Saturday, December 22, 2012

दर्शक कब तक अपने आईक्यू का मजाक दबंग जैसी फिल्मों से उड़वाते रहेंगे

पिछले पखवाड़े कानपुर से दिल्ली की यात्रा में साहित्यकार सेरा यात्री मिल गए। होते-होते बातें फिल्मों तक पहुंच गईं। यात्री साहब ने पिछले कई सालों से हिंदी फिल्मों तो नहीं देखी थीं लेकिन उनकी एक बात रह-रह कर दबंग 2 देखते समय लगातार मेरे जेहन में घूमती रही। सेरा यात्री साहब का कहना था कि भारत के जो भी इंजीनियर, मैजनमेंट, मेडिकल, सीए या दूसरे जो भी लुभावने क्षेत्र हैं यह युवाओं की कार्य करने की क्षमता तो बढ़ा रहे हैं पर उसके अलावा उनकी सोचने और समझने की शक्ति को खत्म कर रहे हैं। खासकर सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर। जब वह वीकेंड में फिल्म देखने जाते हैं तो फिल्म की बुनावट या उसके स्तर पर कोई दिमाग नहीं लगाना चाहते। उन्हें बस ऐसी चीज दिख जाए जिसे वह स्वयं नहीं भोगते तो वह उन्हें बेहतर और मनोरंजक लगती है। भले ही चाहे वह कितनी हल्की क्यों न हो। दबंग 2 के एक सीन में सलमान खान, अपने भाई अरबाज से एक पहेली पूछते हैं। अरबाज उसका जवाब नहीं दे पाते। यह सीन लगभग एक मिनट का है। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दो सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने जा रही और 2012 में बनी इस फिल्म में इतने घटिया स्तर के सीन हो सकते हैं। इससे ज्यादा आश्चर्य इस बात का हुआ कि इस सीन पर तमाम लोग हंस-हंसकर कर सीट में दोहरे हुए जा रहे थे। उन्हें यह सीन बड़ा दिलचस्प, मौलिक और हंसाने वाला लगा था। यह 2012 का सिनेमा है और यह 2012 के दर्शक हैं। मल्टीप्लेक्स का यह सीन किसी कस्बे का नहीं बल्कि भारत की राजधानी दिल्ली का है। सलमान खान अपनी पिछली कई फिल्मों से इस बात का एहसास करा रहे हैं कि भारत के दर्शक का आईक्यू स्तर बहुत ही कम है। उनके पास इस बात के सुबूत भी हैं। बॉडीगार्ड फिल्म का नायक लवली सिंह यह भी अंदाज नहीं लगा पाता कि उसको उसी घर से फोन किया जा रहा है जहां वह रह रहा है। एक लड़की कहती है कि वह उससे प्यार करती है और लवली सिंह मान जाता है। मजे की बात यह है कि दर्शक उस चरित्र के साथ जुड़ते हैं। बार-बार हर फिल्म में। इस बात की गवाही देने के लिए यह आंकड़े काफी हैं कि यह फिल्में 100 करोड़ से ऊपर का कारोबार कर रही है। अभिनेता इरफान खान कहते हैं कि फिल्म कैसी बनेगी यह दर्शक तय करते हैं। स्वाभाविक कि दर्शकों का शिष्टमंडल ‌फिल्मकारों से शिष्टाचार भेंट करके इस बात का ज्ञापन तो देगा नहीं कि कैसी फिल्में बनाई जाएं। फिल्मों यह देखकर बनेंगी कि कैसी फिल्में दर्शक पसंद कर रहे हैं। और दर्शक दबंग 2 के जोक और उसके कम कॉमन सेंस वाले नायकों को नायक मान रहे हैं। मल्टीप्लेक्स में एक ही समय दो फिल्में चल रही हैं। तलाश और दबंग 2। इन दोनों फिल्मों में कॉमन बात यह है कि इन दोनों के ही नायक पुलिस वाले हैं। अब दोनों फिल्मों के ट्रीटमेंट के अंतर को देख लीजिए। आमिर खान ने यह इस फिल्म के लिए दो साल का समय लिया। जहां-तहां से ट्रेनिंग ली। रोल के मुताबिक घनी मूंछे रखी। पुलिस अधिकारियों का उठना बैठना, बात करना और कमजोरियां सीखी। उसी की बगल की ऑडी में चल रही दबंग 2 का पुलिसवाला नकली मूंछे लगाता है। फिल्म में एसपी का किरदार निभाने वाले शख्स की ऊंचाई पांच फिट से भी कम है। थाने में चुटकुले चला करते हैं। थाना दिवस पर कहा जाता है कि पांडेय जी अब हम सब का मनोरंजन करेंगे। दोनों के परिणाम देखिए। दबंग 2, तलाश से बड़ी फिल्म साबित होगी। समझ मे नहीं आता कि दोष फिल्मकारों का है कि दर्शकों का। पहली नजर में तो दर्शकों का ही लगता है। जब तक दर्शक चाहेंगे सलमान खान और दबंग जैसी फिल्में दर्शकों के आईक्यू लेवल का मजाक बनाती रहेंगी।

Tuesday, November 27, 2012

खामोश! यश चोपड़ा हमें प्यार करना सिखा रहे हैं, चुपचाप सी‌खिए, तभी फिल्म 100 करोड़ क्लब में शामिल होगी

यश चोपड़ा की यह महान फिल्म उन दर्शकों के लिए है जिन्होंने यह फिल्म देखने के पहले सिर्फ फिल्मों के बारे में सुन रखा था उन्हें देखा नहीं था। उन्हें यह फिल्म बहुत ही खूबसूरत लगेगी। और जैसा कि बताया जाता है कि इस मुल्क को मोहब्बत करना यश चोपड़ा ने ही सिखाया है दर्शक इस फिल्म से मोहब्बत करने के कुछ ट्रिक सीख भी सकते हैं। पर फिर से यह प्रतिबंध लगाया जाता है कि दर्शक की यह पहली हिंदी फिल्म ही हो। यदि इसके पहले उसने कोई भी हिंदी फिल्म देख रखी है तो उसे यह फिल्म अपने जमाने से 20 से 50 साल पुरानी लग सकती है। उसे फिल्म के हर कलाकार का सामान्य ज्ञान कम लग सकता है। नायिका एक मोटी बुद्घि की लड़की लग सकती है और फिल्म के नाटकीय मोड़ जिसे लोग यशराज सिनेमा ट्वीस्ट कहते हैं बहुत ही भद्दे और बचकाने लग सकते हैँ। फिल्म के नायक शाहरुख को जब-जब प्यार होता है उन्हें एक गाड़ी टक्‍कर मार देती है जबकि वह बहुत सावधानी से रुल ऑफ द रोड को फालो करते हुए सड़क पार कर रहे होते हैं। टक्कर के पहले प्यार बरसाने वाली नायिका इस‌लिए शाहरुख से नहीं मिलती है क्योंकि कि उसने क्राइस्ट से शाहरुख का जीवन बचाने के बदले उससे कभी न मिलने की कसमें खाई होती हैं। आगे फिल्म और भी दिलचस्प है। शाहरुख खान नफरत करने की मौन कसमें खाते हुए भारतीय सेना में शामिल हो जाते हैं। उन्होंने दाढ़ी रख ली होती है और वह साथियों से बहुत काम बात करते हैं। इन सबके बीच वह बस डिफ्यूज करने का काम करते रहते हैं। शाहरुख यहां दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तर्ज पर भगवान से मोर्चा भी खोले हुए होते हैं। कि वह उन्हें मारकर दिखाए। इस बीच एक जर्नलिस्ट शाहरुख को कवर करने के लिए आती है। शाहरुख उससे दिन में रुखा व्यवहार करते हैं और रात में अकेले बैठकर फिल्मी गाने गाते हैं। ऐसी हालत में लड़की बिना प्यार किए रह नहीं पाती है। देश को प्रेम करना सिखाने वाला यश चोपड़ा ऐसा होने देते हैं। इसे उनका मास्टर स्ट्रोक कह सकते हैं। इस दूसरी लड़की (जिसे अभी अभी उन्हें प्यार हुआ होता है) के बुलाने पर वह लंदन जाते हैं। कुछ होने वाला होता ही है कि दुनिया को प्रेम करने के तरीके सिखाने वाले यश चोपड़ा शाहरुख को फिर से एक दुर्घटना का शिकार बनवा देते हैं। यानी पिछली दुर्घटना से शाहरुख ने कुछ नहीं सीखा होता है।
अब मजा देखिए। शाहरुख की याददास्त उस समय के दौर में चली जाती है जब वह पहली वाली लड़की से प्रेम फरमाने के समय चोट खा गए थे। देखिए कितना भयंकर किस्म का ट्वीस्ट। दर्शक तो बिल्कुल दांतों तले उँगलियां दबा लेगा। अब फिल्म की दोनों नायिकाएं एक चुलबुली और दूसरी ऐसी जैसे किसी की मयंत में आई हो मिलकर शाहरुख का जीवन सफल कर रही होती हैं। एक और महान घटना के साथ शाहरुख की याददाश्त वापस आ जाती है। वह दोनों लड़कियों को छोड़कर फिर से अपने फुल टाइम जॉब (बस डिफ़यूज करने वाला) में लग जाते हैं।अब फिल्म का क्लाइमेक्स आता है। जब वह बहुत महत्वपूर्ण बम डिफ्यूज कर रहे होते हैं उसी समय पहली वाली नायिका(वही जिसने क्राइस्ट को कुछ वजन दिया था) अपना वचन तोड़कर शाहरुख के साथ रहने आ जाती है। फिल्म की हैपी इंडिंग हो जाती है। कसम खाने वाली नायिका कैटरीना कैफ हैं और शाहरुख पर डाक्यूमेंट्री बनाने वाली अनुष्का शर्मा। इस फिल्म को देखने के बाद सबकुछ समझ में आता है पर यह समझ में नहीं आता कि 20 साल से अधिक फिल्मी दुनिया में रहने वाले शाहरुख खान की हिम्मत यश चोपड़ा से यह पूछने की नहीं हुई कि हम कर क्या रहे हैं। फिल्म का हर पात्र इतना बचकाना, उसके संवाद इतने हल्के और कहानी के ट्वीस्ट इतने जाने पहचाने कि लगता है कि यशराज कि किसी पुरानी फिल्म की फोटोकॉपी देख रहे हों। याददाश्त खो जाने का प्लाट इतना बचकाना और हल्का है कि हमें यश की कल्पना शक्ति पर संशय प्रकट करने का मन होता है। फिल्म में कैटरीना कैफ की भूमिका निहायत बचकानी है। वह जब-जब फिल्म में आती हैं फिल्म बैठती से लगी है। इस दम तोड़ती फिल्म की एकमात्र उम्मीद है अनुष्का शर्मा हैं। फिल्‍म में गुलजार और रहमान जैसे हस्तियां होने के बाद भी फिल्‍म का संगीत औसत है। यदि 2012 में दर्शकों को ऐसी ही कम बुद्घि वाली फिल्में दिखानी हैँ तो बेहतर है कि नई फिल्म बनाने के बजाय पुरानी फिल्मों को ही रीशूट करके रिलीज कर दें।

Friday, October 26, 2012

प्रकाश झा कहते हैं कि नक्सली जो कर रहे हैं वह दरअसल उनकी मजबूरी है

यदि हम नक्‍सल आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं तो फिर उसके साथ हैं। इस विचारधारा से देखने पर प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह नक्सलियों की हर उस सोच या वारदात को जायज और जरूरत बताने का प्रयास करती है जिसे समाज बुरा मानता है। पूरी फिल्म में नक्‍सलियों के तौर-तरीकों को बुरा मानकर उसके खिलाफ लड़ने वाला फिल्म का नायक फिल्म के अंतिम सीन में नक्सलियों की सोच के साथ खड़ा दिखता है। फिल्म किसी अंजाम या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती है। ऐसा जानबूझ कर ‌किया जाता है। फिल्मकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं कि वह किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े न दिखें। फिल्‍म के अंत में आया एक वाइसओवर बताता है कि नक्‍सल समस्या कैसे अपना आकार बड़ा कर रही है। समस्या हल होने के बजाय उसका चक्रव्यूह गहरा होता जा रहा है। फिल्म चक्रव्यूह नक्‍सल समस्‍या और सरकार के साथ उसके ट्रीटमेंट को भले ही बहुत बेहतर तरीके से न दिखा पाई हो लेकिन यह दो दोस्तों की मानसिक उलझन को बेहतर तरीके से दर्शाती है। यह प्रकाश झा की सफलता है उन्होंने नक्‍सल आंदोलन जैसे जटिल विषय को मनोरंजक और रोचक बनाकर पेश किया। इस विषय को फिल्मी बनाने की कोशिश कहीं-कहीं बचकानी भी लगती है। कभी-कभार फिल्‍म के नक्‍सली वैसे ही बनावटी दिखते हैं जैसे करण जौहर की फिल्मों के स्कूल गोइंग स्टूडेंट। कहानीः चूंकि फिल्म का विषय बड़ा और जटिल था इसलिए इसे दो दोस्तों की कहानी बताकर दिखाने का प्रयास किया गया। इन दो दोस्तों के माध्यम से सरकार और नक्‍सलियों का पक्ष रखने की कोशिश की गई है। आईपीएस पुलिस अधिकारी आदिल(अर्जुन रामपाल) की पोस्टिंग नक्सल समस्या से पीड़ित क्षेत्र नंदीगांव में होती है। यहां पुलिस का नेटवर्क पूरी तरह से तबाह हो चुका है। एक उद्योगपति उस क्षेत्र में अपना उद्योग लगाना चाहते हैं। सरकार की कोशिश के बाद नक्सलियों की वजह से उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। आदिल को इस काम का जिम्‍मा सौंपा जाता है। आदिल का दोस्त कबीर(अभय देओल) जिसने कभी आदिल के साथ पुलिस की ट्रेनिंग भी की थी नक्‍सलियों के बीच आदिल का मुखबिर बनकर शामिल हो जाता है। वह मुखबिर इसलिए बनता है ताकि वह नक्सलियों की मूवमेंट की हर खबर आदिल को दे सके। फिल्म वहां से रोचक होनी शुरू होती है जब कबीर का मन नक्सलियों के पक्ष में बनना शुरू हो जाता है। एक साथी महिला नक्सली जूही(अंजलि पाटिल) के प्रति उसके मन में एक प्रेम भी पैदा होता है। नक्‍सल के पक्ष या विपक्ष की यह वैचारिक लड़ाई इंटरवल के बाद दो दोस्तों की लड़ाई में तब्दील हो जाती है। स्थितियां बदलती जाती हैं। नक्सलियों के बड़े नेता रहे राजन(मनोज बाजपेई) के गिरफ्तार होने के बाद कबीर नक्सलियों का एक बड़ा नेता बनकर उभरता है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि यह दोनों दोस्त अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाते हैं या अपनी वैचारिक सोच को। अभिनयः अभिनय के लिहाज से अर्जुन रामपाल और अभय देओल दोनों ने ही बेहतरीन काम किया है। राजनीति फिल्म में नाना पाटेकर की भूमिका जिस तरह से अंडरप्ले हो गई थी कुछ वैसा ही हाल मनोज बाजपेई का इस फिल्म में रहा है। उनके हिस्से न तो ज्यादा फुटेज आए हैं और न ही संवाद। अपनी संक्षिप्त भूमिका में ही सही वह रोल के खांचे में फिट बैठते हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की गोल्ड मेडलिस्ट रहीं अं‌जलि पाटिल ने इस फिल्म से अपना डेब्यू किया है। उनके पास फिल्म की नायिका ईशा गुप्ता से ज्यादा मौके रहे हैं। वह प्रभावित भी करती हैं। ईशा गुप्ता औसत रहीं हैं। मधुर भंडारकर और प्रियदर्शन की तरह प्रकाश झा के पास जूनियर कलाकारों की अपनी टीम है। गंगाजल से लेकर चक्रव्यूह तक वही सारे किरदार अलग-अलग रूप में दिखते हैं। कोई किसी फिल्‍म में पुलिसवाला बन जाता है तो कोई नेता। इन कलाकारों ने अभिनय तो अच्छा किया है पर एक बासीपन इनके साथ जुड़ता जा रहा है। छोटी सी भू‌मिका में ओमपुरी भी अपनी इमेज के अनुरूप ही रहे हैं। निर्देशनः एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने का मतलब वहां पर तंबू लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। उस चोटी से उतरना ही होता है। मृत्युदंड, अपरहण और राजनीति जैसी फिल्में प्रकाश झा का शिखर रही हैं। यह फिल्म उस शिखर पर उन्हें दोबारा नहीं लौटा पाती। पर हां दर्शकों को निराश भी नहीं करती। पूरी फिल्म खामोशी से नक्‍सल समस्या के लिए सरकार को दोषी और नक्सलियों को जायज ठहराने का प्रयास करती है। यह प्रकाश की खूबी है ‌कि वह संवाद और घटनाओं से चुपचाप दर्शकों को अपनी इस सोच के साथ कर लेते हैं। नक्सल समस्या को बहुत कम या न जानने वाले दर्शक जब फिल्म देखकर निकलते हैं तो वह नक्सलियों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके जैसा सोच रहे होते हैं। फिल्म के अच्छे संवादों के लिए अंजुम राजाबली और सागर पांड्या को भी बधाई मिलनी चाहिए। संगीतः यह प्रकाश झा की पहचान बनती जा रही है कि इंटरवल के बाद जब फिल्म थोड़ी गंभीर होती है तो वह उसे एक आइटम नंबर डालकर थोड़ा फिल्‍मी करते हैं। यह फिल्मी कोशिश चक्रव्यूह में निराश करती है। समीरा रेड्डी पर फिल्माया गाना पूरी तरह से बेझिल है। टाटा, बिरला, अंबानी और बाटा बोल वाला चर्चित गीत प्रभावित तो जरूर करता है पर गीत में वैसी कशिश और विट देखने को नहीं मिली जैसी गुलाल में ‌पीयूष मिश्रा ने अपने लिखने और गाने में पैदा की थी। क्यों देखे फिल्म चर्चित और गंभीर विषय पर बनी है इसके लिए इसे देखा जाना चाहिए। इसके अलावा य‌दि आपकी दिलचस्पी नक्सल की समस्या या उसके समाधानों पर जाने की नहीं है तो भी इसे दो दोस्तों की बनती-बिगड़ती कहानी के लिए देख सकते हैं। क्यों न देखें यह एक सार्थक सिनेमा है। कई जगह फिल्मी होने के बाद भी संभव है कि इसका विषय आपको अपने साथ कनेक्‍ट न करे। हल्के विषयों पर कुछ दूसरी फिल्में भी आपके लिए ही हैं।

Saturday, October 6, 2012

इंगलिश स्पोकन कक्षाओं से भारत में बनता रहेगा आत्मविश्वास, फिल्म भी प्रमाणित करती है

कस्बों और गांवों के लडक़े जब लल्लू लाल, करमा देवी, अहिल्या देवी या रघुराज प्रताप सिंह जैसे नामों वाले महाविद्यालयों से पढ़ाई करके निकलते हैं तो उनकी प्राथमिकता सबसे पहले आत्मविश्वास प्राप्त करने की होती है। जो कि वह मानकर चल रहे होते हैं कि वह उनके पास नहीं है। उनका अनकॉसेस माइंड मानता है कि आत्मविश्वास नाम की चीज शहर के लोगों में पाई जाती है। उनकी निगाह में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो आत्मविश्वासी होते हैं। यह सभी आत्मविश्वासी लोग अंग्रेजी में बात करते हैं। आत्मविश्वास पाने की यह फैक्ट्रियां इंगलिश स्पोकन क्लास के नाम से जानी जाती हैं। हर साल इन फैक्ट्रियां से फुटकर और थोक में आत्मविश्वास निकल कर यहां वहां पहुंचता है। यह कहां पहुंचता है इससे हमारा कोई लेना देना नहीं है। हमारी मान्यताओं में अंग्रेजी को कभी भी सिर्फ भाषा के रूप में नहीं देखा गया है। इसे ज्ञान के रूप में माना जाता है। यह माना जाता है कि यदि आप अंग्रेजी में बोल रहे तो यह संभव ही नहीं कि आप गलत बोल रहे हो। अंग्रेजी के प्रति हमारे अतिरिक्त सम्मान की धारणा को फिल्म अंत में जाकर तोड़ती है। इसके पहले फिल्म की नायिका तब-तब खुश होती है जब वह अपनी अंग्रेजी से बात कहने में सफल हो जाती है। यह फिल्म की फिलॉसफिकल असफलता है। एक फिल्म के रूप में इंगलिश-विंगलिश एक प्रभावी फिल्म है। फिल्म सिर्फ अंग्रेजी के ज्ञान की नहीं हमारी मनोविज्ञान की भी परीक्षा लेती चलती है। हमारी एक मनोवृति होती है कि अपने करीबी की जो जिस कमी की वजह से उस पर दया करते हैं जब वह व्यक्ति उस कमी को ठीक करने के लिए गंभीर होता है तो हम उसके प्रति ईष्या का भाव रखना शुरू कर देते हैं। फिल्म उन रिश्तों की भी समीक्षा करती चलती है कि जो एक समय के बाद सिर्फ प्रेम बरसाते हैं सम्मान नहीं। चीनी कम की तरह आर बल्कि कई फिलॉसिफी देने में सफल रहे हैं।

Friday, September 28, 2012

हम फिल्म का मुहूर्त पंडित से पूछकर तय करेंगे लेकिन दर्शकों तुम धर्म के आडम्बरों को न मानना

सब टीवी के हंसो-हंसो टाइप धारावाहिक जैसी शुरू हुई यह फिल्म अपने बीतने जाने के साथ एक हैरत भरी गंभीरता ओढ़ती जाती है। इस देश में जहां धर्म के नाम पर वाटर फिल्म की शूटिंग नहीं हो पाती, कुछ फिल्में बनने के बाद रिलीज नहीं हो पाती और जहां तेली जैसे सामान्य जातिसूचक शब्दों पर सेंसर बोर्ड वीप चस्पा करके रिलीज करता है वहां यह फिल्म धर्म के नाम पर इतनी खुली और तटस्थ होकर बहस कैसे कर लेती है इस बात का सुखद आश्चर्य होता है। हिंदू धर्म की मूर्ति पूजा पर पूरी तरह प्रश्न खड़ा करती और इस प्रक्रिया में खुद भगवान को शामिल करती हुई यह फिल्म दर्शकों को मनोरंजक लगने के साथ आंखे खोलने वाली भी लगती है। फिल्म देखकर दर्शक उन कुरुतियों पर हंसते हैं जिन्हें वह करते हैं और करते आए हैं। मेरे पास फिल्म देखकर कुछ दर्शक ऐसे थे जिन्होंने धार्मिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करने वाले संवादों पर ठहाके लगाए लेकिन तत्काल ही वह मल्टीप्लेक्स की छत को ताड़ते हुए एक अंनत: शक्ति को नमन करते दिखे। यह धर्म को लेकर दोहरापन है। हम धर्म की कुरुतियों को खारिज तो करना चाहते हैं पर भीड़ के साथ। जैसे भीड़ में कुछ भी कर दो भगवान को पता नहीं चलेगा। अकेले होते ही हम वैसे ही तेल का अर्पण करना चाहेंगे जैसे कि करते आए हैं। हरिशंकर परसाई कहते हैं कि जब यह कहा जाएं कि महिलाएं घरों से बाहर निकलें तो इसका मतलब होता है कि अपने घर की नहीं दूसरों के घरों की। यही इस फिल्म का भी एजेंडा है। इस फिल्म के मुहूर्त के समय भी भगवान की पूजा हुई होगी। प्रसाद में पेड़े और गरी के टुकड़े बांटे गए होंगे। पंडित से पूछकर ही मुहूर्त निकाला गया होगा और फिल्म पूरी होने के बाद फिल्म रोल पर स्वास्तिक का प्रतीक बनाया गया होगा। इतना ही नहीं गणेश पूजा से लोगों को कनेक्ट करने के लिए एक आइटम नंबर भी फिल्म में डाला गया। और यही फिल्म दर्शकों से आडम्बरों से बचने की बात करती है। जब मैं किशोर हो रहा था तो भारत के हर कस्बे में बुफे सिस्टम इंट्रोड्यूस हो रहा था। हर मोहत्ले के दुबे जी, शुक्ला जी, अग्रवाल जी और वर्मा जी बुफे सिस्टम को कुतों का भोज कहकर उसकी आलोचना करते लेकिन पोते के मुंडन में वही इस सिस्टम से दूसरों को खाना खिलाते दिखते। तर्क वही कि यह सिस्टम गलत है लेकिन बदलाव दूसरे से शुरू हो। अच्छी फिलासिफी है। फिल्म के संवाद और परेश रावल की अदाकारी उत्कृष्ट है। भगवान के हिस्से अच्छे संवाद नहीं आए हैं।

Saturday, September 15, 2012

लगता है कि सारे किरदार दार्जलिंग में ही रहे हैं, फिल्म से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है

बर्फी फिल्म एक नशे की तरह दिमाग में चढ़ती जाती है। यह धीमा नशा इतना तेज है कि फिल्म देखते वक्त यह हमारे उन तर्कों को खारिज करता चलता है जिनके सहारे हम किसी फिल्म के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करते हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि हम फॉर्मूला फिल्म देखने के आदी हो चुके हैं । यह इस फिल्म की खूबसूरती है कि जहां यह फिल्म गैर फिल्मी या गैर पारंपरिक होती है वह अपने भव्यतम रूप में पहुंच जाती है। फिल्म में कहीं कोई तरतीब या क्लाइमेक्स जैसा कुछ नहीं। जो घटनाएं फिल्मों में सबसे बाद के लिए बचाकर रखी जाती हैं वह इस फिल्म में कहीं भी प्रयोग कर दी गईं। गूंगे-बहरे का किरदार न तो उसके लिए आपसे दया मांगता है और न ही अतिरिक्त ध्यान देने की अपील करता है। इस फिल्म को देखते-देखते हमें अचानक ही लगता है कि हमको इस छल-कपट की दुनिया हो हमेशा के लिए बाय बोल देना चाहिए। आशीष विद्यार्थी जहां-जहां फिल्म में आते हैं उनसे दर्शकों को ढेर सारे कोफ्त होती है। फिल्म में वही एक ऐसा चेहरा हैं जो बर्फी को फिल्म होने का एहसास कराते हैं। बाकी के किरदार ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वह दार्जलिंग में अभी भी रह रहे होंगे। फिल्म का मुख्य किरदार आपको अपने साथ पहले मिनट से कर लेता है। उसकी शरारतें, उसकी खुशी और उसकी दुखों में हम उसके साथ रहते हैं। बर्फी मोहब्बत की दिलचस्प कथा है।
रणवीर इस फिल्म अपना नाम बोलने के अलावा कुछ भी न बोलते दिखते हैं और न ही बोलने का प्रयास करते हैं। फिर भी दर्शकों को एक बार भी उनका गूंगापन अखरता नहीं है। फिल्म की एक बहुत बड़ी खूबसूरती उसका संगीत है। हर गाने जितना अच्छे से लिखा गया है उससे बढक़र उसे फिल्माया गया है। कुछ फिल्में इंडस्ट्री को १०० करोड़ भले ही न दे पाएं पर कुछ ऐसी चीजें देती हैं जिन पर हम १०० साल तक गर्व करते रहें। बर्फी ऐसी ही फिल्मों में से एक है। अनुराग शायद अब काइट की असफलता को अच्छे से भुला सकेंगे।

Friday, August 31, 2012

६ साल बाद सिर्फ एक कदम बढ़ पाए हैं शिरीष

जोकर फिल्म इस बात का गहराई से एहसास कराती है कि कई अच्छी फिल्मों से जुड़े फिल्मकार मिलकर एक घटिया फिल्म भी बना सकते हैं। फिल्म के निर्देशक शिरीष कुंदर ने अपने अकेले के बूते सिर्फ एक ही फिल्म जानेमन बनाई है। उस उलझी हुई फिल्म के ६ साल बाद उन्होंने जोकर का निर्देशन किया है। शिरीष का निर्देशन इस फिल्म में एक पायदान ऊपर चढ़ता है पर फिल्म विषय के स्तर पर इतनी कमजोर है कि बेहतर निर्देशन, ठीक-ठाक ऐक्टिंग और आयटम सॉन्ग भी फिल्म को बचा नहीं पाते। कहीं यह फिल्म पीपली लाइव हो जाना चाहती है तो कहीं कोई मिल गया। अब कोई न कह पाए कि यह फिल्म पूरी तरह से किसी फिल्म की नकल है तो कुछ अपनी मौलिकता डालने की भी घटिया कोशिश की गई है। अक्षय कुमार एक जैसी ही ऐक्टिंग करते हैं। सोनाक्षी सिन्हां पूरी फिल्म में अक्षय कुमार की चापलूसी करती रही हैं। पिताबश त्रिपाठी जैसे कलाकार का घटिया उपयोग किया गया है।