रींसपल हुआ करते थे और मनोज कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल। आरक्षण विवाद की वजह से उन्होंने कॉलेज से इस्तीफा दे दिया होता है। इंटरवल के पहले अमिताभ से बिदक गए उनके छात्र सैफ अली खान और प्रतीक बब्बर भी कोचिंग में उनका हाथ बंटाते हैं। यह आप जानते ही हैं कि दीपिका पादुकोन हैं तो वह किसी न किसी से प्यार करेंगी ही। प्रतीक फिल्म इंडस्ट्री में बहुत जूनियर हैं इसलिए वह दलित दीपक कुमार बने सैफअली खान से प्यार करती हैं। मोहब्बते के उलट अमिताभ ने अपनी बेटी प्यार करने की अनुमति दे रखी है। फिल्म के क्लाइमेक्स दृश्य पर गौर कीजिए। अमिताभ बच्चन के तबेला कोचिंग इंस्टीट्यूट को तोडऩे के लिए पूरी सरकारी मिशनरी मौजूद है। पर वह टूटता नहीं है क्यों कि उसके समर्थन कुछ सौ छात्र खड़े हैं। कुछ होने वाला ही होता है कि कॉलेज की संस्थापक ट्रस्टी हेमामालिनी ३२ साल बाद पहाड़ से अपना एकांतवास त्यागकर अमिताभ के समर्थन में आती हैं। एक राज्य का मुख्यमंत्री उनसे एक चपरासी की तरह फोन पर भी झुक कर बात करता है। यह है महान आरक्षण फिल्म का शानदार क्लाइमेक्स
इस पर भी गौर फरमाइए।
- फिल्म में अमिताभ बच्चन के हिस्से में आया एक संवाद (चुप हो जा। मैं तेरी एक नहीं सुनुगां अब तक मैने तेरी बहुत सुन ली है। मेरे पास आत्मबल है जो तुम्हारे पास नहीं है) कायदे से इस संवाद पर दर्शकों को तालियां बजानी चाहिए पर वह हंस रहे होते हैं।
-चालीस साल के हो चुके सैफ अली खान कुछ दृश्यों में दीपिका पादुकोन के दूर के चाचा लगते हैं। सैफअली खान फिल्म के नायक हैं पर उनके चेहरे के एरोगेंट भाव उनके लगातार खलनायक जैसा दिखाते हैं।
-यह फिल्म कतई राजनीतिक नहीं है। इस पर आपत्ति देश के हर बड़े कोचिंग इंस्टी्टयूट को होनी चाहिए।
- फिल्म का नाम आरक्षण के बजाय कोचिंग का गोरखधंधा या शिक्षा का व्यवसायीकरण होना चाहिए था। लो गए शिक्षा माफिया भी चलेगा।
- मनोज बाजपेई ने अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। पर उनकी भूमिका कुछ वैसी ही दबी-दबी रह गई है जैसे कि राजनीति में अजय देवगन की। खुलकर संवाद बोलने या अदाकारी दिखाने के मौके सिर्फ अमिताभ के पास थे।
Wednesday, August 3, 2011
अच्छे विषय का हास्यास्पद फिल्मांकन
फिल्म समीक्षा: गांधी टू हिटलर
रायपुर के पांच में से तीन मल्टीप्लेक्सों में यह फिल्म ४ शो में चल रही है। औसतन हर शो में १० दर्शक आ रहे हैं। यानि कि कम से कम ४० दर्शक गांधी टू हिटलर को देखने के लिए रोज आ रहे हैं। इन ४० दर्शकों में से अधिसंख्य को पहले से पता है कि फिल्म में कोई नायक-नायिका नहीं है, गीत-संगीत नहीं है, कॉमेडी नहीं है, एक्शन नहीं है, द्विआर्थी संवाद नहीं हैं और बोल्ड सीन नहीं है। यानि की एक परंपरागत मसाला फिल्म जैसा कुछ भी नहीं। जो दर्शक फिल्म के आ रहे हैं उन्हें वाकई गांधी और हिटलर जैसे चर्चित नायकों से जुड़ा कुछ जानने में दिलचस्पी है। ऑफबीट फिल्मों पर औसम से कम दिलचस्पी और समझ रखने वाले इस शहर में भी एक ऐसी नई पीढ़ी विकसित हो रही है जो गंभीर और लीक से अलग हटकर बनी फिल्मों में दिलचस्पी लेती है। गांधी टू हिटलर देखने वाले दर्शकोंं में भी ज्यादातर युवा थे। जिस फिल्म को भीड़ न देख रही हो उसे देखना एक ब्रांड के रूप में भी उभरा है। यह प्रयोगात्मक फिल्म उद्योग के लिए अच्छा संकेत है। अब यहां जिम्मेदारी फिल्मकार बनती है कि कैसे वह आए हुए इन१० दर्शकों का आना जस्टीफाई करे। और कोशिश करे कि कम से कम यह १० अगली फिल्म में फिर आएं। कैसे वह एहसास कराए कि वह दर्शक कुछ अलग और नया देखकर गए हैं। और क्यों उन्होंने सिंघम, जिंदगी न मिलेगी दोबारा, हैरी पॉर्टर जैसी फिल्मों के विकल्प रहते गांधी टू हिटलर का चुनाव किया। गांधी टू हिटलर के पास इन किसी क्यों का जवाब नहीं है। निर्माता-निर्देशक फिल्म को बनाता तो अपने नजरिए से है पर वह होती है दर्शक के लिए। फिल्म देखकर लगा कि निर्माता अनिल कुमार शर्मा और निर्देशक राकेश रंजन यह फिल्म सिर्फ अपने लिए बनाई है। चलो फिल्म बनाते हैं जैसा। इन फिल्मकारों की फिल्में से जुड़ी सीमित जानकारी और कूपमंडूकपन पूरे फिल्म में चीखता रहा है। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें फिल्माते वक्त निर्देशक ने सोचा होगा कि ऐस दृश्य फिल्म में बहुत जरूरी हैं वह पहली बार ऐसे दृश्यों को फिल्मों में जगह दे रहे हैं।
गांधी टू हिटलर में तीन कहानियां समांतर चलती हैं। पहली हिटलर और जर्मनी की। दूसरी गांधी और उनके उपदेशों की और तीसरी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज के कुछ साथियों और उनके परिवारों की। फिल्म में जहां-जहां हिटलर से जुड़े दृश्य आए हैं दर्शकों का उनसे जुड़ावा होता है। युद्ध में डूबे हुए जर्मनी को उबारने में लगे हिटलरी कोशिशों को अधिक से अधिक जानने की दिलचस्पी उनमें लगातार बनी रहती है। यह दृश्य थोड़ी देर चलते है कि पर्दे पर उपदेश देते गांधी आ जाते हैं। इन दृश्यों में वही शिक्षाएं हैं जो भारत का हर बच्चा कक्षा तीन-चार से ही नैतिक शिक्षा से जुड़ी किताबों मेें पढ़ता आया है। यह दृश्य बहुत ही घटिता तरीके से फिल्माए गए हैं। फिल्म का सबसे खराब हिस्सा आजाद हिंद फौज की एक टुकड़ी की कहानी का है। इस कहानी से जुड़े महाघटिया और उबाऊ फ्लैशबैक हैं। शादी और होली के दृश्य हैं। इस टुकड़ी के सैनिकों का आपस में झगडऩा और समझाने के बाद एक-दूसरे के लिए जान न्योझावन कर देना। सब कुछ बहुत बचकाना और नानसेंस सा। फिल्म में हिटलर का किरदार रघुवीर यादव ने निभाया है और उनकी प्रेमिका नेहा धूपिया बनी हैं। फिल्म इतनी हास्यास्पद है कि हिटलर और उनकी प्रेमिका सहित पूरे जर्मनी का उर्दू मिश्रित ठेठ हिंदी बोलना भी व्यंग्य पैदा नहीं करता। एक अच्छे विषय की महादुर्गति देखने के लिए फिल्म देख सकते हैं। अच्छे फिल्मकारों की हिटलर और द्धितीय विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका जैसे विषयों पर फिल्म बनानी चाहिए।
रायपुर के पांच में से तीन मल्टीप्लेक्सों में यह फिल्म ४ शो में चल रही है। औसतन हर शो में १० दर्शक आ रहे हैं। यानि कि कम से कम ४० दर्शक गांधी टू हिटलर को देखने के लिए रोज आ रहे हैं। इन ४० दर्शकों में से अधिसंख्य को पहले से पता है कि फिल्म में कोई नायक-नायिका नहीं है, गीत-संगीत नहीं है, कॉमेडी नहीं है, एक्शन नहीं है, द्विआर्थी संवाद नहीं हैं और बोल्ड सीन नहीं है। यानि की एक परंपरागत मसाला फिल्म जैसा कुछ भी नहीं। जो दर्शक फिल्म के आ रहे हैं उन्हें वाकई गांधी और हिटलर जैसे चर्चित नायकों से जुड़ा कुछ जानने में दिलचस्पी है। ऑफबीट फिल्मों पर औसम से कम दिलचस्पी और समझ रखने वाले इस शहर में भी एक ऐसी नई पीढ़ी विकसित हो रही है जो गंभीर और लीक से अलग हटकर बनी फिल्मों में दिलचस्पी लेती है। गांधी टू हिटलर देखने वाले दर्शकोंं में भी ज्यादातर युवा थे। जिस फिल्म को भीड़ न देख रही हो उसे देखना एक ब्रांड के रूप में भी उभरा है। यह प्रयोगात्मक फिल्म उद्योग के लिए अच्छा संकेत है। अब यहां जिम्मेदारी फिल्मकार बनती है कि कैसे वह आए हुए इन१० दर्शकों का आना जस्टीफाई करे। और कोशिश करे कि कम से कम यह १० अगली फिल्म में फिर आएं। कैसे वह एहसास कराए कि वह दर्शक कुछ अलग और नया देखकर गए हैं। और क्यों उन्होंने सिंघम, जिंदगी न मिलेगी दोबारा, हैरी पॉर्टर जैसी फिल्मों के विकल्प रहते गांधी टू हिटलर का चुनाव किया। गांधी टू हिटलर के पास इन किसी क्यों का जवाब नहीं है। निर्माता-निर्देशक फिल्म को बनाता तो अपने नजरिए से है पर वह होती है दर्शक के लिए। फिल्म देखकर लगा कि निर्माता अनिल कुमार शर्मा और निर्देशक राकेश रंजन यह फिल्म सिर्फ अपने लिए बनाई है। चलो फिल्म बनाते हैं जैसा। इन फिल्मकारों की फिल्में से जुड़ी सीमित जानकारी और कूपमंडूकपन पूरे फिल्म में चीखता रहा है। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें फिल्माते वक्त निर्देशक ने सोचा होगा कि ऐस दृश्य फिल्म में बहुत जरूरी हैं वह पहली बार ऐसे दृश्यों को फिल्मों में जगह दे रहे हैं।
गांधी टू हिटलर में तीन कहानियां समांतर चलती हैं। पहली हिटलर और जर्मनी की। दूसरी गांधी और उनके उपदेशों की और तीसरी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज के कुछ साथियों और उनके परिवारों की। फिल्म में जहां-जहां हिटलर से जुड़े दृश्य आए हैं दर्शकों का उनसे जुड़ावा होता है। युद्ध में डूबे हुए जर्मनी को उबारने में लगे हिटलरी कोशिशों को अधिक से अधिक जानने की दिलचस्पी उनमें लगातार बनी रहती है। यह दृश्य थोड़ी देर चलते है कि पर्दे पर उपदेश देते गांधी आ जाते हैं। इन दृश्यों में वही शिक्षाएं हैं जो भारत का हर बच्चा कक्षा तीन-चार से ही नैतिक शिक्षा से जुड़ी किताबों मेें पढ़ता आया है। यह दृश्य बहुत ही घटिता तरीके से फिल्माए गए हैं। फिल्म का सबसे खराब हिस्सा आजाद हिंद फौज की एक टुकड़ी की कहानी का है। इस कहानी से जुड़े महाघटिया और उबाऊ फ्लैशबैक हैं। शादी और होली के दृश्य हैं। इस टुकड़ी के सैनिकों का आपस में झगडऩा और समझाने के बाद एक-दूसरे के लिए जान न्योझावन कर देना। सब कुछ बहुत बचकाना और नानसेंस सा। फिल्म में हिटलर का किरदार रघुवीर यादव ने निभाया है और उनकी प्रेमिका नेहा धूपिया बनी हैं। फिल्म इतनी हास्यास्पद है कि हिटलर और उनकी प्रेमिका सहित पूरे जर्मनी का उर्दू मिश्रित ठेठ हिंदी बोलना भी व्यंग्य पैदा नहीं करता। एक अच्छे विषय की महादुर्गति देखने के लिए फिल्म देख सकते हैं। अच्छे फिल्मकारों की हिटलर और द्धितीय विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका जैसे विषयों पर फिल्म बनानी चाहिए।
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