Friday, July 12, 2019

सुपर 30: एक ऐसी फिल्म जिसे आप से ज्यादा आपके बच्चे का देखना जरूरी

एक मैथमैटिशियन के तौर पर मैं आनंद कुमार को नहीं जानता। आप शायद पहले से जानते रहे होंगे। मैं इसलिए नहीं जानता था क्योंकि मैंने इंजीनियरिंग का कभी कोई टेस्ट नहीं दिया। कहां की कोचिंग अच्छी और कहां की बुरी, किसकी फीस ज्यादा है और किसकी कम इन बातों तक पहुंचने का मौका ही नहीं मिला। मेरी जानकारी की हद में आनंद कुमार तब आए जब उन पर बनी फिल्म एनाउंस हुई।

फिल्म की चर्चाओं के साथ आनंद की कई सारी कहानियां भी बाहर आईं। ऐसा नहीं था कि निकली हुई इन तमाम कहानियों में सभी में वे हीरो थे। कुछ में वो ग्रे शेड में थे, कुछ में एक विशुद्व कोचिंग संचालक और कुछ में एक अहसान फरामोश झूठे आदमी।

  सुपर 30 फिल्म पर लिखते समय मेरी इस बात में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है कि फिल्म में दिखाई गई आनंद कुमार की जिंदगी, उनकी असल जिंदगी से कितनी करीब या दूर है। मेरा वास्ता ना तो आनंद को एक हीरो के रूप में देखने में है और ना ही उनकी एचीवमेंट पर खोजी पत्रकारिता कर उसमें नुस्‍ख निकालने में। मैं सुपर 30 को ऐसी फिल्म के रुप में याद करना चाहूंगा जिसके खत्म होते होते आपकी आंखों के कोर गीले हो चुके होते हैं। आप आनंद जैसा बनना चाहते हैं और पाते हैं कि उनके जैसा बनना उतना भी कठिन नहीं है।

अगर यह फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक होती और आनंद कुमार जैसा आदमी इस दुनिया में अस्तित्व भी ना रखता तब भी यह फिल्म उतनी ही अच्छी लग सकती थी। इस अच्छे लगने के पीछे किरदार की नियत और उसका परिश्रम ही है। मैं सुपर 30 को  एक ऐसी फिल्म के रुप में भी याद रखना चाहूंगा जो जिंदगी में एजुकेशन के महत्व को बहुत करीने से एस्टेबलिस करती हैं।

बॉलीवुड में ऐसी बहुत कम फिल्‍में बनी हैं जो एजुकेशन की ताकत को इतने दमदार और प्रभावकारी तरीके से रख सकें। फिल्म जाति व्यवस्‍था पर एक बने-बनाए ढांचे पर भी चोट करना चाहती है लेकिन अपनी असल ताकत वहां आनंद के प्रयासों पर लगाने में दिलचस्‍पी रखती है।

 हम और आप आज जहां पर हैं उसके पीछे की एकमात्र वजह हमारी शिक्षा ही है। मैं गहराई से मानता रहा हूं और अपने आस-पास महसूस भी करता रहा हूं कि अपनी मौजूदा जिंदगी के ब्रेकेट से निकलकर दूसरे ब्रेकेट में जाने के लिए एजुकेशन के अलावा और कोई रास्ता होता नहीं है।

दलित चिंतक बहुतेरे हो सकते हैं, लेकिन अंबेडकर इसलिए दलितों के सच्चे हितैषी कहे जाएंगे क्योंकि उन्होंने झंडा उठाने के बजाय किताब उठाने के लिए प्रेरित किया। सवर्ण हो या दलित एक पढ़ी लिखी जनरेशन ही अपने परिवार को गरीबी के दलदल से उबार सकती है।

 इसमें कोई शंका नहीं कि ये फिल्म अपने कई द्श्यों में सिर्फ एक फिल्म बन जाती है। वह अपने किरदार को कैसे भी हीरो जैसा एस्टेब‌लिस करने के लिए कई सारे ड्रामे रचती दिखती है। आनंद कुमार या कोई भी कोच‌िंग चलाने वाला टीचर इस तरह के चरित्र का नहीं हो सकता जैसा रितिक रोशन को फिल्म में दिखाया गया है। लेकिन फिल्म का सेंट्रल आइडिया ऐसा है जो ना तो हीरोइक और ना ही असंभव। सुपर 30 के कई सारे दृश्य शरीर के अंदर कुछ करने की ऊर्जा पैदा करते हैं यही फिल्म की एकलौती पर बड़ी कामयाबी है।

मैं या इन लाइनों को पढ़ने वाले शायद उस वर्ग के लोग नहीं है जो पढ़ना तो चाहते थे लेकिन जिनके घरों में पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। हमसे से ज्यादातर लोग वो लोग नहीं थे जो बिना खाना खाए कई कई रात जगे हों। बावजूद इसके हम उन किरदारों के करीब पहुंच जाते हैं जो ऐसी जिंदगी जीने के लिए बाध्य हैं और उसे जी रहे हैं। निश्चित ही इन किरदारों का अभिनय इसके पीछे की बड़ी वजह रही होगी।

 फिल्म की लिखावट बहुत शानदार नहीं है, दो किरदारों के आपस के डायलॉग बहुत प्रभावित नहीं करते। विकास बहल का निर्देशन का स्तर क्वीन जैसा नहीं है लेकिन ये अच्छा लगा कि वह शानदार जैसी फिल्म से उबर आए। 

फिल्म के ट्रेलर में रितिक रोशन की बिहारी टोन बहुत खटकती है। फिल्म में भी उनकी भाषा और उनका लंबा-चौड़ा कसरती बदन हमें कई बार परेशान करता है। कई बार लगता है कि पोस्टमैन का यह लड़का अगर ठीक से अपना मुंह धो ले, जींस-टीशर्ट पहन लें तो वह ना तो उनके घर का लगता है ना ही उनके परिवेश का। इसमें कोई शक नहीं कि र‌ितिक ने इस फिल्म में कमाल का अभिनय किया है लेकिन उनकी अति गोरी त्वचा(जिसे फिल्म में अजीब तरह से काला किया गया है), हल्की भूरी दाढ़ी, जिम में तराशा गया बदन और नीली आंखे उनको एक शिक्षक बनने से कई बार मना कर देती हैं।

वह पुरानी, धुंधली सी चेक वाली गंदी कमीज पहनते हैं जिसे देखकर लगता है कि ये कपड़े इनके नहीं हैं, इन्होंने किसी से मांगकर पहने हैं। रितिक को शायद अपनी ये कमियां पता थीं। उन्होंने यहां पर गरीब होने के स्वांग को अपनी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से पूरा करने की कोशिश की है। उनकी मेहनत इतनी अच्छी है कि हमें नकली बिहारी में नुस्‍ख निकालने का मन नहीं करता। पंकज त्रिपाठी अच्छी एक्टिंग के बाद भी एकदम गैरजरूरी लगे। ये रोल उन्हें नहीं करना चाहिए था।


Thursday, July 4, 2019

मेरठ या मिर्जापुर वाला अयान रंजन कब तक दिल्ली वाले अयान रंजन जैसा बन जाएगा?



ये बहुत खूबसूरत सा और चतुराई से छिपा लिया जाने वाला तथ्य है कि हममें से 80 फीसदी से भी ज्यादा लोगों का बचपन और टीन-ऐज छोटे गांव, कस्बों या कस्बेनुमा शहरों में बीता है। ये कूल, ब्रो वाले लहजे से कुछ साल पहले की ही बातें है। हम अभी-अभी उस समाज से इधर शिफ्ट हुए हैं। समाज का ऐसा कुछ भी कच्चा-पक्का नहीं है जिससे हम वाकिफ ना हों। हमारे पास आर्टिकल 15 फिल्म के नायक अयान की तरह ये सहूलियत नहीं है कि हम कायस्‍थ और पासी का अंतर ना समझ सकें। हमें ये सबकुछ मालूम है और प्रकारांतर से हम इसके हिस्से भी रहे हैं।

ये अच्छा है कि आर्टिकल 15 का नायक ऐसे घर से है जहां पढ़ने के लिए बच्‍चे गाजियाबाद या ग्रेटर नोएडा के इंजीनियरिंग कॉलेजों में नहीं बल्कि विदेशों में भेजे जाते हैं। यदि अयान रंजन यूपी के किसी गांव से गाजियाबाद या दिल्ली में पढ़ने आया होता तो इस बात की संभावना ज्यादा थी वह लौटकर लालगंज थाने के प्रभारी ब्रहमदत्त स‌िंह का एक पढ़ा लिखा अपग्रेड वर्जन भर बनके रह जाता। वहां के परसेफशन भी उसे स्वाभाविक लगते और ऊंची जाति के रेपिस्ट ठेकेदार के घर का बना मटन स्वादिष्ट भी। तब अयान को भी पता होता कि 'ये लोग' तो वैसे ही हैं।

 ये अयान की गलती नहीं होती। हमारी परवरिश ही ऐसी है कि कई सारी गलतियां (अपनी और समाज की ) एक समय के बाद हमें अपनी लाइफ स्टाईल का पार्ट लगने लगती हैं और हम उसके आदी हो जाते हैं। जातियों को लेकर समाज के इस गहरे पूर्वाग्रह कि गिरह कुछ खुली जरूर हैं लेकिन इतनी नहीं जितनी की ये फिल्म खुला हुआ दिखाकर हमें राहत देती है।

मुझे उस दिन का इंतजार है जब अयान रंजन दिल्ली का नहीं उसी गांव का एक लड़का होगा। जहां उसे ब्रहमदत्त सिंह के साथ-साथ अपने पिता से भी इस व्यवस्‍था को बदलने के लिए संघर्ष करना होता। अभी तो ये एक मीठी से खुशी देने वाली फिल्म भर लगी। फिल्म के इंटरवल या खत्म होने पर मेरे जैसे तमाम लोग ट्वायलेट गए होंगे और देखा होगा एक खास ड्रेस में टोपी लगाकर और हाथ में वाइपर जैसा कुछ लिए उस आदमी को जो इस बात के इंतजार में है कि आप हटें तो वह वहां सफाई कर सकें। ट्वायलेट हैं तो सफाई होगी ही लेकिन मैं एक इंसान के नाते वह मुल्क देखना चाहता हूं कि जब आपकी पेशाब को धुलने वाले ये हाथ एक ही जाति के ना हों। तब शायद आर्टिकल 15 का बनना एक फिल्म से बड़ा माना जाएगा।

 ये कोई हजार-दो हजार साल पहले की बात नहीं है। ये 25 से 30 साल पहले की बातें है। गांवों में ऊंचे कुल और बिसवा में बड़े (जिस तरह तेल या दूध नापने के लिए लीटर होता है, ब्राहम्‍णों में भी ऊंच नीच नापने के लिए बिसवा नाम का पैमाना उपयोग किया जाता है,अभी भी इस समाज में ऐसे लोग हैं जो बिसवा नाम के पैमाने से आए परिणामों से इतराते हैं) ब्राहाम्‍ण, अपेक्षाकृत नीचे वाले ब्राहाम्‍णों के यहां कच्चा भोजन नहीं करते थे। वो उनके यहां की बनी पूड़ी और हलवा खा लेते ‌थे लेकिन उनके चूल्हे में पके दाल चावल या कढ़ी से उनकी वैसी ही दूरी थी जैसी दूरी फिल्म में चमार जाति वाला पासी किरदारों के प्रति रखता है। या पासी, खटिक, मेहतर या भंगी से जातियों के साथ रखता हो।

 दलित जातियों की आपस में सामाजिक ऊंचाई-निचाई के इक्वेशन क्या रहे हैं ये मुझे नहीं मालूम है, लेकिन यूपी में बसपा के उदय होने के बाद मैंने ये जरूर पाया है कि बाकी दलित जातियों की तुलना में चमार जातियों में खुद को लेकर एक श्रेष्ठता है। वह बाकी दलित जातियों की तुलना में अपने को ज्यादा साफ और सोफिस्टीकेडेट तो मानते ही हैं साथ में वह इस बात के लिए भी इतराते हैं कि सवर्णों के घर होने वाली शादियों में अब उन्हें आमंत्रित किया जाने लगा है।

आर्टिकल 15 की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि ये सिर्फ दलित और सवर्ण के बीच की खांई को नहीं दिखाती, बल्कि फिल्म ये भी दिखाती है कि समाज में दलित और दलित में ही ऊपर और नीचे होने का कैसा एक सिस्टमैटिक बंटवारा है। और ये बंटवारा स्वीकार्य कर लिया गया है। यदि आप इस बंटवारे को स्वीकार नहीं करते हैं तो आपके ऊपर आउटसाइडर का एक ठप्पा लगाकर छोड़ दिया जाता है। आपको ठीक करने का लोड नहीं लिया जाता है और ये माना जाता है कि जरुरत से ज्यादा शिक्षा ने आपकी सभ्यता को भ्रष्ट कर दिया है।

 ये गनीमत रही कि अयान दिल्ली के इलीट क्लास से था जहां जातियां शायद अपनी उस तरह की पहचान नहीं रखती हैं। यदि अयान उसी जिले के किसी ब्राहाम्‍ण या ठाकुर परिवार का लड़का होता तो क्या उसके पिता उसे उस सुअरताल में नंगे पैर, साफ स्वेटर-कोट में घुसने देते? क्या उसका परिवार उसे जातियों के इस कथित घिनौने प्रपंच में अपना कैरियर तबाह करने की छूट देता? क्या उसकी संभावित बीवी उसे ऐसा करने के लिए कहती? खुद से सोचिएगा, मेरे पास इस बा‌त का उत्तर नहीं है। इसे शायद जर्नलाइज नहीं कर सकते।

शहरीकरण ने कुछ बदला है क्या?

हो सकता है कि शहरीकरण कई सारी बुराईयां लेकर आया हो लेकिन जाति व्यवस्‍था को खत्म करने में शहरीकरण का बहुत बड़ा योगदान रहा है। गांव और कस्बे में रहा व्यक्ति मानता है कि शहर, लोगों की सभ्यता को नष्ट और भ्रष्ट करने के लिए ही बने हैं। वहां दिन के उजालों में बैठकर लोग शराब पीते हैं। कोई किसी के साथ उठ-बैठ, खा-पी लेता है। शहर की यह कथित उदारता, सदियों से बने उनके सिस्टम को नष्ट कर रही है, उसे खोखला कर रही है।

पिछले दिनों अखबार की एक कटिंग सोशल मीडिया में वायरल थी जिसमें एक युवती के द्वारा शराब की दुकान पर जाकर शराब खरीदने को चार कॉलम की एक खबर बनाया गया था। मामला छत्तीसगढ़ का था। वहां लोगों के लिए ये शायद खबर थी। लेकिन दिल्ली या मुंबई में लड़कियों का दुकान में खुद से शराब लेना क्या खबर है?  समाज की बुराईयां और उसके दकियानूसपन भी शायद परिवेश बदलते ही बदल जाते हैं। एक पुरुषवादी अधेड़ किसी काम से जब दिल्ली आता है तो मेट्रो में उतर-चढ़ रही लड़कियों की पोशाकें, उनकी बालों के कलर, लड़कों के साथ उनकी घुलमिलकर बातचीत उन्हें कुछ मिनटों तक रोमांचित करती है लेकिन कुछ देर के बाद ही ये दृश्य उन्हें अपनी संस्कृति पर खतरा लगने लगते हैं, लेकिन वहां साल भर रह लेने वाले उसी ऐजग्रुप के आदमी को यह नार्मल लगने लगता है।

शहर का जिक्र इसलिए भी क्योंकि पुरुषवाद और जातिवाद जैसे दो सबसे खतरनाक कीड़े शहर से दम तोड़ रहे हैं। जैसे गांवों में सीजन की पहली बारिश होने के बाद एक खास तरह के कीड़े शाम को निकलते हैं, शहर में भी ये निकलते होंगे लेकिन मालूम नहीं पड़ते। ऐसे ही कई सारी बुराईयां वहां के माहौल में डाइल्यूट हो जाती हैं।  यूपी  या बिहार के किसी एक गांव के दो लड़के जिसमें एक ठाकुर हो और दूसरा दलित वो दिल्ली में साथ फिल्म देख सकते हैं,एक-दूसरे के घर आ जाते हैं। खाना ना सही पर वो शराब सिगरेट शेयर कर लेते हैं। पर अपने गांव पहुंचने पर यही दोनों किरदार ऐसा नहीं कर सकते। उनका ऐसा करने का मन ही नहीं करता। वही इंसान जाति की व्यवस्‍था को दो अलग-अलग परिवेश में दो अलग-अलग ढंग से जीता है।


क्या नफरत एक जैसी?

समाज में नीची जातियों को लेकर ऊंची जातियों का रीएक्‍शन अलग-अलग तरह का होता है। कुछ लोग उनसे नफरत करते हैं, नौकरियों में उनके रिजर्वेशन लेने से नाराज रहते हैं, उन्हें जाति के नाम पर कट्टर मानते हैं और इस बात से भी नाराज रहते हैं कि वो गोलबंद होकर हाथी को वोट देते हैं। जबकि देश के विकास के लिए उन्हें कमल को वोट देना चाह‌िए।

 एक दूसरे तरह का रिएक्‍शन भी है। ये वाले बस उन्हें अपने जैसा नहीं मानते। वो सिर्फ उन्हें दूसरे मानते हैं। उनका छुआ खाने से परहेज करते हैं, उनके घरों की शादियों में जाते हैं लेकिन ज्यादा से ज्यादा डिस्पोजल गिलास में पानी लेते हैं, उनके प्रति कुंठा नहीं रखते।  उनके अपमानित करतें, लेकिन गहराई से मानते हैं कि वह हम जैसे नहीं हैं। आर्टिकल 15 की खूबसूरती ये है कि वह दलित को लेकर हर तरह के विरोध या तटस्‍थ होने को दलित विरोध साबित करने में सफल होती है और आपको अपनी राय बदलने के लिए प्रेरित करती है।

फिल्म के एक डायलॉग "आग लगी हो तो न्यूटल होने का मतलब यह होता है कि हम उनके साथ खड़े हैं जिन्होंने आग लगाई है। यहां इस बारे में एक नजरिया दिखाने की कोशिश करता है। दलित और स्‍त्री विरोध दोनों ही मामलों में पिछला कुछ सालों का हासिल ये हुआ है कि बहुत सारे लोग विरोधी से न्यूटल हो गए हैं। इस न्यूटल होने को वो प्रोग्रेसिव मानते हैं।

हर किरदार की एक अलग फिल्म

फिल्म का एक-एक किरदार एक कहानी लिए हुए हैं। अगर आप इस फिल्म को ब्रहमदत्त सिंह की निगाह से देखेंगे तो आपको ये दूसरी फिल्म लगेगी, निषाद की निगाह से देखेंगे तो दूसरी और ब्रहमदत्त के कुलीग पुलिस इंस्पेक्टर जाटव की निगाह से देखेंगे तो तीसरी। हर कोई अपनी तरह से चीजों को देखना चाहता है। रेपिस्ट का किरदार ये बात गहराई से मानता है कि हर आदमी की एक औकात होती है। वह खुद की भी एक औकात मानता है और जिनके साथ रेप करता है उनकी भी। उसके नजरिए से ये अलग फिल्म है। उसको इस समाज से कोई सफोकेशन नहीं महसूस होता। हां, वो अयान के व्यवहार भी जरुर एक अजीबपन महसूस करके बार-बार चौंकता है।

शानदार लिखावट-बुनावट

गौरव सोलंकी को पढ़ने वाले जान जाएंगे कि फिल्म का ज्यादातर हिस्सा उन्हीं का है। निषाद जैसे किरदार के एकालाप उन्हीं के हैं। फक वाला ह्यूमर भी उन्हीं का है। उन्होंने एक खूबसूरत फिल्म लिखी है। जिसमें कहीं कहीं कुशलता से एक डार्क हयूमर पिरोया गया है। एक निर्देशक के रुप में अनुभव सिन्हां जैसा रुपांतरण मैंने इसके पहले कभी नहीं देखा। मुल्क के पहले भी उन्होंने फिल्में बनाई हैं। उन्हें देखकर लगता है कि ये फिल्में किसी और ने बनाई हैं। आर्टिकल 15 में वे मुल्क से भी आगे निकल जाते हैं।

एक किरदार को गढ़ने की प्रक्रिया में वह अनुराग कश्यप की बराबरी पर खड़े दिखते हैं। इस फिल्म से पहले आप चाहकर भी ये कल्पना नहीं कर सकते थे कि  मनोज पहवा एक ऐसे किरदार को निभा सकते हैं या कुमुद मिश्रा भी। फिल्म दलित के घर ब्राहाम्‍णों के भोजन के टॉपिक को हल्के से छूती है, इसी तरह निषाद के किरादर को भी। इन्हें थोड़ा और कुरेदना चाहिए था। आर्टिकल 15 एक ऐसी फिल्म है जिसे 15 अगस्त और 26 जनवरी को चौराहों चौराहों पर लगाकर दिखानी चाहिए, लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि ये एक फिल्म है किसी सरकार के विज्ञापन वाली एलईडी गाड़ियां नहीं।




Thursday, April 18, 2019

आइए 'कलंक' पर हंसते हैं, ये खिल्ली उड़ाने वाली फिल्म है, समीक्षा वाली नहीं


'कलंक' दरअसल पूरी ठसक के सा‌थ यह बताने का प्रयास करती है कि यदि पैसा पानी की तरह बहाया जाए तो चुनाव भी जीते जा सकते हैं और इंडस्ट्री के टॉप चेहरों को लेकर एक बेहद उबाऊ फिल्म भी बनाई जा सकती है और डंके की चोट पर उसका अथाह प्रमोशन भी किया जा सकता है। ऐसी फिल्म जिसके एक-एक सीन पर लाखों खर्च किए गए हों।  टू स्टेटस जैसी सफल फिल्म बना चुके और कई सारी सफल फिल्मों के असिस्‍टेंट रहे अभिषेक वर्मन की इस फिल्म में आपको ‌‌हिंदी सिनेमा की बीती हुई कई झलकियां या किरदार दिख सकते हैं। फिल्म के सेट और कलर डिजाइन में भंसाली का अक्स साफ दिखता है। कई जगह यह फिल्म सांवरियां और राम-लीला जैसी लगती है, रंगों के चटक और धूसर होने के मामले में।  फिल्म की अच्छी बात ये है कि सभी किरदारों ने अभिनय अच्छा किया है, बुरी बात ये है कि वह सभी एक खराब फिल्म के लिए अभिनय कर रहे थे। बंटवारे जैसी सेंसटिव बैकग्राउंड पर बनी यह फिल्म उस हिस्से को बेहद सतही तरीके से छूती है जिस पर इसका क्लाइमेक्ट टिका होता है। फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ है कि कुछ अच्छे दृश्य, सिनेमेटोग्राफी और गाने भी उसे बचा नहीं पाते हैं।
 फिल्म की स्टोरीलाइन बचकाना है। इसकी कहानी टीवी सीरियलों जैसी है और इसके संवाद किसी थके हुए पत्रकार के चोरी किए हुए आर्टिकल की लंबी-लंबी लाइनों जैसे हैं, जिस पर वह खुद आत्ममुग्‍ध है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसका मजाक उड़ाया जाना चाहिए। फिल्म के हर बचकानेपन और उनकी हरकतों का मजाक। फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा कैंसर से मर रही होती हैं। मरने के दो साल पहले वो बला की खूबसूरत दिखती हैं। मैचिंग की साड़ियां, मेकअप, खूब सारी चूड़ियां पहनकर वो लाहौर से राजस्‍थान किसी के घर जाती हैं। उस घर में आलिया भट्ट पतंगे लूट रही होती हैं। शोले में शादी से पहले वाली जया भादुड़ी जैसी चुलबुली लड़की वाले अंदाज में। पता नहीं उनके बीच में क्या रिश्ता है लेकिन सोनाक्षी चाहती हैं कि वह उनके घर जाएं और मरने तक उनके साथ रहें और मरने के बाद उनके पति से उनकी शादी हो जाए। सोनाक्षी सिन्हा की इस तरह की ख्वाहिशें पहले भी पालती रही हैं। लुटेरा में उन्होंने कुछ ख्वाहिशें रणवीर सिंह से पाली थीं, सेकेंड हॉफ में उनकी ख्वाहिशें रणवीर से शिफ्ट  होकर उनके दरवाजे पतझड़ में झड़ रहे एक पेड़ से हो जाती हैं। फिर बाद में रणवीर उनके लिए एक पत्ती बनाते हैं। हिंदी सिनेमा ऐसी उल जलूल ख्वाहिशें लड़कियों के मन में पालता रहा है और प्रेमी उसे पूरा कर-करके फना होते रहे हैं।

तो फिर आलिया शादी करके उनके घर आ जाती हैं और उनके पति रात में पर्दे की आड़ में ही कह जाते हैं कि सोनाक्षी सिन्हा ही उनकी पत्नी हैं। इस रिश्ते में इज्जत तो होगी लेकिन प्यार नहीं। क्योंकि प्यार वो अपनी पत्नी से करते हैं। वो ये बात नहीं बताते हैं कि सेक्स होगा या नहीं? पहले का समाज इस मामले में शालीन था। वह प्यार को ही सेक्स मानता था। महेश भट्ट इस फिल्म को बनाते तो वह कहलवा देते कि प्यार तो नहीं होगा लेकिन सेक्स तो होगा। तो उस रात के बाद आलिया कुछ दिन घर में वैसे ही घुट-घुटकर जीती हैं जैसे जोधा अकबर में ऐश्वर्य जी रही होती हैं। वह समय काटने के लिए कबूतरों को सहलाती थीं और आलिया समय काटने के लिए छज्जे में बैठकर दूर बज रहे गाने को सुनती हैं और शाम को सुसाइड करने की प्रैक्टिस करती हैं। बाद में वह पत्रकार बन जाती हैं।

अदभुत खूबसूरत लाहौर के उस मुहल्ले में एक जीबी रोड जैसा रेड लाइट इलाका है। लेकिन है बहुत बढ़िया। वहां कोई भला आदमी भी जाए तो उसे गिल्ट ना हो। उस सुंदर मोहल्ले में शहर के लोहार रहते हैं। उसी मोहल्ले में माधुरी दीक्षित लड़कियों को गाना सिखाती हैं और वहीं पर वरुण धवन अपने कसरती बदन से तलवारें बनाया करते हैं। उनकी आंखों में सुरमा लगा रहता है और वह ज्यादातर ऊपरी भाग में नंगे रहते हैं। एक्सट्रा कैरिकुलम ऐक्टिविटी के तहत वह समय काटने के लिए वह बैलों से लड़ते हैं। आलिया भट्ट उन्हें लड़ता हुआ देखती हैं और प्रभावित होती हैं। एक मुस्लिम लीग का नेता है, जो वहां के अखबार के संपादक से बहुत नाराज रहता है। वह समय काटने के लिए लोहार का दोस्त रहता है और उसे तरह-तरह की समझाइश दिया करता है। अखबार के संपादक का परिचय अभी आगे आएगा।

आलिया, माधुरी से  गाना सीखने जाती हैं और उन्हें उस लोहार से प्यार हो जाता है। लोहार वरुण धवन उन्हें पिक ड्रॉप की सेवाएं देते हैं। नाव से। नाव कोई और चलाता है वह सिर्फ मॉरल सपोर्ट देते हैं। बाद में लोहार महेश भट्ट स्टाइल में नाजायज संतान निकलता है। इस नाजायज संतान की मां माधुरी होती हैं और पिता आलिया भट्ट के ससुर संजय दत्त। पूरा मोहल्‍ला जानता है वरुण के अवैध पिता संजय दत्त हैं। बस संजय दत्त के बेटे और दो बीवियों सोनाक्षी सिन्हा और आलिया भट्ट के पति आदित्य राय कपूर को यह बात मालूम नहीं होती है। जो बातें पूरा मोहल्ला जानता है वह बाद उनका बेटा क्लाइमेक्स में जानता है। संजय दत्‍त का बेटा पेशे से एक अखबार का संपादक कम मालिक है। शायद वर्ककोहल्कि होने की वजह से उन्हें यह बात पता ना चल पाई हो।  एक छोटा सा अखबार जो विज्ञापन के संकट से जूझ रहा है लेकिन परिवार इतनी बड़ी और आधुनिक कोठी में रहता है कि लगता है गोदी मीडिया आज से नहीं आजादी से पहले से ही देश में था। आलिया भट्ट लोहारों के उस मोहल्ले में रिपोर्टिंग करती हैं। गाने सीखती हैं, कुल मिलाकर पूरा दिन वहीं रहती हैं। वह मोहल्ले में जो रपट लिखती हैं उन्हें डेस्क गिरा देती है। संपादक डेस्क से प्रमोट होकर संपादक बना होता है उसे फील्ड का ज्ञान कम होता है।  वह रिपोर्टर की कद्र नहीं करता। उनके पिता उसे कई बार फील्ड में जाकर काम करने के लिए कहते हैं, लेकिन वह गुर्राकर उन्हें चुप करा देता है। संजय दत्‍त को इतना निरीह दर्शकों ने पहले कभी नहीं देखा होगा। फिल्म के एक सीन में लोहार वरुण धवन उनका गला तक पकड़ लेते हैं। संजय दत्त उस समय कुर्ता पैजाम पहने होते हैं और उनकी जेब में कोई तंमचा-पिस्तौल भी नहीं होती है।

ये सब करते-करते फिल्म क्लाइमेक्स में पहुंच जाती है। फिल्म के क्‍लाइमेक्स में ट्रेन में लाहौर छोड़कर जाते हुए लोगों का सीन है। लोग शायद अमृतसर जा रहे हैं। इस सीन को  बेहद बचकाने तरीके से फिल्माया गया है। दस हजार से ज्यादा भीड़ को 15 से 20 लोग भगा रहे हैं। आश्चर्य है कि वो हजारों लोग एक दर्जन लोगों की वजह से भाग भी रहे हैं। संपादक भी भाग रहे होते हैं। लोहार वरूण और आलिया भी भाग रही होती हैं। संजय दत्त पहले ही जा चुके होते हैं। माधुरी वहीं रहने का फैसला लेती हैं। सोनाक्षी सिन्हा पहले ही शांत‌ि से मर चुकी होती हैं। मुस्लिम लीग का नेता सबको मार रहा होता है। उस दौरान कांग्रेस का जिक्र नहीं आता है। शायद अभिषेक वर्मन को पता होता तो दो सीन यहां नेहरु के भी रख देते। लेकिन दिक्कत ये थी कि नेहरु का सीन आता तो एक दो सीन नरेंद्र मोदी के डालने पड़ते। बिना मोदी के नेहरु अधूरे हैं।

मजाक उड़ाने से इतर अगर इस फिल्म पर बात करें तो इस फिल्म की स्टोरीलाइन इतनी बुरी नहीं है। यदि किरदारों को सही तरीके से सहेजा जाता। किरदार असली लगते, उनके हिस्से आए संवाद बनावटी न लगते। फिल्म में माधुरी और संजय दत्त की जगह कोई और होता। बंटवारे को कायदे से फिल्मा लिया गया होता तो यह फिल्म डूबने बच जाती। बहुत अरसे बात मैंने कोई फिल्म देखी जिसमें मेरी दो बार आंख लगी। लेकिन तभी गाने आ गए और आंख खुल गई। फिल्म में संवाद की तरह गाने में जरुरत से ज्यादा हैं। आलिया और वरुण ने हमेशा की तरह अच्छी ऐक्टिंग की है। माधुरी दीक्षित को अब अपने बड़े होते बच्चों पर ध्यान देना चाहिए। चुनाव लड़ना भी एक सही विकल्प है। संजय दत्त को अपने ऊपर एक और फिल्म बनवानी चाहिए...


Saturday, April 6, 2019

रॉः एक बुरी फिल्म, जिसके पास शानदार होने के सारे मसाले थे...


अपने नाम और ट्रेलर से ही कमजोर और सुस्त सी लगनी वाली 'रोमियो अकबर वाल्टर' जिसे शॉर्ट में रॉ कहा गया है आखिरकार एक सुस्त फिल्म निकली। एक बड़े और भव्य लैंडस्कैप का स्कोप रखने के बाद भी यह फिल्म अपनी लिखावट और बुनावट की वजह से दम तोड़ देती है।आखिरी के 15-20  मिनट जरूर अच्छे और सधे हुए हैं लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म अपना चार्म और दर्शक अपना सब्र खो चुके होते हैं।  फिल्म एक स्वेटर की तरह होती हैं। बांह और कंधा बहुत अच्छा बुना हुआ हो लेकिन गले या छाती की फिटिंग खराब हो तो पूरा स्‍वेटर ही खराब कहा जाता है। ‌फिर ऊन चाहे जितना अच्छा लगा हो। इस फिल्म का तो ऊन भी औसत था। 

 हॉलीवुड की तरह एक डिफाइन जॉनर ना होते हुए भी बॉलीवुड में समय-समय पर जासूसी बेस्ड फिल्में आती रही हैं। कोई ना मिलने पर जीतेंद्र और धर्मेंद्र तक जासूस बने हैं। कल्पना कीजिए कि जीतेंद्र कहीं के जासूस हों। लेकिन ये भी हुआ है क्या कर सकते हैं। इधर एक था टाइगर जैसी मसाला और बकवास फिल्म भी आपके पास है और राजी जैसी सधी हुई 'घरेलू किस्म की' जासूसी फिल्म भी। श्रीराम राघवन की एक असफल पर स्टाईलिश फिल्म एजेंट विनोद भी याद आती है और निखिल आडवाणी की डीडे भी। अक्षय कुमार इस उपापोह में रहे कि वह जासूस बनें या खुल्ल्मखुल्ला देशभक्त्, कई बार जासूस बनते बनते रह गए हैं। 

रोमियो अकबर वॉल्टर के साथ समस्‍या ये है कि फिल्म को अपना शुरू और अंत तो मालूम है लेकिन बीच के दो घंटे में घटनाएं किस तरह से पिरोकर उन्हें स्टेबलिस की जाएं ये हुनर निर्देशक के पास नहीं था। याद करेंगे तो आपको बॉलीवुड की कई ऐसी फिल्में याद आएंगी जिनकी कहानी तो अच्छी है लेकिन पटकथा कमजोर होने की वजह से फिल्‍म खराब बनकर निकली। इस फिल्‍म का जासूस भारत की एक बैंक से उठकर पाकिस्तान पहुंच तो जाता है लेकिन उससे कराया क्या जाए ये स्‍क्रिप्ट, घटनाओं और उनकी डिटेलिंग से स्टेबलिस नहीं कर पाती। किस तरह की सूचनाएं लीक करानी हैं, उनका उपयोग देश में किस तरह से हो सकता है, सूचना लीक कराने के प्रॉसेस में रिस्क कैसा है, हीरो अपने प्रजेंस ऑफ माइंड से रिस्क को कैसे कवर करता है, उसकी आइडेंटी कैसे लीक होती है ये सब जरूरी चीजें फिल्म के डायरेक्टर रॉबी ग्रेवाल मिस करते हैं। यही छोटी छोटी बारीकियां मेघना गुलजार राजी पर करीने से पकड़ती हैं। रॉबी ग्रेवाल ने इसके पहले समय और आलू चाट जैसी फिल्में बनाई हैं। मैंने आलू चाट फिल्म देखी है लेकिन गूगल पर आलू चाट टाइप करने पर वह चाट और दही भल्ले की तस्वीरें खोल देता है। यानी फिल्म में याद रखने जैसा कुछ नहीं है। किसी हॉलीवुड फिल्म से चुराई गई सुष्मिता सेन की समय वैसी भी एक बकवास और भुला दी गई फिल्म है। इसके अलावा ग्रेवाल का और कोई काम मुझे याद नहीं आता। उनका वीकिपीडिया पेज भी अब तक नहीं है। फिल्‍में अपनी जगह हैं पर उन्हें कम से कम पेज तो बनाना चाहिए। 

गूगल करने पर पता चलता है कि फिल्म 70 के दशक के एक रॉ एजेंट रवींद्र कौशिक की कहानी पर आधारित है। यह सुनना थोड़ा गर्व भी पैदा कर सकता है और इस पर हंसी भी आ सकती है कि पाकिस्तान का आर्मी चीफ भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का एजेंट था। आर्मी चीफ होकर वह सालों तक भारत को खुफिया सूचनाएं पास करता रहा और पाकिस्तान को इसकी भनक भी न लगी। यह इंदिरा गांधी के समय की बात थी। ऐसा एजेंट अगर हमारे पास अभी होता तो नरेंद्र मोदी इसी आधार पर कम से कम पांच लोकसभा और 25 विधानसभा चुनाव जीत लेते। अच्छी बात ये रही कि रवींद्र कौशिक सही समय पर यहां से चले गए और अभिनंदन को मोदी जी के पास छोड़ गए। 

 
फिल्म का कैनवास बांग्लादेश के निर्माण के समय का है। फिल्म ‌रियल लगे इसलिए इंदिरा गांधी की ओरजिनल तस्वीरें फिल्म में प्रयोग की गईं। कई जगह पर उनका जिक्र आया है। कई फिल्‍मों के बाद ऐसी कोई फिल्‍म दिखी जिसमें गाधी परिवार को दिखाया गया हो और उन पर कोई ऐलीगेशन ना हो। रॉ फिल्म इंदिरा को लेकर तटस्थ दिखती है।  मुक्तवाहिनी सेना से जुड़े तथ्य भी सच के आसपास रखे गए। प्रयास ये किया गया कि इस फिल्म को काल्पनिक के बजाय एक सत्य मानकर देखा जाए। लेकिन जिस फिल्म में रॉ चीफ जैकी श्राफ बने हों उसमें इस तरह की फिलिंग आ ही नहीं सकती। श्रॉफ ने अपनी कुव्वत भर अच्छा काम किया है लेकिन उनकी पिछली फिल्मों के निभाए गए किरदार उनको लेकर सीरियस होने ही नहीं देते। जैकी का रोल काफी बड़ा और मजबूत है। वहां कोऔर कोई और होता तो बेहतर होता। 

सबसे ज्यादा खटक जॉन अब्राहम को सही तरीके से यूज ना करने को लेकर होती है। सुजीत सरकार की मद्रास कैफे देखने के बाद लाखों दर्शकों ने जॉन को लेकर अपना परसेफ्शन बदला था। पहले एक लवर, फिर कॉमेडी-एक्‍शन वाली इमेज में बंध चुके जॉन को सुजीत सरकार ने एक झटके से निकालकर बहुत बड़े अभिनेता बना दिया था। जॉन बाद में परमाणु, सत्यमेव जयते जैसी फिल्मों में बार-बार वहीं पहुंचने की कोशिश करते हैं। इस फिल्म में उनके पास शेड तो बहुत हैं लेकिन निर्देशक उनसे एक याद रखने वाला किरदार नहीं निकलवा पाए हैं। फिल्म में मौनी रॉय के साथ डाला गया एक रोमांटिक किस्म का ट्रैक जॉन को और कमजोर करता है। टीवी देखने वाले दर्शक उन्हें नागिन के नाम से जानते हैं। वे फिल्म में जब भी आई हैं जॉन अपने उदेश्य से भटक गए हैं। चूंकि पिछले शुक्रवार भी खराब फिल्में थीं आने वाले शुक्रवार में भी कुछ खास नहीं है इसलिए फिल्‍म पैसा कमा सकती है और ये बहुत बुरी भी नहीं है। देश रेस 3, ठग ऑफ ‌हिंदुस्तान और नोटबंदी का दौर देख चुका है...


Friday, February 15, 2019

गली ब्वॉय आपकी रूह को अच्छी लगेगी, इसे देख लीज‌िए


मल्टीप्लेक्स के नम अंधेरे कमरे के चारों ओर चमक रहे लाल रंग के एक्जिट बोर्ड के बाहर एक दूसरी दुनिया बसी होती है। पिछले ढाई घंटे बिताई हुई फंतासी दुनिया से उलट एक असली दुनिया। अमूमन हॉल की सीढ‌ि़यां उतरते-उतरते आप उस दुनिया के संग हो लेते हैं जहां आपको जीना होता है, और जहां से आप आए होते हैं। बीते ढाई घंटे का देखा और सीखा हुआ उस दुनिया में काम नहीं आता। आप मानते हैं कि जो कुछ अभी देखा गया है वह सिर्फ एक फिल्म थी। पर कुछ फिल्में उस एक्जिट बोर्ड के बाहर चलकर आपके साथ आती हैं, आपके जीवन में। कुछ बातें दुबककर वहां पर बैठ जाती हैं जहां से सोच और नजरिया तय होता है। गली ब्वॉय हिंदी सिनेमा की उन गिनी चुनी फिल्‍मों में  शामिल हो जाती है जो ऐसा करने का हुनर रखती है। 

लक बाय चांस, जिंदगी मिलेगी ना दोबारा जैसी ही यह फिल्म, फिल्म कम एक नॉवेल ज्यादा लगती है। जहां नायक की एंट्री, इंटरवल या फिल्म के खत्म होने पर एक तनाव क्रिएट और रिलीज नहीं किया जाता। सब कुछ सतत सामान्य ढंग से होता रहता है। फिल्म के सीन किताब के पन्ने जैसे होते हैं। कोई पन्ना बोर‌िंग तो हो सकता है लेकिन वह वहां गैरजरूरी नहीं होता है। निश्चति ही ये फिल्म आपका धांसू मनोरंजन नहीं करती, पर्दे पर कोई तूफान नहीं खड़ा करती। वैलेंटाइन डे पर रिलीज होकर भी उसके पास ऐसी कोई अदाएं नहीं हैं जिस पर प्रेमी रीझ सकें, उसे दिखाकर प्रेमिकाओं को रिझा सकें। आलिया और रणवीर के होने के बाद भी ये आपको 'हॉट कपल की गर्म प्रेम कहानी' जैसी गलतफहमियां पालने का मौका नहीं देती। जोया की बाकी फिल्मों की तरह ही यह फिल्म भी जीवन के कुछ दर्शन देती है। रिश्तों की लेयर्स और सपनों की जटिलताओं के बीच फंसे जीवन को जरा नए अंदाज में देखने का दर्शन। आपके अंदर की फड़फड़ाहट को हवा देती है और बताती है कि ये फड़फड़ाहट दरअसल जुर्म नहीं है। 

रीमा कागदी और जोया अख्तर की लिखी इस फिल्म का विषय बहुत यूनीक नहीं कहा जा सकता। फिल्म का अंत भी आप प्रेडिक्ट कर सकते हैं। अंडरडॉग को हीरो बनाने वाले विषयों से सिनेमा भी भरा हुआ है और साहित्य भी। 'गुदड़ी के लाल' की गौरव गाथाएं हमने अपने स्कूलों के दिनों से पढ़ रखी हैं। गली ब्वॉय की खूबसूरती इस बात में है कि यहां एक अंडरडॉग को हीरो बनाने की प्रोसस नई किस्म की है। सपने के बीच आने वाले 'फैमिली हरडेल' तो पुराने हैं लेकिन उनको सॉल्व करने की एप्रोच नई। 'सपने ऐसे हों जो आपकी सच्‍चाई से मैच करें', यह बात बहुत पुरानी कहावत 'जितनी चादर हो उतना ही पैर फैलाओ' कहावत का अपग्रेड वर्जन है। पूरी फिल्म इस घिसी पिटी थ्योरी की काट में लगी रहती है, आखिरकार सफल रहती है। सफल भी चुपके से होती है, फिल्मी स्टाईल में हंगामा मचाकर नहीं। 

 
मुंबई का धारावी हिंदी सिनेमा के लिए एक ऑफ बीट विषय जैसा है। कई फिल्मकारों ने उसे अलग-अलग एंगल से देखने और एक्सप्लोर करने की कोशिश की है। धारावी, सलाम बांबे, काला जैसी कुछ फिल्में आम दर्शकों को भी याद आती हैं। आमतौर पर धारावी या झोपड़पटटी की लाइफस्टाइल दिखाने के लिए फिल्मकार कैमरे को आगे करते रहे हैं। कैमरा खूबसूरती से उस दुनिया को कैप्चर करता रहा है और हम एक बाहरी की तरह बैठकर उस दुनिया के यथार्थ को देखते हैं। उस दुनिया का यथार्थ हमारा अपना यथार्थ नहीं होता रहा है, हम उसे डॉक्यूमेंट्री जैसा देखते आए हैं। मानों फिल्म वहां के बारे में बताकर हमारा सामान्य ज्ञान बढ़ा रही हो। गली ब्वॉय ऐसा बिल्कुल नहीं करती।

 इस बार कुछ बदला सा है। जैसे हैदर कश्मीर को कश्मीर की तरह देखती है एक आउट साइडर की तरह नहीं वैसे ही गली ब्वॉय धारावी को धारावी के नजरिए से देखने का प्रयास करती है। उसकी निगाहों में उसकी लिए सेम्पेथी नहीं है, ना ही स्पेशल फील किए जाने का ऐहसास। फिल्म के नायक के सामने जो जीवन है, सच्‍चाईयां हैं, कांच की कतरन से ढकी चाहरदीवारियां हैं, उस जीवन की जो कसमाकस है वो धारावी ही नहीं कानपुर, बेगूसराय, कटनी या बिलासपुर में भी उसी तरीके से हो सकती हैं। आपकी हो सकती है, मेरी हो सकती है आपके मौसी के लड़के की हो सकती है। आपके प्रेमी की हो सकती है, आपकी प्रेमिका की हो सकती है। मुख्य ‌किरदार मुराद को उठाकर किसी भी परिवेश में रख दें तो भी फिल्म वैसी ही रहेगी। यहां परिवेश मुराद को स्टेबलिश करने में मदद करता है लेकिन मुराद का किरदार कैमरे या परिवेश पर आश्रित नहीं है। 

चूंकि फिल्म के नायक का सपने रैप सिंगर से गुजरकर पूरे होने हैं तो फिल्म में रैप भी एक किरदार की तरह है। रैप की जुबान पर उतना ही काम किया गया है जितना रणवीर के किरादार पर। रैप दरअसल पोएट्री और रिदम का मिक्चर है इस बात को साबित करने के ल‌िए गली ब्वॉय लगातार एक फिलासिफकल पोएट्री का सहारा लेती रहती है। रैप में बोले गए गानों की जुबान भी दरअसल डायलॉग ही हैं। वह फिल्म के हिस्से हैं। मुझे याद पड़ता है कि गुलाल के बाद दूसरी बार किसी फिल्म के गानों में पोलिटकिल सटायर शामिल किया गया है। गली बॉय रैपर्स नैज़ी और डिविन के जीवन से प्रेरित है, जो बस्तियों से स्टारडम तक पहुंचे थे। इसे हॉलीवुड की एक फिल्म 8 Mile से भी प्रेरित बताया जा रहा है। इस बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। जोया को दरअसल हालातों में फंसे एक युवक को फोकस में रखकर अपनी बात कहनी थी। फिर उसका सपना रैप बनाने का भी सकता है या रैंप पर चलने का भी। 

फिल्म के सब प्लाट्स उम्दा हैं। रुढ़ियों में जकड़े, अटके, आर्थिक रुप से निचले पाएंदान पर खड़े एक मुसलमान परिवार की जिंदगी स्याह पक्ष फिल्म में एक किरदार की तरह हैं। पहली बीवी को बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर लेना, अपनी से आधी उम्र की बीवी को घर के जवान लड़के की तरफ फिजकली अट्रैक होना, पहली बीवी के भाई का अपनी बहन को नहीं बल्‍कि पुरुष के नजर‌िए को समर्थन करना जैसे बातें बहुत गहराई से अंडरलाइन की गई हैं। अभिनय इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। रणवीर स‌िंह एक बार फिर से वैसे ही अच्छे लगे हैं जैसे वह लुटेरा में लगे थे। सिंबा जैसा ओवरएक्टिंग के रोल के बाद गली ब्वॉय का मुराद बनना इस एक्टर की रेंज दिखाता है। 

आलिया भटट की खूबसूरती ये है कि एक दो जगह को छोड़कर वह कहीं से आलिया नहीं लगतीं। वह हर जगह एक 'अधकचरे उदार' मुस्लिम परिवार में पल रही सकीना ही लगती हैं। अपनी तमाम कमियों और सीमाओं के सा‌थ जी रहे एक अधेड़ गरीब मुसलमान की भूमिका विजय राज शानदार तरीके से जीते हैं। कॉमेडी से इतर उनका इस्तेमाल शायद पहली बार हुआ है। 'एक और विजय', विजय वर्मा पहली बार प्रियदर्शन की फिल्म रंगरेज में नोटिस किए गए थे। उनके ‌हिस्से में पिंक और मानसून शूटआउट जैसी फिल्में भी हैं लेकिन यह फिल्‍म उन्हें पहली बार स्‍टेबलसि करती हैं। सिद्वांत चतुर्वेदी की चर्चा इस फिल्म के बाद बहुत होने वाली है। कल्‍कि कोचलीन वैसी हैं जैसी वो थीं। अमृता सुभाष, रमन राघव में अपनी भूमिका का मानों एक्सटेंशन कर रही हैं। फिल्म की लंबाई कुछ कम हो सकती थी। ऐसा सेकेंड हॉफ  में लगता है। 

Friday, January 11, 2019

काश ये फिल्म एक एजेंडा फिल्म ही बन जाती, कम से कम कोई तो खुश होता...


एक्सीडेंटल प्राइम म‌िनिस्टर एक बुरी नहीं दरअसल बहुत बुरी और लिजलिजी फ‌िल्म है। ये बुरी फिल्म बन सकती थी पर तब जब ये पूरी मेहनत के साथ एक एजेंडा फिल्म बनाई जाती। एक अच्छी और इफेक्टिव एजेंडा फिल्म बनाने की कोशिशों में तब कम से कम ये एक फिल्म तो बन ही जाती। नहीं फर्क पड़ता था क‌ि तब वह गांधी परिवार को रेडीक्यूल करती या मनमोहन को मजबूर बताती। वह कुछ नयी बातें बताती। झूठ ही सही उन्हें अच्छी तरीके से एस्टेबलिस कर देती। कुछ लोगों का मनोरंजन होता कुछ गाली देते। ये कोई जानकारी नहीं हुई कि  2004 से लेकर 2014 तक सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी रहीं। सबको मालूम है। क्या नया है।  फिल्म घटनाओं को इतने सरसरी तौर पर लेती है कि लगता है क‌ि हम साल के अंत में छपने वाली इयर बुक के पन्ने पलट रहे हों और घटनाओं को तारीख वाइज देख भर रहे हों।

ये एक फीचर फिल्म और डाक्यूमेंट्री का मिलाजुला रुप लगती है। कभी ये फिल्म बन जाती हो कभी डाक्यूमेंट्री। एक सीन में आपको अनपुम खेर वाले मनमोहन स‌िंह दिखते हैं और अगले सीन में ही असली वाले। कभी आडवाणी ये वाले हैं तो कभी फिल्मी वाले। फिल्म में बचकाने सीन्स की भरमार है जो ये सिर्फ ये साबित करने के ल‌िए रखे गए हैं ताकि आपको पता चले क‌ि गांधी परिवार कितना कन‌िंग और घटिया है। गांधी परिवार का विरोध करने वालों के लिए ये भी कोई नई सूचना नहीं है। वो इतने जानकार हैं कि सबके पास गांधी परिवार की अपनी अपनी फिल्में हैं। वाटसअप विवि के जर‌िए वो फिल्म से ज्यादा अपडेट हैं। वो सोनिया गांधी के बारे में ये भी जानते हैं कि वो होटलों में खाना परोसती थीं और इधर ये भी जान गए हैं कि उनके पास दुनिया भर में दस हजार होटल हैं। वो नेहरु के बारे में खुद नेहरु से भी ज्यादा जानते हैं।

फिल्म में शक्तियों का एक अजीब सा बंटवारा दिखाया गया है।  फिल्‍मी मनमोहन स‌िंह ऐसे हैं क‌ि नीली पगड़ी खुद से बांधने के अलावा उनके सारे काम उनके मीडिया सलाहकार संजय बारु करते हैं। वही फिल्म के सूत्रधार हैं और हीरो भी। वह मनमोहन स‌िंह से कम बात करते हैं दर्शकों से ज्यादा।  फिल्म बताती है क‌ि 2004 से लेकर 2009 तक केंद्र सरकार में सबसे ताकतवर आदमी मनमोहन या सोनिया ना होकर संजय बारु होते हैं। वो जो चाहे कर सकते हैं। देश का पीएम जो वित्तमंत्री और आरबीआई का गर्वनर रह चुका था बारु उसे नर्सरी क्लास के बच्चे की तरह बोलना सिखाते हैं। पब्लिक और मीडिया में हाउ हाउ टू बिहेव, हाउ टू सरवाइव  जैसे लेसन बारु लगातार उन्हें दे रहे होते हैं। ताकतवर वो इतने हैं कि उनके सामने कैबिनेट मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव कोई हैसयित नहीं रखते। मनमोहन सिंह उनसे कहकर आपने भाषण लिखवाते हैं और छप्‍पी देने के लिए कहते हैं। वो बारु से ओ तेरी... कहकर बात करते हैं।

तमाम कोशिशों के बाद भी यह फिल्म बहुत बुरी इसल‌िए बनी क्योंक‌ि इस फिल्म केअनाम से निर्देशक को ना तो राजनीत‌ि की लेयर्स समझ में आती हैं और ना ही उसके ग्रे शेड। ऐसा लगता है क‌ि किताब के कुछ पन्ने रैंडमली उठा लिए गए हैं और जो पन्‍ना जहां से मिला उसे शूट कर लिया गया।  फिल्म सिलसिलेवार एक कहानी की तरह आगे नहीं बढ़ती। ना ही उन घटनाओं को राजनीत‌ि में पीछे घटी घटनाओं से जोड़ने की कोशिश करती है। हो सकता है क‌ि इसकी वजह ये हो कि फिल्म के निर्देशक का फिल्मी दुनिया के साथ-साथ राजनीत‌ि से भी कोई वास्ता ना रहा हो। फिल्म बनाने के समय ही उन्होंने जाना हो कि उड़ीसा के उस समय के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक रहे हों। या पी चिदंबरम नाम का कोई आदमी माइनेंस मिनिस्ट्री में दखल रखता है।

 गूगल सर्च में फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटटे का कोई फिल्म रिकॉर्ड नहीं मिलता है। इसके पहले उन्होंने क्या काम किया है ये पता नहीं चल पाता।  उनको लेकर ऑनलाइन मीडिया में जो खबरें हैं वो उनकी जीएसटी टैक्स चोरी और उनकी कंपनियों पर पड़े छापे को लेकर हैं। ये खबरें भी हाल ही की हैं। फिल्‍म के एनाउंसमेंट के बाद की। एक ऐसा नॉन पोलटिकल, नॉन फिल्मी बैकग्राउंड का आदमी यद‌ि ऐसी फिल्म बनाता है तो इससे बेहतर फिल्म की उम्‍मीद भी नहीं की जानी चाह‌िए।  ‌फिल्म देखकर लगता है क‌ि फिल्म के निर्देशक और दोनों मुख्य कलाकार किसी भी तरीके से सिर्फ मोदी को खुश करना चाह रहे थे।

मनमोहन सिंह को बेचारा और मजबूर बताते बताते यह फिल्म उनको हास्यास्पद भी बना देती हैं। उनके चलने, बोलने, और उठने बैठने की स्टाइल को भी। उनकी आवाज को इस तरह से निकाला गया है मानों नीली आंखों वाले खिलौने से निकलने वाले पी की आवाज को स्वर दे दिए गए हों। एक ग्लास पानी मांगने के डायलॉग को भी एक अजीब से मिमिक्री वाली आवाज में बोला गया है। आवाज की यह बनावट एक समय बाद कानों को चुभने लगती है। ये वैसी ही मिमिक्री है जैसे तमाम टीवी शो नए कलाकार राजकुमार, सुनील शेटटी  या नाना पाटेकर की आवाजें निकाला करते हैं। मनमोहन स‌िंह मर नहीं गए हैं। अभी भी टीवी पर बोलते हैं। संसद में भी। फिल्म देखने वाले दर्शक भी उनको सुनते हैं।

फिल्म का सबसे खराब पक्ष ये है क‌ि ये कोई तनाव क्रिएट नहीं करती। घटनाओं से दस सालों में ये किसी भी एक घटना को इस तरह से नहीं दिखा पाती क‌ि वह दर्शकों के जेहन में ज‌िंदा रह जाए। ये एक बॉयोपिक की तरह भी नहीं है कि वह मनमोहन स‌िंह के पक्ष को दिखा रही हो। उनकी सोच, उनकी मजबूरी या उनके मजबूत पक्षों को। हां ये संजय बारु को हीरो जरूर बनाती है। जो एरोगेंट, ताकतवर होने के साथ कूल भी है। वह महंगी शराब पीते हुए दोपहर में अपने आलीशान बंगले में लंच बनाता है और जब मनमोहन से मिलने के ल‌िए जाता है तो उनके साथ बैठे कैबिनेट मंत्रियों को कमरे से बाहर निकाल देता है।

फिल्म बारु की किताब लिखने की प्रक्रिया और उसके हिट हो जाने को भी अपने दृश्यों में शामिल करती है। अप्रैल 14 में रिलीज हुई इस किताब को मैंने नवंबर 14 में अपने एक साथी के साथ दरियागंज को फुटपाथ मार्केट में 50 रुपए में खरीदी थी। पढ़ नहीं पाया था। लेकिन अब पढ़ना चाहूंगा ये जानने के ल‌िए कि क्या किताब भी इतनी ही घटिया है। हां, एक बार और। फिल्म बताती है कि राहुल गांधी को बढ‌़िया इटालियन बोलना भी आता है। ये इसल‌िए बता रहा हूं कि कल ममता बनर्जी ने कहा है कि मोदी एक लाइन अंग्रेजी की नहीं बोल पाते।

Friday, December 21, 2018

मैं आज थिएटर में अपने सुपरस्टार की तेरहवीं खाकर आया हूं

मेरे अंदर ड्रॉपर से निब पेन में स्याही भरने का सहूर भी नहीं आया था, मेरे पैर इतने लंबे नहीं हुए थे कि मैं पापा की 20 इंची सायकिल चला सकूं, तब तक मुझे नहीं पता होता था कि गाने में आवाज शाहरुख या आमिर की ना होकर सोनू निगम और उदित नारायण होती थी उसके बहुत पहले शाहरुख खान सुपरस्टार बन चुके थे। आपकी समझ आने के पहले ही यदि किसी का आभामंडल आपके पूरे वजूद पर छा जाए तो उसके तिलिस्म को टूटते हुए देखने का दर्द भी है और मज़ा भी। ज़ीरो फिल्म के शाम के शो में मैं ये तिलिस्म टूटता हुआ देखकर आ रहा हूं, और जाहिर है कि ये मज़े लेकर भी। इंटरवल के बाद जब दर्शक अपने इस सुपरस्टार की खिल्ली उड़ाते हुए हॉल से निकलने लगे तो लगा कि मैं अपने इस हीरो की तेरहवी की पंगत में खाने बैठा हूँ। दो-तीन ये पंगत और चलेगी। फिर सब मरने वालों को भी भूल जाएंगे और पंगत में परोसी गई सब्जी या चटनी को भी।

मुझे याद नहीं आता कि शाहरुख की ऐसी भी कोई फ़िल्म रही है जिस पर दर्शक उसे पूरा करने का सब्र भी ना रख पाए हों। हैरी मेट सेजल और फैन भी शाहरुख की असफल फिल्में थीं लेकिन वो तिलिस्म को तोड़ने वाली फिल्में नहीं थीं। रॉ वन घाटा देने वाली फिल्म थी और डियर जिंदगी बहुत सफल न होकर भी उनकी रेंज को दिखाने वाली।

 जीरो फिल्म अपने अभिनय की वजह से शाहरुख की सबसे खराब फिल्म नहीं है। एक्टिंग के मामले में हो सकता है कि ये शाहरुख़ की मास्टरपीस कही जाए लेकिन ये शाहरुख के दुरुपयोग वाली फिल्म जरूर कही जाएगी। युगों युगों तक। साथ ही ये उनके मिस जजमेंट की फ़िल्म है, ये आनंद एल राय और हिमांशु शर्मा की सीमाओं को दिखाने वाली फिल्म है, एक निर्देशक और लेखक के फेल होने की फ़िल्म है। एक नकली और बनावटी किरदारों वाली फिल्म है। एक नए हाथों से सुपरस्टार को न संभाल पाने वाली फिल्म है।

ऐसा नहीं है कि शाहरुख रियलस्टीक सिनेमा के हीरो रहे हों और सच में पंजाब में कोई बाप अपनी बेटी से 'जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी कहता हो' शाहरूख का पूरा सिनेमा ही नकली रहा है। लेकिन ये नकली उनका अपना बनाया हुआ नकली था। जो नकली होते होते असली सा होता गया। जिसमें फिलिंग और अदाएं असली थीं। जिसमें शाहरुख असली थे, उनका इश्क असली था, उनकी फैलती हुए बाहें असली थीं, उनका स्विट्जरलैंड असली था, शिफॉन की साड़ी पहने पहाड़ में डांस कर रही उनकी प्रेमिका असली थी और अंत में किसी भी सूरत में होने वाली उनकी जीत असली थी।

आत्मविश्वास से भरे किसी बौने की प्रेम कहानी पहली नजर में दिलचस्प लग सकती है और ये शायद शाहरुख को लगी भी हो लेकिन उसका ट्रीटमेंट इतना घटिया होगा ये उन्हें तो समझ में आना चाहिए था। उनको पता होना चाहिए था कि नकली मेरठ चल सकता है ये किरदार और उनकी मोहब्बत नहीं चल पाएगी।
इंटरवल तक कैसे भी गिर पड़ते चलने वाली ये फ़िल्म मेरठ से मुंबई पहुँचते ही किसी नौसिखिया डायरेक्टर की फ़िल्म लगने लगती है। ऐसा लगता है कि आनंद एल रॉय की पहली फिल्म स्ट्रेंजर के बाद इस फ़िल्म को बना रहे हैं। बीच में कोई और उनके नाम से फिल्में बनाता रहा है। संवादों से कमाल के किरदार रचने वाले हिमांशु शर्मा शायद शाहरुख का लोड बर्दाश्त नहीं कर पाए।

 फ़िल्म की अच्छी बात ये है कि कमाल की घटिया स्क्रीप्ट होने के बाद भी किसी भी किरदार का अभिनय घटिया नहीं था। आनंद और हिमांशु को छोड़कर सब अपनी इज़्ज़त और इमेज बचा लेते हैं। रेस 3, ठग के बाद ज़ीरो का ये प्रदर्शन के ट्रेंड नहीं शो कर रहा है?