Saturday, February 22, 2020

ये फिल्म उनके लिए है जिन्हें पूजा और सिमरन की फोन कॉल बहुत आती हैं...



हैलो सर, मैं HDF.. बैंक से पूजा बात कर रही हूं। क्या मैं आपका कीमती समय ले सकती हूँ?

सर, आपका एटीएम कॉर्ड ब्‍लॉक हो गया है, आप उसे फिर से शुरू करना चाहेंगे सर? फोन के उस पार से आने वाली पूजा, रोशनी, जसप्रीत, रिचा या राजेश की ऐसी ही सुरीली और अदब भरी आवाजें बहुत लोगों के एकांउट से हजार से लेकर लाखों तक का डाका डाल चुकी हैं।

आपके एटीएम कॉर्ड का क्लोन बनाकर, आपसे ही बातें बनाकर एटीएम कार्ड की डिटेल लेकर या इंटरनेट बैंकिंग को हैक करके होने वाले फ्रॉड अब वैसे ही पब्लिक डोमेन में हैं जैसे कि यह जानना कि कश्मीर में अब कोई भी प्लाट ले सकता है।

नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज 'जमताराः सबका नंबर आएगा' इस विषय पर बनी अपनी तरह की पहली फिल्म है। यह फिल्म अपने शुरुआती ऐपीसोड में कई चौंकाने वाली जानकारियां देती है। पहली तो यही कि बैंक से जुड़ी इस तरह की होने वाली कुल फोन कॉल की 95 फीसदी कॉलें अकेले जमतारा से होती हैं। जमतारा, झारखंड का ए‌क पिछड़ा और नक्सल प्रभावित जिला है। फिल्म बताती है कि फर्जी फोन कॉल करने वाले यह लड़के ज्यादातर अनपढ़ या साक्षर भर हैं। वह उम्र में भी बस अभी-अभी बालिग हुए हैं। उसमें से कुछ लड़की की आवाज में बात कर लेते हैं तो कुछ के पास ऐसी लड़कियां हैं जो पैसे के बदले ये काम करती हैं।

ये बात दबी छिपी रहे इसलिए ये लड़के पश्चिम बंगाल बेस्ड की ऐसी लड़कियों से लाखों रुपए देकर शादी कर रहे हैं जो उम्र में उनसे बड़ी हैं साथ ही अंग्रेजी मिश्रित सोफेस्टीकेटेड हिंदी बोल लेती हैं। जरुरत पड़ने पर पूरी की पूरी एक लाइन अंग्रेजी की भी। ऐसा काम करने वाले किसी लड़के के पास अपना बैंक एकांउट नहीं है। फ्रॉड से आया हुआ यह पैसा वह हर किसी के पास उपलब्‍ध जनधन एकाउंट में ट्रांसफर करते हैं, फिर कुछ हजार देकर उसी रोज उनसे लाखों निकलवा लेते हैं। यह एक किस्म की डील है। बैंक जानते हैं कि इसमें कहीं ना कहीं फ्रॉड है, लेकिन वह चुप इसलिए रहते हैं क्योंकि ऐसा उनके धंधे को मुनाफा ही दे रहा है।

ऐसा नहीं है कि पुलिस इन सब चीजों से वाकिफ नहीं है। देश भर की पुलिस अपनी शिकायतें लेकर जमतारा पहुंच रही है। पुलिस संदेह वाले लड़कों को गिरफ्तार भी कर ले रही है लेकिन उन्हें सजा दिलाने के लिए उनके पास वो सबूत नहीं होते हैं जहां ये मुजरिम कोर्ट की नजर में भी मुजरिम साबित हो सकें। इस पूरे नेक्सस में वहां के नेता भी शामिल हैं। वह इस असंगठित काम को संगठित करना चाहते हैं। पुलिस उनके लड़कों को यूं ही ना उठाए इसलिए वह उनको प्रोटेक्‍शन भी दे रहे हैं, बदले में वह पूरी कमाई का चालीस से पचास फीसदी का शेयर अपने पास रख रहे हैं। छोटे से उस गांव में देखते ही देखते कई बड़ी बड़ी कोठियां बन गईं। ब्लैक पैसे को व्हाइट करने के लिए दुकानें भी।

10 एपीसोड वाली वेब सीरिज जमतारा की खूबी ये है कि वह हमें फोन से होने वाले बैकिंग फ्रॉड के बारे में दिलचस्‍प जानकारी बिना बोर किए हुए देती है। सूचनाएं निबंध की शैली में ना रहे इसके लिए वह कई काल्पनिक कथाएं रचती है। जिनमें प्यार की भी एक कहानी है। यहां टुकड़ों-टुकडो़ में जाति की भी बाते आती हैं और संकेतों में राजनीति की भी। फिल्म पात्रों की डिटेलिंग भी करती है। हमें यह पता चलता है कि इस काम में उलझे हुए लड़के बाई डिफॉट अपराधी नहीं हैं लेकिन उनके पास अथाह पैसा इतनी जल्दी आ रहा है कि वह इससे अलग हो ही नहीं सकते। अब वह इसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। आईपीसी की मौजूदा धाराएं उनको धर दबोचने के लिए नाकाफी हैं।

जमतारा के साथ समस्या यह है कि जैसे ही इसके पास हमें देने के लिए सूचनाएं चुक जाती हैं यह एक बीग्रेड थ्रिलर फिल्म जैसी लगने लगती है। अपराधियों के साथ लोकल पुलिस का नेक्सस, दैनिक जिंदाबाद, टाइम्स ऑफ सवेरा, अमर क्रांति जैसे सड़कछाप अखबार, उनके रिपोर्टर और जिंदा रहने के लिए उनका किसी दबंग नेता का परिजीवी बन जाना जैसी बातें हम सब पहले भी किसी ना किसी तरह से देख चुके हैं। जमतारा देखी हुई इन चीजों को आगे नहीं ले जा पाती। बल्कि कई दृश्यों में वह उसी तरह की बातों को दोहरा देती है।

नई महिला एसपी के आने के बाद पुरूष प्रधान पुलिस वर्ग में पुलिस कर्मियों की प्रतिक्रिया, उसके काम में आने वाले अवरोध और उस छुटभैय्या नेता को खत्म कर देने का एसपी का संकल्प जैसे प्लाट बचकाने स्तर पर हैं। यह फिल्म तब बेहद सामान्य बन जाती है जब उसका क्लाइमेक्स रचा जा रहा होता है। क्लाइमेक्स में यह फिल्म किसी भी सस्ते सीरियल का महाएपीसोड जैसी लगती है। जिस ग्रिप के साथ जमतारा शुरू होती है क्लाइमेक्स आते-आते वह चीजें हवा हो जाती हैं, यह जमतारा एकलौती लेकिन बड़ी कमी है।

जमतारा में पहचाना हुआ चेहरा सिर्फ अमित सियाल का है। अमित को हम अमेजॉन प्राइम के शो इनसाइड ऐज में सट्टेबाजी करने वाले देवेन्दर मिश्रा से पहचानते हैं। इसके अलावा अमित छोटे से रोल में मिर्जापुर, रेड, सोन चिरय्या, तितली जैसी फिल्मों में भी दिखे थे। अमित के अलावा बाकी टीम लगभग नई है। हमने उन्हें कहीं और एक्टिंग करते नहीं देखा होगा। ज्यादातर का अभिनय अच्छा है। झारखंड के गांव में इतनी साफ सुथरी हिंदी नहीं बोली जाती होगी। तो किरदारों ने टंग पकड़ने की कोई कोशिश नहीं की। हां, ताजे चलन के अनुसार जरुरत से ज्यादा और नई-नई गालियां आपको यहां सुनने को मिल सकती हैं। जमतारा अपने विषय के लिए एक बार देखी जा सकती है...

पंगा जैसी फिल्में हमारे गिल्ट को कम करती हैं, बाकी ये शानदार नहीं हैं

हिंदी सिनेमा स्पोटर्स, पॉलिटिकल आटोबॉयोग्राफी, बॉयोपिक और वुमन सिन्ट्रिक विषय वाली फिल्मों को लेकर इतना बौना है कि उन विषयों पर बनी औसत फिल्में कई बार ओवररेटेड हो जाती हैं।

शायद उनकी ज्यादा तारीफ करके हम अपनी गिल्ट कम करना चाहते हैं। पंगा एक ऐसी ही फिल्म है, जो औसत होने के साथ-साथ सुस्त और थोपी सी मालूम पड़ती है, लेकिन विषय की वजह से यह ओवररेटेड बन गई।

पंगा एक पूर्व महिला कबड्डी खिलाड़ी जया निगम की कहानी है। करियर के पीक पर उसे अपने अनप्लांड बच्‍चे की वजह से अपने खेल से दूर होना पड़ता है। पर वह इसी खेल की वजह से मिली रेलवे की नौकरी, अपने 'एक्सट्रा केयरिंग, 'बोरियत की हद तक हंसमुख और उपलब्‍ध' पति और एक प्यारे से बच्‍चे के साथ भोपाल के सरकारी रेलवे कॉलोनी के एक मकान में रह रही होती है। जया का पति भी रेलवे में इंजीनियर है। वो रेलवे की एक कैंटीन में मिले होते हैं और तीन मुलाकातों के बाद माला बदल लेते हैं।

फिल्म के शुरुआती दृश्य दिखाते हैं कि जया अपने जीवन में खुश है। कबड्डी की टीम में खेलते रहना उसकी जिंदगी का अंतिम हासिल नहीं है, वह यह बात गहराई से मानती है। वह अपनी वर्तमान जिंदगी में रमी हुई है और संतुष्ट होने की हद तक खुश है। बाद में कुछ कुछ घटनाओं के जरिए उसका अतीत कुरेदा जाता है और एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद उसका बेटा चाहता है कि उसकी मां फिर से कबड्डी में कमबैक करे। जया वापस आती है। कई लेयर्स में आने वाले हर्डेल को पार करते हुए अंततः वह इंडियन टीम का फिर से हिस्सा बन जाती है।

पंगा फिल्म इस तथ्य को मजबूती से पकड़कर चलना चाहती है कि वह पूरी तरह से एक स्पोर्ट फिल्म नहीं है। उसका फोकस एक महिला के कमबैक पर होता है। खासकर एक मां का कमबैक। फिल्म का हर सीन और उसकी अंडरकरेंट मां के कमबैक के रुप में लगातार फिल्म में बनी रहती है है।

फिल्म देखते-देखते हम पाते हैं कि ऐसी हूबहू तो नहीं लेकिन ऐसी कई फिल्में हम पहले देख चुके हैं जैसी पंगा हमें दिखा रही है। पंगा का कोई भी सीन चक दे इंडिया, सुल्तान और दंगल की कॉपी नहीं है लेकिन फिल्म की मूल आत्मा इन तीनों फिल्मों की सामूहिक आत्मा का मिक्चर लगती है।

इस फिल्म की निर्देशक अश्वनी अय्यर तिवारी हैं। अश्चनी दंगल फेम नीतेश तिवारी की पत्नी है। नीतेश इस फिल्म के को-राइटर भी हैं। कई जगहों पर एक तरह का परिवेश होने की वजह से यह फिल्म कई बार दंगल की छोटी बहन मालूम पड़ती है। दंगल और पंगा भाई बहन होने की वजह से कई बार उनके चेहरे के कुछ हिस्से और बोलियों का स्टाईल मैच कर जाता है। 'पहले से देखा सा लगना' फिल्म को प्रिडिक्टबल बनाता है। हमें ऐसा लगता है कि हम फिल्म के कर्व, उतार-चढ़ाव और क्लाइमेक्स से वाकिफ हैं और फाइनली क्या होना है ये हम जानते हैं।

पंगा की सबसे बड़ी कमजोरी जया निगम के कमबैक करने की वजहों में छिपी हुई हैं। ये वजहें कई जगहों पर बनावटी हैं और कुछ जगहों पर ओवरस्टीमेट। फिल्‍म के एक महत्वपूर्ण सीन में (जिसे फिल्म अपना टर्निंग प्वाइंट भी कह सकती है) जया को अपने बच्चे की स्पोर्ट्स एक्टिविटी देखने के लिए ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल पाती है और उसका सीनियर उसे एक घंटे लेट आने पर एक दिन पहले जलील कर चुका होता है। भारत देश के सरकारी नौकरी के सिस्टम में एक घंटा देर से आने और 'पारिवारिक जरुरतों के लिए' छुट्टी लेना कितनी सहज प्रक्रिया है इससे हम वाकिफ हैं। एक और सीन में जया निगम को स्कूली कबड्डी टीम के बच्चे नहीं पहचान पाते है। वह उदास हो जाती है। ऐसी चार-पांच वजहें मिलाकर जया निगम की वापसी का प्लाट बुना जाता है।

कमबैक करने के बाद का हिस्सा अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत है। कुछ खुरदरे किरदारों से फिल्म हमें तआरुफ कराती है जो फिल्म को रियल बनाते हैं। फिल्म में जया निगम की जिंदगी के दो सबसे करीबी किरदार उसके पति और उसकी कबड्डी दोस्त- ट्रेनर है। ये दोनों ही किरदार बेहद सतही तरीके से लिखे गए हैं। बहुत सारा स्पेस खाने के बाद भी ये किरदार अपनी कोई महक नहीं छोड़ पाते। पंजाबी फिल्मों के परिचित चेहरे जस्सी गिल एक पति के रुप में बेहद सपाट लगते हैं। उनका हर समय हंसते रहना दर्शकों को चिढ़चिढ़ा बना सकता है। दोस्त बनीं रिचा चड्ढा की स्टाईल, डायलॉग बोलने का ढंग उन्हें फुकरे से बाहर ही नहीं निकलने दे रहा। इस बीच अमेजॉन प्राइम की वेब सीरिज इनसाइड ऐज और सेक्शन 375 फिल्‍में करने के बाद भी रिचा फुकरे के एक्सटैंशन रोल में ही लगती हैं।

कंगना रनौत बॉलीवुड की नई सलमान खान हैं। उनकी फिल्मों में सिर्फ वही होती हैं। इसमें शक नहीं कि उन्होंने एक बार फिर उम्दा एक्टिंग की है लेकिन सिर्फ एक्टिंग के दम पर फिल्‍में अच्छी बनतीं तो इरफान का मुकाम आमिर जैसा और विजय आनंद का मुकाम अमिताभ जैसा होता। एक्टिंग में कंगना को चुनौती उनके आठ साल के बच्चे का किरदार निभाने वाले यज्ञ भसीन से मिली है। तमाम नकली किरदारों के बीच वह एक असली और याद रखने वाला किरदार बन जाता है। नीना गुप्ता और राजेश तैलंश के पास जितना करने को था उन्होंने किया। पंगा आप देख सकते हैं। ये बुरी फिल्म नहीं है। ये बस ओवररेटेड और थोपी हुई फिल्म है।

छपाक के‌ लिए आपको अतिरिक्त संवेदनशील होना होगा और गैर राजनीतिक भी

'छपाक' पर कुछ भी पढ़ने से पहले क्या आप कुछ मिनटों के लिए यह भूल सकते हैं कि दीपिका पादुकोन जेएनयू कैंपस में गई थीं और आपने पिछले चुनाव में वोट किसे दिया था?

क्या आप कुछ मिनटों के लिए यह भूल सकते हैं कि उस शाम 'बायकॉट छपाक' ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहा था? क्या आप यह भी भूल सकते हैं कि इस फिल्‍म के विलेन के नाम और उसके धर्म को लेकर किस तरह की अफवाहें आपके मोबाइल तक चलकर आईं और उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?और जब आप ये चीजें भूल ही रहे हों तो यह भी भूल जाइए कि यह फिल्म कुछ राज्यों में टैक्स फ्री की गई और उसकी प्रतिक्रिया में उसी के साथ रिलीज हुई एक दूसरी फिल्म को किसी दूसरे राज्य में दूसरी पार्टी की सरकार ने टैक्स फ्री कर दिया।

'छपाक' दुर्भाग्य से हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में शामिल हो गई जिसका अच्छा या बुरा कहा जाना इस बात से जुड़ गया कि चुनावों में आप वोट किसे देते हैं। ट्वीटर पर फॉलो किसे करते हैं, आपको फॉलो कौन करता है। सीएए-एनआरसी के साथ हैं या विरोध में हैं। जेएनयू को लेकर क्या सोचते हैं। वामपंथी दाढ़ी या झोले के बारे में आपके क्या विचार हैं। एक फिल्म के तौर पर 'छपाक' कैसी है उस पर शायद तब लिखा जाना ही बेहतर होता जब राजनीति की ये डस्ट सेटल हो जाती। तब इसे अच्छा या बुरा कहना आपकी राजनीति के साथ चस्पा ना किया जाता।

एक चर्चित एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी पर बनी यह फिल्म एक फिल्म के रुप में उतनी मजबूत नहीं है जितनी कि इसे बनाने की इच्छाशक्ति। यकीनन फिल्म का विषय, एक मेनस्ट्रीम एक्ट्रेस का भूत जैसे डरावने चेहरे के साथ दिखने का रिस्क, भुला दिए गए शुष्क और गैर फ़िल्मी विषय का चुनाव, तारीफ के काबिल है लेकिन इस फिल्म के पास वह बहुत सारा सामान नहीं है जो इसे एक यादगार फिल्म बना सके।

मैं हमेशा इस बात का पैरोकार रहा हूं कि जब किसी विषय पर फिल्‍म बनाई जाए तो एक फिल्म के रुप में वह दर्शकों की जरुरतों को पूरी करे। इसके अलावा वह कुछ और भी कर सकती है तो वो उसकी दोहरी सफलता है। 'छपाक' खालिस सिनेमा के लिहाज से कमजोर फिल्म है। एक समय के बाद दर्शक सिर्फ इसलिए फिल्म से चिपका रहना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि वह एक संवेदनशील विषय पर फिल्म देखने के लिए आया है और चुप लगाकर देखे जाना उसकी सामाजिक जवाबदेही है।

रेप पीड़ित वर्सेज एसिड अटैक पीड़ित के साथ समाज के बर्ताव और मीडिया अटेंशन की बहस के साथ शुरू हुई यह फिल्म एसिड फेंके जाने की घटना, घटना के बाद लड़की की जिंदगी में आए बदलाव, कोर्ट की ठंडी बहसों, एसिड अटैकर की गिरफ्तारी, उसकी जमानत, खुलेआम बिकता एसिड, इस मामले पर पीड़ित की पीआईएल और आखिरकार उसकी जीत की कहानी को कहने की कोशिश करती है। छपाक की कोशिश है कि वह इस विषय से जुड़े उन सभी पहलुओं को शामिल कर लें जो किसी भी तरह से उस दौरान उस लड़की की जिंदगी में आए। चाहे वह घटनाएं हों या इंसान। इन सबके बीच एसिड अटैक सर्वाइवर के लिए चलाने वाले एक एनजीओ, उस एनजीओ के कर्ता-धर्ता के साथ उस लड़की की साइलेंट प्रेम कहानी पैरलल रुप में दिखती है। प्रेम की इस कहानी को जानबूझ कर बहुत पंख नहीं लगाए गए हैं।

वो सारी घटनाएं इस फिल्म में हैं जो मुख्य पात्र मालती (दीपिका पादुकोन) के स्ट्रगल को दिखाने के साथ उसकी वर्सेटाइल पर्सनाल्टी को भी दिखाएं। कई जगहों पर यह फिल्म जबरन मालती को एक हीरो के तौर पर स्टेबलिस करने की कोशिश करती है। इसमें बुरा नहीं है। इससे फिल्म कमजोर नहीं बनती बल्कि इससे यह सरकारी विज्ञापन जैसी लगती है। फिल्म कमजोर इसलिए बनती है क्योंकि उसके पास उपकथाएं नहीं हैं, उसके पास याद रह जाने वाले किरदार नहीं हैं। उसके पास एसिड फेकने वाले किरदार की जिंदगी और उसकी सोच को दिखाने वाली लेयर्स नहीं हैं। फिल्म इसलिए कमजोर बन जाती हैं क्योंकि कोर्ट के बहसें जरुरत से ज्यादा रुखी और बेजान हैं। फ़िल्म इसलिए भी कमजोर होती है क्योंकि फ़िल्म के पास किरदार या तो स्ट्रीम व्हाइट हैं या स्ट्रीम ब्लैक। फिल्म इसलिए प्रभावी नहीं लगती क्योंकि कई जगहों पर दर्शक एसिड अटैक पीड़ित उस लड़की के दुख के साथ अपने को कनेक्ट नहीं कर पाते। बावजूद वह यह मानते हैं कि उसके साथ बहुत बुरा हुआ है।

हिंदी सिनेमा समस्याओं का ही सिनेमा है। किसी की सपाट जिंदगी में फिल्मकारों की दिलचस्पी नहीं होती है। दर्शक किसी भी समस्या से खुद को कनेक्ट करता है और वह फिल्म उसे अच्छी लगने लगती है। राजकुमार संतोषी की फिल्म घातक का विलेन डैनी जब बाप का किरदार निभा रहे कैंसर पीड़ित अमरीश पुरी के गले में कुत्ता वाला पट्टा बांधकर उन्हें कुत्ते की ही तरह खींचता हैं तो बेटे के किरादार में सनी देओल की उस प्रतिक्रिया में फिल्म देख रहा हर बेटा खुद को कनेक्ट कर लेता है। भले ही उसके पिता के गले में किसी ने कुत्ते का पट्टा नहीं डाला हो। यह सिनेमा की ताकत होती है। यह सीन की ताकत होती है कि उसके दुख हमारे दुख लगते हैं।

हिंदी सिनेमा बदला लेने की कहानियों से भरा हुआ है। दर्शक बदला लेने की हीरो की इच्छा को मौन स्वीकृति तभी देता है जब उसे लगता है कि वाकई उसके साथ गलत हुआ है। छपाक के साथ दिक्कत ये है कि दर्शक पीडित के साथ खड़ा होता है, उसके साथ हुए जुल्म पर उसे गुस्सा आता है लेकिन दर्शक किरदार के कष्ट के साथ खुद को कनेक्ट नहीं कर पाता। ऐसा इसलिए है क्योंकि फ़िल्म के पास अच्छे दृश्य नहीं हैं।

'राजी' और 'तलवार' मेघना की पिछली सफल फिल्में हैं। यह दोनों ही फिल्में रिश्तों की विडंबनाओं की फिल्में हैं। ये दोनों ही फिल्में इसलिए बड़ी फिल्में बनी क्योंकि इसके पास अच्छे सीन हैं। ये फिल्में याद इसलिए रखी गईं क्योंकि इसके पास याद रखने वाले किरदार हैं, किरदारों की लेयर्स हैं। यह संभव है कि छपाक की कहानी ऐसी रही हो जहां इस‌ तरह की सिनेमाई लिबर्टी नहीं ली जा सकती थी। लेकिन जब यह फिल्म रिक्‍शा वाले के साथ राइट-लेफ्ट का एक काल्पनिक सीन डाल सकती थी तो वह कई ऐसे सीन बना सकती थी जो किरदार को गढ़ने में मदद करते।

छपाक का वह सीन मुझे कमजोर लगा जब दीपिका पहली बार अपना झुलसा हुआ मुंह आईने में देखती हैं। वो सीन फ़िल्म की रीढ है, लेकिन कमज़ोर बन पड़ा है। आपको राजेन्द्र कुमार की फ़िल्म आरज़ू देखनी चाहिए। राजेन्द्र की शादी होनी होती है। एक दुर्घटना में उनके पैर कट जाते हैं। जब डॉक्टर पहली बार अस्पताल के उस बेड पर राजेन्द्र कुमार के पैरों पर पड़ा कंबल हटाते हैं, तब उस किरदार का चेहरा देखिए। राजेन्द्र के चेहरे की उस प्रतिक्रिया को दीपिका को बार बार देखना चाहिए। हमें उस सीन को बार बार देखना चाहिए।

आप यह भी कह सकते हैं कि छपाक जैसी फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं देखी जानी चाहिए लेकिन एक फिल्मकार का धर्म है कि वह सिनेमाई जरुरत को कभी नजरअंदाज ना करे। दर्शक जिस टिकट को लेकर सिनेमाघर में दाखिल होता है वह टैक्स के रुप में इंटरटेनमेन्ट टैक्स चुका रहा होता है, और मनोरंजन से ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि यहां नाच गाना, फाइटिंग, एक्शन सीन या कॉमेडी की बात की जा रही है।

सिनेमा के लिए यह बेहतर है कि छपाक जैसे विषयों पर ज्यादा फिल्में बनें और साथ ही यह भी जरुरी है कि सोशल मी‌डिया पर अफवाहें बांटने वाले फिल्म भी देखना शुरू करें। वो सिर्फ वट्सअप फारवर्ड को ही अपनी दुनिया न बनाएं। साथ ही हर शहर में ऐसे नेता हों जो लोगों को दिखाने के लिए सिनेमाघर फ्री करा दे।

हिंदी सिनेमा के लिए सिर्फ कॉमेडी है विवाहेत्तर संबंध


 कुछ सालों पहले जब ये फिल्म मैंने कमलेश्वर की वजह से दोबारा देखी तो मुझे यह कॉमेडी फिल्म लगी। गोविंदा की साजन चले ससुराल, दूल्हे राजा, छोटे सरकार टाइप की कोई भी कॉमेडी फिल्म जैसी। अभी जब कुछ सप्ताह पहले इसी नाम वाली एक और फिल्म आई है तब भी इतने बरसों के बाद भी उसका अंदाज सिगरेट पीने और पकड़े जाने जैसा ही रहा है।

हिंदी सिनेमा इस विषय पर जज्बाती होकर नहीं बल्कि तफरी के अंदाज में सिनेमा गढ़ता दिखा है। ऐसी बहुत सारी कॉमेडी फिल्में हैं जिसमें नायक अपनी पत्नी से उबकर सिर्फ सेक्स की लालसा में यहां वहां 'मुंह मारने' की कोशिशों में लगा दिखता है। सिनेमा दिखाता है कि नायकों की एप्रोच उन लड़कियों के प्रति रही है जिनके कपड़े पत्नी की तुलना में आधुनिक हैं और सेक्‍स को लेकर उनके विचार 'लिबरल' हैं। बाद में ये हीरो रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं और मासूम सा चेहरा बनाए पत्नी से वादा करते हैं कि अब आगे से वह सिगरेट नहीं पीएंगे। पत्नियां मान जाती हैं और फिल्म खत्म हो जाती है।

हिंदी सिनेमा ने इस समीकरण को पलटकर बनाने की कोशिश नहीं की है, कि पत्‍नी किसी सिंगल लड़के से अफेयर करे, बाद में वह पकड़ी जाए और फिल्म कॉमेडी हो, इस तरह के सिचुवेशन शायद समाज अभी एफोर्ड नहीं कर सकता? यदि सिचुवेशन होगी भी तो कॉमेडी नहीं होगी। निर्देशक को शायद यह लगता है कि पत्नियों का अफेयर करना कॉमेडी नहीं है और यह छिपकर सिगरेट पीने जैसा भी नहीं है। 

इसी तरह ऐसी फिल्में बनाने में भी सिनेमा की दिलचस्‍पी नहीं रही है जहां पर पति का अफेयर उस लड़की से हो जो ना तो 'लिबरल' हो ना ही सिंगल। दोनों विवाहित हों और दोनों मन के किसी कोने के खालीपन को भरने के लिए करीब आने की कोशिश में हों। और यह करीब आना भी इंटेनशनल ना हो। इस तरह के एक्वेशन में सेक्स प्रियॉरिटी में नहीं होगा। ये संबंध सेक्स के लिए बन भी नहीं रहे होंगे।

 करण जौहर की फिल्म कभी अलविदा ना कहना , अस्तित्व और सिलसिला इस ट्रैक की फिल्‍में हैं जहां चीजें हास्य के रुप में नहीं पेश की गई हैं। सेक्सुअल अट्रैक्‍शन यहां प्रधानता में नहीं है। एक तनाव किरदारों के जेहन और चेहरे में दिखा है, पर इन फिल्मों में भी विवाहेत्तर संबंधों की जटिलताएं नहीं रिफलेक्ट होती हैं।

 खुद की जरुरतें वर्सेज परिवार की अपेक्षाएं, गिल्ट का बढ़ता-घटता बोझ, निरंतर हर पल चलने वाला कश्माकस, बिस्तर पर जिस्मों को लेकर एक अनचाही तुलना, अनचाही तुलना के बाद आने वाला गिल्ट, मूड ‌स्विंग, रिश्तें का अंधकार भरा भविष्य, इन सबके बाद भी उसे चलाए रखने की चाह जैसी बातें भी इन फिल्मों में नदारत दिखीं।

 विवाहेत्तर संबंधों का एक मनोवैज्ञानिक बोझ ये फिल्में संभालकर लेकर चलने में अक्षम साबित रही हैं। किरदार किन किन छोटी छोटी बातों से जूझ रहा है फिल्में वहां तक पहुंचने की कोशिश नहीं करती हैं। या ये कह सकते हैं कि ऐसी फिल्में बनी ही नहीं ‌जिनमें इन बातों को इस तरह से देखने की कोशिश की गई हो।

ऐसा नहीं है कि ऐसा ख्याल नहीं आया होगा। हिंदी साहित्य के पास ऐसी कुछ कहानियां हैं जहां पर पति और पत्नी दोनों ही अफेयर में हैं। रिश्तों और समाज का मनोवैज्ञानिक पक्ष वहां दिखता जरूर है पर वहां भी लेखक इस चीज को लेकर उपापोह में है कि वह कहानी को खत्म कहां करें।

राष्ट्रवाद वर्सेज मानवतावाद की तरह ही शादी वर्सेज प्रेम की कोई सटीक व्याख्या ना अब तक हुई है और ना ही शायद इससे हर कोई सहमत होगा। बावजूद इसके हमें सिनेमा से ऐसी फिल्में की उम्‍मीदें हैं जो इस विषय को उसी संजीदा तरीके से पेश करें जिस तरह के ये विषय हैं। कॉमेडी हम किसी और फिल्म में देख लेंगे।

मर्दानी 2, रेप की भयावहता दिखाने से ज्यादा खुद को फिल्म बनाने में बिजी है

'मर्दानी 2' रेप विषय पर बनी ऐसी फिल्म है जो एक पल भी यह बात नहीं भूलती कि वह एक मुंबईया फिल्म है, जिसका मकसद लोगों का मनोरंजन करना है।

वह रेप के भावनात्मक और संवेदनशील द्वंद में खुद को न उलझाकर रेपिस्ट और उसे पकड़ने वाली पुलिस ऑफिसर के बीच की नूराकुश्ती पर खुद को फोकस करना चाहती है।

रेपिस्ट, जिसे आमतौर पर घिनौना माना जाता है यह फिल्म उसे हिंदी फिल्मों के विलेन की तरह स्टेबलिश करती है, जो शातिर भी है और स्मार्ट भी। मर्दानी उसे अच्छे सीन भी देती है और संवाद भी। 'विलेन मजबूत होगा तो हीरो भी मजबूत दिखेगा' वाली लीक पकड़कर यह फिल्म क्लाइमेक्स तक आते-आते रेप को भूल जाती है और सिर्फ विलेन की चालें और पुलिस की जांबाजी को याद रखती है। बचे हुए समय में यह फिल्म यह भी याद दिलाने की कोशिश करती है कि यह काम एक महिला पुलिस ऑफिसर ने किया है।

फिल्म विलेन को मजबूत करने के साथ-साथ उसके द्वारा किए जाने वाले अपराधों को भी एक वजह देने की कोशिश करती है। एक रेपिस्ट जिसे फिल्म सिर्फ एक रेपिस्ट नहीं मानती और अंत तक आते-आते वह उसे एक साइकोलॉजिकल क्रिमनल की तरह दिखाने लगती है। जाहिर सी बात है कि साइकोलॉजिकल क्रिमिनल के प्रति हमारे मन में वैसा लिजा-लिजा घृणा वाला भाव पैदा नहीं होता जैसा रेपिस्ट को लेकर होता है।

 इस फिल्‍म को देखते हुए आपको दर्जनों ऐसी देशी-विदेशी फिल्में याद आ सकती हैं जिसमें विलेन अपने किसी कॉम्लेक्स की वजह से क्रिमिनल बन गया होता है। इस फिल्म का रेपिस्ट विलेन आपको क्रिस्टोफर नोलन की फिल्‍म द डॉर्क नाइट के जोकर या एआर मुर्गादास की तमिल-तेलुगू फिल्म स्पाइडर के विलेन की नकल करता हुआ भी लग सकता है। ऐसा विलेन जो क्रूर तो है पर साथ में 'कूल' भी है। उसके पास हीरो के सामने टिके रहने की क्षमता है और उसे हराने की भी। 

'मर्दानी 2' के साथ सुविधा और संयोग ये है कि यह फिल्म ऐसे समय पर आई है जब देश के अखबार और टीवी के प्राइम टाइम रेप की खबरों से रंगे पड़े हैं। पुलिस रेपिस्टों का एनकांउटर कर दे रही है और चारों ओर वाह-वाह की आवाजें आ रही है। पर फिल्म की टोन रेप को लेकर वैसी नहीं है। यह रेप पीड़िता, उनके परिवारों की हालत और समाज में उसके गुस्से की तरफ अपना कैमरा नहीं घुमाती है। बल्कि उन दृश्यों को रचने में व्यस्त रखती है जिसमें पुलिस और विलेन के बीच शह और मात का खेल चलता दिखे। कभी वह जीते तो कभी वो हारे। ‌फिल्म की सबसे ज्यादा दिलचस्‍पी विलेन के अपराध करने के तरीकों और एक पुलिस ऑफिसर के महिला होने पर है। 

 'मर्दानी 2',  स्‍त्री सशक्कतीकरण की कुछ बहुत ही वाजिब बातें निहायत सस्ते तरीके, और घिसे-पिटे संवादों के साथ करती है। फिल्म के क्लाइमेक्स सीन के ठीक पहले मर्दानी बनी रानी मुखर्जी एक टीवी इंटरव्यू दे रही होती हैं जिसमे वह पुरुषों से बराबरी का हक मांग रही होती हैं। वह पुरुष जो उनके ऑफिस में भी हैं और जिन्हें एक महिला से ऑर्डर लेने में शर्म आती है। ये सीन अब अच्छे नहीं लगते और किसी महिला को स्टीरियोटाइप ही फील कराते हैं।

मर्दानी 2 देखते समय आपको नेटफ्लिक्स पर कुछ महीनों पहले स्ट्रीम हुई वेब सीरिज 'दिल्ली क्राइम' की भी याद आती है और 'आर्टिकल' 15 की भी। निर्भया गैंगरेप पर बेस्ड करके बनाई 'दिल्ली क्राइम', क्राइम के सिरों को जिस तरह से खोलती है, अपराधियों का बैकग्राउंड तलाशती है, बिना रेप दिखाए रेप की यातना को महसूस कराती है वह बार-बार इस फिल्म में दर्शकों को याद आ सकता है।

मर्दानी 2, रानी मुखर्जी के लिए अपने पति द्वारा कुछ-कुछ समय के बाद दिया जाने वाला तोहफा है। यह फिल्म आदित्य ने रानी के लिए ही बनाई है। रानी मुखर्जी का बढ़ता वजन और चेहरे पर बढ़कर झूलती चर्बी उन्हें इस रोल की कास्टिंग के लिए रोक देती यदि वह आदित्य की बीवी ना होतीं। पर ये मियां-बीवी का मामला है। इसमें फिल्म के निर्देशक गोपी पुथरन बहुत दखल नहीं दे सकते थे, दर्शकों को भी नहीं देनी चाहिए...रेपिस्ट बने विशाल जेठा ने उम्दा काम किया है।

किसी बरसती दोपहर में कमरे को खुद को बंद करके देख डालिए हाउस अरेस्ट

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म 'हाउस अरेस्ट' को समझने से पहले इन दो बातों को समझ लीजिए...

पहलीः जापान की पूरी आबादी के लगभग दो प्रतिशत लोग 'हीकीकोमोरी' नाम के सिंड्रोम से जूझ रहे हैं। इस सिंड्रोम में व्यक्ति खुद को सोशली डिस्कनेक्ट कर लेता है, वह घर से बाहर निकलता ही नहीं है। वह अपने घर या कमरे में अकेले रहता है। कई-कई महीने। वह सिर्फ इंटरनेट और फोन के जरिए ही लोगों से जुड़ा होता है। जापान के अलावा अमेरिका, इटली, फ्रांस और स्पेन जैसे देशों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। 

दूसरीः हाउस अरेस्ट फिल्म का नायक दिल्ली के एक फ्लैट से पिछले 9 महीनों से बाहर नहीं निकला है। फिल्म के खत्म होने के कुछ मिनट पहले हम जान पाते हैं कि उसकी बीवी उसके बॉस के साथ भाग गई है। उसके शब्दों में 'शादी के बाद वह बीवी को अच्छी लाइफ देने के लिए दिन रात काम करता है। ऑफिस में वह बॉस का काम भी करता है, कुछ समय बाद बॉस उसके घर पर उसका काम करने लगता है' ये भागने के कुछ दिन पहले की उसकी और उसके बॉस की रुटीन थी। घर में कैद इस आदमी का इंटरव्यू करने के लिए एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट उसके घर आती है। वह जापान में रह चुकी है तो उसे ये केस हीकीकोमोरी का लगता है, उसके लिए ये एक स्टोरी होती है।

 इन दोनों बातों को जानने के बाद आपके मन में जो एक सीरियस किस्म का प्लाट बन रहा है, दरअसल फिल्म वैसी है नहीं। ये अल्ट्रा अर्बन माहौल में रची एक लाइट हार्टेड इमोशनल फिल्‍म जैसी है। जिसकी पिच और टोन कॉमिक है। 100 मिनट से ऊपर की यह फिल्म थिएटर के अंदाज में एक फ्लैट में शूट की गई है। यहां मुख्य रुप से दो किरदार हैं और कुछ और किरदार आते जाते रहते हैं।

 इस फिल्म की खूबसूरती ये है कि कुछ मिनटों के बाद हम फिल्म के मुख्य किरदारों करन और शायरा के बीच बन रहे इमोनशल बॉडिंग का हिस्सा बन जाते हैं। शायरा  एक नहीं कई सारे अफेयर्स से गुजर चुकी है। सेक्स या वन टाइम रिलेशनशिप उसके लिए टैबू नहीं है, फिर भी करन और शायरा का करीब आना बेहद नेचुरल और जरूरी लगता है। एक ऑडियंश के रुप में दर्शक को लगने लगता है कि अब इनको क्लोज हो जाना चाहिए। चाहे तो बॉलकनी में पौधों को पानी देते वक्त, वीडियो गेम खेलते या एक ही बाउल से कुछ खाते हुए। हर दफा लगता है कि होना चाहिए। 'ये होने चाहिए' की फीलिंग स्वाभाविक क्यों लगती है यही इस फिल्म की स्ट्रेंथ है।

फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू करन का दोस्त जेडी है। जेडी का किरदार जिम शरभ ने किया है। जिम को आप चाहें तो पदमावत के अलाउद्नीन खिलजी के करीबी के रूप में याद कर सकते हैं या मेड इन हैवेन वेब सीरिज के बिजनेसमैन आदिल के रूप में। कमरे में बंद करन का किरदार अली जफर ने किया है। उस जर्नलिस्ट के रोल में श्रेया पिलगांवकर हैं। श्रेया को आप इस तरह से समझिए कि मिर्जापुर वेब सीरिज में वह गुड्डू पंडित की प्रेमिका का किरदार कर चुकी हैं। और गुड्डू पंडित यानी फिर से अली जफर...

 जेडी ने ही उस जर्नलिस्ट को करन के घर भेजा हुआ है। बीवी के भाग जाने की तरह ही दर्शकों को ये भी आखिरी में ही पता चलता है कि शायरा जेडी की एक्स है। जेडी अपने आप को प्लेयर मानता है। वह मानता है कि पति के साथ 'रोज-रोज के दाल चावल' जैसी बोरिंग रिलेशनशिप से उकताई लड़कियां उसके पास कुछ थ्रिल खोजने के लिए आती हैं। वह पल जिनमें शायरा और करन के बीच में एक रिलेशन डेवलप हो रही होती हैं उन्हीं पलों में जेडी शायरा को फोन करके उसे थ्री सम के लिए इनवाइट करता है। इस थ्री सम में 'थ्री' शायरा की एक दोस्त को बनना है। जाहिर है वह भी जेडी की एक्स रह चुकी है। वह उसी के जरिए शायरा से मिला है।

फिल्म का खूबसूरत पक्ष इन्हीं रिलेशनशिप को बगैर पैनिक हुए दिखाना है। ये फिल्म कहीं भी मॉरल, इथक्सि या मॉरल पुलिसिंग के लोड में नहीं पड़ती है। वह सहजता के साथ बनने वाले रिश्तों में असहज होना जानती है और यह भी जानती है कि असहजता को झेलते हुए कब तक सहज रहा जा सकता है।

फिल्म में कॉमेडी का भी एक साइड प्लाट भी डाला गया है। शायद फिल्म की स्पीड को बनाए रखने के लिए। उसकी चर्चा इसलिए जरूरी नहीं कि वह दर्जनों बार किसी फिल्म में घुमा-फिराकर यूज हो चुका है।

हाउस अरेस्ट कोई चमत्कारिक फिल्म नहीं है। इसकी ना तो चर्चा होगी ना ही इसे कहीं कोट किया जाएगा, लेकिन मेरे लिए यह फिल्म एक जरुरी फिल्म है। मैं कह सकूंगा कि जिस शुक्रवार थिएटर में 'मरजावां' रिलीज हुई थी उसी शुक्रवार एक ऐसी फिल्म भी आई थी, जिसका बजट शायद कुछ लाख ही रहा हो। और जिसके पास रिलेशनशिप को लेकर दो चार नई फिलॉसफी थीं.. और जिसे घर में खुद को बंद करके देखा जा सकता है...

Wednesday, October 2, 2019

वॉर जैसी फिल्‍में ‌हिट होनी चा‌हिए ताकि मर्दानी के सीक्वल बनते रहें...


इस बात पर तो आप भी एग्री करेंगे कि एक स्पाई या जासूस का कॉमन सेंस और इंटलैक्ट लेवल एक पुलिस सब इंस्पेक्टर से बेहतर होता होगा। उसके रिफलेक्‍शन, मूव्स और प्लानिंग भी। तो फिर ये भी मानेंगे कि ऐसी फिल्म देखने वालों दर्शकों का स्तर भी चुलबुल पांडेय जैसा नहीं मानना चाहिए। दर्शकों को भी स्मार्ट मानना चा‌हिए। उन्हें स्पून फीडिंग नहीं करानी चाहिए। तमाम सारी बेहतर बातें लिए वॉर फिल्म यहां पर गलती करती है। एक तरफ वह एक्‍शन के नाम पर हॉलीवुड की दिग्गज फिल्मों के एक्‍शन डायरेक्टर्स की सेवाएं लेती है लेकिन फिल्म के प्लाट और स्क्रिप्ट में वही एक घिसी पिटी कहानी को दोहरा देती है। फिल्म के सस्पेंस और खुलासे मेरे स्कूल दिनों में देखे गए सीरियल सुराग के इंस्पेक्टर भारत जैसे लगते हैं। जो इतने प्रिडेक्‍टिबल हैं कि जिनके बारे में अन्ना हजारे तक बता दें कि आगे क्या होने वाला है।

वॉर फिल्म एक पॉपकॉर्न इंटरटेनर की तौर पर बुरी फिल्म नहीं है। इसके एक्‍शन सीन सांस रोककर देखने वाले हैं। जो किसी भी लेवल पर हॉलीवुड स्पाई फिल्मों से कमतर नहीं हैं। फिल्म के पास खूबसूरत लोकशन हैं और खूबसूरत हीरो भी। प्रॉब्लम वहां नहीं हैं। प्रॉब्लम ये है कि फिल्म के पास एक्‍शन के अलावा कुछ और है ही नहीं। जब फिल्म में एक्‍शन नहीं हो रहा होता है तो दरअसल बकवास हो रही होती है। दर्जनों फिल्‍मों में देखी गई बकवास फिर से एक बार नए तरीके से देखने को मिलती है। करोड़ो रुपए खर्च करके फिल्म का एक्‍शन बनाया गया है, कुछ लाख खर्च करके एक अच्छी स्किप्ट के बारे में नहीं सोचा गया। फिल्म की कहानी अपने एजेंट के बागी हो जाने की है। अभी अभी फिल्म देखना शुरू करने वाला ऑडियंश भी बता देगा कि यदि हमारा स्पाई बागी हो रहा है तो इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं होगा कि वह पाकिस्तान या चीन से मिल गया होगा। यकीनन उसके पास कुछ ऐसी बातें आईं होंगी जो उसे सिस्टम में कोई जासूस होने का इशारा कर रही होंगी और इसका खुलासा वह किसी सीन में शराब पीते हुए करेगा।

प्लाट का कॉमन होना बुरा नहीं होता। पचास और साठ के दशक की हिट फिल्मों को निकाल लीजिए। आप पाएंगे कि इन बीस सालों में जो फिल्मों आई हैं इनके प्लॉट घूम फिरके वही दस-बारह ही रहे हैं। अस्‍सी के दशक में इनकी संख्या और भी कम हो गई थी। हर तीसरी फिल्म पहली फिल्म जैसी लगती थी। वॉर अगर इसी प्लाट के साथ आगे बढ़ना चाहती थी तो भी बुरा नहीं था। वह चूकती है अपनी चरित्रों को गढ़ने में। उनके पर्सनल लाइफ को दमदार बनाने में। उनकी‌ डिटेलिंग में। एक सिस्टम के अंदर होने वाली बातचीत को स्मार्ट बनाने में। आप एक हीरो से हर तीसरे सीन में एक्‍शन कराएंगे तो एक्‍शन भी एक समय के दाल रोटी जैसा बोरिंग लगने लगता है।

ये अच्छी बात है कि फिल्‍म प्रेम कहानी के नाम पर बहुत समय नष्ट नहीं करती है। पर मुझे वाणी कपूर के लिए सॉरी हमेशा फील होता है। 31 साल की इस एक्ट्रेस के पास ले-देकर अब तक तीन फिल्में हैं। वाणी को फिल्में कब मिलेंगी? जब कोई कपूर सरनेम वाला देश का प्राइम मिनिस्टर बन जाएगा? फिल्में न मिलने से बोर होने वाली वाणी कपूर अपना समय प्लास्टिक सर्जरी करवाकर काटती हैं। वाणी के चेहरे को देखिए। शुद्घ देशी रोमांस में अलग चेहरा, बेफिकरे में अलग और वॉर में अलग। वाणी कपूर के चेहरे पर इतनी प्लास्टिक है कि सरकार को प्लास्टिक बैन की मुहिम वहां से शुरू करनी चाहिए थी। वाणी कपूर के ओंठ दिखाकर यूपीएससी में प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि ये ओंठ किस फिल्म में था। तब तक उनके पास चार फिल्‍में भी हो जाएंगी।

फिल्म में प्लास्टिक सर्जरी सिर्फ वाणी कपूर के चेहरे पर नहीं दिखती। फिल्म का मुख्य विलेन प्लास्टिक करवाकर घूम रहा है। इसे इतना आसान करके दिखाया गया है कि यदि आडवाणी चाहें तो कुछ दिन के लिए नरेंद्र मोदी के चेहरे वाली प्लास्टिक सर्जरी करवाकर पीएम बन सकते हैं। क्योंकि फिल्म ये मानती है कि प्लास्टिक सर्जरी के बाद चेहरा ही नहीं आदमी भी पूरी तरह से बदल जाता है। प्लास्टिक सर्जरी वाले प्लॉट 30 साल पहले आई 'खून भरी मांग' में चौंकाते थे अब बकवास लगते हैं। फिल्म में एक मुस्लिम गद्दार के देशभक्त बेटे का भी बचकाना प्लॉट है। यह एरीटेट करता है। इस हद तक कि इस पर जोक बनाने का मन भी नहीं करता है।

रितिक रोशन का डील डौल, उनका लंबा मुंह, भूरी आंखे, आंखों में लगे काले चश्में, शरीर पर चिपकी गोल गले की टीशर्ट, हवा में उड़ते उनके डाई किए हुए हल्के लाल बाल, ये सब मिलाकर माहौल बनाने में कोई कमी नहीं रखते। एक्‍शन के सीन में वह अच्छे भी लगते हैं लेकिन एक्‍शन के अलावा आप उनसे क्या काम करवा रहे हैं? टाइगर श्राफ कुछ दिनों बाद फिल्मों में आइटम सॉन्ग की तरह एक्‍शन सीन करते दिख सकते हैं। वह एक्‍शन सीन इतनी खूबसूरती से करते हैं कि लगता है कि इनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। वह मदारी के कंधे पर बैठे बंदर की तरह  हैं। जो उतरता है कुछ खेल दिखाता है और फिर से उसके कंधे पर बैठ जाता है। बाकी पूरे खेल से जैसे उसे मतलब ही नहीं। एक इंसान के तौर पर टाइगर कहानी के साथ घुलते-मिलते नहीं हैं। किसी भी फिल्‍म में नहीं। यहां तक कि उनकी सोलो हीरो वाली बागी तक में नहीं।

दो अक्टूबर को रिलीज हुई  इस फिल्म लंबा वीकेंड दशहरा तक चलेगा। फिल्म की पहली दिन की आक्यूपेंसी बताती है कि यह तीन सौ करोड़ कमाएगी। ये अच्छा है। आदित्य चोपड़ा इस फिल्म से इतना पैसा कमा लेंगे कि वह अपनी बीवी के लिए हर साल मर्दानी का सीक्वल बनाते रहें। एक मिडिल क्लास आदमी करवा चौथ पर बीवी को साड़ी देता है, आदित्य चोपड़ा अपनी बीवी को फिल्म देते हैं। भगवान हर बीवी को आदित्य जैसा पति दे। वॉर के साथ अच्छी बात ये है कि यह ठग्स ऑफ हिंदुस्तान, कलंक या साहो जैसा दिल नहीं तोड़ती, वह सिर्फ अपनी लिमिटेशन दिखाती है।