Monday, September 17, 2018

चूहे बिल बनाते हैं और सांप उसमें रहते हैं, इस बार चूहे ने बिल नहीं बनाया


चूहे बिल बनाते हैं और सांप उनमें रहा करते हैं। सांप आलसी होते हैं वो काटते भी तब हैं जब उन्हें खुद अपने लिए डर लगता है। चूहे पूरे दिन काटते हैं बिना किसी डर के। अनुराग कश्यप फिल्मी दुनिया के चूहे रहे हैं उनका दूसरों के बनाए बिलों में  गुजारा नहीं हुआ है। डिब्बाबंद 'पांच' से  लेकर 'मुक्काबाज'  तक सब उन्हीं के बिल हैं। ये बिल इतने संकरे और स्टाइलिश हैं कि अगर कोई सांप उसमें घुसना चाहे तो उसकी चमड़ी छिल जाए। मनमर्जिंया अनुराग की पहली  ऐसी फिल्म है जब अनुराग दूसरों के बिल में घुसे हैं। इस फिल्म में उन्होंने कुछ रचा नहीं। ना ही किरदार, ना वातावरण, ना कहानी और ना ही नई भाषा। बस बने बनाए पहले के फॉर्मूलो को जरा अपने ढंग से एडिट भी कर दिया। जैसे एक सब एडिटर डेस्क पर बैठकर रिपोर्टर की एक कॉपी को एडिट कर देता  है। कुछ अपने शब्द डाल देता है और उसके हटा देता है।

फिल्म में कई सारे सीन ऐसे हैं जहां अनुराग कश्यप की झलक मिलती तो है लेकिन यह उनकी फिल्म नहीं लगती। इसकी कई वजह हो सकती हैं। सबसे बड़ी शायद ये  कि अनुराग शायद अपने आइसोलेशन से उकता गए हों और उन्हें अब मेनस्ट्रीम की शोहरत आकर्षित करने लगी हो। या उनको लगने लगा हो कि फिल्में अब फिल्म फेस्टिवल के लिए नहीं बल्कि भारतीय  फेस्टिवल के अनुरूप बनानी चाहिए। फैमिली ऑडियंश का एक बडा वर्ग जो उनसे चिढता है उसे वे अपने करीब बैठाना चाहते हों। चाहते हों कि उनकी फिल्में परिवार को लोग देखने आएं और फिल्म देखकर खुशी खुशी खाना ऑर्डर करें और फिल्म को भूल जाएं।


सेक्स के बाद सलवार में  नाड़ा बांधती तापसी पन्नू के उस सीन को छोड दे तों फिल्म ज्यादातर जगहों पर संस्कारी ही है। बस थोडा थोडा वैसा ही  साहस दिखाने की कोशिश करती है जैसे यूपी या मप्र के किसी स्कूल मास्टर, या बैंक कैशियर की लडकी जब पहली बार सिगरेट का  कश  खींचती है या वोदका का पहला घूंट भरती है तो उसे लगता है कि उसने बहुत बडी बगावत कर ली। इस फिल्म को देखते हुए मुझे आडवाणी का जिन्ना की मजार में जाना याद आ गया। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहना याद आया। याद आया कि कैसे 2003 में अटल बिहारी बाजपेई  ने हज यात्रियों के लिए बडी छूट की घोषणा की थी। फिर राहुल गांधी के वे चित्र भी दिमाग में आए जिसमें वे रामनामी ओढे मंदिरों के चक्कर लगा रहे  थे। ये भी याद आया कि प्रणब दा संघ के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गए  थे।

मनमर्जियां लंबी फिल्म है पर बुरी नहीं। किरदार अच्छे लगते हैं। पर कुछ कुछ टाइप्ड भी। क्लाइमेक्स का तो ऐसा है कि आप पहले से दो दिन लिख लें, फिर अक्कड़ बक्कड़ खेल लें। उसी में से कोई एक निकलेगा। टाइप्छ ऐसे कि प्रेमी, प्रेम अच्छा करेगा, सेक्स जुनूनी करेगा। बिल्कुल संतुष्ट कर देगा। लडकी को सिगरेट और शराब पीने की लिबर्टी देगा, जीवन की छोटी छोटी बातों में जज नहीं करेगा। लेकिन यही प्रेमी जिम्मेदार नहीं होगा।  पैसा नहीं कमाएगा। पति के रूप में जिम्मेदार नहीं दिखेगा। लडकी जो एक सुरक्षा चाहिए होती है वह नहीं देगा। इसके उलट फिल्म के पास एक पति भी होगा। और लगेगा कि वह पति के रुप में ही पैदा हुआ है। वह बहुत भयंकर किस्म का जिम्मेदार  होगा। संवेदनशील होगा लेकिन ठीक से सेक्स नहीं कर पाएगा। शायद सेक्स में प्रयोग बिल्कुल ना करें। 69 पोजीशन उसे पता ना हो। फ्लेवर्ड कंडोम का यूज ना करता हो। क्योंकि उसका जन्म जिम्मेदारी उठाने के लिए हुआ था ना कि सेक्स करने के लिए। मनमर्जियां ये  सब बहुत पुरानी मानसिकतााओं की हवा देती हैं, बस जरा नए तरीके से।


फिल्म के किरदार खासकर अभिषेक बच्चन का किरदार ना चाहते हुए भी 'हम दिल दे चुके सनम' के अजय देवगन और 'तनु वेडस मनु' के माधवन जैसा ही लगता है। तापसी पन्नू के किरदार का कन्फयूजन  इम्तियाज अली से चुराया हुआ लगता  है। कहीं कहीं ये करण जौहर की फिल्म भी लगने लगती है। कहीं शाद अली की तो कहीं दिबाकर बनर्जी की। बस अनुराग की नहीं लगती। जिंदगी में हमें किसी के जैसा नहीं बनना चाहिए। रन वीवीएस लक्ष्मण भी बनाते हैं और वीरेंद्र सहवाग भी। दोनों के अपने चाहने वाले हैं। लेकिन दोनों के रन बनाने के तरीके अलग अलग हैं। अनुराग की फैन फालोइंग खानों जैसी नहीं है लेकिन उनके सिनेमा को पसंद  करने वाले हैं और बढ रहे हैं। इसकी उनको कद्र होनी चाहिए।

कुछ फिल्मों से  तापसी पन्नू वैसी ही लग रही हैं जैसे एक समय परिणिती चोपडा लगती थीं। अपने कोस्टार पर चढी हुई। बिस्तर पर भी और सीन में भी। ये अच्छा लगता है लेकिन कई  बार जबरिया भी। हमारे आसपास ऐसी लडकियां नहीं हैं जो  अपनी स्कूटी से प्रेमी के घर चली जाएं या अपनी बुलेट से अरेंज्ड मैरिज वाले दूल्हे के घर जाएं और उसे मना कर आएं।  ये फेमेनिज्म का एक नया तरीका है। अच्छा लगता है कई लडकियों को। लेकिन बहुत सारी लडकियां इसे ओवरडोज मानती हैं और मानती हैं कि ये फेमेनिज्म नहीं है।

अभिषेक इस फिल्म में एक सरप्राइज पैकेज हैं। अभिषेक के खराब दिनों में भी मैंने उन्हें एक अच्छा कलाकार माना। ऐसा  कलाकार जिसे अच्छे निर्देशक कम मिले। जो मिले उन्होंने रिपीट नहीं किया। मनमर्जियां में अभिषेक का मॉडेस्ट होना बनावटी नहीं लगता। लगता  है कि ये बंदा इतना बर्दाश्त तो कर ही लेता है। 'एक दूसरे को खा जाओ, घुसे रहो एक दूसरे में' वाला सीन 'कभी अलविदा  ना कहना' का बी पार्ट लगता है। इस सीन को और लंबा होना चाहिए  था। इतना था कुछ था उस आदमी के पास उस हालात में कहने के लिए  पर जाने क्यों उस सीन को एक मिनट में ही समेट दिया गया।

इधर दो चार साल में जो  कलाकार प्रकट हुए हैं उनमें विक्की कौशल की रेंज सबसे बडी है। मनमर्जिया देखते हुए मुझे लस्ट स्टोरी और राजी वाले  विक्की याद  आ रहे थे। एक बहुत लंबी रेंज वाला ये अभिनेता वाकई  बहुत दूर तक जाने वाला है। सबकुछ ठीक है फिल्म में। बस ये कुछ लंबी कम होती और आखिरी में डायरेक्टेड बाई में अनुराग की जगह कोई  और नाम चमक गया होता। 

Friday, August 3, 2018

मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है, 'मुल्क' चाहता है कि ये टूटे


मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है। परसेप्शन यूं ही नहीं बना। इसके बनने और मजबूत होने में सालों लगे हैं। कश्मीर में हुई एक घटना गोरखपुर के किसी सुबोध शुक्ला का परसेप्शन और मजबूत कर देती है। या कोई चंदन मार दिया जाता है। मुसलमान का आतंकी होना एक अलग डिग्री का परसेपशन है। लेकिन वह अनपढ होता है, जाहिल है, कई सारी शादियां करता है। वह किसी के साथ भी सेक्स कर सकता है, बहुत सारे बच्चे पैदा करता है। गंदगी में रहता है और इस्लाम को छोडकर हर धर्म  का विरोधी होता है। और सबसे बडी बात ये है कि वह विश्वास करने का पात्र नहीं है। ये ऐसे परसेप्शन है जो रोजमर्रा की जिंदगी में हर रोज मुसलमान अपने सामने वालों की आंखों में खुद के लिए देखता है।

अब तो यूज्ड टू है। यही परसेप्शन उसे 'हम और वो' में बांटते रहे हैं। दर्दनाक पहलू ये है कि मुसलमाानों ने खुद को लेकर बन रहे इस परसेप्शन का विरोध नहीं किया, बल्कि उनका ही विरोध करने लगे जो इस तरह के परसेप्शन के साथ जी रहे होते हैं। मेरा अपना फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस हैं कि प्रगतिशील और आर्थिक रुप से बहुत सक्षम मुसलमान खुद को इस 'सो कॉल्ड गंदगी' से दूर कर लेते हैं। और वो ये बात कहते भी हैं कि 'हम' उनके जैसे नहीं हैं। मुल्क फिल्म में एसएसपी का किरदार निभाने वाले दानिश जावेद मुसलमानों के इसी तबके की सोच की नुमाइंदगी करते हैं।


मुल्क मुसलमानों को लेकर बने इन्हीं परसेप्शन की बात करती है। फिल्म के एक सीन में जब आतंकवादी के पूरे परिवार को ही सरकारी वकील आतंकी साबित कर रहे होते हैं तो उसी क्रम में वह मुसलमानों के यहां बहुत बच्चे होने का तंज कसते हैं। इस  तंज पर  कोर्ट रुम में बैठे हुए लोग ही नहीं हंसे थे। मेरे बगल में बैठे लोगों के चेहरे और शरीर में भी हल्की सी हरकत हुई थी। बावजूद इसके वे पढे लिखे लोग थे और कई सारी मसाला फिल्मों को छोडकर मुल्क देखने आए थे। उनके शरीर की ये हरकत बताती है कि धर्म को लेकर बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो अब उनके कंटोल में नहीं हैं। उनका अनकांसेस माइंड इन चीजों पर रिक्शन दे देता है। 

मुल्क ऐसे ही परसेप्शन को खारिज करने का प्रयास करती है। पर तकरीर से नहीं। वो ये कोशिश करती है कि हम बनारस के उस मुसलमान परिवार का हिस्सा बनकर सोचे जिसके घर का एक लडका आतंकवादी बन जाता है। उस घर के लोगों पर क्या बीतती है जिसके घर की दीवारों पर गो बैक पाकिस्तान के नारे लिख दिए जाते हैं। उसी घर में जिसके यहां दो दिन पहले हुई दावत में हिंदू मुसलमान दोस्तों ने साथ बैठकर खाना खाया था। एक मां अपने आतंकी बेटे की लाश लेने से मना कर देती है। किसी सामाजिक दबाव में नहीं बल्कि उसकी अंतरआत्मा इस बात को गंवारा नहीं करती। ये भारत देश ऐसे मुसलमानों से भरा पडा है।

हो सकता है कि इस देश में ऐसे मुसलमाान भी हों तो पाकिस्तान की जीत पर पटाखे बजाएं। हो सकता है कि ओसामा बिन लादेन की तकरीरे सुनते हों। हो सकता है कि उवैसी उनको एक काबिल और उनकी बात कहने वाला नेता लगता हो। लेकिन ऐसे मुसलमान कितने हैं। क्या इन चंद मुसलमानों की वजह से पूरी कौम को कटघरे में रख दिया जाएगा? फिल्म इस बारे में आपसे से सोचने के लिए कहती है। फिल्म कतई नहीं कहती कि मुसलमान कटटर नहीं है। उनके अंदर भी कटटरता है। दूसरे कौमों के लिए जहर है। धर्म को लेकर वह जाहिल हैं, लेकिन कितने फीसदी? दो- चार फीसदी की सजा 100 प्रतिशत को तो नहीं मिलनी चाहिए।

एक मैसेज देने के अलावा फिल्म, फिल्म के रुप में भी बहुत सक्षम है। कैमरावर्क बेहद शानदार है। हर एक किरदार की एक्टिंग लाजवाब है। पूरी जिंदगी मसखरी भरे रोल करने वाले मनोज पहवा ने एक आतंकी बेटे के बाप का क्या खूबसूरत रोल किया है। तापसी एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री बनकर उभरी हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज बहुत बेहतरीन है। अमिताभ बच्चन की तरह ही रिषी कपूर जवानी से बेहतर फिल्में अब कर रहा हैं। आशुतोष राणा को प्लीज हिंदी फिल्में दीजिए। नहीं तो ये फिर से साउथ इंडिया की फिल्में करने लगेंगे। अनुभव सिन्हा के सारे पाप इस फिल्म ने धो डाले हैं। उम्मीद है कि वह अब जिद जैसी फिल्म बनाने की जिद नहीं करेंगे। मुल्क एक जरुरी तौर पर देखी जाने वाली फिल्म है। देखे जाने के बाद  पूरी रात बैठकर चर्चा की जाने वाली फिल्म है। कोशिश करें....

Friday, June 29, 2018

संजू: जीवन में पहली बार आमिर खान का कम लंबा होना अखरा है



राजू की फिल्म थ्री इडियटस के समय ऐसी खबरें आती थीं कि आमिर हिरानी के काम में काफी दखल देते हैं और स्क्रिप्ट में बदलाव सेट पर ही करवा देते हैं। राजू इसे खारिज नहीं किया करते  थे और मीडिया से कहते कि आमिर सीनियर और  संजीदा कलाकार हैं और हमें उनके क्रिएटवि सजेशन अच्छे लगते हैं। बाद के एक इंटरव्यू में आमिर ने ऐसे ही सवालों का एक लैंडस्केप आंसर दिया था। आमिर ने कहा था कि वे स्क्रिप्ट नहीं बदला रहे थे दरअसल उस फिल्म में  राजू ने उनका जो किरदार गढा  था वह बहुत ही आदर्शवादी थी। इतना कि उसे हर सीन में अच्छे होने को स्टेबलिस करना होता। मैं उस किरदार के अच्छे होने का लोड नहीं उठा पा रहा था। मैंने बस उस किरदार  के अच्छे होने को माइल्ड किया है। और वो जो माइल्ड हुआ तो वह राजू को भी अच्छा लगा।

जो गलती हिरानी थ्री इडियटस में  आमिर की वजह से करते  करते बच गए थे वही गलती संजू में कई बार दिखती है। राजकुमार हिरानी अपने दोस्त संजय को एक अच्छे इंसान के तौर पर स्टेबलिस करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि कोर्ट से संजय को जो  सजा मिली है वो तो  वह काट ही चुके हैं पब्लिक परसेप्शन में भी उनकी इमेज बदले। राज कुमार हिरानी संजय के समर्थन में इतना एकतरफा हैं कि उन्हें उनकी हर हरकत को जस्टीफाई  करते चलना पडा है। फिल्म संजय की अच्छाई से कहीं कहीं दब सी जाती है। फिल्म बाकी कलाकार उसे  निकालते  दिखते हैं।

फिल्म के दो हिस्से हैं। पहला डग्स लेने वाला संजय दत्त और दूसरा आतंकी संजय दत्त। पहले हिस्से में यह फिल्म थोडी चुलबुली है। वह संजय को एक 'नेक लापरवाह' के रुप में  स्थापित करती हुई  चलती है। अगर वो डग्स ले रहे हैं तो उसका दुष्परिणाम कितने गहरे हैं फिल्म इस पर वह बात नहीं करती। बस इसे एक आदत मान लेती है। लेकिन  इस गंदी आदत से निकलकर  एक आदमी बनने की कोशिशों को वह 'मैदान फतेह' के रुप में दिखाती है। नशा करने वाला संजय दत्त आम आदमी बन जाते हैं और  इंटरवल हो जाता है।


इंटरवल के  बाद हिरानी संकेतों में बात नहीं कहते। वो सीधे उनके बचाव में उतर आते हैं। संजय दत्त का आर्म्स रखना, उनके आतंकियों के साथ में मेलजोल रखना, उनका गिरफतार  होना, जेल जाना। फिल्म इन सबका दोष संजय पर 25 प्रतिशत डालती है और बाकी 75 प्रतिशत कसूर  मीडिया पर। ये फिल्म सिर्फ संजय को ही स्टेबलिस नहीं करती। वो उन्हें एक अच्छे पुत्र, अच्छे दोस्त, अच्छे पति और अच्छे पिता के रुप में दावेदारी करती हुई चलती है। पिता और पुत्र के संबंधों को बहुत आदर्श तरीके से पेश करने में राजू ने बहुत सारे सीन खर्च कर डाले हैं। आपके इमोशन को वे पूरा निचोडना चाहते हैं। लेकिन ये सब कुछ 25 प्रतिशत स्वाभाविक लगती है और 75 प्रतिशत बलात।


ये एक बडी फिल्म है और अच्छी भी। दो सौ करोड से उपर कमाने वाली फिल्म। लेकिन ये फिल्म हिरानी की फिल्म नहीं है। पीके और थ्री इडियटस बनाने वाले हिरानी फिल्म। जब हिरानी इस फिल्म में अपनी ही एक फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस का जिक्र ले आते हैं तो कहीं कहीं  ये बचकाना भी लगता है। और भी यहीं पर आमिर खान याद आ जाते हैं।

आमिर खान यदि इतने लंबे होते तो कि वह संजय दत्त जैसे दिख सकते तो यकीनन संजू एक बेहतर फिल्म होती। आमिर  का कम लंबा होना मुझे मेरे  कम लंबे होने से ज्यादा जीवन में पहली बार अखरा। और शुक्रिया अनुराग कश्यप और नीरज घेवान। बॉलीवुड को विक्की कौशल जैसा अभिनेता देने के लिए।

Thursday, June 14, 2018

काला: यहां पर ये डिस्केलमर लगा देना चाहिए कि ये फिल्म सिर्फ दलित- मुसलमानों के लिए है, यह बेहद डरावना है


यह हिंदी सिनेमा की  खूबसूरती है दर्शक जब किसी फिल्म को  देखने का चुनाव करता  है तो उसके जेहन में यह बात नहीं आती कि फिल्म के नायक का धर्म क्या है, यदि वह हिंदू है तो उसकी जाति क्या  है, दर्शक ये भी पता करने की कोशिश नहीं करता कि उसके हीरो ने पर्दे पर जो रोल निभाया है वह किस जाति का है। या वह किस जाति के खलनायक का  विरोध कर रहा है। सिनेमा की यह खूबसूरती 'काला' में कई जगह बारीक तरीके से तहस नहस की गई। इसका ये तहस नहस किया जाना भविष्य के  के  प्रति डर पैदा करता है। वैसा ही डर जैसे हमनें वोट देने के लिए पार्टियां  चुनी हैं वैसे ही हमें  फिल्म देखने के लिए हीरो चुनने  होंगे।

मैं तमिलनाडु की राजनीति को करीब से नहीं जानता। वहां पर दलित मुसलमान के गठजोड की क्या संभावनांए हैं या सवर्ण जातियों  का विरोध करने पर  किस किस्म की गोलबंदी हो सकती है ये भी नहीं पता। लेकिन ऐसा लगता  है कि यह फिल्म फ्रेम दर  फ्रेम  फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे रजनीकांत के राजनीतिक एजेंडे को कलात्मक तरीके से रखती चल रही है। रजनी नई पार्टी का एलान कर चुके हैं। जिसे कुछ समय के बाद अस्थिर तमिलनाडु  की राजनीति में उतरना है, जहां जयललिता मर चुकी हैं और करुणानिधि बूढे होने की हद तक बूढे हो चुके हैं।

 सिनेमा एक्सप्रेसन का एक माध्यम है लेकिन काला उसका मिसयूज करती दिखती है। एक  खास उदेश्य की  पूर्ति के लिए। सिनेमा में जमींदार, लाला, मुनीम, पंडित जैसे किरदार कहानियों के हिस्से रहे हैं। लेकिन इन्हें इनकी गंदी मानसिकता के होने से जोडा गया ना कि इनकी जाति से। ऐसा नहीं कहा गया और ना ही दिखाया गया  कि सभी क्षत्रिय, ब्राहाम्ण या श्रीवास्तव घटिया लोग हैं। जमींदार होने को एक सोच का नाम दिया गया ना कि जाति का। यदि जमींदार  क्लाइमेक्स  में हीरो से पिटता है तो सिनेमा ने इसे क्षत्रियों की हार के तौर पर नहीं दिखाता रहा है।

काला इसके उलट खडी होती है। इस फिल्म का नायक दलित समुदाय से आता है, वह मुंबई की उस धारावी बस्ती का नेता है जहां मुसलमान और दलित रहते हैं। इस नेता की पहली प्रेमिका मुसलमान होती है। शादी उससे नहीं हो पाती है। शादी दलित से होती है। इसे दोनों तबको का समर्थन प्राप्त है। यहां तक तो ठीक होता है।  लेकिन फिल्म में इन दो जातियों के अलावा समाज की बाकी जातियों का हर आदमी विलेन है। यदि वो ब्राहाम्ण है तो उसकी एकमात्र ख्वाहिश लोगों से पैर छुलवाने की है। मेरी अपनी जानकारी में  ये पहला ऐसा सिनेमा है जहां पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर का बार-बार  इरादतन लाया गया। वह फिल्म के एक किरदार  हैं। उनके विचार तक बताए गए। और ऐसा महसूस कराया गया कि यह फिल्म सिर्फ दलितों के लिए बनाई गई। दलित चेतना के लिए। सिनेमा से इसका कोई सरोकार  नहीं है।


फिल्म के क्लाइमेक्स सीन में एक सवर्ण के घर में रामचरित मानस की कथा चल रही होती है। एक ऐसे सीन का वर्णन हो रहा होता है जहां राम, रावण को मार रहे होते हैं। मुझे थोडा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि मेरा किसी धर्म  से कोई लगाव नहीं है। लेकिन उस सीन में राम द्वारा रावण के  मारने की पूरी प्रक्रिया को  को ना सिर्फ गलत ठहराया गया  बल्कि उस पर मजाक भी किया गया। वो रावण जिसे राम मार देते हैं वह कुछ देर बाद और मजबूत तरीके से उभर आता है। और इसे रावण की जीत के तौर पर दिखाया जाता है। मुझे सतयुग के राम और रावण में रुचि नहीं है। मुझे गलत और सही चुनने में रुचि है। फिल्म गलत को सिर्फ इसलिए गलत नहीं कहती कि वह सोच से गलत है बल्कि यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि उस इसलिए गलत है क्योंकि वह उंची जातियों से है।

एक खास उदेश्यों के तहत बनाया गया यह सिनेमा, सिनेमा को तो कहीं नहीं ले जाता लेकिन एक बात जरूर बताकर चला जाता है कि एक्सप्रेशन के इस माध्यम से अपने राजनीतिक हित भी साधे  जा सकते हैं। मैं रजनीकांत या साउथ पैटर्न की फिल्मों का समर्थक नहीं रहा हूं। उनके विषय और उनकी  मेकिंग  स्टाइल से। मुझे ये फिल्म चिढाती हुई सी लगी। कि आप यदि उंची जाति में पैदा  हुए हैं  तो  आपने पाप किया है और आप बाई डिफाल्ट गलत हैं।  सिनेमा का यह तरीका हमें गलत तरीके  से  आगे ले जाएगा क्योंकि उनका जवाब देने के लिए उतने ही संकीर्ण मानसिकता के उंची जातियों के  लोग सिनेमा की दुनिया  में बैठे हुए हैं। फिल्म देखकर मुझे कई बार लगा कि इस फिल्म के साथ डिस्कलेमर लगाया जाना चाहिए कि यह सिर्फ मुसलमान और दलितों के लिए है। जिन्हें आगे चलकर अलग अलग चुनावों में अलग अलग पार्टियों के लिए वोट करना है। 

Saturday, April 14, 2018

आजकल भी बेहतर इश्क हो सकता है, राजेश खन्ना को याद करने की जरूरत नहीं है...



इश्क और जर्नलिज्म का कभी कोई स्वर्णयुग नहीं रहा है। डिपेंड करता है कि आपको इश्क और ये दूसरा वाला काम करने का मौका किन हालातों में मिले। अमर प्रेम फिल्मों के दौर में भी लपंट किस्म के प्रेम होते रहे हैं और लंपट ठहराई गई इस पीढ़ी में अमर प्रेम की कहानियां भी रची जा रही हैं। अक्टूबर एक सो कॉल्ड प्रेम कहानी है। सो कॉल्ड इसलिए कि यदि आप उससे कनेक्ट होते हैं तो ये इश्क लगता है, कनेक्ट नहीं हो पातें तो एक कुछ बेमतलब के दृश्यों का दस्तावेज।

लड़की कोमा में है। कोमा की हालत में आईसीयू में पड़ी एक लड़की से इश्क हो सकता है? हां बिल्कुल हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है वाली इसी फीलिंग को जूही चतुर्वेदी और सुजीत सरकार जस्टीफाई करने की कोशिश करते हैं। वो बहुत मेहनत नहीं करते। जबरिया कुछ भी नहीं। वो चाहते हैं कि आप मेहनत करें। आप वरुण धवन बने डैन की जगह पर खुद को खड़ा करें और शिवली से प्यार करके देखें। क्या आप प्यार कर पाते हैं?

सुजीत की एक और फिल्म पीकू की तरह ही इस फिल्म के पास कोई कहानी नहीं है। घटनाएं नहीं है। उत्तेजना और उसका स्खलन नहीं है। बस कुछ दृश्य हैं और उनकी बारीक डिटेलिंग है। बहुत अच्छा कैमरा वर्क है। और पर्दे पर एक सुकुन हैं। सुकून ऐसा कि अक्टूबर फिल्म देखकर निकला दर्शक तुरंत ही पार्किंग के लिए या ट्रैफिक में ओवरटेक या गलत कट के लेने के लिए किसी से झगड़ा नहीं कर सकता। फिल्म देखने के बाद मन चुप हो जाता है और एकांत तलाशता है।

वो दर्शक जो सिनेमा से कुछ बेसिक जरुरतें पूरी होते देखना चाहते हैं। अपने लगाए हुए टिकट पैसों के बदले भरपूर मनोरंजन और एक कल्पनाई फंतासी दुनिया में जाना चाहते हैं अक्टूबर उनको निराश कर सकती है। ऐसे दर्शक पूरी फिल्म अब कुछ होने वाला है कि फीलिंग के साथ जीते हैं और आखिरकार बिदा हो जाते हैं। वो बाद में इंतजार करते हैं उस रिपोर्ट को जो बताती है कि अक्टूबर फ्लॉप हो गई।


अक्टूबर सिर्फ हीरो-हीरोइन की कहानी नहीं है। होटल और अस्तपताल की दुनिया के साथ-साथ फिल्म तमाम सारे किरदारों पर भी बात करना चाहती हैं। शिवली और डैन की मां, शिवली के अंकल, होटल में डैन के बॉस उसकी फीमेल कलीग, उसका दोस्त ये सब सिनेमाई किरदार नहीं थे। ये सब हमारे आसपास के लोग हैं जिन्हें फिल्मों के कैमरे ने कभी डिकोड करने की कोशिश ही नहीं की। हीरोइन की दोस्त सोचती क्या है सिनेमा के पास इसे अंडरलाइन करने की कभी फुर्सत नहीं रही है। अक्टूबर के पास ये फुरसत है। शायद ये फुरसत इसलिए भी कि उसके पास बताने के लिए और कुछ है भी नहीं। हम किरदारों से इतना कनेक्ट हो जाते हैं कि वो हमें कहीं मिल जाएं तो हमें उनके पास जाकर पूछने का मन होगा कि उन्होंने आखिर ऐसा क्यों किया था?

अक्टूबर एक डरावना प्रयोग है। सिनेमा में जहां फिल्मकार एक-एक मिनट को रंगीन और जवां बना देने की जीतोड़ कोशिश करते हैं। सुजीत का कैमरा कोहरे में डूबी दिल्ली की सुबह दिखाने में व्यस्त है। उसे होटल के बगल से मेट्रो को गुजरता दिखाने में आनंद आता है। हरश्रंगार के गिरते फूलों में  उसे दिलचस्पी है।अस्पताल के आईसीयू वार्ड, डॉक्टर के कनवरशेसन और वहां की नर्स की जिंदगी को भरपूर दिखा देने की जानलेवा चाहत है। इस बात की परवाह किए बगैर की एक घंटे के बाद भी फिल्म की कहानी वहीं की वहीं हैं और दर्शक एक प्रेम कहानी देखने आया था। उसे नहीं पता था कि फिल्म की हीरोइन बाल मुंडवा के आईसीयू में लेटी हुई मिलेगी।


फिल्म में जिस किस्म का सेंस ऑफ हयूमर है अब ये बाजारों में नहीं मिलता। जो चीजें नहीं बिकती दुकानदार उन्हें रखना बंद कर देते हैं। सुजीत के लिए ये चीजें जूही ने जुटाई हैं। छोटे-छोटे दृश्यों में हल्का सा हास्य हमें हंसा देता है। ये वाली हंसी डेविड धवन, नीरज वोरा, प्रियदर्शन की हंसी से अलग होती है। हम बहुत तेज नहीं हंसते और बहुत देर तक नहीं हंसते। लेकिन जो हंसते हैं वो याद रहता है।

अक्टूबर अपेक्षाओं के बोझ से दबी हुई फिल्म थी। सुजीत पिछले कुछ समय में अलग लेवल पर का एक बहुत अच्छा सिनेमा रच रहे थे। अक्टूबर जैसी फिल्में तभी दिमाग में आती हैं जब आप पूरी तरह से आत्मविश्वास से भरे हुए हों। सुजीत की बाकी फिल्मों से तुलना करने पर ये फिल्म थोड़ी कमजोर है। कमजोर इसलिए नहीं कि ये अक्टूबर है। अक्टूबर जैसी फिल्में तो एकबार ही बनती हैं। ना उसके पहले बनी होती हैं और ना बाद में बनेंगी।

Saturday, February 24, 2018

इश्क से ज्यादा जरुरी है बेवफाई करना या बेवफाई से गुजरना, क्यों??



अपने करेंट प्रेमी/प्रेमिका के माथे पर 'मौके पर काम आएगा' लिख उसे स्टैंडबाई मोड पर रखकर दूसरे के बिस्तर में घुस जाना एक नई तरह की बेवफाई है। इसमें रिश्ते पूरी तरह से खत्म नहीं होते बस रिश्तों को लेकर लैबिलेटी वाली फीलिंग खत्म हो जाती है। जब चाहें तब इसे एक फोन कॉल से रिन्वूय भी कर सकते हैं। बेवफाई की दुनिया में ये एडवांस प्रैक्टिस है। ये बात मुझे पिछले दिनों किसी ने बताई थी। 'हम हमारे बीच कुछ रहा नहीं, इसे और कॉम्पलीकेटेड नहीं करते, यहीं खत्म करते हैं' बेवफाई की दुनिया की ये आउटडेटेड लाइन है। ये बात भी।

 बेवफाई की दुनिया इश्क से बड़ी दुनिया है। सम्मोहन भी इश्क से ज्यादा है। हिंदी फिल्में और उर्दू शायदी इस दुनिया का एक आसान और लोकप्रिय चेहरा पेश करती रही हैं। उर्दू की शायरी प्रेमी को पवित्र और बड़े दिल वाला दिखाती रही है तो वहीं हिंदी सिनेमा का मकसद इस रिश्तें में हालातों को विलेन बनाने का रहा है। फिल्मों की बेवफाई इतनी स्पष्ट रही है कि उसे पकौड़े तलने वाला स्कील्ड युवा भी समझ जाए और रिक्शा चलाने वाला नॉन स्कील्ड भी।

लव रंजन अपनी फिल्मों में बेवफाई की उन्हीं लेयर्स को दिखाने की कोशिश करते हैं जो अब तक सिनेमा में उस तरह एप्रोच नहीं की गईं। या उनकी मैपिंग बेवफाई के रुप में हुई ही नहीं। प्यार का पंचनामा के दो पार्ट के बाद सोनू के टीटू की स्वीटी भी उसी मिजाज या सोच की फिल्म है जिसके लिए लव जाने जाते हैं। शहरी बैकड्रॉप वाली ये फिल्में एक बहुत बड़े वर्ग को अपनी आवाज सी लगती हैं। लव के निशाने पर लड़कियां ही रही हैं। वे लड़कों के उस बड़े तबके की आवाज बनने की कोशिश करते रहे हैं जिन्हें ये लगता है कि इश्क के मामले में लड़कियां लड़कों से ज्यादा क्लीयर और अपारचुनिस्ट होती हैं।


प्यार का पंचनामा की दोनों फिल्मों में लव ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि लड़कियां किस तरह से लड़कों का शोषण करती हैं। उनके किस्से मनोरंजक होते हैं। कुछ हकीकत कुछ फसाने जैसे। प्रेमी-प्रेमिका साथ बैठकर ये फिल्में देखते हैं और दोनों एंज्वाय करते हैं। लड़का बीच में उठकर पॉपकॉर्न भी लाता है। हॉल खाली होने पर पप्पी भी ले लेता है। यानी बिगड़ता कुछ नहीं है। लड़कियों को भी लगता है कि हां उन्होंने कभी ना कभी तो ऐसा किया है। फिल्म के क्लाइमेक्स में लड़कियां, लड़कों से दूर हो जाती हैं और हॉल में बैठी आडियंश को यह जस्टिस लगता है।

सोनू के टीटू की स्वीटी में फर्क ये है कि लव के पास वो तर्क और किस्से खत्म हो गए हैं जिनसे वह ये बात साबित करते रहे हैं कि लड़कियां बुरी होती हैं। इस बार लव ने सिक्स सेंस को चुना। दोस्त का सिक्स सेंस कह रहा है कि लड़की गलत है और फिल्म के आखिरी सीन में सिक्स सेंस की ही जीत होती है। यहां दोस्ती और लड़की में शर्त लगी होती है। फिल्म के एक सीन में स्वीटी बनीं नुसरत भरुचा कहती हैं कि दोस्ती और लड़की में हमेशा लड़की जीतती रही है।

नुसरत की ये बात कुछ अलग तरीके से मुझे किसी ने 12वीं में बताई थी। कॉलेज में एक लड़ाई हुई थी। मेरे एक दोस्त ने समोसा खाते हुए दार्शनिक अंदाज में बताया था कि कॉलेज में होने वाली 99 फीसदी लड़ाइयां लड़कियों के लिए ही होती हैं। बस लड़कियों के नाम बदल जाया करते हैं। इस बार लड़ाई रेखा चौधरी के लिए हुई थी। रेखा चौधरी में पता नहीं ऐसा क्या जादू था कि उन्हें बहुत लड़के अलग-अलग और सामूहिक रुप से प्यार करते थे। इस घटना के बाद मैंने रेखा को 100 मीटर से लेकर 10 मीटर तक की दूरी से देखा। मुझे रेखा से इश्क नहीं हो सका। इस बात अफसोस मुझे बीएससी पार्ट 2 तक था। बाद में सुनने में आया कि रेखा चौधरी, राकेश सिंह के साथ भाग गई थीं। भागी हुई लड़कियों को लेकर मेरे मन बहुत सम्मान रहा है। मैं उनके साथ बैठकर इडली सांभर खाना चाहता हूं। मुझे खाती हुई लड़कियों को देखना बहुत पसंद है। वो खाएं और मैं उनके देखूं। बाद में वह अपने खाए हुए के पैसे खुद दें।



सोनू के टीटू की स्वीटी की सबसे अच्छी बात ये है कि इस फिल्म के पास कोई कहानी ना होते हुए भी ये अपने किस्से और दृश्यों से दर्शकों को उलझाए रखती है। कार्तिक तिवारी, नुसरत भरुचा और सनी सिंह तीनों ने ही सिचुवेशनल कॉमेडी की है। कार्तिक तो लाजवाब लगते हैं। लेकिन इस फिल्म का सरप्राइज पैकेट आलोक नाथ हैं। जब आदमी जिंदगी भर शराब नहीं पीता या पोर्न नहीं देखता तो उसे बाद में ये काम बहुत मात्रा में करने पड़ते हैं। आलोक नाथ के साथ वही हुआ है।

संस्कारी आलोक नाथ के इस फिल्म में जितने भी सीन हैं उसमें में वह लगातार शराब पीते दिखें। क्या मजेदार तरीके से शराब पीते हैं और उसी मजेदार तरीके से टाइमिंग के साथ वनलाइनर बोलते हैं। ये आलोक नाथ के लिए सबसे बड़ी फिल्म है। इस फिल्म ने आलोक नाथ से आलोक नाथ का पीछा छुटवाया है।

लव रंजन की यह फिल्म देखी जानी चाहिए। लेकिन यह एक चिंता का विषय यह है कि बेवफाई की इस सब्जेक्ट में लव खाली होते दिख रहे हैं। उनकी फिल्मों में यदि बेवफाई अपने मजबूत रुप में दिखे इसके लिए जरुरी है कि समाज में नई स्टाइल की बेवफाई क्वाइन की जाए। जाते-जाते साहिर लुधयानिवी के इस शेर का मजा लीजिए...

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं
तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी

Friday, February 9, 2018

पैडमैन: एक बहुत जरुरी फिल्म, जो थोड़ा और पहले बननी चाहिए थी




पैडमैन एक अच्छी फिल्म है। ईमानदार। बस मुझे यह थोड़ी सी लेट आई हुई लगी। एक जगह पर ये फिल्म खुद बताती है कि यह 2001 का भारत है 2018 नहीं। ये फिल्म यदि 2001 में आती तो यह मुझे अपने आसपास की कहानी लगती। जब मैं अपने आसपास कह रहा हूं मेरे दिमाग में निश्चित ही उड़ीसा, छत्तीसगढ़ या झारखंड अति पिछड़े गांव नहीं हैं। मेरे आसपास का एक मध्यमवर्गीय संसार हैं। उत्तर भारत के गांवों और कस्बों का संसार। जो अब शहर बनना चाहता हैं। ऑनलाइन शॉपिंग करना चाहता है। वह मध्यम वर्ग जहां तक यह फिल्म या फिल्म की पायरेटेड की डीवीडी पहुंच पाएंगी। 

यह एक काल्पनिक सिनेमा नहीं है। ये एक ऐसी कहानी है जिसे आप देखते हुए खुद को भी टटोलते चलते हैं। मैंने 2001 का भारत देखा है। वैसा ही गांव देखा है जैसा फिल्म में है। मैंने वह सोच देखी है जब महिलाएं अपने इनर वियर ब्लाऊज या किसी दूसरे सम्मानित कपडे़ के नीचे सुखाती थीं। पता नहीं किस शर्म से? उसे वह किससे छिपाना चाहती थी? पैड तब भी घरों में आते थे लेकिन वह बहुत छिपाकर रखे जाते थे। पीरियड में घर से बाहर तो नहीं लेकिन रसोई से बाहर करने के रिवाज देखे हैं। फिर मैंने इसी गांव और कस्बे को बदलते देखा है। पीरियड पर खाने बनाते हुए देखा है। लड़कियों को दुकान में जाकर पैड मांगते देखा है। भले ही वह आज भी चाहती हैं कि पैड उन्हें काली पॉलीथिन या अखबार में लपेटकर मिलें।



बाल्की 2018 में 2001 की बात कहना चाह रहे हैं। यही बात मुझे फिल्म से डिसकनेक्ट करती है। 2018 के जिस परिवेश में मैं या मेरे जैसा उम्र के युवा हैं उस परिवेश में मेरी फीमेल दोस्त जरुरत पड़ने पर बताती हैं कि वो आज डाऊन हैं। कई बार उस पर जोक भी कर देती हैं। ऐसा बताने वाली ये लड़कियों की अपब्रिगिंग मुंबई या पुणे की नहीं है। वह भी उप्र, मप्र या बिहार की हैं। उन्होंने वह समय देखा है और उसे बदलते हुए भी। लड़कियां कई बार छुटटी की मेल में ये बात मेंशन कर देती हैं कि वह पीरियड की वजह से नहीं आफिस नहीं आ पा रही हैं। और उन्हें यह सब सामान्य लगता है। वह पीरियड आने का डिडोरा नहीं पीटना चाहतीं लेकिन इसे वह अब एक टैबू नहीं मानतीं।  


लेयर्स में बंटे इस देश में शर्म भी अपने केचुल अलग अलग समय पर छोड़ती है। कस्बे और छोटे शहरों की दुकानों में ये पैड अभी भी काली पॉलीथिन या अखबार में लपेट कर मिल रहे होंगे लेकिन शहरों और महानगरों में शॉपिंग की ट्राली में ये  पैड रिफाइंड की बोतल के बगल में रखे हुए होते हैं। कोई हिचक नहीं कोई अनईजी नेस नहीं। ये बदलता हुआ भारत है जिसने लड़कियों को बदला है। लड़कियों को लेकर लोगों की सोच बदली है। 

बाल्की इंसान के अंदर के काम्लेक्स को दिखाने में माहिर हैं। उनकी एक असफल मानी गई फिल्म शमिताभ मुझे बेहद पसंद है। इंगलिश विंगलिश अपने समय की फिल्म है और की एंड का समय से आगे की। लेकिन ये फिल्म समय से पीछे की फिल्म है। 

धर्म और परंपराओं को लेकर जो पात्र फिल्म में दिखते हैं वो थोड़े नकली लगते हैं। एक लड़का या लड़की अपने जकड़े हुए परिवेश से बाहर निकलकर जब थोड़ी खुली हवा पाते हैं तो वह उस हवा को उस परिवेश में भी भरना चाहते है जहां की रिवाजों से उन्हें अब घुटन महसूस होती है। 2001 में बदलाव का विरोध होता था अब बदलाव का स्वागत होता है। कम से कम मेरे जानने वाले परिवेश में। मैंने बहुत लोगों को अपने बच्चों के अनुसार अपनी सोच को बदलते देखा है। लव मैरिज को अरेंज मैरिज में कनवर्ट होते देखा है। ये बदलता समाज है। लड़की मां से झगड़कर पैड खरीद लेगी। गंदा कपड़ा नहीं लगाएगी। अव्वल तो मां इसकी नौबत ही नहीं आने देगी। 


पैडमैन एक अच्छी कोशिश है। फिल्म से ज्यादा उसे इस बात की तारीफें मिलनी चाहिए कि ऐसे विषय पर कर्मिशयल सिनेमा बनाने का प्रयास किया गया है। संवेदनशील विषय होने के बाद भी इसे कहीं से भी फूहड़ नहीं बनने दिया गया। हां, इंटरवल के बाद यह फिल्म अपने किरदार को स्थापित करने की कोशिशों में ज्यादा व्यस्त होती दिखती है। लेकिन यह खटकता भी नहीं है। 

मुझे अक्षय कुमार से अधिक राधिका आप्टे का अभिनय प्रभावित करता है। राधिका आप्टे में सिनेमा की कितनी बड़ी रेंज है यह देखने के लिए एक ही दिन में पार्च्ड, हंटर, बदलापुर और शोर इन द सिटी फिल्में देखनी चाहिए। अक्षय कुमार एक ही जैसी रोल करते जा रहे हैं। उन्हें अब एक ऐसी फिल्म करनी चाहिए जिसमें वह एक चोर या बने हों। वह सक्षम अभिनेता हैं उन्हें अपनी रेंज के दर्शन कराते रहना चाहिए।