Monday, August 19, 2019

सीक्रेड गेम्स 2: ये फिल्‍म गायतोंडे के ल‌िए नहीं गुरू जी के लिए देखिए



सेक्रेड गेम्स का दूसरा सीजन तमाम सारे सवालों का जवाब देने के लिए पैदा हुआ है। पर ये बिल्कुल जरुरी नहीं है कि आपको जवाब उतने ही भव्य लगें जितने भव्य और रहस्यमयी सवाल लगे थे। 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा' इसका उत्तर इस प्रश्न की भव्यता के आगे बहुत बौना और घिसा-पिटा हो गया था। सेक्रेड गेम्स सीजन 1 में चूंकि सवाल कई सारे थे इसलिए उनके हर जवाब जरुरी नहीं  ‌कि सवाल जितनी ही कैपासिटी में खुद को दर्ज करा पाए हों। कहीं-कहीं उनके उत्तर जल्दबाजी में दे दिए गए लगते हैं तो कहीं-कहीं उन्हें और उलझा दिया गया मालूम होता है। ट्ववीटर की कुछ प्रतिक्रियाएं इशारा करती हैं कि इस बार हर किसी को चरमसुख का अनुभव नहीं हुआ है।

25 दिन में दुनिया तबाह होने के मुख्य प्रश्न के साथ कई और सेम्पलीमेंट्री प्रश्नों का जवाब देने के लिए बनाई गई ये फिल्म उत्तर देते-देते कई बार थक भी जाती है। सिर्फ उत्तर देने के लिए बेवजह के सीन जोड़कर आपको और थकाने और उबाने के बजाय सीजन 2 आपके लिए कुछ नए किस्से गढ़ता है, कुछ नए किरदार खड़ा करता है, कुछ पुराने किरदारों में चमक पैदा करता है और चमकदार किरदारों को धु्ंधला करता है।

 फिल्म की मंशा है कि आप पहले सीजन के सवालों वाले हैंगओवर से उतरें और कुछ नए सवालों और किरदारों को अपने रुह में जगह दें। त्रिवेदी बचा या मर गया इस प्रश्न के उत्तर से लाख गुना बड़ा प्रश्न ये है कि गुरू जी का नेक्सस इतना बड़ा कैसे बना? कैसे दुनिया को खत्म करने का काम इतनी सहजता से कर पा रहे थे? यह सीजन सीधे तौर पर नहीं लेकिन बिटविन द लाइन बहुत कुछ कहने की कोशिश करता है। जिसे शायद सीधा कहा भी नहीं जा सकता है। जो घोर राजनीतिक है और घोर सांप्रदायिक भी।


फिल्म की कहानी को कहने का तरीका पिछली बार वाला ही है। बारी-बारी से गणेश गायतोंडे का अतीत और उसके मर जाने के बाद चल रही जांच के दृश्य आगे-पीछे चलते रहते हैं। सीजन 2 में एक बदलाव हुआ। गणेश गायतोंडे का हिस्सा तो अनुराग कश्यप के पास ही रहा लेकिन वर्तमान के इन्वेस्टीगेशन और सरताज वाले हिस्से के डायरेक्टर विक्रमादित्य मोटवानी की जगह नीजर घेवान बन गए। मोटवानी के पास इस बार दोनों शूट्स को क्रम से लगाने और एडिट करने का जिम्मा था। यह बदलाव दिखेगा। लेकिन इसे महसूस तब कर पाएंगे जब आप सीजन 2 के तुरंत बाद सीजन 1 भी देखने बैठ जाएं।

अगर आप फिल्म देख चुके होंगे तो पाएंगे कि सीजन 2 गायतोंडे के किरदार को हल्का करने का बड़ा रिस्क लेता है। खुद को भगवान मानने वाले उस इंसान को इस बार भ्रम में उलझा हुए एक आम इंसान बनाकर दिखाया गया है। एक इंसान जो सरवाइव करने के लिए कदम-कदम पर समझौते करता है, दूसरे के हाथों में खेलता है। उसके बदलाव की यह यात्रा उसके बने बनाए ग्लैमर को नोचती- घसोटती तो है लेकिन उसी समय फिल्म गायतोंडे के किरदार की सारी लेयर्ड उतारकर गुरू जी को पहनाकर उन्हें ताकतवर बना रही होती है।


 सीजन 1 में  जो सम्मोहन गायतोंडे के पास था 2 में अब वह गुरू जी के पास है। गुरू जी की दुनिया गायतोंडे के दुनिया से अलग और ज्यादा मायावी है। गुरू जी की 'कैलकुलेटिव नीचता' के आगे गायतोंडे की 'बाचाल नीचता' मासूम लगी। योगेंद्र यादव वाली मीठी स्टाईल में कही गई उनकी बातें गायतोंडे की गालियों से ज्यादा भद्दी लगती हैं। गुरू जी कायनात देखकर गायतोंडे की गैंग के छोकरे एक स्कूली गैंग वाले लड़के लगने लगे। जो छोटी-छोटी बातों में उलझे हुए हैं। बड़ा काम तो गुरू जी कर रहे हैं। सेक्रेड 2 अपनी बातें और फिलॉसिफी गुरू जी के प्रवचनों के द्वारा कहने की कोशिश करती है। एक सम्मोहन सा है उनकी बातों में, एक जादू और एक तिलिस्म। एक समय ऐसा भी आता है जब आडियंश गुरू जी से सहमत होने लगती है। सहमति होने के उन लम्हों में आते हैं राम रहीम, आशाराम, उनके अनुयायी, उनकी मानस पुत्रियां, उनकी शिष्याएं,  कंडोम और सेक्स वर्द्वक दवाओं के जखीरे। फिर गायतोंडे जैसा हमारा भी मोहभंग होता है।

इस दुनिया को नष्ट करके और फिर से नई दुनिया बनाने के बचकाने ख्याल और सपने पालने वाले गुरू जी अपने इर्द-गिर्द ताकतवर लोगों का एक गिरोह जमाकर कर चुके हैं। ब्रेशवॉन शब्द का इस्तेमाल गुरू जी जानते हैं। उनके अनुयायियों में आईएसआईएस का प्रमुख शाहिद खान भी है और मासूल दिल वाला दिलबाग सिंह भी। गुरू जी धर्म से उपर उठ चुके हैं। दुनिया को नष्ट करने में सभी धर्म के लोग उनके साथ हैं। सभी को गुरू जी उसकी लियाकत के अनुसार जिम्मेदारी देते रहते हैं। ‌इन जिम्मेदारियों में उस ड्रग को बेचना भी है जिसे उनके आश्रम में बनाया और खपाया दोनों जाता है।

अपने इस पाप को वो किस तरह से शब्दों और फिलॉसिफी के जर‌िए जस्टीफाई करते हैं फिल्म उसे दिखाने में कई तरह की तरकीबों का सहारा लेती है। फिल्म गुरू जी पर कहीं पर भी आक्षेप नहीं लगाती है। आपको खुद गुरू जी को समझाना होता है। फिल्म बस उन्हें वैसा पेश कर देती है जैसे वे हैं। वो अपनी मंशा छिपाते भी नहीं हैं। किसी को अपने साथ बने रहने की जोर-जबरदस्ती भी नहीं करते हैं। गुरू जी के हिस्से सबसे अधिक संवाद भी आए हैं। इनकी लिखावट बेहद शानदार है। कई जगह तार्किक और नई सी भी। इस‌लिए उनकी हर बात को हवा में उड़ा देने की हिम्मत ना तो हमारी होती है ना ही फिल्म की।


इस बार फिल्म के पास राजनीति और धर्म पर कटाक्ष करने के लिए बहुत सारे वन लाइनर हैं। राजनीति की विडंबनाओं वाले सारे वन लाइनर इस बार अतीत में नहीं हैं, आज का वर्तमान भी फिल्म में खूब है। फिल्म राजीव और इंदिरा गांधी का नाम तो खुलकर लेती है वर्तमान में जो घट रहा है उस पर चोट करने में वह रुपक का सहारा लेती है। कई बार रूपक मुसलमान बनते हैं, कई बार राम मंदिर, कई बार दंगे और कई बार सत्ता। राजनीति और धर्म इन दिनों जैसे शक्‍कर और रुहआफजा की तरह घुलकर मीठे शर्बत बना रहे हैं, वाट्सअप के जरिए आप उस शर्बत को गटागट पी रहे हैं फिल्म की नजर उस पर अच्छी है, ओछी नहीं।

2019 में हिंदू और मुसलमान दोनों को लगने लगा है कि दोनों एक दूसरे से पीड़ित हैं। ये एहसास सीक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन में कई जगह पर होता है। एक जगह पर माजिद का किरदार कहता है कि 'मुसलमान वह जिसे कुछ लोग यूज करें और बाकी उस पर शक करें'। या एक और मुसलमान किरदार कहता है कि 'मुसलमान को उठाने के लिए कोई वजह चाहिए आपको? एक सीन में हिंदुओं की तरफ से जवाब  भी आता है 'एक समुदाय पूरे शहर में इतना घुस गया है कि.... और आप सेक्युलर-सेक्युलर कर रहे हैं'


लिखावट के बाद फिल्म का सबसे वजनदार पक्ष उनका अभिनय है। सिर्फ लाश के रुप में सीजन एक में दिखने वाली सुरवीन चावला ने इस सीरीज में बेहद खूबसूरत अभिनय किया है। गायतोंडे के साथ फोन पर होने वाली उनकी बातचीत को अलग से सुना जाना चा‌हिए। सुरवीन के करियर का ये अब तक का सबसे मजबूत किरदार है। अमृता सुभाष अनुराग की प्रिय हैं। रमन राघव में नवाजुद्दीन की बहन का किरदार करने वाली अमृता इस बार रॉ एजेंट बनकर कमाल लगती है। कल्कि कोचलीन का किरदार सामान्य है। इसे किसी और से भी कराया जा सकता था। नवाजुद्दीन शिद्दकी की तरह ही सैफ अली खान के बगैर इस सीरिज की कल्पना नहीं हो सकती है। निराश करने वाले लोग कम हैं। रणवीर शौरी के पास पद बहुत बड़ा है लेकिन उनका रोल जरा सा। वो जरुर निराश करते हैं। साथ ही फिल्म का क्‍लाइमेक्स भी जो एक और सीजन की राह खोल देता हे।

तो ये दुनिया फिलहाल दो तरह के लोगों में बंटी हुई है। पहले वे जिन्होंने सेक्रेड गेम्स सीजन 2 देखा है और दूसरे वो जो इसे देखना चाहते हैं। आपको चाहिए कि आप भी जल्दी से पहले वाले लोग बन जाएं। आपको ये सीरिज देखनी चाहिए।

Friday, August 9, 2019

आपको भी याद आती हैं 'इमेज' को दांव पर लगाकर देखी गई वो फिल्में?


मेरी जिंदगी में 'कली हूं फूल बना दो' का पोस्टर एक नई सुबह लेकर आया था। इस पोस्टर को मैंने अपने साथ करीब सौ लोगों के साथ खड़े होकर दीवार पर लगते हुए देखा था। इसके पहले होता ये था कि रात में पोस्टर चिपक जाते और हम अगली सुबह बदली हुई फिल्म का पोस्टर देखते। पोस्टर चिपकते कैसे हैं ये हमने कभी नहीं देखा था। ये एक बड़े साइज का पोस्टर था जिसे लगाने के ‌लिए एक रिक्‍शा से दो आदमी, एक सीढ़ी, पोस्टर का एक बंडल, आटे की लेई की एक बाल्टी और पुताई करने वाली एक कूंची को लेकरआए थे। चार हिस्सों में बटे हुए पोस्टर को करीब पांच मिनट में सिरे से सिरे जोड़कर लगाया गया। जब ये रिक्‍शा आगे चला गया तो हमारे सामने 'कली हूं फूल बना दो' का जीवन बदल देने वाला विहंगम दृश्य था। ये बारहवीं क्लास में सर्दियों के दिनों की बात थी। एक ऐसा कस्बा जहां फिल्में हर शुक्रवार के हिसाब से नहीं कभी भी बदल जाया करती थीं।

दसवीं में मैंने बॉटिनी के ज्यादातर हिस्से बेमन से पढ़े थे। 'कली के फूल' बनने का प्रोसस वहां मुझे ठीक से क्लीयर नहीं हो पाया था, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मुझे उसके फंडामेंटल ही न पता थे। इस पोस्टर में कोई फूल नहीं था और कोई कली भी नहीं। साइंस से जुड़ी संस्‍थाएं इस पोस्टर को खारिज कर सकती थीं। यहां कली और फूल के बजाय एक अधेड़ आदमी एक औरत में समाने की कोशिश कर रहा था। महिला के चेहरे से लग रहा था कि इसमें उसकी स्वीकृति है और वह ऊपर की ओर देख रही थी। दोनों खुश थे। पुरूष की शकल तो नहीं दिख रही थी लेकिन उसकी पीठ देखकर अंदाजा लगाना आसान था कि वह महिला से ज्यादा खुश था।

 पोस्टर में कई छोटे-छोटे चित्र और थे। एक में एक मोटी सी लड़की नहाने का उपक्रम कर रही थी, एक ओर एक मोटा सा आदमी कोने में बंदूक लिए खड़ा था, एक आदमी एक खूब वजन वाली एक महिला का एक पैर अपने हाथों से थामें हुए था, दूसरे पैर के पंजे नहीं दिख रहे थे, लेकिन उसका दूसरा पैर भी था। एक महिला ब्लाउज में थी और किसी से डरने की ऐक्टिंग कर रही थी, डराने वाले को पोस्टर में जगह नहीं मिल पाई थी। पोस्टर देखने की एक सीमा थी। ये एक चौराहा जैसा था जहां से हमे एक वक्त के बाद हटना ही था। हम हट तो गए लेकिन उस पूरा दिन मैं बॉयोलोजी को ठीक से न पढ़ने और 11वीं में गणित लेने के रिग्रेट में रहा।

शोले, दीवार, अनोखा बंधन, प्यार झुकता नहीं, बॉर्डर, कुली नंबर 1, फूल और कांटे, मैंने प्यार किया से इतर भी कोई सिनेमा बन रहा है ये मेरी जानकारी में पहली बार इसी फिल्म के जरिए आया था। ये 21वीं शताब्दी का पहला साल था। देश में अटल बिहारी बाजपेई की सरकार थी, कश्मीर के लोग धारा 370 के साथ घुट रहे थे। इंटरनेट नाम की कोई चीज जिंदगी और सरकार तक तय करेगी ये तब मालूम नहीं था। साथियों के मुंह से अब तक गंदी फिल्में, ब्लू फिल्में जैसी शब्द सुने  जरुर थे लेकिन असल में वह किस तरह से हो सकते हैं दिमाग इसको विजुलाइज नहीं कर पाया था। किसी से पूछा नहीं जा सकता था कि ये कैसी फिल्म है। इसमें दरअसल होता क्या है। चुप रहकर उस पोस्टर के बारे में सोचते रहने के अलावा और कोई जरिया नहीं था।

कोई कामना यदि सच्‍चे मन से की जाए तो वह पूरी होती है। ये सूक्ति सुनी बाद में, इसके लाभ जीवन में पहले ही मिल गए थे। इस पोस्टर के लगे कोई दो से तीन सप्‍ताह हुए होंगे। घोर सर्दियों के दिन थे। स्कूल के कोई ट्रस्टी मर गए थे। कांडोलेंस हुआ था। जिस जगह कली हूं फूल बना दो पोस्टर था उस जगह उस दिन 'कच्ची जवानी' फिल्म का पोस्टर था। इसका साइज जरुर छोटा था। लेकिन उसका कंटेट कहीं ज्यादा असर करने वाला। मारक और तीखा। फिल्म का नाम भी खुद से कनेक्ट करने वाला। पहले पीरियड के बाद छुट्टी हो जानी थी। ये बात बारहवीं में कई सालों से फेल हो रहे बच्‍चों को (उनको बच्चे लिखना राहुल गांधी को युवा लिखना जैसा ही झूठ है) पहले से पता था। पहले पीरियड से ही उनका फिल्म का प्रोग्राम बन गया था। मैंने उस प्लान में शामिल होने की इच्छा जताई। वो मेरी जिंदगी का पहला रिस्क था। यहां इमेज बिगड़ने का नहीं खत्म हो जाने का संकट था। लेकिन उन पोस्टरों में कुछ ऐसा था जो जिसके सामने रिस्क एक मामूली शब्द था।

जब मैंने उनसे कच्ची जवानी देखने की इच्छा जताई तो उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वेज से बिल्कुल भी ये नहीं लगने दिया कि मैं कोई गलत काम करने जा रहा हूं। उन्होंने ऐसा जताया कि बार्डर सरीखी कोई फिल्म देखने जा रहा हूं, जो राष्ट्रहित में भी है। बजाय मुझे अपराध बोध में डालने के उन्होंने मुझसे मेरे हिस्से के 12 रुपए मांगे। मैं अब तक गिल्ट फ्री हो चुका था। मुझे संक्षेप में वहां पहुंचने का प्लान बताया गया। मेरी हर बात में सहमति थी। वो अगर कुछ और मुझसे लिखवा लेते तो कच्ची जवानी के लिए एक छोटी कीमत थी। हम साइकिलों से शार्टकर्ट रास्तों से इस नई तरह की जवानी को देखने के लिए सिनेमाघर पहुंचे। इस सिनेमाघर का अभी कुछ साल पहले से ही गोव‌िंदा, सन्नी देओल जैसे कलाकारों से मोहभंग हुआ था। अब यहां रियल दुनिया की बातें रियल तरीके से होतीं। जैसे छोटे बच्चों को गुमराह किया जाता है कि कोई परी उन्हें लेकर आई थी जैसी नॉन प्रैक्टिकल बातों से इस सिनेमाघर की असहमति थी। वह सच्चाई के साथ था और जीवन की सच्चाई को सबके सामने रखना चाहता था।

अब वहां पहुंचे तो हमने पाया कि 11वीं के गौरव, शुभम और राकेश भी यहीं हैं और दसवीं के आर्ट साइड का आधा बैच ही। जैसे दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल मफलर बांधते हैं वैसे कई केजरीवाल चेहरे को मफलर से कसे हुए सिनेमाहॉल की लॉबी में टहल रहे थे। कोहरा छटने के बाद धूप खिली हुई थी। लोगों के स्वेटर उतर गए थे लेकिन मफलर नहीं। स्कूली लड़कों, कुछ युवाओं और अधेड़ के साथ एक बड़ी संख्या रिक्‍शा वाले यहां थे। रिक्‍शे वालों को छोड़कर कोई भी आत्मविश्वास से लॉबी में नहीं टहल रहा था। सभी एक-दूसरे को भरपूर सम्मान दे रहे थे और कोई किसी की आंखों में झांक नहीं रहा था। सब सिनेमाहॉल के शटर खुलने का इंतजार कर रहे थे। फिल्म शुरु होने में उनको जल्दबाजी नहीं थी उन्हें डर था कि कहीं कोई परिचित न मिल जाए। तब तक इतने तर्क नहीं विकसित हुए थे कि हम भी पलटकर पूछ लेते कि मैं तो देखने आया हूं लेकिन आप यहां क्या कर रहे हैं? हर उम्र की अपनी अल्पज्ञता और संकोच होते हैं।

गेट खुलते ही पेट में एक तरंग सी दौड़ गई। मुझे लगा कि रोमांच के नए सागर में गोता लगाने जा रहा हूं। नए लोग तुरंत ही सिनेमाहॉल के अंदर घुसकर सीट लेने में उत्साहित दिखे पर कुछ अनुभवी हॉल के अंदर लगे छोटे-छोटे पोस्टरों में कच्ची जवानी को लूट लेना चाहते थे। सीनियर की प्लानिंग के अनुसार हम फैमिली में ही बैठे और कोने की सीट ली। पहलवान छाप साबुन के विज्ञापन के बाद फिल्म शुरु हुई। पूरे पर्दे पर नहीं बल्कि पर्दे के बीचो-बीच के हिस्से में। कुछ क्‍लीयर नहीं था। फिल्म से ज्यादा उसमें जलेबियां गिर रही थीं। कुछ साउथ का बैकग्राउंड दिख रहा था। हम नए लोग जल्दबाजी में थे लेकिन अनुभवी लोग जानते हैं कि असली फिल्म कब शुरू होनी है...वो तब तक पिछले फिल्म के किस्से दबी आवाज में आपस में शेयर कर रहे थे। हम डर के काम कर रहे थे और यकीनन इस डर के आगे जीत भी नहीं थी।

(नाम ना छापने की शर्त पर एक अनाम पाठक का अनुभव, आप भी अपनी राय और अनुभव हम तक भेज सकते हैं )

Friday, July 26, 2019

कोटा फैक्ट्रीः फिल्म जो आपको शायद कुछ अनदेखी चीजें दिखाने की कोशिश करती है

TVF या AIB जैसी प्लेटफॉर्म्स से फूटने वाली हंसी ज्यादातर मौकों पर गैरसंस्कारी, गैरसामाजिक और 'बालिग' साबित की जाती रही है। इससे कभी फर्क ही नहीं पड़ा कि उसके सेंस ऑफ हॅयूमर की IMDb रे‌टिंग धवन, प्रियदर्शन, वोरा या शेट्टी पैटर्न से निकली बनावटी और रिपेटेटिव फिल्मों से ऊपर होती है।

पांच एपीसोड वाली वेब सीरिज 'कोटा फैक्ट्री' से टीवीएफ ने शायद अपनी इमेज को बड़ा और 'जिम्मेदार' बनाने की कोशिश की है। यह फिल्म इंजीनियर बनाने की मंडी कोटा की कहानी को बगैर फिल्मी या हीरोइक बनाए उसे शानदार तरीके से दिखाने में सफल होती है।

अपनी मूल किस्से में कोटा फैक्ट्री किसी गुदड़ी के लाल के हीरो बन जाने की या कोचिंग मंडी की पोल खोलने जैसी बचकाने कहानी कहने की कोशिश नहीं करती। ना ही कोचिंग मंडी के किसी संचालक को विलेन बनाने की चाह रखती है। वो सिर्फ मीडिल क्लास, अपर मीडिल क्लास से आए कुछ बच्चों के जरिए सपनों और यथार्थ का एक फिलासिफिकल सिनेमा गढ़ने की कोशिश करती है। जिस फिलॉसिफी में मनोरंजन भी भरपूर है। छात्रों की इस दुनिया में सुपर 30 जैसे अमीर-गरीब, दलित-सवर्ण वाले इक्वेशन नहीं हैं।

दसवीं या ग्यारहवीं पास करके दूसरे शहर से पहली बार इस शहर में आया एक अजनबी बच्‍चा कैसा अपना परिवेश खुद तैयार करता है। सिगरेट-शराब जैसी आदतों से खुद को बचाता या अपने को इनवॉल्व करता है। कैसे उस नए परिवेश में वह सहज होता है। कैसा वह सरवाइव करने वाले कुछ नुस्‍खे और चालाकियां सीखता है। कैसे सा‌थ पढ़ रही लड़कियों के संग मोहब्बत की शुरुआत करता है। कैसे छोटे-छोटे फेल्योर और एचीवमेंट पर टूटता या संवारता है। बस इन्हीं बातों के इर्द गिर्द या पूरी सीरिज चला करती है। कहीं कोई बड़ी घटना या ड्रामा का अतिरेक नहीं। कोई विलेन नहीं तो कोई हीरो भी नहीं।

फिल्‍म में कोटा शहर, उसकी कोचिंग मंडियां, टीचर्स, हॉस्टल, मकान मालिक, चाय की दुकानें, इश्क सब बराबर भी हैं और संतुलित भी। कैमरा या स्क्रिप्ट किसी एक खास चीज को टटोलने की कोशिश नहीं करता। हॉस्टल के कमरे को बस उतने ही सरसरी निगाह से देखने की कोशिश की गई है जैसी निगाह से कोई सोहल-सत्रह बरस का बच्‍चा उसे देख सकता है। 'ऑब्जरवेशन के निर्मल वर्मा स्टाइल' से ना तो हॉस्टल के उस कमरे को देखा गया है और ना ही किरदार। फिल्म का पूरा फोकस किरदारों की बदल रही जिंदगियों के साथ आगे बढ़ रही कहानी पर होता है। कुछ कमाल या धमाल घटनाएं फिल्म में नहीं है लेकिन एक भी लम्हा ऐसा नहीं है जिसे आप फिल्म में गैरजरुरी मानें।

मेनस्ट्रीम सिनेमा की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि ये कभी मीडियॉकर या एवरेज आदमी की कहानी ही नहीं कहता। या कहता भी है तो कहानी कहते-कहते उसे बड़ा बना देता है। ज्यादातर मौको में उसके लिए फिल्म का हीरो या तो बहुत गरीब होता है या फिर एक्सट्रा टैलेंटेड अमीर या कोई नई कैटेगरी। कोटा फैक्ट्री अपने बच्‍चों के साथ ऐसा नहीं करती। हाल ही में लगभग इसी विषय पर आई सुपर 30 से उलट यह फिल्म हर स्टूडेंड को सिर्फ एक खांचे में रखने की कोशिश करती है। जहां स्टूडेंट की जाति इतना निरर्थक सवाल है कि आपस में बच्‍चों को पता ही नहीं होता कि वह जिसे जिस नाम से बुला रहे होते हैं वह उनका इनीशियल है या सरनेम।

कोटा फैक्ट्री का एक और सबसे मजबूत पक्ष किरदारों की शानदार ऐक्टिंग है। लीड किरदार कर रहे मयूर मोरे ने एक इंजीनियरिंग छात्र की उलझनों को खूबसूरती से जिया है। नए-नए बने प्रेम को वह बहुत ही सहज तरीके से पर्दे पर उतारते हैं। टीचर का किरदार करने वाले जीतेंद्र कुमार से आप वाकिफ हैं। टीवीएफ के बहुत पुराने वीडिया में उन्होंने अरविंद केजरीवाल से प्रेरित अर्जुन केजरीवाल का किरदार निभाया था। टीवीएफ के बहुत सारे वीडियो में वह नजर आए हैं। फ़िल्म में उनके वन लाइनर भी अच्छे हैं और मोनोलॉग भी। एहसास छन्ना, रंजन राज और उर्वी सिंह के रोल देखकर लगता है कि ये कोटा के स्‍टूडेंट हैं, आप जाएंगे तो आपको वो वही टकरा जाएंगे।

इस फिल्म के कुछ खूबसूरत डायलॉग पढ़िए, आपका फिल्म देखने का मन बनाने के लिए ये काफी होंगे। वैसे ये फिल्म आपको देखनी चाहिए। पूरी फिल्म कलर्ड न होकर ब्लैक एंड व्हाइट है। क्यों है इसके लिए शायद गूगल करना पड़े।

"कोई पूछेगा तो बताएंगे कि बेटा आईआईटी की तैयारी कोटा से कर रहा है, कहने में कूल लगता है"

"बच्चे तो दो साल में कोटा से निकल जाते हैं, लेकिन कोटा सालों तक उनसे नहीं निकलता"

"दोस्ती कोई रिवीजन नहीं है जिसे किया ही जाए"

"मां-बाप के फैसले गलत हो सकते हैं, उनकी नियत कभी गलत नहीं होती"

"तुम अमीर लोग किसी भी दिन केक खा लेते हो क्या "

"महिला मित्र तो उनकी है पर स्नेह ज्यादा मुझसे करती है"

"इफ यू आर स्मार्टेस्ट इन द क्लास, इन मीन्स यू आर इन रॉन्ग क्लास "

लैला फिल्‍म देखिए, कुछ डर हैं जो आपको बेहतर इंसान बना सकते हैं


कबीर सिंह जैसे मीनिंगलेस सिनेमा के बीच इन दिनों लैला जैसा मीनिंगफुल ऑप्शन भी आपके लिए मौजूद है। नेटफ्लिक्स पर ये वेब सीरीज भले ही सीक्रेट गेम्स या मिर्जापुर जैसी चर्चा न बटोर पा रही हो पर ये एक देखी जानी वाली फिल्म है।

फ़िल्म अघोषित रूप से एक पोलिटिकल टोन लिए हुए हैं। राइट विंगर्स को शायद फ़िल्म का विषय हाइपोथिटिकल लगने के साथ खुद को टारगेट करने वाला भी लगे। फ़िल्म एक डर पैदा करने में सफल होती है। ये डर राजनीति में धर्म के मिश्रण का है।

ये डर देश के बहुसंख्यक लोगों के श्रेष्ठ होने का है, ये डर ऊंची जातियों के खुद को ऊंचा मानने का है और ये डर अल्पसंख्यक को नीच और घटिया मानने का भी है। ये डर दिखता है कि यदि भारत लिंचिंग के हादसों को ऐसे ही सेलिब्रेट करता रहा, और राम का नाम पुजारी से ज्यादा हत्यारे लेने लगे तो ये आने वाले समय में ये देश 'आर्यावर्त' की शक्ल ले सकता है।

फ़िल्म में आर्यावर्त देश की कहानी कही गई है। जो आज से करीब 30 साल आगे की कहानी है। ये एक काल्पनिक देश की कहानी जरूर है लेकिन फ़िल्म पूरा संकेत देती है कि ये कहानी भारत देश ही है, जहां डायनामाईट लगाकर ताजमहल गिराया जा रहा है। जहाँ आर्ट, कल्चर, सिनेमा में पाबंदी की बात हो रही हैं, क्योंकि ये चीजें टाइम और दिमाग दोनों खराब करती हैं और जहां 'घर वापसी' कराई जा रही है।

फ़िल्म में सभी कलाकारों की अदाकारी उम्दा है। लीड रोल में हुमा कुरैशी की अब तक के अपने करियर में सर्वश्रेष्ठ हैं। दीपा मेहता ने पहले दो एपिसोड डायरेक्ट किए हैं। निश्चित ही ये फ़िल्म की जान है। फ़िल्म देखी जानी चाहिए।

कबीर सिंह हीरो नहीं है, कोई बात नहीं, उसे एक किरदार तो मानिए

सेक्स के लिए आमत्रंण देने वाली लड़की(लड़के के कथनानुसार) के साथ रेप की कोशिश करने वाला, सेक्स की तड़प खत्म करने के लिए अंडरवियर में बर्फ उड़ेल लेने वाला, हर तरह के नशे में डूबा रहने वाला, अपनी प्रेमिका को रेस्पेक्ट न देने वाला, हमारा हीरो नहीं हो सकता, बिल्कुल नहीं हो सकता।

ठीक है कोई दिक्कत नहीं। मत मानिए उसे हीरो। पर वो एक किरदार तो है। उसे एक किरदार की तरह तो देखिए। और क्यों चाहिए आपको हर फिल्म में हीरो। बिना हीरो के फ़िल्म नहीं देख पाएंगे आप? आप ऊब नहीं गए हिंदी सिनेमा के साफ सुथरे और परफेक्ट हीरो से?

उबकाई नहीं आती आपको सालों, दशकों से नैतिकता में लिपटे नायक को देख देखकर। बनावटी कृत्य करते देख जी नहीं करता ऐसा किरदार प्रोटोगेनिस्ट के रूप में पर्दे में दिखे जो अपनी बुराइयों और सीमाओं के साथ जीए। हर जगह वो आदर्श नहीं हैं, वो हर काम वैसा नहीं करता जो सामाजिक रूप से सही हो। तो कभी कभार ऐसे किरदारों से भी काम चला लीजिए जो हमारे जैसे हैं..

और फिर हिंदी सिनेमा से आदर्श नायक हमेशा के लिए चले थोड़ी गए। नावो मर गए हैं न ही कोमा में हैं। अपनी प्रेमिका ऐश्वर्या को असल जिंदगी में मारने वाले सलमान कहीं चले नहीं गए। वो यहीं हैं और 'बनावटी' भारत जैसे किरदार करते रहेंगे।

यही पर बच्चन भी हैं, बाकी कपूर्स और खान भी। फिर अक्षय तो हैं ही। शाहरुख भूखों मर जाएंगे लेकिन अंडरवियर के अंदर बर्फ डालने वाला सीन नहीं करेंगे। क्योंकि उनकी इमेज किरदार से भी बड़ी है और दर्शकों को शायद उनके किरदार से मतलब भी नहीं।

कबीर सिंह को एक किरदार के तौर पर देखा जाना ही उसके साथ न्याय होगा। यदि आप यहां भी हीरो वाले Do,s और dont लगा देंगे तो मुश्किल होगी...उसके लिए भी और आपके लिए भी..

अगर प्रेम के तौर तरीकों में भी स्त्रीवाद खंगालिएगा, तो उस सेक्स पोजीशन का भी रिव्यू कीजिए जिसमें स्त्री नीचे है...

कबीर सिंह फ़िल्म के साथ कुछ स्त्री विमर्श की बातें भी समीक्षा के साथ सुनने को आ रही हैं, आपको भी मिली होंगी। आपत्ति इस बात पर है कि फ़िल्म का हीरो पूरी फिल्म में हीरोइन को 'अपनी बंदी' कहता है। इंटरवल के ठीक पहले का एक सीन भी दिक्कत पैदा कर रहा है जहां हीरो उसे थप्पड़ मारता है और कहता है कि उसकी कॉलेज में सिर्फ यही पहचान है कि वो उसकी बंदी है...आइए इस पर कुछ बातें करते हैं।

कबीर सिंह जिस अर्जुन रेड्डी फ़िल्म की कलर जिरोक्स है वो प्रेम में डूबी हुई एक फ़िल्म है। दो इंसान(लड़का या लड़की नहीं) एक दूसरे के बिना जिंदगी जीने की कल्पना नहीं कर सकते नहीं फर्क पड़ता कि वो दोनों अलग अलग तरह के इंसान हैं। एक अति डोमनेटिंग और प्रतिक्रियावादी और दूसरा हर हालात से एडजेस्ट कर लेने वाला। तो क्या दिक्कत ये है पहले वाला लड़का है?

प्रेम करने के सबके अपने अपने स्टाइल और रिजर्वेशन होते हैं। इश्क़ करने का कोई तयशुदा मैथमेटिकल या फाइनेंसियल फार्मूला नहीं है कि उसमें 44% प्यार हो, 17% फिजिकल अट्रैक्शन हो, 20% या उससे अधिक की रेस्पेक्ट हो, बाकी बचे 100 फीसदी में कुछ चीज़ें मिसलेनियस हों। जिसमें हॉबी मैच करना, एक दूसरे की फैमली को रेस्पेक्ट देना या सोशल मीडिया पर एक दूसरे को सपोर्ट करना शामिल हो सकता है। प्रेम, प्रेम है, ये कंडीशन नहीं मांगता। अर्जुन रेड्डी हो या कबीर सिंह दोनों किरदार ये बता लेते हैं कि यहां प्रेम की मात्रा उचित से भी ज्यादा है। प्रेम के शुरू के दिनों में और किसी और चीज़ की जरूरत भी नहीं लगती..

चलिए दोनों के थप्पड़ गिनते हैं

पूरी फिल्म में हीरो, हीरोइन को एक थप्पड़ और हीरोइन हीरो को तीन थप्पड़ मारती है। चर्चा सिर्फ पहले वाले थप्पड़ की है। यानी जिनको ऐतराज है वो इस बात में है कि प्रेम में जो न्यूनतम 20% की 'म्यूच्यूअल रिस्पेक्ट' होनी चाहिए वो नायिका को नहीं मिल मिली। कोई पुरुष भला ऐसे कैसे कर सकता है? डर ये दिखया गया कि लड़के अब लड़कियों को प्यार में रिस्पेक्ट करना बंद कर देंगे और स्त्री के ग्राफ में गिरावट होगी।

ऐसी दर्जनों हिंदी या रीजनल फिल्में होंगी जिसमें किसी कॉलेज की सबसे हॉट और खूबसूरत लड़की पर एक साधारण सा लड़का मर मिटता है। लड़की अपनी उन खूबियों के रिज़र्वेशन पर इतराती है, उसे अपनी स्ट्रेंथ पता होती है और लड़के के लिमिटेशन भी। वो लड़के को उसकी औकात बताते हुए चलती है लेकिन फाइनली प्यार कर लेती है। तो इस पर तो पुरुषों को आपत्ति होनी चाहिए थी क्योंकि रेस्पेक्ट का 20% वाला पैरामीटर यहां भी ब्रेक हो रहा था।

एक और सीन पर ऐतराज है। यहां लड़का अपनी प्रेमिका को टैडी बियर टाइप की लड़की से दोस्ती करने के लिए कहता है क्योंकि वो ज्यादा 'रिलायबल' होती हैं, इस सीन पर दिक्कत स्वाभाविक है, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि कबीर सिंह मूलतः एक तेलुगू फ़िल्म है। जहां के सिनेमा में मोटापा, हकलाहट, तोतलाहट और यहां तक कि गैस पास करने पर हास्य निकालने की कोशिश की जाती है। शायद वो दर्शक इसके आदी हैं और उन्हें अब ये यूज़ड्ड टू लगता है। साउथ की तमाम सारी हिंदी रिमेक में भी शरीर पर टिप्पणी करके हंसी पैदा करने वाले सीन देखने को मिले हैं। इन फिल्मों की सफलता ये बताती है दर्शकों को शायद ये अटपटा नहीं लगता। शायद ये सोचकर हिंदी वर्जन में भी इसे हटाया नहीं गया।

कम सुंदर और ज्यादा सुंदर लड़कियों की दोस्ती ज्यादा दिखती भी है, वो शायद एक दूसरे से असुरक्षित महसूस नहीं होती हैं। सम्भव है निर्देशक ने वो सिरा पकड़ने की कोशिश की हो। पुरुषों में शायद ऐसा नहीं होता। मेरे कई खूब मोटे और खूब दुबले दोस्त हैं। मैंने उन्हें इस नजरिए से नहीं देखा। जैसा अभी मैं मोटा हो रहा हूँ तो क्या मैं कुछ दोस्त खो दूंगा?

क्या इतना प्रभावित करती हैं फिल्‍में?

मैं गहराई से ये बात मानता हूं कि आम दर्शक फ़िल्म के बारे में सिर्फ तब तक सोचता है जब तक कि वो हॉल के उस अंधेरे से अपने वाहन तक जाने के लिए सीढ़ियां उतर रहा होता है। इसके बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। वो फ़िल्म और हकीकत को अलग करके चलता है। यदि ऐसा न होता तो नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक हिंदी सिनेमा की सबसे सफल फ़िल्म होती। तो कबीर सिंह की आलोचना कीजिए पर स्त्रीवाद का एंगेल मत तलाशिए। यहां पर दो लोग प्रेम में हैं वो उनकी समझ है कि वो कैसे एक दूसरे के लिए डील करें। प्रीति के लिए कबीर उसका प्रेमी है, पुरुष नहीं है। ऐसे ही कबीर के लिए प्रीति सिर्फ वो इंसान है जिससे वो बेइंतहां प्रेम करता है। प्रेम में स्त्रीवाद मत डालिए नहीं तो बन्द कमरे में हर रोज प्रोटोकॉल टूटेंगे। आप कहां तक उन्हें डिफेंड करेंगे...

यह फिल्म मुझे हीन भावना के गहरे समंदर में ले जाती है

सरकारी स्कूल में पढ़े होने की वजह से स्टूडेंट ऑफ ईयर की दूसरी किश्त मुझे समझ नहीं आई। फिर जैसे-जैसे समझ में आती गई मैं कुंठित होता गया।  शारीरिक रूप से मेरा कद, काठी, ऊंचाई, लम्बाई, वजन, सीना, हाथ, पैर, गला, कंधे, पीठ अभी भी उन स्टूडेंट्स से कमजोर हैं जो फ़िल्म में दिखाए गए हैं। वो सभी स्कूल स्टूडेंट थे। मुझे स्कूल छोड़े 18 साल हो गए हैं। तब ये हालत है। उनके बारे में कुछ भी लिखते समय मेरे हाथ कांप रहे हैं।

पूरी फिल्म के दौरान मैं लगातार शर्मिंदा महसूस करता रहा। 12th स्टैंडर्ड के लड़के इतना अच्छा नाच लेते है, 8 से 12 पैक तक बना लेते हैं, दौड़ लेते हैं, एक साथ दो तीन प्रेम कर लेते हैं, इतने बार बदलकर कपड़े पहनते हैं ये सब मेरे जैसे सभी लड़कों के लिए हीन भावना पैदा करने वाला था। मैं बहुत निराश हूं।

लेकिन खुद से ज्यादा निराश हूं फ़िल्म के निर्देशक पुनीत मल्होत्रा के लिए। पुनीत ने इसके पहले आई लव हेट स्टोरी और गोरी तेरे प्यार में जैसी असफल फिल्में बनाई हैं। दोनों ही फिल्मों में इमरान खान थे जो अब इंडस्ट्री से बाहर हो चुके हैं। करन जौहर पिछले कुछ सालों से नए लोगों को मौका देते रहे हैं लेकिन पुनीत नए नहीं थे। न ही स्टूडेंट ऑफ नई फिल्म थी। इस फ़िल्म से डेब्यू करने वाले आज बॉलीवुड को लीड कर रहे हैं। वो याद रखने वाली फ़िल्म थी। एक ब्रांड फ़िल्म थी।

ये फ़िल्म बेहद कच्ची और प्रिडिक्टेबल फिल्म है। ये उनको अच्छी लग सकती है जिन्होंने इसके पहले फिल्में नहीं सिर्फ टीवी सीरियल देखे हों। टाइगर श्राफ की अपनी फैन फॉलोइंग है। पता नहीं इसमें उन्होंने खुद को क्यों खपाया? शायद बड़े बैनर के लोभ में।

फ़िल्म में ट्रेडिशनल के अनुसार ही 2 लड़कियां हैं। इसमें Ananya Pandey याद रह सकती हैं। आप फ़िल्म देख सकते हैं, पर उसमें मेरी तरह शर्मिंदा होने के खतरे भी है