Saturday, February 22, 2020

हिंदी सिनेमा के लिए सिर्फ कॉमेडी है विवाहेत्तर संबंध


 कुछ सालों पहले जब ये फिल्म मैंने कमलेश्वर की वजह से दोबारा देखी तो मुझे यह कॉमेडी फिल्म लगी। गोविंदा की साजन चले ससुराल, दूल्हे राजा, छोटे सरकार टाइप की कोई भी कॉमेडी फिल्म जैसी। अभी जब कुछ सप्ताह पहले इसी नाम वाली एक और फिल्म आई है तब भी इतने बरसों के बाद भी उसका अंदाज सिगरेट पीने और पकड़े जाने जैसा ही रहा है।

हिंदी सिनेमा इस विषय पर जज्बाती होकर नहीं बल्कि तफरी के अंदाज में सिनेमा गढ़ता दिखा है। ऐसी बहुत सारी कॉमेडी फिल्में हैं जिसमें नायक अपनी पत्नी से उबकर सिर्फ सेक्स की लालसा में यहां वहां 'मुंह मारने' की कोशिशों में लगा दिखता है। सिनेमा दिखाता है कि नायकों की एप्रोच उन लड़कियों के प्रति रही है जिनके कपड़े पत्नी की तुलना में आधुनिक हैं और सेक्‍स को लेकर उनके विचार 'लिबरल' हैं। बाद में ये हीरो रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं और मासूम सा चेहरा बनाए पत्नी से वादा करते हैं कि अब आगे से वह सिगरेट नहीं पीएंगे। पत्नियां मान जाती हैं और फिल्म खत्म हो जाती है।

हिंदी सिनेमा ने इस समीकरण को पलटकर बनाने की कोशिश नहीं की है, कि पत्‍नी किसी सिंगल लड़के से अफेयर करे, बाद में वह पकड़ी जाए और फिल्म कॉमेडी हो, इस तरह के सिचुवेशन शायद समाज अभी एफोर्ड नहीं कर सकता? यदि सिचुवेशन होगी भी तो कॉमेडी नहीं होगी। निर्देशक को शायद यह लगता है कि पत्नियों का अफेयर करना कॉमेडी नहीं है और यह छिपकर सिगरेट पीने जैसा भी नहीं है। 

इसी तरह ऐसी फिल्में बनाने में भी सिनेमा की दिलचस्‍पी नहीं रही है जहां पर पति का अफेयर उस लड़की से हो जो ना तो 'लिबरल' हो ना ही सिंगल। दोनों विवाहित हों और दोनों मन के किसी कोने के खालीपन को भरने के लिए करीब आने की कोशिश में हों। और यह करीब आना भी इंटेनशनल ना हो। इस तरह के एक्वेशन में सेक्स प्रियॉरिटी में नहीं होगा। ये संबंध सेक्स के लिए बन भी नहीं रहे होंगे।

 करण जौहर की फिल्म कभी अलविदा ना कहना , अस्तित्व और सिलसिला इस ट्रैक की फिल्‍में हैं जहां चीजें हास्य के रुप में नहीं पेश की गई हैं। सेक्सुअल अट्रैक्‍शन यहां प्रधानता में नहीं है। एक तनाव किरदारों के जेहन और चेहरे में दिखा है, पर इन फिल्मों में भी विवाहेत्तर संबंधों की जटिलताएं नहीं रिफलेक्ट होती हैं।

 खुद की जरुरतें वर्सेज परिवार की अपेक्षाएं, गिल्ट का बढ़ता-घटता बोझ, निरंतर हर पल चलने वाला कश्माकस, बिस्तर पर जिस्मों को लेकर एक अनचाही तुलना, अनचाही तुलना के बाद आने वाला गिल्ट, मूड ‌स्विंग, रिश्तें का अंधकार भरा भविष्य, इन सबके बाद भी उसे चलाए रखने की चाह जैसी बातें भी इन फिल्मों में नदारत दिखीं।

 विवाहेत्तर संबंधों का एक मनोवैज्ञानिक बोझ ये फिल्में संभालकर लेकर चलने में अक्षम साबित रही हैं। किरदार किन किन छोटी छोटी बातों से जूझ रहा है फिल्में वहां तक पहुंचने की कोशिश नहीं करती हैं। या ये कह सकते हैं कि ऐसी फिल्में बनी ही नहीं ‌जिनमें इन बातों को इस तरह से देखने की कोशिश की गई हो।

ऐसा नहीं है कि ऐसा ख्याल नहीं आया होगा। हिंदी साहित्य के पास ऐसी कुछ कहानियां हैं जहां पर पति और पत्नी दोनों ही अफेयर में हैं। रिश्तों और समाज का मनोवैज्ञानिक पक्ष वहां दिखता जरूर है पर वहां भी लेखक इस चीज को लेकर उपापोह में है कि वह कहानी को खत्म कहां करें।

राष्ट्रवाद वर्सेज मानवतावाद की तरह ही शादी वर्सेज प्रेम की कोई सटीक व्याख्या ना अब तक हुई है और ना ही शायद इससे हर कोई सहमत होगा। बावजूद इसके हमें सिनेमा से ऐसी फिल्में की उम्‍मीदें हैं जो इस विषय को उसी संजीदा तरीके से पेश करें जिस तरह के ये विषय हैं। कॉमेडी हम किसी और फिल्म में देख लेंगे।

मर्दानी 2, रेप की भयावहता दिखाने से ज्यादा खुद को फिल्म बनाने में बिजी है

'मर्दानी 2' रेप विषय पर बनी ऐसी फिल्म है जो एक पल भी यह बात नहीं भूलती कि वह एक मुंबईया फिल्म है, जिसका मकसद लोगों का मनोरंजन करना है।

वह रेप के भावनात्मक और संवेदनशील द्वंद में खुद को न उलझाकर रेपिस्ट और उसे पकड़ने वाली पुलिस ऑफिसर के बीच की नूराकुश्ती पर खुद को फोकस करना चाहती है।

रेपिस्ट, जिसे आमतौर पर घिनौना माना जाता है यह फिल्म उसे हिंदी फिल्मों के विलेन की तरह स्टेबलिश करती है, जो शातिर भी है और स्मार्ट भी। मर्दानी उसे अच्छे सीन भी देती है और संवाद भी। 'विलेन मजबूत होगा तो हीरो भी मजबूत दिखेगा' वाली लीक पकड़कर यह फिल्म क्लाइमेक्स तक आते-आते रेप को भूल जाती है और सिर्फ विलेन की चालें और पुलिस की जांबाजी को याद रखती है। बचे हुए समय में यह फिल्म यह भी याद दिलाने की कोशिश करती है कि यह काम एक महिला पुलिस ऑफिसर ने किया है।

फिल्म विलेन को मजबूत करने के साथ-साथ उसके द्वारा किए जाने वाले अपराधों को भी एक वजह देने की कोशिश करती है। एक रेपिस्ट जिसे फिल्म सिर्फ एक रेपिस्ट नहीं मानती और अंत तक आते-आते वह उसे एक साइकोलॉजिकल क्रिमनल की तरह दिखाने लगती है। जाहिर सी बात है कि साइकोलॉजिकल क्रिमिनल के प्रति हमारे मन में वैसा लिजा-लिजा घृणा वाला भाव पैदा नहीं होता जैसा रेपिस्ट को लेकर होता है।

 इस फिल्‍म को देखते हुए आपको दर्जनों ऐसी देशी-विदेशी फिल्में याद आ सकती हैं जिसमें विलेन अपने किसी कॉम्लेक्स की वजह से क्रिमिनल बन गया होता है। इस फिल्म का रेपिस्ट विलेन आपको क्रिस्टोफर नोलन की फिल्‍म द डॉर्क नाइट के जोकर या एआर मुर्गादास की तमिल-तेलुगू फिल्म स्पाइडर के विलेन की नकल करता हुआ भी लग सकता है। ऐसा विलेन जो क्रूर तो है पर साथ में 'कूल' भी है। उसके पास हीरो के सामने टिके रहने की क्षमता है और उसे हराने की भी। 

'मर्दानी 2' के साथ सुविधा और संयोग ये है कि यह फिल्म ऐसे समय पर आई है जब देश के अखबार और टीवी के प्राइम टाइम रेप की खबरों से रंगे पड़े हैं। पुलिस रेपिस्टों का एनकांउटर कर दे रही है और चारों ओर वाह-वाह की आवाजें आ रही है। पर फिल्म की टोन रेप को लेकर वैसी नहीं है। यह रेप पीड़िता, उनके परिवारों की हालत और समाज में उसके गुस्से की तरफ अपना कैमरा नहीं घुमाती है। बल्कि उन दृश्यों को रचने में व्यस्त रखती है जिसमें पुलिस और विलेन के बीच शह और मात का खेल चलता दिखे। कभी वह जीते तो कभी वो हारे। ‌फिल्म की सबसे ज्यादा दिलचस्‍पी विलेन के अपराध करने के तरीकों और एक पुलिस ऑफिसर के महिला होने पर है। 

 'मर्दानी 2',  स्‍त्री सशक्कतीकरण की कुछ बहुत ही वाजिब बातें निहायत सस्ते तरीके, और घिसे-पिटे संवादों के साथ करती है। फिल्म के क्लाइमेक्स सीन के ठीक पहले मर्दानी बनी रानी मुखर्जी एक टीवी इंटरव्यू दे रही होती हैं जिसमे वह पुरुषों से बराबरी का हक मांग रही होती हैं। वह पुरुष जो उनके ऑफिस में भी हैं और जिन्हें एक महिला से ऑर्डर लेने में शर्म आती है। ये सीन अब अच्छे नहीं लगते और किसी महिला को स्टीरियोटाइप ही फील कराते हैं।

मर्दानी 2 देखते समय आपको नेटफ्लिक्स पर कुछ महीनों पहले स्ट्रीम हुई वेब सीरिज 'दिल्ली क्राइम' की भी याद आती है और 'आर्टिकल' 15 की भी। निर्भया गैंगरेप पर बेस्ड करके बनाई 'दिल्ली क्राइम', क्राइम के सिरों को जिस तरह से खोलती है, अपराधियों का बैकग्राउंड तलाशती है, बिना रेप दिखाए रेप की यातना को महसूस कराती है वह बार-बार इस फिल्म में दर्शकों को याद आ सकता है।

मर्दानी 2, रानी मुखर्जी के लिए अपने पति द्वारा कुछ-कुछ समय के बाद दिया जाने वाला तोहफा है। यह फिल्म आदित्य ने रानी के लिए ही बनाई है। रानी मुखर्जी का बढ़ता वजन और चेहरे पर बढ़कर झूलती चर्बी उन्हें इस रोल की कास्टिंग के लिए रोक देती यदि वह आदित्य की बीवी ना होतीं। पर ये मियां-बीवी का मामला है। इसमें फिल्म के निर्देशक गोपी पुथरन बहुत दखल नहीं दे सकते थे, दर्शकों को भी नहीं देनी चाहिए...रेपिस्ट बने विशाल जेठा ने उम्दा काम किया है।

किसी बरसती दोपहर में कमरे को खुद को बंद करके देख डालिए हाउस अरेस्ट

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म 'हाउस अरेस्ट' को समझने से पहले इन दो बातों को समझ लीजिए...

पहलीः जापान की पूरी आबादी के लगभग दो प्रतिशत लोग 'हीकीकोमोरी' नाम के सिंड्रोम से जूझ रहे हैं। इस सिंड्रोम में व्यक्ति खुद को सोशली डिस्कनेक्ट कर लेता है, वह घर से बाहर निकलता ही नहीं है। वह अपने घर या कमरे में अकेले रहता है। कई-कई महीने। वह सिर्फ इंटरनेट और फोन के जरिए ही लोगों से जुड़ा होता है। जापान के अलावा अमेरिका, इटली, फ्रांस और स्पेन जैसे देशों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। 

दूसरीः हाउस अरेस्ट फिल्म का नायक दिल्ली के एक फ्लैट से पिछले 9 महीनों से बाहर नहीं निकला है। फिल्म के खत्म होने के कुछ मिनट पहले हम जान पाते हैं कि उसकी बीवी उसके बॉस के साथ भाग गई है। उसके शब्दों में 'शादी के बाद वह बीवी को अच्छी लाइफ देने के लिए दिन रात काम करता है। ऑफिस में वह बॉस का काम भी करता है, कुछ समय बाद बॉस उसके घर पर उसका काम करने लगता है' ये भागने के कुछ दिन पहले की उसकी और उसके बॉस की रुटीन थी। घर में कैद इस आदमी का इंटरव्यू करने के लिए एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट उसके घर आती है। वह जापान में रह चुकी है तो उसे ये केस हीकीकोमोरी का लगता है, उसके लिए ये एक स्टोरी होती है।

 इन दोनों बातों को जानने के बाद आपके मन में जो एक सीरियस किस्म का प्लाट बन रहा है, दरअसल फिल्म वैसी है नहीं। ये अल्ट्रा अर्बन माहौल में रची एक लाइट हार्टेड इमोशनल फिल्‍म जैसी है। जिसकी पिच और टोन कॉमिक है। 100 मिनट से ऊपर की यह फिल्म थिएटर के अंदाज में एक फ्लैट में शूट की गई है। यहां मुख्य रुप से दो किरदार हैं और कुछ और किरदार आते जाते रहते हैं।

 इस फिल्म की खूबसूरती ये है कि कुछ मिनटों के बाद हम फिल्म के मुख्य किरदारों करन और शायरा के बीच बन रहे इमोनशल बॉडिंग का हिस्सा बन जाते हैं। शायरा  एक नहीं कई सारे अफेयर्स से गुजर चुकी है। सेक्स या वन टाइम रिलेशनशिप उसके लिए टैबू नहीं है, फिर भी करन और शायरा का करीब आना बेहद नेचुरल और जरूरी लगता है। एक ऑडियंश के रुप में दर्शक को लगने लगता है कि अब इनको क्लोज हो जाना चाहिए। चाहे तो बॉलकनी में पौधों को पानी देते वक्त, वीडियो गेम खेलते या एक ही बाउल से कुछ खाते हुए। हर दफा लगता है कि होना चाहिए। 'ये होने चाहिए' की फीलिंग स्वाभाविक क्यों लगती है यही इस फिल्म की स्ट्रेंथ है।

फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू करन का दोस्त जेडी है। जेडी का किरदार जिम शरभ ने किया है। जिम को आप चाहें तो पदमावत के अलाउद्नीन खिलजी के करीबी के रूप में याद कर सकते हैं या मेड इन हैवेन वेब सीरिज के बिजनेसमैन आदिल के रूप में। कमरे में बंद करन का किरदार अली जफर ने किया है। उस जर्नलिस्ट के रोल में श्रेया पिलगांवकर हैं। श्रेया को आप इस तरह से समझिए कि मिर्जापुर वेब सीरिज में वह गुड्डू पंडित की प्रेमिका का किरदार कर चुकी हैं। और गुड्डू पंडित यानी फिर से अली जफर...

 जेडी ने ही उस जर्नलिस्ट को करन के घर भेजा हुआ है। बीवी के भाग जाने की तरह ही दर्शकों को ये भी आखिरी में ही पता चलता है कि शायरा जेडी की एक्स है। जेडी अपने आप को प्लेयर मानता है। वह मानता है कि पति के साथ 'रोज-रोज के दाल चावल' जैसी बोरिंग रिलेशनशिप से उकताई लड़कियां उसके पास कुछ थ्रिल खोजने के लिए आती हैं। वह पल जिनमें शायरा और करन के बीच में एक रिलेशन डेवलप हो रही होती हैं उन्हीं पलों में जेडी शायरा को फोन करके उसे थ्री सम के लिए इनवाइट करता है। इस थ्री सम में 'थ्री' शायरा की एक दोस्त को बनना है। जाहिर है वह भी जेडी की एक्स रह चुकी है। वह उसी के जरिए शायरा से मिला है।

फिल्म का खूबसूरत पक्ष इन्हीं रिलेशनशिप को बगैर पैनिक हुए दिखाना है। ये फिल्म कहीं भी मॉरल, इथक्सि या मॉरल पुलिसिंग के लोड में नहीं पड़ती है। वह सहजता के साथ बनने वाले रिश्तों में असहज होना जानती है और यह भी जानती है कि असहजता को झेलते हुए कब तक सहज रहा जा सकता है।

फिल्म में कॉमेडी का भी एक साइड प्लाट भी डाला गया है। शायद फिल्म की स्पीड को बनाए रखने के लिए। उसकी चर्चा इसलिए जरूरी नहीं कि वह दर्जनों बार किसी फिल्म में घुमा-फिराकर यूज हो चुका है।

हाउस अरेस्ट कोई चमत्कारिक फिल्म नहीं है। इसकी ना तो चर्चा होगी ना ही इसे कहीं कोट किया जाएगा, लेकिन मेरे लिए यह फिल्म एक जरुरी फिल्म है। मैं कह सकूंगा कि जिस शुक्रवार थिएटर में 'मरजावां' रिलीज हुई थी उसी शुक्रवार एक ऐसी फिल्म भी आई थी, जिसका बजट शायद कुछ लाख ही रहा हो। और जिसके पास रिलेशनशिप को लेकर दो चार नई फिलॉसफी थीं.. और जिसे घर में खुद को बंद करके देखा जा सकता है...

Wednesday, October 2, 2019

वॉर जैसी फिल्‍में ‌हिट होनी चा‌हिए ताकि मर्दानी के सीक्वल बनते रहें...


इस बात पर तो आप भी एग्री करेंगे कि एक स्पाई या जासूस का कॉमन सेंस और इंटलैक्ट लेवल एक पुलिस सब इंस्पेक्टर से बेहतर होता होगा। उसके रिफलेक्‍शन, मूव्स और प्लानिंग भी। तो फिर ये भी मानेंगे कि ऐसी फिल्म देखने वालों दर्शकों का स्तर भी चुलबुल पांडेय जैसा नहीं मानना चाहिए। दर्शकों को भी स्मार्ट मानना चा‌हिए। उन्हें स्पून फीडिंग नहीं करानी चाहिए। तमाम सारी बेहतर बातें लिए वॉर फिल्म यहां पर गलती करती है। एक तरफ वह एक्‍शन के नाम पर हॉलीवुड की दिग्गज फिल्मों के एक्‍शन डायरेक्टर्स की सेवाएं लेती है लेकिन फिल्म के प्लाट और स्क्रिप्ट में वही एक घिसी पिटी कहानी को दोहरा देती है। फिल्म के सस्पेंस और खुलासे मेरे स्कूल दिनों में देखे गए सीरियल सुराग के इंस्पेक्टर भारत जैसे लगते हैं। जो इतने प्रिडेक्‍टिबल हैं कि जिनके बारे में अन्ना हजारे तक बता दें कि आगे क्या होने वाला है।

वॉर फिल्म एक पॉपकॉर्न इंटरटेनर की तौर पर बुरी फिल्म नहीं है। इसके एक्‍शन सीन सांस रोककर देखने वाले हैं। जो किसी भी लेवल पर हॉलीवुड स्पाई फिल्मों से कमतर नहीं हैं। फिल्म के पास खूबसूरत लोकशन हैं और खूबसूरत हीरो भी। प्रॉब्लम वहां नहीं हैं। प्रॉब्लम ये है कि फिल्म के पास एक्‍शन के अलावा कुछ और है ही नहीं। जब फिल्म में एक्‍शन नहीं हो रहा होता है तो दरअसल बकवास हो रही होती है। दर्जनों फिल्‍मों में देखी गई बकवास फिर से एक बार नए तरीके से देखने को मिलती है। करोड़ो रुपए खर्च करके फिल्म का एक्‍शन बनाया गया है, कुछ लाख खर्च करके एक अच्छी स्किप्ट के बारे में नहीं सोचा गया। फिल्म की कहानी अपने एजेंट के बागी हो जाने की है। अभी अभी फिल्म देखना शुरू करने वाला ऑडियंश भी बता देगा कि यदि हमारा स्पाई बागी हो रहा है तो इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं होगा कि वह पाकिस्तान या चीन से मिल गया होगा। यकीनन उसके पास कुछ ऐसी बातें आईं होंगी जो उसे सिस्टम में कोई जासूस होने का इशारा कर रही होंगी और इसका खुलासा वह किसी सीन में शराब पीते हुए करेगा।

प्लाट का कॉमन होना बुरा नहीं होता। पचास और साठ के दशक की हिट फिल्मों को निकाल लीजिए। आप पाएंगे कि इन बीस सालों में जो फिल्मों आई हैं इनके प्लॉट घूम फिरके वही दस-बारह ही रहे हैं। अस्‍सी के दशक में इनकी संख्या और भी कम हो गई थी। हर तीसरी फिल्म पहली फिल्म जैसी लगती थी। वॉर अगर इसी प्लाट के साथ आगे बढ़ना चाहती थी तो भी बुरा नहीं था। वह चूकती है अपनी चरित्रों को गढ़ने में। उनके पर्सनल लाइफ को दमदार बनाने में। उनकी‌ डिटेलिंग में। एक सिस्टम के अंदर होने वाली बातचीत को स्मार्ट बनाने में। आप एक हीरो से हर तीसरे सीन में एक्‍शन कराएंगे तो एक्‍शन भी एक समय के दाल रोटी जैसा बोरिंग लगने लगता है।

ये अच्छी बात है कि फिल्‍म प्रेम कहानी के नाम पर बहुत समय नष्ट नहीं करती है। पर मुझे वाणी कपूर के लिए सॉरी हमेशा फील होता है। 31 साल की इस एक्ट्रेस के पास ले-देकर अब तक तीन फिल्में हैं। वाणी को फिल्में कब मिलेंगी? जब कोई कपूर सरनेम वाला देश का प्राइम मिनिस्टर बन जाएगा? फिल्में न मिलने से बोर होने वाली वाणी कपूर अपना समय प्लास्टिक सर्जरी करवाकर काटती हैं। वाणी के चेहरे को देखिए। शुद्घ देशी रोमांस में अलग चेहरा, बेफिकरे में अलग और वॉर में अलग। वाणी कपूर के चेहरे पर इतनी प्लास्टिक है कि सरकार को प्लास्टिक बैन की मुहिम वहां से शुरू करनी चाहिए थी। वाणी कपूर के ओंठ दिखाकर यूपीएससी में प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि ये ओंठ किस फिल्म में था। तब तक उनके पास चार फिल्‍में भी हो जाएंगी।

फिल्म में प्लास्टिक सर्जरी सिर्फ वाणी कपूर के चेहरे पर नहीं दिखती। फिल्म का मुख्य विलेन प्लास्टिक करवाकर घूम रहा है। इसे इतना आसान करके दिखाया गया है कि यदि आडवाणी चाहें तो कुछ दिन के लिए नरेंद्र मोदी के चेहरे वाली प्लास्टिक सर्जरी करवाकर पीएम बन सकते हैं। क्योंकि फिल्म ये मानती है कि प्लास्टिक सर्जरी के बाद चेहरा ही नहीं आदमी भी पूरी तरह से बदल जाता है। प्लास्टिक सर्जरी वाले प्लॉट 30 साल पहले आई 'खून भरी मांग' में चौंकाते थे अब बकवास लगते हैं। फिल्म में एक मुस्लिम गद्दार के देशभक्त बेटे का भी बचकाना प्लॉट है। यह एरीटेट करता है। इस हद तक कि इस पर जोक बनाने का मन भी नहीं करता है।

रितिक रोशन का डील डौल, उनका लंबा मुंह, भूरी आंखे, आंखों में लगे काले चश्में, शरीर पर चिपकी गोल गले की टीशर्ट, हवा में उड़ते उनके डाई किए हुए हल्के लाल बाल, ये सब मिलाकर माहौल बनाने में कोई कमी नहीं रखते। एक्‍शन के सीन में वह अच्छे भी लगते हैं लेकिन एक्‍शन के अलावा आप उनसे क्या काम करवा रहे हैं? टाइगर श्राफ कुछ दिनों बाद फिल्मों में आइटम सॉन्ग की तरह एक्‍शन सीन करते दिख सकते हैं। वह एक्‍शन सीन इतनी खूबसूरती से करते हैं कि लगता है कि इनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। वह मदारी के कंधे पर बैठे बंदर की तरह  हैं। जो उतरता है कुछ खेल दिखाता है और फिर से उसके कंधे पर बैठ जाता है। बाकी पूरे खेल से जैसे उसे मतलब ही नहीं। एक इंसान के तौर पर टाइगर कहानी के साथ घुलते-मिलते नहीं हैं। किसी भी फिल्‍म में नहीं। यहां तक कि उनकी सोलो हीरो वाली बागी तक में नहीं।

दो अक्टूबर को रिलीज हुई  इस फिल्म लंबा वीकेंड दशहरा तक चलेगा। फिल्म की पहली दिन की आक्यूपेंसी बताती है कि यह तीन सौ करोड़ कमाएगी। ये अच्छा है। आदित्य चोपड़ा इस फिल्म से इतना पैसा कमा लेंगे कि वह अपनी बीवी के लिए हर साल मर्दानी का सीक्वल बनाते रहें। एक मिडिल क्लास आदमी करवा चौथ पर बीवी को साड़ी देता है, आदित्य चोपड़ा अपनी बीवी को फिल्म देते हैं। भगवान हर बीवी को आदित्य जैसा पति दे। वॉर के साथ अच्छी बात ये है कि यह ठग्स ऑफ हिंदुस्तान, कलंक या साहो जैसा दिल नहीं तोड़ती, वह सिर्फ अपनी लिमिटेशन दिखाती है।

Saturday, September 21, 2019

एक बीवी की निगाह से देखिए कि उसका जासूस पति क्या अहमियत रखता है...


अमेजॉन प्राइम पर स्ट्रीम हुई वेब सीरिज 'द फैमिली मैन' आप देख सकते हैं, बशर्ते इसे एक स्पाई की कहानी के नजरिए से नहीं, बल्कि एक भारतीय मुसलमान, आतंक से लड़ रहे सरकारी सिस्टम और एक स्पाई की बीवी के नजरिए से देखने की कोशिश कीजिए...

"भारत पर कोई आतंकी हमला होने वाला है। जिसके कुछ कोड वर्ड्स हमें मिल गए हैं। हमले के मास्टरमांइड पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर में बैठे हैं। उनके तार अफगानिस्तान, सीरिया, यूएई, सूडान, यूंगाडा जैसे इस्लामिक देशों से होते हुए सोवियत रुस और यूएएस तक पहुंचते हैं। इस खेल में सिर्फ आतंकी नहीं हैं। इसमें सरकार बनाने बिगाड़ने की हैसियत रखने वाले पॉवरफुल लोग हैं, दुनिया भर को हथियार सप्लाई करने वाली कंपनियों के ब्रोकर्स हैं, कई सारे बड़े कार्पोरेट्स हैं। भारत खुफिया एजेंसी के अधिकारी अपनी लगन, समर्पण और कूटनीति से इन चालों को नाकाम कर देते हैं।"  ये सिनेमा का वो प्लाट है जिसे बुनियाद बनाकर दर्जनों हिंदी फिल्में रची जा चुकी हैं।

कहानी के ये प्लाट भी उनके ओरिजनल नहीं रहे हैं। पश्चिम में सेकेंड वर्ल्ड वॉर, यहूदी दमन, ईराक, वियतनाम, अफगानिस्तान, इजराइल फिलिस्तीन युद्घ जैसे बड़े मामलों पर ढेरों अच्छी और बुरी फिल्में बनी हैं। वर्ल्ड वॉर के बाद शुरू हुए कोल्ड वॉर के दौरान जासूसी की दुनिया शुरू होती है। उन फिल्मों का एक अलग जॉनर हैं। श्रीराम राघवन जैसे सक्षम फिल्मकारों ने भी स्पाई और युद्घ फिल्मों के कॉकटेल को मिलाकर सिर्फ संदर्भ बदलकर परोस देने की कोशिश की है। हमारे पास काबुल एक्प्रसेस और फैंटम जैसी भी बेहद घटिया फिल्‍में भी हैं और मद्रास कैफे जैसी बेहतरीन फिल्‍म भी।


 तो क्या अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हुई फिल्म द फैमिली मैन ऐसी ही दर्जनों फिल्मों में से एक है जिसका हीरो भारतीय है और वह भारत के बचाने के मिशन में लगा हुआ है? पहले दो एपीसोड देखकर ऐसा ही लगता है। पर खत्म होते-होते ऐसा नहीं लगता। यह वेब सीरिज तब बड़ी लगने लगती है जब यह आतंकवाद और आतंकवादी बनने की प्रक्रिया को एक नए ढंग से देखने लगती है। इस बार ये बिल्कुल जरुरी नहीं कि आतंकवादी समंदर के रास्ते भारत में घुसे।

फैमिली मैन बताती है कि भारत पर हमला करने के लिए आतंकी यहीं के ही हैं, सिर्फ वहां से प्लान आया है। वह मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हुए, कॉलेज में पढ़ाई करते हुए, यू ट्यूब में वीडियो देखते हुए, किसी हिंदू प्रेमिका को डेट करते हुए भी वह आतंकवादी बने हुए हैं। वह जन्नत पाने के लिए, कश्मीरियों को हक दिलाने के ‌लिए या बाबरी मसजिद का बदला लेने के लिए आतंक के रास्ते नहीं चले हैं बल्कि वह इसलिए इस राह में है क्योंकि उन्हें अपने ऊपर हो रहे जुल्‍म् का बदला लेना है। वह भारत की सरकारों और यहां के बहुसंख्यक लोगों को सबक सिखाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। गुजरात दंगे, गौ हत्या, मॉब लिंचिंग, हिंदू वादी नेताओं के बयान उनकी प्रतिक्रिया के प्रमुख स्रोत हैं।

फिल्म अपने टैग लाइन से ही यह बताने की कोशिश करती है कि यह किसी सत्य घटना से प्रेरित नहीं बल्कि अखबारों में आमतौर पर छपने वाली खबरों से इंस्पायर्ड है। निर्देशक ने कोशिश की है आतंकवाद से लड़ने वाले सिस्टम, सरकारों के पक्ष के साथ उनका पक्ष भी रखा जाए जो कई बार सरकार की निगाह में तो गुनाहगार हैं लेकिन हर बार वह गुनाहगार नहीं होते। वैसे ही जैसे हर बार वह मासूम नहीं होते। कुछ फर्जी एनकाउंटर, मामूली शक में गोली मार देने या घर से उठा लेने जैसी घटनाएं भी फिल्म का हिस्सा बनती हैं और विमर्श के कुछ परागकण को छोड़कर आगे बढ़ जाती हैं।

यह वेब सीरिज आतंकवाद को देखने के नजर‌िए के साथ-साथ इस मायने में भी एक अलग है कि वह अपने जासूस को एक कूल, दिलफेंक, बॉडी बिल्डर की तरह पेश नहीं करती। मौका पड़ने पर वह हवाई जहाज भी नहीं उड़ा  सकता और पानी का जहाज भी। उसका नाम किसी फिल्‍मी के हीरो जैसा नहीं है। एक मीडिल क्लास का आदमी जिसका नाम श्रीकांत तिवारी(मनोज बाजपेई) है इस बार हमारा हीरो है। 'श्रीकांत तिवारी' नाम की अपनी सीमाएं हैं। ना तो वह जेम्स बॉड की तरह फ्लर्ट कर सकते हैं और दूसरा उनका मालूम है कि वह टॉम क्रूज भी नहीं है। उन्हें अपने बच्चों की पैरेंट्स मीटिंग में भी जाना है और किचन में अपनी बीवी की हेल्प भी करनी हैं। श्रीकांत तिवारी के पास ऐसे गुर्दे भी नहीं हैं जो लगातार शराब और सिगरेट पीने से खराब ना हों। श्रीकांत तिवारी को उन्हीं लिमिटेशन में देश भी बचाना है और परिवार भी।


आमतौर पर जासूसों की जिंदगी में बदलती हुई प्रेमिकाएं होती हैं। हॉट और मौकापरस्त।  श्रीकांत तिवारी की जिंदगी में बीवी है। एक बीवी और दो बच्चे । फिल्म की खूबसूरती उस एंगल को एक्सप्लोर करने की है जिस एंगल से श्रीकांत की बीवी अपने पति और उसकी नौकरी को देखती है। फैमिली को लेकर उसकी अवेलबिलटी को जज करती है। उसकी सेलरी की तुलना में उसके काम के घंटे कंपेयर करती है। उसकी पुरानी कार भी फिल्‍म में एक किरदार की तरह है।  एक जासूस की जिंदगी में ये एंगल नए हैं जो इस सीरिज को आतंकवाद पर बनी बाकी फिल्‍म से दूर खड़ा कर‌ते हैं।  श्रीकांत की बीवी के तौर पर तेलगू और मलयालम फिल्म की एक्ट्रेस प्रियमनी कमाल का काम करती हैं।

सुचित्रा अय्यर उर्फ सुचि का उनका किरदार बेहद खूबसूरती, ईमानदारी और सावधानी से लिखा गया है। जिन्हें आतंकवाद, पाकिस्तान, बम और जासूसी की दुनिया में रत्ती भर रुचि नहीं है उन्हें सिर्फ सुचि के किरदार के बदलाव और उसकी लेयर्स देखने के लिए यह फिल्म देखनी चाहिए। अघोषित तौर पर पति से होपलोस हो चुकी सुचि जब अपने एक कलीग की तरफ मुड़ती हैं तब फिल्म का वह हिस्सा अचानक बेहद रचनात्मक और खतरनाक हो उठता है। जिंदगी में कई बार पति और पति दोनों को लगता है कि दोनों की स्ट्रेंथ का सही आकलन एक-दूसरे नहीं कोई तीसरा कर रहा है। फैमिली मैन में ये तीसरा विलेन ना होकर भी विलेन से बड़ी हैसियत रखता है। इसकी हेल्प करने की नियत हमेशा कटघरे में होती है।


सुचि और उसके एक कलीग अरविंद (शरद केलकर)के बीच के ये रिश्ते प्रोफेशनल और प्लूटोनिक प्रेम के होते हैं या जिस्मानी? इसे राज और डीके ने बहुत ही संकेतों में कहने की कोशिश की है। दोनों किस तरह एक-एक स्टेप करीब आते हैं यह दिखाने में निर्देशक ने कई सारे मजेदार सीन गढ़े हैं जो कि बहुत सारे जिम्मेदारी भरी समझदारी लिए हुए हैं। जिन लोगों ने हैपी इंडिग फिल्‍म देखी होगी उन्हें सैफ और इलियाना डीक्रूज के बीच होटल में बने सेक्स रिलेशनशिप का वह सीन याद होगा। इस बार भी होटल है और दो होटल के कमरे के दो किरदार हैं। फर्क यह है कि दोनों मिडिल क्लास से आते हैं और मैरिड हैं।

 लोनेवाला के एक होटल कमरे में बेड पर लेटी सुचि और उसी कमरे के सोफे पर लेटे अरव‌िंद की आधी रात में होने वाली वाट्सअप चैट आपको अलग से बार-बार देखनी चाहिए। चैट के खत्म होने का प्वाइंट, उसके बाद कमरे की हलचल, यहीं सीन का खत्म हो जाना, गाड़ी में बैठे दोनों के सख्त चेहरे फिर बाद में एक लाइन में हुई उनकी चैट वालों हिस्सों को बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है। जिसके मायने आप निकालना चाहें तो निकाल लें, निर्देशक साफ-साफ कुछ नहीं कहता।


राज निधिमोरु और कृष्‍णा डीके निर्देशकों की जोड़ी ने इस फिल्‍म को डायरेक्ट किया है। ये सक्षम फिल्मकार हैं। 99, शोर इन द सिटी, गो गोवा गॉन, हैपी इंडिंग, जेंटलमैन और स्‍त्री फिल्मों को यह साथ-साथ निर्देशित कर चुके हैं। निर्देशकों की इस जोड़ी ने पहली बार इस तरह के जॉनर में हाथ आजमाया है। अच्छी बात ये है कि उन्हें अपनी स्ट्रेंथ पता है। वह आतंकवाद या जासूसी फिल्‍मों वाले कोर जोन में जाने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय उनकी कोशिश कुछ नए तरह के किरदार गढ़ने में होती है। राज और डीके की फिल्‍मों के किरदार आपको याद रहते हैं। ये फिल्म जितनी मनोज बाजपेई की फिल्‍म है उतनी ही यह शारिब हाशमी, नीरज माधव, प्रियमनी, दर्शन कुमार की भी फिल्म है।

दस ऐपीसोड वाली यह वेब सीरिज ऐसी जगह पर खत्म होती है जहां पर यह निश्चित है कि इसका सीजन 2 जरुर आना है। गूगल पर सर्च करने पर पता चलता है कि शायद ये तीन सीजन में बनने वाली सीरिज है। तो भातर पर केमिकल हमला हो पाता है या नहीं इसके लिए आपको इसके नए सीजन का वेट करना होगा। भारत पर एक और हमला सेक्रेड गेम्स में भी पेडिंग पड़ा है। सब मिलाकर भारत पर बहुत सारे हमले तो सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के बाकी हैं...

Friday, September 13, 2019

डियर कॉमरेडः यदि आपको कबीर सिंह उर्फ अर्जुन रेड्डी पसंद है तो आपको इसे देखना चाहिए...


हिंदी सिनेमा की कई त्रासदियों में एक त्रासदी ये भी है कि यदि वो आज कॉलेज लाइफ, स्टूडेंट यूनियन, उनकी पॉलिटिक्स, पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के मतभेद और उसके इर्द-गिर्द पनप रहे किसी प्रेम की कहानी को कहना चाहे तो उसके पास चेहरे ही नहीं हैं। मोहब्बत करने के लिए आलिया भट्ट तो हो सकती हैं लेकिन उनके लिए कॉलेज कौन जाए?

अधेड़ हो चुके शाहिद कपूर या अधेड़ हो रहे सुशांत सिंह राजपूत? टाइगर श्रॉफ कॉलेज जा तो सकतें हैं, अभी पिछली फिल्‍म में गए भी थे लेकिन वह वहां डांस कर सकते हैं, शरीर की नुमाइश कर सकते हैं, पॉलिटिक्स की लेयर्स या किसी आइडियोलॉजी के चेहरे नहीं बन सकते हैं। अर्जुन रेड्डी के बाद विजय देवरकोंडा की नई फिल्‍म डियर कॉमरेड देखकर लगता है कि साउथ का सिनेमा इस मामले में धनी है। उसके पास कॉलेज जाने वाले हीरो हैं जो इश्क भी अच्छा करते हैं और क्रांति भी।

अर्जुन रेड्डी और अब डियर कॉमरेड के जरिए विजय देवरकोंडा एक ऐसे हीरो की उम्मीद जगाते हैं जो टूटकर प्रेम करना भी जानता है, रुठना भी और प्रेमिका के सामने बिखर जाना भी। कबीर सिंह फिल्म का विरोध करने वाली गैंग को भी डियर कॉमरेड देखनी चाहिए और उन्हें भी जिन्होंने कई दशक तक शाहरुख को प्रेमिकाओं का ख्याल करने वाले हीरो के रुप में पहचाना है। विजय सरसो के खेत में बांहे फैलाकर अपनी प्रेमिका को नहीं भरते ना ही छूट रही ट्रेन में अंतिम समय में हाथ बढ़ाकर अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़ते हैं, लेकिन वो जिस तरह से अपनी प्रेमिका को चाहते हैं, वैसा चाहा जाना हर लड़की का सपना हो सकता है। विजय सपनों के हीरो हैं...

डियर कॉमरेड, शुरूआत में कॉलेज यूनियन की पॉलिटिक्स करने वाले एक गुस्सैल नायक की कहानी लगती है। बाद में यह कहानी स्टेल लेवल पर क्रिकेट खेल रही उसकी प्रेमिका की कहानी बन जाती है, जहां नायक सिर्फ उसके अधूरेपन को भरने की कोशिश भर के लिए है।

फिल्म अपने नाम को बहुत जस्टीफाई करने की कोशिश नहीं करती। ना ही वह हॉर्डकोर कॉमरेड या पोलित ब्यूरो की पॉलिटिक्स में घुसना चाहती है। वह कॉमरेड होने के अर्थ को समझाती है पर बिल्कुल आसान भाषा में बिना राजनैतिक हुए...फ़िल्म में रूस और चीन के तमाम सारे कम्युनिस्ट नेताओं की तस्वीरें तो दिखती हैं पर उनकी आइडियोलॉजी को न बताया जाता है न ही ग्लोरीफाई किया जाता है...

यह शुद्घ रुप से एक प्रेम कहानी ही है। एप्रोच के लेवल पर दो अलग-अलग तरह के इंसानों की प्रेम कहानी। कई सारे अवरोधों में लिपटी हुई ऐसी प्रेम कहानी जिसके कुछ हिस्से इन्हीं डिफरेंट एप्रोच के चलते उधड़ जाते हैं और बाद में उन पर तुरपाई भी हो जाती है। इस कहानी के अवरोध कई बार फिल्मी तो लगते हैं लेकिन कुछ अच्छे और नए सीन इन्हें संभालते रहते हैं। फ़िल्म की कहानी एक लिनियर लाइन में नहीं चलती। अंत तक पहुंचने के पहले यह यहां-वहां की कई सारी बातें कहना चाहती है। जिसके मकसद यकीनन रुहानी हैं।

फिल्म का आखिरी हिस्सा बीसीसीआई के जोन क्रिकेट सिलेक्टर के द्वारा एक महिला क्रिकेटर के संग यौन शोषण की कहानी बन जाती है। यौन शोषण करने और उसके छिपाने का तरीका कमजोर है। लेकिन बाद में उसके खिलाफ उठ खड़े होने वाली लड़ाई अच्छी है। इस लड़ाई को लड़ने में दो अलग-अलग लोगों के एप्रोच का कश्माकस ही फिल्‍म की जान है। फिल्म के हीरो के पास अपनी फिलॉसिफी को कहने के लिए बहुत सारे डायलॉग आए हैं। हीरोइन को आखिरी में मौका दिया गया है। जहां उसके ऊपर खरा उतरने का दबाव होता है..

डियर कॉमरेड कई हिस्सों में सिर्फ सिनेमा लगने के साथ ही कई जगह मीनिंगफुल भी लगती है। निर्मल वर्मा की फंतासी और यथार्थ की मिली जुली दुनिया जैसी। फिल्म के गाने समझ में नहीं आते लेकिन सुनने में अच्छे लगते हैं। फिल्म अंग्रेजी सब टाइटिल के साथ अमेजन प्राइम में उपलब्‍ध है। इस फिल्म के पास इतने मसाले हैं कि जल्द ही इसके हिंदी रीमेक बनाने के अधिकार खरीद जा सकते हैं, आप यह फिल्म देख सकते हैं।

सेक्शन 375 : एक ऐसी फिल्‍म जो रेप पीड़ित नहीं शायद रेप आरोपी के नजरिए से बनी है


सेक्शन 375 हिंदी सिनेमा की शायद पहली ऐसी फिल्म है जो रेप के आरोपों में इंटेंशन खोजने की कोशिश करती है... बगैर इस बात से डरे हुए कि उस पर स्‍त्री विरोधी होने का ठप्पा लगने के साथ-साथ वह रेपिस्ट के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली फिल्म के रुप में भी दर्ज की जाएगी।

सेक्‍शन 375 रेपिस्ट मानसिकता को जस्टीफाई करने की कोशिश नहीं करती लेकिन वह इस बात को कहने का इरादा जरुर रखती है कि रेप और यौन शोषण का हर आरोप जरुरी नहीं कि हर बार सही ही हो। इस आरोप की कुछ 'दूसरी वजहें' भी हो सकती हैं। फिल्म उन दूसरी वजहों में घुसने की खतरनाक कोशिश करती है।
फिल्म मानती है कि रेप की सजा इतनी कठोर है, उसके लेकर कानून इतने एकपक्षीय हैं कि कई बार उन कानूनों का प्रयोग अपने 'दूसरे सेटलमेंट' के लिए भी किया जा सकता है। ऊपरी तौर पर सेक्‍शन 375 एक थ्रिलर कोर्टरुम ड्रामा है, लेकिन अंदर घुसने पर आप पाएंगे कि यह फिल्म हाल ही में ट्रेंड हुए मीटू मोमेंट को काउंटर करने के लिए बनाई गई है। पूरे मीटू अभियान पर इसे पीड़ित पुरुषों की तरफ से आए पक्ष के रुप में भी देखा जा सकता है।

अजय बहल के निर्देशन वाली यह फिल्म कई लोगों को विकास बहल की असल जिंदगी पर बनी फिल्म लग सकती है। विकास बहल पर उस समय मीटू का आरोप लगा था जब वह सुपर हिट वेब सीरिज सेक्रेड गेम्स के पहले पार्ट के बाद दूसरे पार्ट की शूटिंग कर रहे थे। आरोप के बाद विकास को उस प्रोजेक्ट से अलग कर दिया गया था। विकास अभी कुछ समय पहले बरी हो गए हैं।

अकेले विकास नहीं कई सारे फिल्मी दुनिया के लोग इन आरोपों से बरी हुए हैं। आरोप लगने की खबरों पर प्राइम टाइम हुए, स्पेशल सेप्‍लीमेंट छपे लेकिन बरी होने की खबरें सिंगल कॉलम में सिमट गईं। मीटू के सबसे ज्यादा आरोप भी फिल्म इंडस्ट्री से ही आए थे। यहां पर यह जानना जरुरी है कि अजय बहल और विकास बहल भाई-भाई नहीं हैं। वैसे ही जैसे मोहनीश बहल इन दोनों के ताऊ नहीं हैं। और कनू बहल इसमें से किसी के कजिन नहीं हैं।

घटनाओं को जर्नलाइज करके देखने वाली महिलाओं को एक झटके में यह फिल्म महिला विरोधी लग सकती है। यह तर्क आ सकता है कि यह फिल्म उन लड़कियों के खिलाफ खड़ी है जो कुछ एंबीसन और सपने रखती हैं।आगे बढ़ने के लिए उनका एप्रोच पर कई बार कंजरवेटिव ना होकर लिबरल और प्रै‌क्टिकल होता है। लिबरल शब्द तलवार की धार जैसा है। इसका मिस इंटरप्रिटेशन हमेशा से होता आया है, लोग अपने अनुसार इस दोहरा उपयोग करके गिरते गिराते रहे हैं।

फिल्म का बैकड्रॉप एक मशहूर निर्देशक और एक कॉस्ट्यूम डिजाइनर के बीच बने शारीरिक संबंध की कहानी पर आधारित है। आरोप यहां रेप का है। रेप करने वाला ताकतवर जमात का है और पीड़ित कमजोर वर्ग की। दोनों वर्गों का यह आर्थिक अंतर भी फिल्म में एक किरदार की तरह चला करता है। फिल्म इस बात को कहने की कोशिश करती है कि कई बार आपका प्रिवेल्जड होना भी एक बड़े तबके लिए आपके विरोध में खड़ा होने के लिए काफी होता है। फैसला आने से पहले ही रेप आरोपी के खिलाफ फेसबुक और ट्विटर पर हैशटैग बनकर ट्रेंड कर रहे होते हैं। मीडिया ट्रायल में उसे दोषी पाया जा चुका होता है।

इंटरवल तक यह फिल्म रेप की एक कहानी और उस पर हुए फैसले को दिखाती है। इंटरवल के बाद फिल्म चाहती है कि आप अपने को रेप पीड़ित से इमोशनली डिकनेक्ट करके दूसरे फैक्ट देखने की कोशिश करें। इन दूसरे फैक्ट में रेप का आरोपी कोई दूध का धुला इंसान नहीं है। वह दुनिया भर के ऐब रखता है। अपनी पत्नी को चीट करता है। एक नहीं कई सारी लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाता है। अपनी पोजिशन का उपयोग करते हुए उनकी आवाज दबाता है। लेकिन वह रेपिस्ट नहीं है। वह सेक्स करता है, रैंडम करता है, बिना इमोशनल कनेक्‍शन के करता है लेकिन सामने वाली की मर्जी से करता है, रेप नहीं करता।

फिल्म चाहती है कि न्यायालय उसके इन सब ऐबों पर उसे सजा दें ना कि रेप के आरोपों पर। फिल्म का क्लाइमेक्स इंडियन पीनल कोर्ट और भारत के ज्यूडीशिरी सिस्टम की सीमाओं पर व्यंग्य करता है। दो जजों की ज्यूरी इस बात को लेकर कन्वींस हो जाती है कि यहां पर रेप के आरोप बदला लेने की नियत से लगाए गए हैं लेकिन चूंकि सेक्‍शन 375 में इसको लेकर कुछ डिफाइन किया गया है इसलिए इसे रेप ही माना जाए। इस फिल्म को देखने के बाद उन लोगों को सुधीर मिश्रा की फिल्म इंकार भी देखनी चाह‌िए। ये मीटू मोमेंट के आने से पहले की फिल्म है। जो मर्जी से सेक्स और उसके बाद के आरोपों की कहानी को शानदार तरीके से कहती है।

अभिनय भी फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है। अक्षय खन्ना ग्रे शेड के किरदारों में कमाल लगते हैं। कानूनों को समझने वाले एक ग़ैरभावुक वकील के किरदार को उन्होंने शानदार निभाया है। रिचा चड्ढा अपनी इस फिल्म से साबित करती हैं कि उनकी अपनी सीमाएं हैं। रिचा की जगह यहां कोई और होता तो बेहतर करता। आमतौर पर ग्लैमरस रोल करने वाली मीरा चोपड़ा यहां रेप पीड़ित लड़की के किरदार में प्रभावित करती हैं। फिल्म का अंतिम डायलॉग कि 'हम जस्टिस के नहीं कानून के बिजनेस में हैं' देर तक आपके कानों में गूंजता रहता है। ये फ़िल्म देखी जानी चाहिए। देखने से ज्यादा इस पर चर्चा की जानी चाहिए...