Friday, February 24, 2017

'रंगून' को खराब कहना अपराध होगा, पर हुजूर ये अच्छी भी नहीं है...


फिल्मी बिरादरी में इमेज की अपनी एक कीमत होती है। इमेज बन जाए तो उसको तोड़ना मुश्किल और इमेज को बचाकर रखना भी मुश्किल। विशाल भारद्वाज की हिंदी सिनेमा में एक इमेज है। रंगून जब शुरू होती है और आगे बढ़ती है तो फिल्म के साथ-साथ विशाल की इमेज दर्शक के साथ चल रही होती है। दृश्य कहीं औसत तो कहीं बेहतर होते हैं लेकिन विशाल की इमेज उन सबके ऊपर होती हे। हम इस फिल्‍म को विशाल की फिल्म के रुप में देख रहे होते हैं। वो विशाल जो मकबूल, ओमकारा और कमीने में हमें प्रभावित करते हैं और हैदर आते-आते चमत्कृत।

रंगून जैसे जैसे आगे बढ़ती जाती है दर्शक फिल्म के बेहतर होने का इंतजार करते जाते हैं। कुछ अच्छे दृश्य आते हैं और हमें लगता है कि अब कुछ होने वाला है लेकिन ये दृश्य लौट जाते हैं। 'अब कुछ होने वाला है' की फीलिंग के सा‌थ इंटरवल आ जाता है। ये फिल्म इंटरवल तक अपना इरादा जाहिर नहीं कर पाती। इरादा यूं कि उसे कौन सा पक्ष हाईलाइट करना है और किसे ब्लर। ये एक उपन्यास जैसी लगती है जिसका कोई मध्यांतर या क्लाइमेक्स नहीं होता। जहां पर चाहे पन्ने का एक किनारा मोड़ कर रख दें।

हां, इंटरवल तक किरदार जरुर याद रह जाते हैं। किरदार जो बहुत ठहरकर लिखे गए हैं और उन्हें स्टेबिलिस भी किया गया है। किरदारों के साथ फिल्म गाने न सिर्फ इतने अच्छे लिखे गए है बल्कि तहजीब से गाए भी गए हैं। अच्छा अभिनय, बड़ा बैकड्रॉप, बेहद सुंदर कैमरा वर्क, शानदार लोकेशन ये सब कुछ फिल्‍म के मेन्यू में है लेकिन में वह गोंद ‌थोड़ा कम है जो एक निर्देशक या उसकी फिल्म को दर्शक के साथ जोड़ता है।

इंद्र कुमार गुजराल एक बात कहते थे। वे कहते थे कि एवरेस्ट में चढ़ने का मतलब वहां पर टेंट लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। हमें वहां पहुंचकर उतरना भी होता है। रंगून, फिल्‍म ये बताती है कि ये विशाल की उतार वाली फिल्म है। हो सकता है कि वह फिर कभी चढ़ें।  फिल्म का कैनवास बड़ा है। इतना बड़ा कि हम दर्शक उसे संभाल नहीं पाते। फिल्म में प्यार है पर वह गहरा होते-होते इतना भारी हो गया है कि हम उससे जुड़ नहीं पाते। फिल्‍म में देश प्रेम है लेकिन वह उस स्टाईल का है कि हम उससे खुद को कनेक्ट नहीं कर पाते। फिल्म में जन गण मन है लेकिन हमें हम उस पर खड़े नहीं हो पाते। फिल्म के गाने सम्मोहक हैं लेकिन जहां पर आए हैं वह आंखों को रास नहीं आते।

कई जगहों या दृश्यों में  यह फिल्म, फिल्म कम निर्देशक की बौद्विक जुगाली ज्यादा लगती है। बौद्विक जुगाली जिसे समय-समय पर हर स्टेबलिस निर्देशक करते हैं। एक नजरिए से अनुराग कश्यप की फिल्म बांवे वेलवेट क्रिएशनके स्तर पर बुरी फिल्म नहीं थी लेकिन वह दर्शकों से कनेक्ट नहीं पैदा कर पाई। कनेक्‍शन का यही तार रंगून में भी ढीला है। इस तार को जिस पेंचकस से कसते हैं वह पेंचकस विशाल के पास है। शायद वह इसे फिर कसें। विशाल की इस फिल्म की बुराई करना एक अपराध जैसा लगता है, पर माफ करें यह एक अच्छी फिल्म भी नहीं है। और प्लीज ये फिल्मों में बार-बार जनगण मन दिखा-सुनाकर जबरन देश प्रेम मत पैदा कीजिए। हम पहले से ही देश प्रेम में ओवरलोडेड हैं...



Saturday, February 11, 2017

सलमान को कभी एक शाम कुमुद मिश्रा के साथ शराब पीते हुए बितानी चाहिए...


जावेद अख्तर कहते हैं कि क्रिएटिव काम दो तरह के होते हैं। पहले काम में इंसान काम कर-करके भरता जाता है और दूसरे काम में खाली होता जाता। फिल्म का निर्देशन दूसरे तरह का काम है और लेखन पहले तरह का। जॉली एलएलबी 2 सुभाष कपूर की फिल्म है। जिन्होंने जॉली 1 देखी है वह जावेद अख्तर की इस बात से सहमत होंगे। जॉली एलएलबी 2 खराब फिल्म नहीं है लेकिन यह फिल्म सीक्वल का वैसा जादू नहीं रच पाती है जैसा तनु वेड्स मनु करती है। तनु वेड्स मनु अपने हिट हो चुके जॉनर से निकलकर एक अलग क्राफ्ट बनाने का प्रयास करती है। उन्हीं कलाकारों की उन्हीं स्टाईलों के साथ। सुभाष कपूर वैसा नहीं करते हैं। वे फिर से उस कोर्ट रुम ड्रामा का दोहराते हैं‌ जिसे वह जॉली 1 में बहुत शानदार तरीके से दिखा चुके होते हैं। वह वकील बदलते हैं, शहर बदलते हैं , विषय बदलते हैं पर स्टाईल और फिल्म को पकड़ने का अंदाज नहीं बदलते। एक लाइन में कहें तो वह हिट हो चुका अपना कंफर्ट जोन नहीं बदलते, उसी को फ्राई राइस की तरह फिर से तलने का प्रयास करते हैं।

इंटरवल के बाद के कोर्ट रुम दृश्यों को हटा दें तो जॉली 2 एक औसत फिल्म है। फिल्म अपने को स्‍थापित करने में इंटरवल तक का समय ले लेती है। इसके बाद फिल्म बेहतर होती है। कोर्ट रुम के ड्रामें हमें हंसाते हैं। दोनों वकीलों की बहसें हमें कोई एक पाला चुनने के लिए प्रेरित करती है। हर वकील के पास अपने प्रभावी तर्क होते हैं। लेकिन जैसे ही यह फिल्म तर्क-वितर्क करने के ठेठ तरीके की तरफ बढ़ती है हमें पुरानी फिल्म की याद आने लगती है। अक्षय कुमार और अन्नू कपूर इस नई फिल्म में अरशद वारसी और बोमन ईरानी को रिप्लेस करते हैं। सभी कलाकार समृद्घ हैं लेकिन पता नहीं क्यों राजपाल बने बोमन ईरानी बार-बार याद आते हैं।


इस नई फिल्म में उनका बार-बार याद आना इसलिए भी लाजिमी था क्योंकि सुभाष कपूर ने फिल्म में वकील और शहर तो बदले थे लेकिन फिल्म को पकड़ने का अंदाज हूबहू वैसा ही रखा था। जज वही होता है और कुछ अलग करने के चक्कर में ज्यादा ड्रामेटिक हो जाता है। सौरभ शुक्ला में अभिनय की बहुत बड़ी रेंज हैं लेकिन जब वह प्रमोद माथुर को चुप होकर बैठाते हैं तो वह लगभग खुद को रिपीट करते हुए दिखते हैं। चश्में को उतारने चढ़ाने, कागज पढ़ने, उस पर कुछ लिखने का अंदाज हूबहू वैसा है। "माथुर साहब मैं एलाऊ कर रहा हूं ना बस बात खत्म" वाला डायलॉग, "राजपाल साहब मैं एलाऊ कर रहा हूं ना" कि खराब फोटोकॉपी लगता है। दृश्य अच्छा है पर हम देख चुके हैं। एक अच्छे निर्देशक से उम्मीद होती है कि वह कलाकार को भी उसके कंफर्ट जोन और स्टाईल से बाहर निकाले।

जॉली 2, दर्शकों को जोड़ने के लिए हिंदू, मुस्लिम, आतंकवाद, आतंकवाद पर सही गलत-गलत जैसे फिल्मी और टची मुद्दे का सहारा भी लेती है। दर्शक जब कुछ ही देर पहले जन गण मन करके ही बैठा हो तो वह जाहिर है कि देश के सेंटी ही होगा। चुनाव चल रहे हैं तो हिंदू-मुसलामन भी उसके दिमाग में घुसा ही है। सुभाष आतंकवाद और ‌हिंदू-मुसलमान के मुद्दे पर सेंटी हो जाने को फिल्म में भुनाने का प्रयास करते हैं। पिछली फिल्म में ये टोटके प्रयोग में नहीं आए थे। वहां बस तर्क ही आपको सही या गलत के पाले में खड़ा करने के लिए काफी थे।

फिल्म में अक्षय कुमार अच्छा अभिनय करते हैं। कॉमेडी के दृश्यों में  उनका हाथ मजबूत है। कॉमेडी वाली टाइमिंग वे यहां भी प्रयोग करते हैं। अन्नू कपूर एक बेहतरीन अभिनेता है लेकिन फिल्म में वे वहां नहीं पहुंच पाते जहां जॉली 1 में बोमन पहुंच चुके होते हैं। सह कलाकारों का चयन भी अच्छा है। कुमुद मिश्रा हर तरह के रोल में खुद को कैसे फिट कर लेते हैं कभी मौका मिले तो सलमान खान को उनके पास बैठकर दो चार पैग पीते-पीते यह बात पूंछनी चाहिए। 

Sunday, December 25, 2016

दंगलः ये हमारे पापाओं और डैडियों की भी कहानी है, भले ही हम गीता-बबिता नहीं थे...



मैं दसवीं में था और उन दिनों मेरे पापा के पास रेड चीफ की एक पुरानी सैडिंल हुआ करती थी। भूरे कलर की उस सैंडिल का शेप बिगड़ चुका था। पापा अब उसे पहनते नहीं थे। वह अब दूसरे कामों में आ रही थी। जब मैं पढ़ता तो मेरे बैठने के बगल में ही वह सैंडिल रखी होती। रेड चीफ की उस सैंडल से मानों सैकड़ों मर्तबा मार खाई है। सुबह के 6 बजे भी और रात के 11 बजे भी। पापा जब मारते तो बहुत मारते। वह जाड़ा गर्मी और बरसात का अंतर न करते।  पढ़ाई में मेरा मन तब नहीं लगा जब उसमें लगाने की जरूरत थी। पापा मेरे फोकस न करने से चिंतित थे और हर बाप की तरह चाहते थे कि मैं इतना काबिल तो बन ही जाऊं कि रोटी कमा सकूं। पापा का सपना मुझे गोल्ड मेडल जितवाना नहीं था और न ही कोई अपने कोई अधूरे सपने मुझ पर थोप रहे थे। पर एक संतान के भविष्य के साथ उनका जुड़ाव दंगल के महावीर फोगाट से कम नहीं था। ये मेरी नहीं हर मध्यमवर्गीय बेटे और पिता की कहानी होगी या हो सकती है। हमारे पिता महावीर फोगाट ही थे हम भले ही गीता या बबिता न बन सके। 

दंगल फिल्म वाकई गीता-बबिता की  फिल्म नहीं है। ये एक पिता की फिल्म है। उसकी कमजोरी और आशाओं की फिल्म है। आमिर अपनी फिल्‍मों में वैसे भी खुद को लगातार पर्दे पर ना दिखाने के समर्थक होते हैं इस बार वह गौण रहकर भी फिल्म के नायक होते हैं। क्लाइमेक्स के उस सीन में जहां गीता गोल्ड के लिए लड़ रही होती हैं, कैमरा, गीता और हमारा मन आमिर को खोज रहा होता है। गीता ने भले ही देश के लिए गोल्ड जीता हो लेकिन दरअसल वह गोल्ड अपने बुढ़ा रहे पिता के लिए जीत रही होती है। एक फिल्म के रुप में दंगल एक मजबूत फिल्म है। पर फिल्म से ज्यादा यह एक पिता और बेटी के संबंधों का सत्य दस्तावेज है। फिल्म बिना प्रगतिशील हुई बाप-बेटी के इन संबंधों को हमारे सामने रखती है। दर्शक के रुप में अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम कौन सा हिस्सा पकड़े और किसे जाने दें...

जिस दौर में मैं या मेरी उम्र के लोग बड़े हो रहे थे उस दौर में हमारे पिता हमारे दोस्‍त नहीं हुआ करते थे। जिंदगी को थोड़ा और पीछे ले जाएं तो पिता को दरअसल पुत्र का विरोधी सा माना या देखा जाता है। पिता यानीकि उसके हर शौक और इच्छाओं का विरोधी। पिता और पुत्र आपस में बात नहीं करते थे। आदेश दिए और लिए जाते थे। पिता और पुत्र के बीच का शारीरिक स्पर्श सिर्फ पैर छूने के दौरान होता था। मेरी उम्र् लगभग  15 साल थी। मैं कानपुर रेलवे स्टेशन पर किसी ट्रेन के इंतजार में था। एक पिता और पुत्र मेरे बगल में आकर खड़े होते हैं। 23 या 24 साल की उम्र का लड़का अपने पिता को डैड कह रहा  था। पिता पुत्र की वह जोड़ी प्लेटफार्म पर बेंच पाने की आश में थोड़ा मूव करती है। कुछ कदम चलने के बाद पिता अपने हाथ बेटे के कंधे पर दोस्त के अंदाज में रख लेता है। बाप अपने बेटे के कंधे पर भी हाथ रखकर चल सकता है यह मेरे लिए नया अनुभव था। फिल्मों में उस समय अमीर घरानों के बेटे-बेटियां अपने पिताओं को डैड या डैडी कहकर बुलाते थे। ये निष्कर्ष निकालकर की अमीर पिता और बेटे के बीच संबंध ऐसे ही होते होंगे मैंने अपना फोकस इस बात से हटा लिया था। दंगल, सालों पुरानी उस छोटी सी बात को ताजा करती है। 

दरअसल दंगल की सबसे बड़ी खूबी बेटी और बाप के खुरदरे संबंध ही हैं। एक बाप जो अपने बेटियों से मजाक नहीं करता, उनके साथ हंसता नहीं, गले लगाकर उन्हें शाबासी नहीं देता है। उनसे उतनी ही बात करता है जितनी करनी बेहद जरुरी है।  जिस परिवेश से फोगाट आते हैं ऐसा होने स्वाभाविक भी था। बेटे होने के लिए पुत्र जाप के लिए तैयार हो जाने वाले फोगाट से उम्‍मीद भी इससे ज्यादा नहीं होती। फिल्म की खूबसूरती यही है कि वह रियल रहती है। फोगाट को जबरन प्रगतिशील नहीं बनाया गया। फोगाट तब बनावटी जरुर लगते हैं जब वह सीढ़ियों में बैठकर अपनी बेटी को स्‍त्री सशक्कतीकरण की शिक्षा दे रहे होते हैं। फिल्म में आमिर खान की वह स्पीच गैर जरुरी लगी। फोगाट अपनी बेटियों को इसलिए आगे लेकर नहीं आए थे कि वह स्‍त्री सशक्कतीकरण में अपना हाथ बंटाना चाहते थे। 



  मैंने अपने जिंदगी में बहुत कम ऐसे बाप देखे हैं जो किशोरी से जवां हो रही बेटियों से खुलकर बात करते हैं। जब मैं यह बात लिखकर रहा हूं तो मेरे दिमाग में निश्चित ही 2016 न होकर 2000 के आसपास का कस्बाई माहौल है। अपवाद को छोड़कर मध्यमवर्गीय संस्कार में जी रहे किसी पिता को अपने बेटी को गले लगाते नहीं देखा है।  फोगाट इस परंरपरा जो कि एक संस्कार से लगती है का निर्वाह करते हैं। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहां दर्शकों को लगता है कि अब बेटी फोगाट के सीने से लग जाएगी। ऐसा कई जगह पर हुआ पर ऐसा होता नहीं है। फोगाट गोल्‍ड जीतने वाली बेटी से गले न लगकर उसका हाथ से मेडल लेकर उसे देखते हैं। यह बेहद अटपटा तो है लेकिन रियल है। यही ईमानदारी दंगल की खूबसूरती है। 

 दंगल खुद को फिल्म बनाने की बहुत कोशिश नहीं करती। बॉयोपिक फिल्में कई बार इस उपापोह से जूझती हैं कि उन पर छेड़छाड़ करने का आरोप भी न लगे और सिनेमा भी सधा रहे। किसी एक की जिंदगी में इतना मसाला कभी नहीं होता कि उस पर एक मुक्कमल फिल्म बना दी जाए। फिल्म बनाने के लिए फिल्मी होना पड़ता है। दंगल भी कई जगह पर फिल्मी हुई है पर उसका फिल्मी होना अच्छा लगता है। कोचिंग एकेडमी पहुंचने के बाद गीता का बदलाव और पिता के रुप में इसकी कुढ़न फिल्म का सबसे बेहतर हिस्सा है। आमिर और उस नई नवेली लड़की दोनों ने ही इस बदलाव को शानदार तरीके से पर्दे पर उकेरा है। 

यहां फोगाट हमारे पारंपरिक पिताओं से अलग हटते हैं। आमतौर पर एक पिता अपने आप को तब पीछे खींचने लगता है जब  उसे लगता है कि उसकी संतान उससे ज्यादा काबिल हो रही है। दोनों की काबलियतों के बीच कभी मुकाबला नहीं होता। कहावत भी है कि संसार में सिर्फ बाप का ही एक रिश्ता ऐसा होता है जो यह चाहता है कि उसका बेटा उससे भी ज्यादा काबिल हों। यहां फोगाट बेटी की तरक्की से बहुत सहमत नहीं होते। यह जानते हुए भी कि बेटी कुछ नया सीख रही है। 

चूंकि फिल्म आमिर खान की होती है इसलिए कुछ समय के लिए बेटी को 'भटक गई' के रुप में दिखाया जाता है। पिता को सार्वजनिक रुप से अपमानित करने के बाद जब गीता एक के बाद एक मैच हार रही होती है तो दर्शकों को एक अजीब सा खलसुख मिलता है। दर्शक तब राहत की सांस लेते हैं जब गीता को अपनी गलती मानता हुआ दिखाया जाता है। फिल्म यहां पर गीता के साथ नाइंसाफी करती है। काबिल हो जाना किसी का अपमान करना होता है। फोगाट गीता के काबिल हो जाने को अपने अपमान से जोड़ते हैं। और बाद में फिल्म इसे जस्टीफाई भी करती है। कुल मिलाकर दंगल हिंदी सिनेमा की सबसे संपन्न फिल्मों में से एक है। जिसे एक जरुरी काम की तरह देखा जाना चाहिए। 








Saturday, July 26, 2014

साजिद-सलमान तुमको हिंदी सिनेमा माफ करेगा...?

 
किक फिल्म में सलमान की एंट्री एक ऐसे दुर्लभ वाहन से होती है जो पीछे से कार और आगे से मोटरसाइकिल जैसा दिखता है। इसमें वह अपने एक दोस्त की भगाकर शादी करा रहे होते हैं। बैकग्राउंड दिल्ली का होता है और सलमान का पीछा तलवार लिए हुए कुछ मूंछधारी लोग कर रहे होते हैं। यह सीन करीब 10 मिनट से अधिक समय का है। इस दौरान सीट पर पीछे बैठे दूल्हे की मूंछे तलवार के हमले से कट जाती हैं और यह मूंछे पता नहीं कैसे बाइक चला रहे सलमान खान को चिपक जाती हैं। मूंछे लगे सलमान को देख एक युवक उन्हें चुलबुल भईया कहता है और पीछे से दबंग फिल्म की परिचित सी टोन बजती है। इस सीन पर मल्टीप्लेक्स में बैठे ज्यादातर लोग हंस रहे होते हैं। रात का शो है ‌इसलिए ज्यादातर लोग सपरिवार हैं। बच्चे भी खुश, मम्मी भी खुश और इन सबकी खुशी में पापा भी खुश। कोशिश तो करता हूं कि मैं भी हंसू..

इस सीन के बाद कुछ और सीन हैं। जिसमें सलमान रेस्टोरेंट में बैठे लोगों को उनके अच्छा होने का कर्तव्य याद दिलाते हुए गुडों के साथ उनकी भी पिटाई करते हैं। इस सीन से यह साफ किया जाता है सलमान साहसी होने के साथ-साथ नेकदिल और दूरदर्शी भी हैं। साथ ही समाज के प्रति जवाबदेह भी। यू ट्यूब पर इस सीन को देखकर नायिका उनसे प्यार कर बैठती है और इसके बाद एक गाना होता है जिसे सलमान ने ही आवाज दी है। नायिका इस समय विदेश में है और सलमान के बारे में यह कहानी खुद को देखने आए एक लड़के को सुना रही होती है। इसी बीच एक छोटे से फ्लैशबैक में सलमान के पैदा होने, उनके तेज दिमाग का होने और रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस होने को कॉर्टून के जरिए दिखाया जाता है। इसमें सलमान के बाली पहनकर पैदा होने, पैदा होते ही नर्स को आंख मारने बाथरूम में उल्टा होकर फारिग होने और लैपटाप को बिना देखे टाइप करने जैसे कुछ सीन दिखाए जाते हैं।

प्रेम करने के बाद उनकी प्रेमिका उन्हें कुछ न करने का उलाहना देती है। यह उलाहना सलमान को अखरती है और पैसा कमाने के‌ लिए चोर बन जाते हैं। फिल्म में उन्हें चोरी करते नहीं बल्कि चोरी करने के बाद फ्लाइओवर से उड़ते-कूदते, हवा में लहराते और स्टंट करते हुए दिखाया जाता है। उनके पीछे-पीछे पुलिस भी ऐसा करती है और लोग पॉपकॉर्न टूंगते हुए इन दृश्यों को एंज्वाय कर रहे होते हैं। आगे की कहानी सलमान को पकड़ने के लिए होती है। बीच में एक किस्सा यह जस्टीफाई करता है कि सलमान चोरी एक नेक इरादे से कर रहे होते हैं। कुछ इन्हीं दृश्यों के बीच सलमान को महान बनाती हुई यह फिल्म खत्म हो जाती है।

इंटरवल के पहले तक किक खुद को कॉमेडी फिल्म बनाकर रखना चाहती है। ऐसे कॉमेडी जो हमें साउथ की दोयम दर्जे की फिल्मों में देखने को मिलती है। मूंछों के उड़ने के साथ सलमान के जेल जाने का प्रसंग भी इन्हीं कॉमेडी दृश्यों में हैं। यदि गौर करना चाहें तो गौर करने वाली बात यह है कि जिन दृश्यों में सलमान नहीं होते हैँ वह दृश्य बेहतर लगते हैं। मसलन कहीं-कहीं संजय मिश्रा और सौरभ शुक्ला जैसे किरदार लेकिन सलमान के साथ जैसे ही इनके दृश्य होते हैं ये मंझे कलाकार भी सलमान जैसी ही घटिया ऐक्टिंग करनी शुरू कर देते हैं। उन्हें तुरंत एहसास होता है कि वह सलमान की फिल्म में ऐक्टिंग कर रहे हैं .

फिल्म का सेकेंड हॉफ थोड़ा बेहतर है। इस बार कैमरा सलमान के चेहरे पर होकर उनके कारनामों पर है। इसी बहाने रणदीप हुड्डा और नवाजुदीन जैसे कलाकारों को भी कुछ मौके मिल जाते हैँ। लेकिन सलमान का फिल्म में इतना आतंक है कि लगता है कि ये किरदार सलमान की चापलूसी कर रहे हैं। ज्यादा अच्छा अभिनय करने पर सलमान इन्हें आगे किसी फिल्म में अपने साथ नहीं रखेंगे। सलमान के साथ बैठकर शराब पी रहे रणदीप का यह सीन उसकी गवाही है। एक अच्छे अभिनेता को इस सीन में दम तोड़ते देखना दुखा भरा है। नवाज के साथ तो खैर सलमान ने स्क्रीन ही शेयर नहीं की। थोड़े से ही दृश्यों में नवाज प्रभावित करते हैं।

जो व्यक्ति फिल्म इंडस्ट्री जैसी जटिल व्यवसाय में पिछले 24 साल से सफलतापूर्वक सरवाइव कर रहा है उसका आईक्यू लेवल कम है यह कहना तो गलत होगा लेकिन यह निश्चित है कि सलमान यह जरूर मानते हैं कि देश के दर्शकों का आईक्यू लेवल जरूर कम है। वरना तुक्के से एक बार ऐसी फिल्में हिट होती हैं। वांटेड, दबंग 1, 2, रेड्डी बॉडीगॉर्ड, जय हो जैसी घटिया फिल्में लाइन से हिट नहीं होती हैं। सलमान देश के दर्शकों के बारे में सही सोचते हैं यह दर्शक बार-बार सिद्घ करते हैं।

हॉलीवुड की हिट एक्‍शन फिल्मों की सीरिज देखकर बड़ी हुई नई पीढ़ी को यह फिल्म देखकर कायदे से तो उल्टी आने चा‌‌हिए लेकिन ऐसा होता नहीं। वह खुश दिखते हैं और उनकी खुशी ट्वाइलेट से लेकर पॉपकॉर्न खरीदने के लिए लगी लाइनों तक में दिखती है। जब हिंदी सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें किक निश्चितरूप से नहीं होगी लेकिन किक उन फिल्मकारों को जरूर हतोत्साहित करेगी जिनके पास कुछ अदद अच्छी कहानियां हैं और वह प्रोड्यूसरों के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन अब प्रोड्यूसर खुद निर्देशक बन रहे हैं और फिल्म को 30 करोड़ की ओपनिंग मिल रही है।

साजिद नाडियवाला उस अपढ़ व्यवसायी की तरह फिल्म निर्देशित करते हैं जिसके पास पैसा आ जाने के बाद वह प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज खोलकर लोगों को शिक्षा के मायने समझा रहा होता है। एक बात जो बिल्कुल समझ में नहीं आती कि वंस अपॉन ए टाइम और डर्टी पिक्चर में संवाद लिखने वाले रजत अरोडा़, चेतन भगत जैसे प्रतिभावान के सा‌थ मिलकर भी याद रखने वाले डायलॉग नहीं लिख पाए। जबकि उनके साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी साजिद भी थे।

Monday, July 14, 2014

आपने खुद से पूंछा है कि आपको 'हम्टी' क्यों अच्छी लगी?


हम्टी शर्मा की दुल्हनियां इस बात को दिखाने में अतिरिक्त कोशिश करती हुई पकड़ी जाती है कि वह 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' का रीमेक नहीं है। इसके लिए सुविधानुसार यह फिल्म कई जगहों पर उसकी खिल्ली भी उड़ाती है, लेकिन ऐसी खिल्ली कि बस दर्शक हंसे, बाकी निर्देशक उस फिल्म को गॉर्ड ऑफ ऑनर देता नजर आए। डीडीएलजी ओवरऐक्टिंग और भावुकता के अतिरेक से भरी एक ऐसी ड्रामा फिल्म है कि जिसका हर सीन उसकी खिल्ली उड़ायी जाने की गुंजाइश छोड़ जाता है। राज और सिमरन की मोहब्बत के साथ बाबूजी के 'संस्कारों' और 'वचनों' पर भी लुत्फ लिए जाते रहे हैं। कभी फिल्मों में तो कभी ट्वीटर पर बने चुटकुलों पर।

लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी हिंदी सिनेमा के कई महान निर्देशक गाहे-बगाहे डीडीएलजी बनाने का प्रयास करते पाए जाते हैं। उनको जब मोहब्बत सूझती है तो वह दिल्वाले दुल्हनियां बनाते पाए जाते हैं। इसमें वह कुछ अपनी भी होशियारी जोड़ते हैं। ताकि उनकी फिल्म आज की फिल्म लगे और राज-सिमरन की मोहब्बत में प्रैक्टिकली जान पड़े। हम्टी शर्मा की दुल्हनियां भी एक ऐसी ही कोशिश है। शायद इन्हीं कोशिशों में काव्या और हम्टी के दो-तीन चुंबन सीन और एक बेडरूम सीन रखा गया है। आलिया हॉट हैं जो निश्चित रूप से काजोल नहीं थीं।

करण जौहर की फिल्‍मों की पहचान बन गए गे चरित्र इस फिल्म में भी आपको सताते हैं। फिल्म का एक सीन जहां वरूण धवन बिस्तर पर सेक्स आसन और सेक्स के दौरान निकलने वालों आवाजों की मिमिक्री कर रहे होते हैं वहां यह फिल्म दिबाकर बनर्जी की फिल्म 'लव सेक्स और धोखा' की याद दिलाती है। लेकिन यह सीन उस बचकानी डीडीएलजी को फिर महान बना देती है यह बताने के साथ कि मूल फिल्म बनाना कितना कठिन होता है।

फिल्म का मूल ढांचा कॉमेडी है। यदि फिल्म से कॉमेडी का डीएनए निकाल लिया जाए तो वह चंद मिनट ही होंगे जहां काब्या और हम्टी हमको अपनी मोहब्बत से सम्मोहित कर पाते हैं। जैसे-जैसे हम पर प्रोफेशनल और प्रैक्टिकल हो जाने का चस्का चढ़ रहा है वैसे-वैसे हम प्रेम कहानियों की तरफ आकृष्ट होते जा रहे हैं। लेकिन हमें मोहब्बत भी शायद हम्टी वाली ही रास आती हैं क्यों‌कि हमें 'लुटेरा' पसंद नहीं आती। शायद जो हम कर नहीं पा रहे हैं उसे पर्दे पर होते हुआ देखना चाहता है। इसे 70 के दशक में अमिताभ बच्‍चन के यंग एंग्री मैन के संदर्भ से भी जोड़कर समझ सकते हैं।

वरूण और आलिया के साथ अच्छी बात यह है कि इन्हें ऐक्टिंग करवाई जा सकती है। आलिया को शायद ऐक्टिंग से ज्यादा इस बात की फिक्र है कि वह सेक्स बम लगे और बॉलीवुड की सबसे हॉट हीरोइन कही जाएं। उन्हें भी पता है कि हर रोज किसी आलिया के इम्तियाज 'हाइवे' और कंगना के लिए विकास 'क्वीन' नहीं बनाते फिरेंगे। तब बॉलीवुड के जाने माने प्रोड्यूसरों को उनकी सेक्स अपील की अट्रेक करेगी। वरुण को चिंता नहीं करनी चाहिए। इंडस्ट्री में कई सारे वरुण सालों से हैं...

Saturday, June 28, 2014

'चचा महेश' मोहित सूरी की कुछ मदद करें


पर्दे पर प्रेम को दिखाना, खुद के जीवन में प्रेम करने से ज्यादा जटिल वस्तु है। फिर जब इसी प्रेम के न मिलने से उपजे गुस्से को दिखाना हो और मामला 'बदला टाइप' वाला हो जाए तो यह काम और भी कठिन हो जाता है। इसलिए फिल्मकार सुविधा का रास्ता चुनते रहे हैं। प्रेमी या तो प्रेम करता है या फिर किसी से बदला लेता है। दोनो काम एक साथ नहीं करता। भारत में इस‌ीलिए जो प्रेम कहानियां बनती हैं उनके विलेन बड़े चिर‌परिचित से होते हैं। अमरीश पुरी भी अंतिम सीन में "जा सिमरन अपनी जिंदगी जी ले" कहकर तालियां बटोरते आए है। लेकिन गलतियां वहां होती हैं जब हम विदेश की किसी फिल्म के क्राफ्ट को थोड़े बहुत बदलावों के साथ हिंदी सिनेमा में लागू करते हैं। यह सोचकर की लोग अब नए किस्म का सिनेमा देखना चाहते हैं। मोहित सूरी की एक विलेन यही कई सारी गलतियां करती है।

मैंने तो नहीं देखी लेकिन सुनते हैं कि एक विलेन कोरियाई फिल्म 'आई सॉ द डेविल' फिल्म से काफी हद प्रेरित है। मोहित को निश्चित ही खून करने वाले मनोरोगी का मनोविज्ञान 'फिल्मी' लगा होगा। उन्होंने सोचा होगा कि इसी के इर्द-गिर्द प्रेम की फंतासी बुन दी जाए तो दर्शकों को एक कोरियाई फिल्म के साथ यश चोपड़ा या करन जौहर की फिल्म मुफ्त में मिल जाएगी। अब उन्होंने खूनी का खून करने की जो वजहें पकड़ी है वह बेहद हास्यास्पद है।

एक विलेन की कई औसत अच्छाईयां उसके खराब क्राफ्ट के आगे दम तोड़ती रहती है। कई दृश्य इतने बचकाने हैं कि
हम किसी उत्साही सिनेमा छात्र की पहली डाक्यूमेंट्री देख रहे हैं। अच्छे गाने और बेहतर ऐक्टिंग फिल्म को बचाने का प्रयास करती है लेकिन इंटरवल के बाद यह उसमें भी नाकाम हो जाती है। एक रोमांटिक फिल्म की जरूरत यह है कि फिल्‍म में प्यार हो, प्यार दिखे, अवरोध आएं। अवरोध के तनाव को हम महसूस करें और तनाव खत्म होने पर हमें राहत लगे। ‌एक विलेन के जिस हिस्से में यह प्रेम रचा जा रहा होता है वहां हम ऐसा कुछ भी महसूस नहीं करते। प्यार दोनों कर रहे होते हैं लेकिन यह दोनों ही यह एहसास दर्शकों को नहीं करा पाते।

फिर जब यह फिल्म थ्रिलर होना चाहती है तो वह उसकी भी शर्ते और जरूरतें पूरी नहीं करती। फिल्म के पहले दृश्य में ही नायिका को मरते दिखा दिया जाता है। फिर इंटरवल आते-आते यह साफ हो जाता है कि किसने और क्यों मारा है। इंटरवल के ठीक पहले के दृश्य में बदला लेने वाला नायक उस विलेन से कहता है कि मैं तुम्हें एकदम से नहीं मारूंगा लेकिन रोज-रोज मारूंगा। विलेन तो बच जाता है लेकिन मारने की वह परिकल्पना दर्शकों को जान निकाल देती है। दर्शक "मारने के सौ तरीके" नाम की कोई फिल्म देखने नहीं गए थे।

यदि किसी ‌फिल्म से नकल करके  कोई इतने बड़े बजट की फिल्म बन रही है तो वाकई उस फिल्म में इतनी मामूली कमियां नहीं होगी जितनी एक विलेन में दिखती हैं। फिल्म में विलेन बने रितेश देशमुख का पात्र मजबूत हो सकता था बस उसे अच्छे से लिखा गया होता। बीवी से अपमान सहने वाला एंगल बहुत आलोचना की गुंजाइश रखता है। उन दृश्यों का अधकचरापन मोहित सूरी की शिकायत करता है।

सिद्घार्थ मेल्होत्रा और श्रद्घा कपूर ने अपनी सीमाओं के अनुसार अच्छी ऐक्टिंग की है। श्रद्घा तितली पकड़ने के शौक रखने के साथ कुछ फिलॉसफिकल बातें भी करती हैं। जिनसे हीरो प्रभावित होता रहता है। और क्या चाहिए। गाने नाचने वाले थे नहीं इसलिए वह नाची नहीं। सिद्घार्थ चुप रहने में अच्छे लगते हैं लेकिन उनका यह चुप रहना उनकी ठीक पहले की फिल्‍म हंसी तो फंसी में ज्यादा अच्छा लगता है। एक्‍शन के लिए हिंदी फिल्‍मों में अक्षय कुमार और सलमान खान ही काम पर लाए जाने चाहिए।

लगातार खराब फिल्मों के इस दौर में 'एक विलेन' कुछ कम खराब फिल्म कही जा सकती है। जब साजिद खान हमशक्ल की सफलता का जश्न मना सकते हैं तो मोहित शूरी इस फिल्म के बदले दो और ऐसी फिल्में बना सकते हैं। नाम '2 विलेन' और '3 विलेन' हो सकते हैं। 'महेश चचा' मोहित सूरी की कुछ मदद करें। फिल्मों में गर्मागर्म दृश्य की घोर कमी महसूस की गई। युवाओं में इस बात का रोष दिखा।

Saturday, March 22, 2014

हद है! भूत तभी आता है जब सनी लियोनी कुछ कर रहीं होती हैं


कई बार गलती से कुछ ‌अच्छी फिल्‍में बन जाती हैं। लेकिन उन्हीं अच्छी फिल्मों को यदि हम चालू फिल्‍मी फॉर्मूलों से व्हाइट वाइश करने लगते हैं यही फिल्में रागिनी एमएमएस 2 कहलाती हैं। रागिनी एमएमएस की सीक्वल फिल्म रागिनी एममएमएस 2 (दो में ज्यादा मजा) के साथ विडंबना यही है कि इस फिल्म में सभी प्रचलित और हिट फॉर्मूले डालने की कोशिश की गई है।

जो कि इसकी प्रीक्वल फिल्म में नहीं थे। पूरी फिल्म एक गणतीय फॉर्मूले की तरह चलती है। एक सेक्स सीन, एक हॉरर सीन, एक सामान्य सीन, फिर एक बाथरूम सीन और एक घटिया सा लाऊड ऐक्टिंग वाला कॉमेडी सीन। अगर फिल्म से बालाजी बैनर को हटा लिया जाए यह फिल्‍म तो यह फिल्‍म अपनी बनावट, रंग ढंग और अंदाज से एक बी ग्रेड साऊथ फिल्म जैसी लगती है।

फिल्म में सनी ‌लियोन उसी मात्रा में हैं जिस मात्रा में सिर्फ आलू की सब्जी में आलू होती है। सनी के साथ फिल्म में एक्टिंग करने के लिए जो पलटन रखी गई थी वह शायद सनी से इतनी नर्वस थी कि वह ढेर सारी ओवरऐक्टिंग किए जा रही थी। फिल्म में तमाम ऐसे सीन थे जिनकी फिल्म में कोई जरूरत नहीं थी। लोग यह दृश्य देखने के लिए गए भी नहीं थे। इस फिल्म को देख रहे लोगों की ख्वाहिश तो यह थी कि फिल्म शुरु हो और सनी लियोनी अपनी ख्याति के अनुरूप काम करना शुरु कर दें और अंत तक वही करती रहें।

चूंकि यह पोर्न फिल्म तो थी नहीं इसलिए सनी लियोनी को पहले ऐक्टिंग करनी थी। वह वे जबर्दस्त करती हैं। इस फिल्‍म का भूत एक महिला है इसलिए वह सनी लियोनी के साथ सेक्स नहीं कर सकता, उन्हें नहाते हुए नहीं देख सकता उनके कपड़े नहीं उतार सकता इसलिए उनके इर्द-गिर्द 5-6 ऐसे लोगों की पलटन जमा की जाती है जिन्हें देखकर लगता है कि इनका जन्म सिर्फ सेक्स करने के लिए हुआ होगा और वह सेक्स करते-करते ही बीरगति को प्राप्त हो जाएंगे। सनी लियोनी को यह न लगे कि यह दुनिया बड़ी जालिम और स्वार्थी है इसलिए फिल्म में उनका एक प्रेमी भी दिखाया गया है। वह उस प्रेमी के साथ रात में टहलने को निकलती हैं तभी बारिश आ जाती है। बा‌रिश से बचने के दौरान एक गाना होता है और सनी लियोनी गाने के इस सपने में भी सेक्स ही करती हैं। तभी गाना खत्म हो जाता है और भूत आ जाता है। है न मजेदार।

इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाले का काम आसान था। उसे बस ऐसे कुछ सीन लिखने थे जिसमें किसी में सनी लियोनी नहा रहीं हो तो भूत आ जाए। सेक्स की कल्पना कर रहीं हो तो भूत आ जाए और किसी और के सपने में चुड़ैल सनी लियोनी का रूप रखकर आ जाए। इसके अलावा कुछ ऐसे सीन रखे गए हैं जब सनी लियोनी अकेले में भी सेक्स करती हैं।

इन सब दृश्यों के बीच यह भ्रम बनाए रखने के लिए कि यह एक हॉरर फिल्म है मुंबई में बैठी एक डॉक्‍टर उस लड़की का वीडियो देखती है जिसमें वह चुड़ैल समायी होती है। वह चुड़ैल मराठी में बोलती है और वह डॉक्टर अभी अभी स्विटजरलैंड से आई है। इसलिए डॉक्टर अपनी नौकरानी से यह पूंछती है कि चुड़ैल क्या कह रही है। इसके बाद फिर चुड़ैल की हिंदी ठीक हो जाती है और हिंदी में बोलने लगती है।

फिल्‍म के दृश्यों की एड‌टिंग ऐसी है कि यदि पांचवे नंबर के सीन को 26वें नबंर पर और 13वें नंबर के सीन को 7वें नंबर पर भी लगा दिया जाए तो कुछ फर्क नहीं पड़ता है। हां फिल्म कहीं कहीं गंभीर भी है। जैसे वह यह बात गंभीरता से बताती है कि एक पोर्न स्टार को भी ऐक्टिंग करनी होती है। शरीर को हिलाकर ऊह आह आवाज निकालने के अलावा भी वह और काम भी कर सकती है। उसे हल्के में नहीं लिया जाना चाह‌िए।

रागिनी एमएमएस 2 देखकर इस बात पर गंभीरता से सोचने का मन करता है कि यदि बोल्डनेस के नाम पर इतनी घटिया फिल्‍में दिखाए जाएंगी तो फिर विजय आनंद के उस प्रस्ताव पर एक बार फिर से विचार क्यों नहीं किया जा सकता कि भारत में एडल्ट कैटेगरी की फिल्में अधिकृत तौर पर बननी चा‌हिए और उनके लिए अलग से सिनेमाघर होने चाहिए। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक सनी लियोनी के जिस्म में रागिनी का भूत समाता रहेगा।