Friday, January 11, 2019

काश ये फिल्म एक एजेंडा फिल्म ही बन जाती, कम से कम कोई तो खुश होता...


एक्सीडेंटल प्राइम म‌िनिस्टर एक बुरी नहीं दरअसल बहुत बुरी और लिजलिजी फ‌िल्म है। ये बुरी फिल्म बन सकती थी पर तब जब ये पूरी मेहनत के साथ एक एजेंडा फिल्म बनाई जाती। एक अच्छी और इफेक्टिव एजेंडा फिल्म बनाने की कोशिशों में तब कम से कम ये एक फिल्म तो बन ही जाती। नहीं फर्क पड़ता था क‌ि तब वह गांधी परिवार को रेडीक्यूल करती या मनमोहन को मजबूर बताती। वह कुछ नयी बातें बताती। झूठ ही सही उन्हें अच्छी तरीके से एस्टेबलिस कर देती। कुछ लोगों का मनोरंजन होता कुछ गाली देते। ये कोई जानकारी नहीं हुई कि  2004 से लेकर 2014 तक सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी रहीं। सबको मालूम है। क्या नया है।  फिल्म घटनाओं को इतने सरसरी तौर पर लेती है कि लगता है क‌ि हम साल के अंत में छपने वाली इयर बुक के पन्ने पलट रहे हों और घटनाओं को तारीख वाइज देख भर रहे हों।

ये एक फीचर फिल्म और डाक्यूमेंट्री का मिलाजुला रुप लगती है। कभी ये फिल्म बन जाती हो कभी डाक्यूमेंट्री। एक सीन में आपको अनपुम खेर वाले मनमोहन स‌िंह दिखते हैं और अगले सीन में ही असली वाले। कभी आडवाणी ये वाले हैं तो कभी फिल्मी वाले। फिल्म में बचकाने सीन्स की भरमार है जो ये सिर्फ ये साबित करने के ल‌िए रखे गए हैं ताकि आपको पता चले क‌ि गांधी परिवार कितना कन‌िंग और घटिया है। गांधी परिवार का विरोध करने वालों के लिए ये भी कोई नई सूचना नहीं है। वो इतने जानकार हैं कि सबके पास गांधी परिवार की अपनी अपनी फिल्में हैं। वाटसअप विवि के जर‌िए वो फिल्म से ज्यादा अपडेट हैं। वो सोनिया गांधी के बारे में ये भी जानते हैं कि वो होटलों में खाना परोसती थीं और इधर ये भी जान गए हैं कि उनके पास दुनिया भर में दस हजार होटल हैं। वो नेहरु के बारे में खुद नेहरु से भी ज्यादा जानते हैं।

फिल्म में शक्तियों का एक अजीब सा बंटवारा दिखाया गया है।  फिल्‍मी मनमोहन स‌िंह ऐसे हैं क‌ि नीली पगड़ी खुद से बांधने के अलावा उनके सारे काम उनके मीडिया सलाहकार संजय बारु करते हैं। वही फिल्म के सूत्रधार हैं और हीरो भी। वह मनमोहन स‌िंह से कम बात करते हैं दर्शकों से ज्यादा।  फिल्म बताती है क‌ि 2004 से लेकर 2009 तक केंद्र सरकार में सबसे ताकतवर आदमी मनमोहन या सोनिया ना होकर संजय बारु होते हैं। वो जो चाहे कर सकते हैं। देश का पीएम जो वित्तमंत्री और आरबीआई का गर्वनर रह चुका था बारु उसे नर्सरी क्लास के बच्चे की तरह बोलना सिखाते हैं। पब्लिक और मीडिया में हाउ हाउ टू बिहेव, हाउ टू सरवाइव  जैसे लेसन बारु लगातार उन्हें दे रहे होते हैं। ताकतवर वो इतने हैं कि उनके सामने कैबिनेट मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव कोई हैसयित नहीं रखते। मनमोहन सिंह उनसे कहकर आपने भाषण लिखवाते हैं और छप्‍पी देने के लिए कहते हैं। वो बारु से ओ तेरी... कहकर बात करते हैं।

तमाम कोशिशों के बाद भी यह फिल्म बहुत बुरी इसल‌िए बनी क्योंक‌ि इस फिल्म केअनाम से निर्देशक को ना तो राजनीत‌ि की लेयर्स समझ में आती हैं और ना ही उसके ग्रे शेड। ऐसा लगता है क‌ि किताब के कुछ पन्ने रैंडमली उठा लिए गए हैं और जो पन्‍ना जहां से मिला उसे शूट कर लिया गया।  फिल्म सिलसिलेवार एक कहानी की तरह आगे नहीं बढ़ती। ना ही उन घटनाओं को राजनीत‌ि में पीछे घटी घटनाओं से जोड़ने की कोशिश करती है। हो सकता है क‌ि इसकी वजह ये हो कि फिल्म के निर्देशक का फिल्मी दुनिया के साथ-साथ राजनीत‌ि से भी कोई वास्ता ना रहा हो। फिल्म बनाने के समय ही उन्होंने जाना हो कि उड़ीसा के उस समय के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक रहे हों। या पी चिदंबरम नाम का कोई आदमी माइनेंस मिनिस्ट्री में दखल रखता है।

 गूगल सर्च में फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटटे का कोई फिल्म रिकॉर्ड नहीं मिलता है। इसके पहले उन्होंने क्या काम किया है ये पता नहीं चल पाता।  उनको लेकर ऑनलाइन मीडिया में जो खबरें हैं वो उनकी जीएसटी टैक्स चोरी और उनकी कंपनियों पर पड़े छापे को लेकर हैं। ये खबरें भी हाल ही की हैं। फिल्‍म के एनाउंसमेंट के बाद की। एक ऐसा नॉन पोलटिकल, नॉन फिल्मी बैकग्राउंड का आदमी यद‌ि ऐसी फिल्म बनाता है तो इससे बेहतर फिल्म की उम्‍मीद भी नहीं की जानी चाह‌िए।  ‌फिल्म देखकर लगता है क‌ि फिल्म के निर्देशक और दोनों मुख्य कलाकार किसी भी तरीके से सिर्फ मोदी को खुश करना चाह रहे थे।

मनमोहन सिंह को बेचारा और मजबूर बताते बताते यह फिल्म उनको हास्यास्पद भी बना देती हैं। उनके चलने, बोलने, और उठने बैठने की स्टाइल को भी। उनकी आवाज को इस तरह से निकाला गया है मानों नीली आंखों वाले खिलौने से निकलने वाले पी की आवाज को स्वर दे दिए गए हों। एक ग्लास पानी मांगने के डायलॉग को भी एक अजीब से मिमिक्री वाली आवाज में बोला गया है। आवाज की यह बनावट एक समय बाद कानों को चुभने लगती है। ये वैसी ही मिमिक्री है जैसे तमाम टीवी शो नए कलाकार राजकुमार, सुनील शेटटी  या नाना पाटेकर की आवाजें निकाला करते हैं। मनमोहन स‌िंह मर नहीं गए हैं। अभी भी टीवी पर बोलते हैं। संसद में भी। फिल्म देखने वाले दर्शक भी उनको सुनते हैं।

फिल्म का सबसे खराब पक्ष ये है क‌ि ये कोई तनाव क्रिएट नहीं करती। घटनाओं से दस सालों में ये किसी भी एक घटना को इस तरह से नहीं दिखा पाती क‌ि वह दर्शकों के जेहन में ज‌िंदा रह जाए। ये एक बॉयोपिक की तरह भी नहीं है कि वह मनमोहन स‌िंह के पक्ष को दिखा रही हो। उनकी सोच, उनकी मजबूरी या उनके मजबूत पक्षों को। हां ये संजय बारु को हीरो जरूर बनाती है। जो एरोगेंट, ताकतवर होने के साथ कूल भी है। वह महंगी शराब पीते हुए दोपहर में अपने आलीशान बंगले में लंच बनाता है और जब मनमोहन से मिलने के ल‌िए जाता है तो उनके साथ बैठे कैबिनेट मंत्रियों को कमरे से बाहर निकाल देता है।

फिल्म बारु की किताब लिखने की प्रक्रिया और उसके हिट हो जाने को भी अपने दृश्यों में शामिल करती है। अप्रैल 14 में रिलीज हुई इस किताब को मैंने नवंबर 14 में अपने एक साथी के साथ दरियागंज को फुटपाथ मार्केट में 50 रुपए में खरीदी थी। पढ़ नहीं पाया था। लेकिन अब पढ़ना चाहूंगा ये जानने के ल‌िए कि क्या किताब भी इतनी ही घटिया है। हां, एक बार और। फिल्म बताती है कि राहुल गांधी को बढ‌़िया इटालियन बोलना भी आता है। ये इसल‌िए बता रहा हूं कि कल ममता बनर्जी ने कहा है कि मोदी एक लाइन अंग्रेजी की नहीं बोल पाते।

Friday, December 21, 2018

मैं आज थिएटर में अपने सुपरस्टार की तेरहवीं खाकर आया हूं

मेरे अंदर ड्रॉपर से निब पेन में स्याही भरने का सहूर भी नहीं आया था, मेरे पैर इतने लंबे नहीं हुए थे कि मैं पापा की 20 इंची सायकिल चला सकूं, तब तक मुझे नहीं पता होता था कि गाने में आवाज शाहरुख या आमिर की ना होकर सोनू निगम और उदित नारायण होती थी उसके बहुत पहले शाहरुख खान सुपरस्टार बन चुके थे। आपकी समझ आने के पहले ही यदि किसी का आभामंडल आपके पूरे वजूद पर छा जाए तो उसके तिलिस्म को टूटते हुए देखने का दर्द भी है और मज़ा भी। ज़ीरो फिल्म के शाम के शो में मैं ये तिलिस्म टूटता हुआ देखकर आ रहा हूं, और जाहिर है कि ये मज़े लेकर भी। इंटरवल के बाद जब दर्शक अपने इस सुपरस्टार की खिल्ली उड़ाते हुए हॉल से निकलने लगे तो लगा कि मैं अपने इस हीरो की तेरहवी की पंगत में खाने बैठा हूँ। दो-तीन ये पंगत और चलेगी। फिर सब मरने वालों को भी भूल जाएंगे और पंगत में परोसी गई सब्जी या चटनी को भी।

मुझे याद नहीं आता कि शाहरुख की ऐसी भी कोई फ़िल्म रही है जिस पर दर्शक उसे पूरा करने का सब्र भी ना रख पाए हों। हैरी मेट सेजल और फैन भी शाहरुख की असफल फिल्में थीं लेकिन वो तिलिस्म को तोड़ने वाली फिल्में नहीं थीं। रॉ वन घाटा देने वाली फिल्म थी और डियर जिंदगी बहुत सफल न होकर भी उनकी रेंज को दिखाने वाली।

 जीरो फिल्म अपने अभिनय की वजह से शाहरुख की सबसे खराब फिल्म नहीं है। एक्टिंग के मामले में हो सकता है कि ये शाहरुख़ की मास्टरपीस कही जाए लेकिन ये शाहरुख के दुरुपयोग वाली फिल्म जरूर कही जाएगी। युगों युगों तक। साथ ही ये उनके मिस जजमेंट की फ़िल्म है, ये आनंद एल राय और हिमांशु शर्मा की सीमाओं को दिखाने वाली फिल्म है, एक निर्देशक और लेखक के फेल होने की फ़िल्म है। एक नकली और बनावटी किरदारों वाली फिल्म है। एक नए हाथों से सुपरस्टार को न संभाल पाने वाली फिल्म है।

ऐसा नहीं है कि शाहरुख रियलस्टीक सिनेमा के हीरो रहे हों और सच में पंजाब में कोई बाप अपनी बेटी से 'जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी कहता हो' शाहरूख का पूरा सिनेमा ही नकली रहा है। लेकिन ये नकली उनका अपना बनाया हुआ नकली था। जो नकली होते होते असली सा होता गया। जिसमें फिलिंग और अदाएं असली थीं। जिसमें शाहरुख असली थे, उनका इश्क असली था, उनकी फैलती हुए बाहें असली थीं, उनका स्विट्जरलैंड असली था, शिफॉन की साड़ी पहने पहाड़ में डांस कर रही उनकी प्रेमिका असली थी और अंत में किसी भी सूरत में होने वाली उनकी जीत असली थी।

आत्मविश्वास से भरे किसी बौने की प्रेम कहानी पहली नजर में दिलचस्प लग सकती है और ये शायद शाहरुख को लगी भी हो लेकिन उसका ट्रीटमेंट इतना घटिया होगा ये उन्हें तो समझ में आना चाहिए था। उनको पता होना चाहिए था कि नकली मेरठ चल सकता है ये किरदार और उनकी मोहब्बत नहीं चल पाएगी।
इंटरवल तक कैसे भी गिर पड़ते चलने वाली ये फ़िल्म मेरठ से मुंबई पहुँचते ही किसी नौसिखिया डायरेक्टर की फ़िल्म लगने लगती है। ऐसा लगता है कि आनंद एल रॉय की पहली फिल्म स्ट्रेंजर के बाद इस फ़िल्म को बना रहे हैं। बीच में कोई और उनके नाम से फिल्में बनाता रहा है। संवादों से कमाल के किरदार रचने वाले हिमांशु शर्मा शायद शाहरुख का लोड बर्दाश्त नहीं कर पाए।

 फ़िल्म की अच्छी बात ये है कि कमाल की घटिया स्क्रीप्ट होने के बाद भी किसी भी किरदार का अभिनय घटिया नहीं था। आनंद और हिमांशु को छोड़कर सब अपनी इज़्ज़त और इमेज बचा लेते हैं। रेस 3, ठग के बाद ज़ीरो का ये प्रदर्शन के ट्रेंड नहीं शो कर रहा है?

Friday, November 9, 2018

विजय कृष्ण आचार्य के हाथ काट लेने चाहिए, वह मना करें तो उनका लिंग काट लेना चाहिए


ठग्स ऑफ हिंदुस्तान दरअसल बहुत बुरी फिल्म नहीं है। दरअसल ये एक निर्देशक की सिनेमाई लिमिटेशन की कहानी है। ऐसा लगा है कि कोई अपना पैर अलग-अलग साइज के दूसरों के जूतों में डालकर चलने की कोशिश कर रहा है। चलने में कभी जूता आगे घिसक जाता है तो कभी पांव। ठग... जैसा बचकानापन जीवन में भी होता है। एक आदमी जब अंदर से बिलो एवरेज होकर पैसों के दम पर बड़ा  दिखना चाहता है तो वह अपने उन कॉम्पलेक्स को महंगे लिबास, महंगी विदेशी घडियों,  लग्जरी गाड़ियों या फोर बेड रुम  फ्लैट से ढकने की कोशिश करता है। वह आपको महंगी विदेशी शराब ऑफर  करता हूं लेकिन उस शराब दो घूंट निगलने के बाद जब वह बोलता तो उसकी कलई घुल जाती है। उसका सतहीपन उभरकर उतराने लगता है।

एक फिल्माकर के  तौर पर यही खालीपन विजय कृष्ण आचार्य निर्देशित ठग्स ऑफ हिंदुस्तान के हर सीन में दिखता है। वह अपनी सीमाओं और बचकानेपन को बडे सितारों के आभामंडल, वीएफएक्स तकनीक, बड़े-बड़े सेट से ढकने की कोशिश करते हैं। हर एक सीन में जहां इमोशन दिखने चाहिए, किरदार के लेयर्स दिखने चाहिए उन्होंने उसे बस वैसे ही ड्रामेटिक बना दिए जैसे स्टार प्लस में आने वाले धारावाहिकों के सीन। जहां आप किसी किरदार से कनेक्ट नहीं हो पाते बस उसे होते हुए देखते रहते हैं। चूंकि वहां ब्रेक होते हैं, एपीसोड की लेंथ 22 मिनट की होती है इसलिए आप उसे झेल लेते हैं लेकिन तीन घंटे की फिल्म को लगातार झेलना कठिन हो जाता है। आपका मन करता है कि आप यहां से निकल जाएं और फील करें कि आपकी रियल दुनिया उतनी बोरिंग नहीं है जितनी की ये फिल्म।

कई जगहों पर ये फिल्म कॉमेडी की तरह होती है जो निर्देशक की नजर में भव्य एक्शन होता है। अमिताभ बच्चन बहुत बुजुर्ग आदमी के मेकअप में हैं। चेहरे पर इतनी घनी दाढी है कि समझ में नहीं आता कि आवाज कहां से निकल रही है। वह एक लडकी के साथ कुछ कुछ देर में अंग्रेजों के जहाज लूटने लगते हैं। लडकी की अपनी एक अलग कहानी है। वह हर समय गुस्से में होती है। जब वह युद्व नहीं भी कर रही होती है, शाम को समंदर की तरफ निहार रही होती है तब भी वह उतनी ही नाराज दिखती है।  नाराजगी ऐसी की जैसे मम्मियां गुस्से वाला मुंह बनाकर बच्चे को डराएं और बच्चा डर के मारे दूध पीले। उधर अमिताभ जब वह युद्व के लिए जा रहे होते हैं तो एक चील या बाज जैसा कोई जीव उडकर आने की दस्तक देता है और एक खास तरह की आवाजें बैकग्राउंड से निकलने लगती है। ऐसा 90 दशक की कई घटिया फिल्मों में दर्शक देख चुके होते हैं।

गुस्से वाली ये लडकी है हर बार एक तरह से फिसलकर तीर चलाती है। अमिताभ मुंह से भें भें की आवाज निकालते हैं और सामने वााले जहाज में गोले बरसने लगते हैं। जब गोले फूटने लगते हैं तो वह हेया हेया जैसी आवाज दो बार निकालते हैं। जहाज लूटने के ये सीन फिल्म में कई बार हैं। अमिताभ बच्चन हर बार वैसा ही करते हैं। लाल पोशाक पहने कंपनी के सैनिकों की भर्ती की जांच होनी चाहिए। उनको भर्ती किसने किया था? उन्हें कभी भी कोई भी मार सकता है। एक नॉन प्रोफेशनल सैनिक भी सात से आठ लाल कपडों वालों को मार देता है। वह किसी को मार रहे हैं ऐसा फिल्म में कभी नहीं दिखाया गया है। लंदन को इस फिल्म पर ऐतराज जताना चाहिए।

मजे की बात ये है कि अमिताभ अपना गिरोह छिपाकर रखते हैं तो जहाज लूटकर वह करते क्या हैं। वह खुद भी जहाज से चलते हैं लेकिन कई बार वह नाव से भी चलते हैं। लडकी के विपरीत अमिताभ जहाज लूटने के बाद शांत हो जाते हैं। और शाम को बंजर जमीन में खेती करने लगते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स हास्यास्पद है। आचार्य जी 2018 में आप जहर वाले लडडू खिलाकर सैनिकों को बेहोश करता हुआ दिखाओगे? फिल्म बनाने का आपका लाइसेंस क्यों न रदद कर दिया जाए। आपके हाथ क्यों ना काट लिए जाएं और आप मना करें तोआपका लिंग क्यों ना काट लिया जाए?

आपको आमिर खान को वेस्ट करने में भी शर्म आनी चाहिए। साथ में फातिमा सना शेख को भी। इनकी दंगल देखिए और आठ दस बार देखिए। हो सकता है कि शूटिंग के बाद आमिर हंसते रहे हों कि वह कर क्या रहे हैं। लेकिन उन्हें ये भी पता था कि दीवाली वीकेंड में  ये फिल्म उनके कैरियर की सबसे बडी फिल्म बनने वाली है। आपने कैटरीना कैफ को बहुत सेक्सी दिखाया है। उनसे एक्टिंग नहीं करवाई है। ये आपका एकमात्र ठीक काम है। उनको देखकर कंपनी के सैनिकों के साथ साथ दर्शकों का भी मन सेक्स करने का हो सकता है।

सिनेमा में कहानी कुछ नहीं होती। वह हमेशा एक पेज  की होती है। निर्देशक और लेखक की ताकत इस बात में होती है कि कैसे उस एक पेज की कहानी को 100 पन्नों की पटकथा में बदलें। उन पन्नों में किरदार हों, सीन हों। कहानी उसमें एक स्वेटर की तरह बुनी हो जिसमें कंधा भी हो, बांह भी। पेट और पीठ भी। ठग्स ऑफ हिंदुस्तान में ऐसा कुछ  भी नहीं है। इस फिल्म के बाद विजय कृष्ण आचार्य बस उस जमात में आकर खडे हो जाते हैं जहां प्रभुदेवा,  साजिद वााजिद,  साजिद खान,  अभिनव कश्यप, शिरीष कुंदर  जैसे जैसी घटिया निर्देशक पहले से खडे हुए होते हैं। जब आप ये लाइन पढकर  होंगे उस समय इस फिल्म के सबसे जल्दी सौ करोड कमाने की खबरें भी आ चुकी होंगी। एक सप्ताह बाद आप इस फिल्म की सक्सेज पार्टी की तस्वीरें भी दिखेंगे। भारतीय सिनेमा को अभी और जलील होना है...

Friday, October 19, 2018

मिडिल क्लास को भी किसी भी उम्र में सेक्स करने का पूरा हक है, और हां शराब पीने का भी



शराब पीना और सेक्स करना जैसे 'बुरे काम' कितने बुरे हैं इनकी डिग्री परिवेश तय करता है। मध्यमवर्गीय आदमी के लिए ये दोनों ही टैबू हैं। वो ये दोनों काम करता तो है गिल्ट के साथ। सेक्स तो बहुत ही बुरी चीज है। शादी के बाद जब  लड़की
 प्रेगनेंट होती है तो उसे ये बात अपने भाई और पिता से बताने में झिझक होती है। झिझक की वजह ये होती है कि वह मां बनने वाली है तो इसका मतलब ये है कि उसने सेक्स किया होता है। ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों में ये बातें आज भी वाया मां परिवार  के मेल मेंबर तक पहुंचती हैं । बधाई हो एक ऐसे विषय पर बनी फिल्म है जिसमें एक युवा इस झिझक के साथ जीता है कि उसकी मां 'फिर से मां' बनने वाली है। वो भी तब जब वह खुद अफेयर में  है और शादी करने वाला है। जाहिर है कि बच्चा जूठा आम खाने से तो वजूद में आया नहीं होगा तो ज्यादा शर्म की बात ये है कि उसके मां बाप अभी भी सेक्स करते हैं। उसके मां-बाप भी अनजाने में हुए इस पाप को कवर करते हुए चलते हैं। घर में, मोहल्ले में, ऑफिस में। चूंकि एबॉर्शन करना उनके लिए इससे बडा पाप है इसलिए वह बच्चा रखने के अपेक्षाकत छोटे पाप के साथ सरवाइव करने का फैसला लेते हैं। फिल्म कॉमिक अंदाज में बहुत ही कठिन और डिस्कश ना करने वाली चीजों की चर्चा करती हुई चलती है। एक शानदार भावुक क्लाइमेक्स के  साथ।

सेक्स को मुख्य विषय बनाकर भारत में कुछ बहुत अच्छी फिल्में बनाई गई हैं। इसमें से कुछ गुमशुदा हैं और कुछ को चर्चाएं मिलीं। दिल कबडडी, मिक्सड डबल, रात गई बात गई जैसी फिल्में गुमशुदा और असफल रही हैं। विक्की डोनर, शुभ मंगल सावधान को आप सफल की कैटेगरी में रख सकते हैं। बधाई हो इन सभी फिल्मों से  एक कदम आगे की फिल्म है। बिना अश्लील हुए और मुंह छिपाए ये फिल्म सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बात करती है। घर की दादी के मुंह से जब निरोध शब्द निकलता है तो हमें अटपटा नहीं लगता है। हम हंसते हैं। फिर फिल्म खत्म होते होते खुद शादी की दहलीज में खड़े लडके को अपने मां बाप का सेक्स करना बुरा नहीं लगता। जो कुछ समय पहले बहुत ही लिजलिजा सा ख्याल लगता है। और लडका शर्मिंदगी में अपनी 'अपरक्लास प्रेमिका' से बात करना तक बंद कर देता है क्योंकि उसे डर है वह उसे जज करेगी।

बधाई हो इधर समाज और खासकर शहरी कल्चर में आई एक नई टेंडेंसी पर भी बात करती है। लड़की और उसकी फैमिली को मिडिल क्लास का लड़का तो पसंद आता है पर उसे फैमिली उसे 'डाउन मार्केट' लगती है। लड़का इसलिए पसंद आता है क्योंकि वह महसूस करती हैं कि लड़के को खुद भी 'मिडिल क्लास' होने पर शर्म है और वह मिडिल क्लास से 'वाया अपर मिडिल क्लास' अपर क्लास में शिफ्ट हो रहा है। शादी के बाद लड़की उसकी इस शिफिटिंग में  मदद करेगी। एक्चुअली ये एक अनकही डील होती है। मैंने आसपास हाल ही में अमीर हुए बहुत से ऐसे मध्यमवर्गीय लडके देखे हैं जो अपनी ससुराल के स्टेटेस का ख्याल रखते हुए ऐसे मां बाप से उचित दूरी बना लेते हैं जिन्हें मॉल के एक्सीलेटर में पैर रखने में डर लगता है या वह हाथ से ही रेस्टोरेंट में दाल चावल खाने लगते हैं। पत्नी के सामने उनकी अपनी उस बोली में बात करने में झिझक होती है जिसे वह सालों से बोलते आ  रहे हैं।

फाइनेंसियल डिफरेंस को फिल्म दुनिया में पहले भी दिखाया जाता रहा है पर जरा फिल्मी अंदाज से। प्यार झुकता नहीं है से लेकर राजा हिंदुस्तानी जैसी फिल्में में ये डिस्कोर्स आए हैं। यहां भी कटघरे में 'लडके का क्लास' है। लडकी का पाप सिगार पीते हुए लडके की मासिक कमाई पूछता है और फिर अकडकर अपनी बेटी के एक दिन का खर्च बताता है। पर इधर अमीर लोग भी जरा 'संस्कारी और मॉडेस्ट' हो गए हैं। इसका रिफ्लेक्शन फिल्मों में आया है। उन्हें मिडिल क्लास से बू तो आती है लेकिन उसके आगे वह एक किस्म का सेफ्टी वाल्वलगा देते हैं। 'शिफ्टिंग इन फ्यूचर' का सेफ्टी वाल्व। बधाई हो इस टेंडेसी को बहुत 'क्लासी' तरीके से दिखाती है, बगैर अपर क्लास को जलील किए। खासकर मिडिल क्लास  के लडके का मिडिल क्लास में घर वापसी का सीन।

फिल्म का सबसे खूबसूरत पक्ष किरदारों की ऐक्टिंग और उनके किरदार का गठन है। आयुष्मान खुराना, नीना गुप्ता और गजराज राव मंझे हुए अभिनेता है। उन्होंने तो अच्छा किया ही दादी के रोल में सुरेखा सिकरी ने बेहद उम्दा काम किया है। बधाई हो एक जरुरी तौर पर देखी जाने वाली फिल्मों में है। हम हिंदी सिनेमा के सबसे सुनहरे दौर में जी रहे हैं। इसके टेस्ट को चख लेना चाहिए। कोई ठिकाना नहीं कि पांच साल के बाद हमें क्या मिलने लगे। कई बार मनमोहन को हटाने के चक्कर में हम क्या चुन लेते हैं।

Wednesday, October 3, 2018

'पटाखा' टीवी सीरियलों की लोकप्रिय कहानियों का 'इंटलेक्चुअल वर्जन' है

विशाल भारद्वाज की पटाखा देखते हुए आपको दूरदर्शन में 'चिक शैंपू पेश करते हैं' के दौर वाली फिल्में याद आ सकती हैं। ऐसी फिल्में जो सबकी समझ में आ जाएं। मेरे घर में जब भी अनोखा बंधन, प्यार झुकता नहीं, स्वर्ग या फिर इधर बाद में विवाह या बागबान जैसी फिल्में आईं तो बुश टीवी वाला कमरा हाउसफुल चला। उसी कमरे ने वह बुरा दौर भी देखा जब टीवी पर हू तू तू, जख्म, फिजा, क्या कहना जैसी फिल्में आईं। विशाल की पटाखा 'टीवी की इन सर्वमान्य फिल्मों' से दो मामलों में अलग है। पहली उसमें  कोई जाना-पहचाना चेहरा या स्टार नहीं है। दूसरा उसमें बीच-बीच में 'भारद्वाज स्कूल ऑफ फिल्म मेकिंग' के इंटलेक्चुअल छींटे और शटायर हैं। फिल्म के एक सीन में खुद को परेशान कर रहे है  युवक से नायिका बोलती है कि मारुंगी एक तो गुजरात में  जाकर गिरोगे। परेशान करने वाले को गुजरात में जाकर गिराना यूपी या बिहार में नहीं यही विशाल का पॉलिटिकल कमेंट है।

विशाल एक ऐसे फिल्मकार हैं जिनकी राजनीतिक समझ उनकी फिल्मों में रिफ्लेक्ट होती है। उनके सिनेमा का एक छोटा सीन या संवाद एक बहुत बडी बात या विडंबना को कहने की कोशिश करता है। देशकाल और राजनीतिक विचार उनकी फिल्मों में बार-बार आते जाते रहते हैं। पटाखा इस मामले में अलग है। इस बार केंद्र में वाकई एक मनोरंजक कहानी है जो भदेस है। देशी है। कहानी किस कालखंड की है ये नहीं मालूम। फिल्म में दिखाई गईं रेलगाडियों के डिब्बे नीले हैं तो यह मान लेते हैं कि ये इसी दौर की बात है। इस बार जोर सिनेमा की भव्यता पर ना होकर एक सामान्य कहानी को डायलॉग, सीन और अभिनय से चमत्कारिक बनाने में है। अगर इस आधार पर चीजों को परखा जाए तो वे सफल रहे हैं। यह फिल्म दर्शकों को लगातार इंगेज्ड रखती है। पर ये उन लोगों को कुछ निराश कर सकती है जिनके लिए विशाल,  हैदर, मकबूल, मटरु, या रंगून  जैसा सिनेमा रच चुके थे। ये कुछ वैसा ही है कि निर्मल वर्मा अपनी कोई कहानी शरदचंद या कुछ हद तक जैनेंद्र की तरह लिख दें। या फिर महेश भटट कुछ नया करने के लिए रोहित शेटटी की स्टाईल में एक कॉमेडी फिल्म बनाएं और जिसका नायक उनकी मेकिंग स्टाईल के अनरूप ही अवैध संतान हों। ये सब अच्छा रचते या बनाते हैं पर अपनी तरह से।

सिनेमा में इमेज एक ताकत भी है और कमजोरी भी। दो बहनों की लड़ाई वाली यह फिल्म विशाल के लिए कुछ वो दर्शक जोड सकती है जिन्हें रंगून बहुत हैवी लगी हो,  हैदर लेफ्ट धारा के आसपास और मटरु शुद्व राजनीतिक। पर विशाल की कुछ और फिल्में जैसे ओमकारा, सात खून माफ और कमीने विशुद्व रुप से मनोरंजक फिल्में थीं जिनका कैनवास बहुत बडा था और  घटनाएं एक परिवार  के बीच की। इन फिल्मों से तुलना करने पर पटाखा पीछे छूट जाती है और लगता है कि हम नेशनल न्यूज चैनल में कोई लोकल खबर देखने लगे। उनके इस सिनेमा में फिलॉसफी कम है और घटनाएं ज्यादा। फिलॉसिफी का पूरा जिम्मा फिल्म में सूत्रधार बने सुनील ग्रोवर पर ही है। वह मसखरे अंदाज में लोकल से ग्लोबल और ग्लोबल से इंटलैक्चुअल बातों की तरफ बढ जाते हैं। बहनों की लडाई की निरर्थकता को भारत-पाकिस्तान से जोडना उसी कवायद का हिस्सा है। ऐसे कई सारे कमेंट हैं जो फिल्म के ह्रयूमर को डार्क बनाकर ये बताने की कोशिश करते हैं कि यह अनोखा बंधन या प्यार झुकता नहीं जैसी नहीं है।

सिनेमा में सही तरीके से गांव को ना दिखाना खटकता है। गांव की लडकियां सुंदर भी हो सकती हैं और गोरी भी। ऐसी बहुत सी लडकियां मैंने देखी हैं जिनके दांत बहुत सुंदर और चमकदार होते हैं। फिल्म उन्हें टाइप्ड दिखाती है। जब वीडियो कॉलिंग है तो जींस भी हो सकती है और छोटे बालों वाली हेडर स्टाईल भी।  महिलाएं ही घर को तोडती हैं पुरूषों की इसी बनी बनाई मानसिकता को भी विशाल हवा देते हैं। जाहिर है आज से बीस साल के बाद जब विशाल सिनेमा नहीं बना रहे होंगे तब उनको हैदर के लिए ही याद रखा जाएगा ना कि पटाखा के लिए। आप देखना चाहें तो देख सकते हैं  क्योंकिफिल्म बुरी नहीं है। बस ये बदले हुए विशाल की है। जो शायद बटर चिकन और नॉन खा-खाकर थक गए थे और उन्होंने बटर खिचडी का ऑर्डर दिया हो।

Monday, September 17, 2018

चूहे बिल बनाते हैं और सांप उसमें रहते हैं, इस बार चूहे ने बिल नहीं बनाया


चूहे बिल बनाते हैं और सांप उनमें रहा करते हैं। सांप आलसी होते हैं वो काटते भी तब हैं जब उन्हें खुद अपने लिए डर लगता है। चूहे पूरे दिन काटते हैं बिना किसी डर के। अनुराग कश्यप फिल्मी दुनिया के चूहे रहे हैं उनका दूसरों के बनाए बिलों में  गुजारा नहीं हुआ है। डिब्बाबंद 'पांच' से  लेकर 'मुक्काबाज'  तक सब उन्हीं के बिल हैं। ये बिल इतने संकरे और स्टाइलिश हैं कि अगर कोई सांप उसमें घुसना चाहे तो उसकी चमड़ी छिल जाए। मनमर्जिंया अनुराग की पहली  ऐसी फिल्म है जब अनुराग दूसरों के बिल में घुसे हैं। इस फिल्म में उन्होंने कुछ रचा नहीं। ना ही किरदार, ना वातावरण, ना कहानी और ना ही नई भाषा। बस बने बनाए पहले के फॉर्मूलो को जरा अपने ढंग से एडिट भी कर दिया। जैसे एक सब एडिटर डेस्क पर बैठकर रिपोर्टर की एक कॉपी को एडिट कर देता  है। कुछ अपने शब्द डाल देता है और उसके हटा देता है।

फिल्म में कई सारे सीन ऐसे हैं जहां अनुराग कश्यप की झलक मिलती तो है लेकिन यह उनकी फिल्म नहीं लगती। इसकी कई वजह हो सकती हैं। सबसे बड़ी शायद ये  कि अनुराग शायद अपने आइसोलेशन से उकता गए हों और उन्हें अब मेनस्ट्रीम की शोहरत आकर्षित करने लगी हो। या उनको लगने लगा हो कि फिल्में अब फिल्म फेस्टिवल के लिए नहीं बल्कि भारतीय  फेस्टिवल के अनुरूप बनानी चाहिए। फैमिली ऑडियंश का एक बडा वर्ग जो उनसे चिढता है उसे वे अपने करीब बैठाना चाहते हों। चाहते हों कि उनकी फिल्में परिवार को लोग देखने आएं और फिल्म देखकर खुशी खुशी खाना ऑर्डर करें और फिल्म को भूल जाएं।


सेक्स के बाद सलवार में  नाड़ा बांधती तापसी पन्नू के उस सीन को छोड दे तों फिल्म ज्यादातर जगहों पर संस्कारी ही है। बस थोडा थोडा वैसा ही  साहस दिखाने की कोशिश करती है जैसे यूपी या मप्र के किसी स्कूल मास्टर, या बैंक कैशियर की लडकी जब पहली बार सिगरेट का  कश  खींचती है या वोदका का पहला घूंट भरती है तो उसे लगता है कि उसने बहुत बडी बगावत कर ली। इस फिल्म को देखते हुए मुझे आडवाणी का जिन्ना की मजार में जाना याद आ गया। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहना याद आया। याद आया कि कैसे 2003 में अटल बिहारी बाजपेई  ने हज यात्रियों के लिए बडी छूट की घोषणा की थी। फिर राहुल गांधी के वे चित्र भी दिमाग में आए जिसमें वे रामनामी ओढे मंदिरों के चक्कर लगा रहे  थे। ये भी याद आया कि प्रणब दा संघ के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गए  थे।

मनमर्जियां लंबी फिल्म है पर बुरी नहीं। किरदार अच्छे लगते हैं। पर कुछ कुछ टाइप्ड भी। क्लाइमेक्स का तो ऐसा है कि आप पहले से दो दिन लिख लें, फिर अक्कड़ बक्कड़ खेल लें। उसी में से कोई एक निकलेगा। टाइप्छ ऐसे कि प्रेमी, प्रेम अच्छा करेगा, सेक्स जुनूनी करेगा। बिल्कुल संतुष्ट कर देगा। लडकी को सिगरेट और शराब पीने की लिबर्टी देगा, जीवन की छोटी छोटी बातों में जज नहीं करेगा। लेकिन यही प्रेमी जिम्मेदार नहीं होगा।  पैसा नहीं कमाएगा। पति के रूप में जिम्मेदार नहीं दिखेगा। लडकी जो एक सुरक्षा चाहिए होती है वह नहीं देगा। इसके उलट फिल्म के पास एक पति भी होगा। और लगेगा कि वह पति के रुप में ही पैदा हुआ है। वह बहुत भयंकर किस्म का जिम्मेदार  होगा। संवेदनशील होगा लेकिन ठीक से सेक्स नहीं कर पाएगा। शायद सेक्स में प्रयोग बिल्कुल ना करें। 69 पोजीशन उसे पता ना हो। फ्लेवर्ड कंडोम का यूज ना करता हो। क्योंकि उसका जन्म जिम्मेदारी उठाने के लिए हुआ था ना कि सेक्स करने के लिए। मनमर्जियां ये  सब बहुत पुरानी मानसिकतााओं की हवा देती हैं, बस जरा नए तरीके से।


फिल्म के किरदार खासकर अभिषेक बच्चन का किरदार ना चाहते हुए भी 'हम दिल दे चुके सनम' के अजय देवगन और 'तनु वेडस मनु' के माधवन जैसा ही लगता है। तापसी पन्नू के किरदार का कन्फयूजन  इम्तियाज अली से चुराया हुआ लगता  है। कहीं कहीं ये करण जौहर की फिल्म भी लगने लगती है। कहीं शाद अली की तो कहीं दिबाकर बनर्जी की। बस अनुराग की नहीं लगती। जिंदगी में हमें किसी के जैसा नहीं बनना चाहिए। रन वीवीएस लक्ष्मण भी बनाते हैं और वीरेंद्र सहवाग भी। दोनों के अपने चाहने वाले हैं। लेकिन दोनों के रन बनाने के तरीके अलग अलग हैं। अनुराग की फैन फालोइंग खानों जैसी नहीं है लेकिन उनके सिनेमा को पसंद  करने वाले हैं और बढ रहे हैं। इसकी उनको कद्र होनी चाहिए।

कुछ फिल्मों से  तापसी पन्नू वैसी ही लग रही हैं जैसे एक समय परिणिती चोपडा लगती थीं। अपने कोस्टार पर चढी हुई। बिस्तर पर भी और सीन में भी। ये अच्छा लगता है लेकिन कई  बार जबरिया भी। हमारे आसपास ऐसी लडकियां नहीं हैं जो  अपनी स्कूटी से प्रेमी के घर चली जाएं या अपनी बुलेट से अरेंज्ड मैरिज वाले दूल्हे के घर जाएं और उसे मना कर आएं।  ये फेमेनिज्म का एक नया तरीका है। अच्छा लगता है कई लडकियों को। लेकिन बहुत सारी लडकियां इसे ओवरडोज मानती हैं और मानती हैं कि ये फेमेनिज्म नहीं है।

अभिषेक इस फिल्म में एक सरप्राइज पैकेज हैं। अभिषेक के खराब दिनों में भी मैंने उन्हें एक अच्छा कलाकार माना। ऐसा  कलाकार जिसे अच्छे निर्देशक कम मिले। जो मिले उन्होंने रिपीट नहीं किया। मनमर्जियां में अभिषेक का मॉडेस्ट होना बनावटी नहीं लगता। लगता  है कि ये बंदा इतना बर्दाश्त तो कर ही लेता है। 'एक दूसरे को खा जाओ, घुसे रहो एक दूसरे में' वाला सीन 'कभी अलविदा  ना कहना' का बी पार्ट लगता है। इस सीन को और लंबा होना चाहिए  था। इतना था कुछ था उस आदमी के पास उस हालात में कहने के लिए  पर जाने क्यों उस सीन को एक मिनट में ही समेट दिया गया।

इधर दो चार साल में जो  कलाकार प्रकट हुए हैं उनमें विक्की कौशल की रेंज सबसे बडी है। मनमर्जिया देखते हुए मुझे लस्ट स्टोरी और राजी वाले  विक्की याद  आ रहे थे। एक बहुत लंबी रेंज वाला ये अभिनेता वाकई  बहुत दूर तक जाने वाला है। सबकुछ ठीक है फिल्म में। बस ये कुछ लंबी कम होती और आखिरी में डायरेक्टेड बाई में अनुराग की जगह कोई  और नाम चमक गया होता। 

Friday, August 3, 2018

मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है, 'मुल्क' चाहता है कि ये टूटे


मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है। परसेप्शन यूं ही नहीं बना। इसके बनने और मजबूत होने में सालों लगे हैं। कश्मीर में हुई एक घटना गोरखपुर के किसी सुबोध शुक्ला का परसेप्शन और मजबूत कर देती है। या कोई चंदन मार दिया जाता है। मुसलमान का आतंकी होना एक अलग डिग्री का परसेपशन है। लेकिन वह अनपढ होता है, जाहिल है, कई सारी शादियां करता है। वह किसी के साथ भी सेक्स कर सकता है, बहुत सारे बच्चे पैदा करता है। गंदगी में रहता है और इस्लाम को छोडकर हर धर्म  का विरोधी होता है। और सबसे बडी बात ये है कि वह विश्वास करने का पात्र नहीं है। ये ऐसे परसेप्शन है जो रोजमर्रा की जिंदगी में हर रोज मुसलमान अपने सामने वालों की आंखों में खुद के लिए देखता है।

अब तो यूज्ड टू है। यही परसेप्शन उसे 'हम और वो' में बांटते रहे हैं। दर्दनाक पहलू ये है कि मुसलमाानों ने खुद को लेकर बन रहे इस परसेप्शन का विरोध नहीं किया, बल्कि उनका ही विरोध करने लगे जो इस तरह के परसेप्शन के साथ जी रहे होते हैं। मेरा अपना फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस हैं कि प्रगतिशील और आर्थिक रुप से बहुत सक्षम मुसलमान खुद को इस 'सो कॉल्ड गंदगी' से दूर कर लेते हैं। और वो ये बात कहते भी हैं कि 'हम' उनके जैसे नहीं हैं। मुल्क फिल्म में एसएसपी का किरदार निभाने वाले दानिश जावेद मुसलमानों के इसी तबके की सोच की नुमाइंदगी करते हैं।


मुल्क मुसलमानों को लेकर बने इन्हीं परसेप्शन की बात करती है। फिल्म के एक सीन में जब आतंकवादी के पूरे परिवार को ही सरकारी वकील आतंकी साबित कर रहे होते हैं तो उसी क्रम में वह मुसलमानों के यहां बहुत बच्चे होने का तंज कसते हैं। इस  तंज पर  कोर्ट रुम में बैठे हुए लोग ही नहीं हंसे थे। मेरे बगल में बैठे लोगों के चेहरे और शरीर में भी हल्की सी हरकत हुई थी। बावजूद इसके वे पढे लिखे लोग थे और कई सारी मसाला फिल्मों को छोडकर मुल्क देखने आए थे। उनके शरीर की ये हरकत बताती है कि धर्म को लेकर बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो अब उनके कंटोल में नहीं हैं। उनका अनकांसेस माइंड इन चीजों पर रिक्शन दे देता है। 

मुल्क ऐसे ही परसेप्शन को खारिज करने का प्रयास करती है। पर तकरीर से नहीं। वो ये कोशिश करती है कि हम बनारस के उस मुसलमान परिवार का हिस्सा बनकर सोचे जिसके घर का एक लडका आतंकवादी बन जाता है। उस घर के लोगों पर क्या बीतती है जिसके घर की दीवारों पर गो बैक पाकिस्तान के नारे लिख दिए जाते हैं। उसी घर में जिसके यहां दो दिन पहले हुई दावत में हिंदू मुसलमान दोस्तों ने साथ बैठकर खाना खाया था। एक मां अपने आतंकी बेटे की लाश लेने से मना कर देती है। किसी सामाजिक दबाव में नहीं बल्कि उसकी अंतरआत्मा इस बात को गंवारा नहीं करती। ये भारत देश ऐसे मुसलमानों से भरा पडा है।

हो सकता है कि इस देश में ऐसे मुसलमाान भी हों तो पाकिस्तान की जीत पर पटाखे बजाएं। हो सकता है कि ओसामा बिन लादेन की तकरीरे सुनते हों। हो सकता है कि उवैसी उनको एक काबिल और उनकी बात कहने वाला नेता लगता हो। लेकिन ऐसे मुसलमान कितने हैं। क्या इन चंद मुसलमानों की वजह से पूरी कौम को कटघरे में रख दिया जाएगा? फिल्म इस बारे में आपसे से सोचने के लिए कहती है। फिल्म कतई नहीं कहती कि मुसलमान कटटर नहीं है। उनके अंदर भी कटटरता है। दूसरे कौमों के लिए जहर है। धर्म को लेकर वह जाहिल हैं, लेकिन कितने फीसदी? दो- चार फीसदी की सजा 100 प्रतिशत को तो नहीं मिलनी चाहिए।

एक मैसेज देने के अलावा फिल्म, फिल्म के रुप में भी बहुत सक्षम है। कैमरावर्क बेहद शानदार है। हर एक किरदार की एक्टिंग लाजवाब है। पूरी जिंदगी मसखरी भरे रोल करने वाले मनोज पहवा ने एक आतंकी बेटे के बाप का क्या खूबसूरत रोल किया है। तापसी एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री बनकर उभरी हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज बहुत बेहतरीन है। अमिताभ बच्चन की तरह ही रिषी कपूर जवानी से बेहतर फिल्में अब कर रहा हैं। आशुतोष राणा को प्लीज हिंदी फिल्में दीजिए। नहीं तो ये फिर से साउथ इंडिया की फिल्में करने लगेंगे। अनुभव सिन्हा के सारे पाप इस फिल्म ने धो डाले हैं। उम्मीद है कि वह अब जिद जैसी फिल्म बनाने की जिद नहीं करेंगे। मुल्क एक जरुरी तौर पर देखी जाने वाली फिल्म है। देखे जाने के बाद  पूरी रात बैठकर चर्चा की जाने वाली फिल्म है। कोशिश करें....