Saturday, April 14, 2018

आजकल भी बेहतर इश्क हो सकता है, राजेश खन्ना को याद करने की जरूरत नहीं है...



इश्क और जर्नलिज्म का कभी कोई स्वर्णयुग नहीं रहा है। डिपेंड करता है कि आपको इश्क और ये दूसरा वाला काम करने का मौका किन हालातों में मिले। अमर प्रेम फिल्मों के दौर में भी लपंट किस्म के प्रेम होते रहे हैं और लंपट ठहराई गई इस पीढ़ी में अमर प्रेम की कहानियां भी रची जा रही हैं। अक्टूबर एक सो कॉल्ड प्रेम कहानी है। सो कॉल्ड इसलिए कि यदि आप उससे कनेक्ट होते हैं तो ये इश्क लगता है, कनेक्ट नहीं हो पातें तो एक कुछ बेमतलब के दृश्यों का दस्तावेज।

लड़की कोमा में है। कोमा की हालत में आईसीयू में पड़ी एक लड़की से इश्क हो सकता है? हां बिल्कुल हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है वाली इसी फीलिंग को जूही चतुर्वेदी और सुजीत सरकार जस्टीफाई करने की कोशिश करते हैं। वो बहुत मेहनत नहीं करते। जबरिया कुछ भी नहीं। वो चाहते हैं कि आप मेहनत करें। आप वरुण धवन बने डैन की जगह पर खुद को खड़ा करें और शिवली से प्यार करके देखें। क्या आप प्यार कर पाते हैं?

सुजीत की एक और फिल्म पीकू की तरह ही इस फिल्म के पास कोई कहानी नहीं है। घटनाएं नहीं है। उत्तेजना और उसका स्खलन नहीं है। बस कुछ दृश्य हैं और उनकी बारीक डिटेलिंग है। बहुत अच्छा कैमरा वर्क है। और पर्दे पर एक सुकुन हैं। सुकून ऐसा कि अक्टूबर फिल्म देखकर निकला दर्शक तुरंत ही पार्किंग के लिए या ट्रैफिक में ओवरटेक या गलत कट के लेने के लिए किसी से झगड़ा नहीं कर सकता। फिल्म देखने के बाद मन चुप हो जाता है और एकांत तलाशता है।

वो दर्शक जो सिनेमा से कुछ बेसिक जरुरतें पूरी होते देखना चाहते हैं। अपने लगाए हुए टिकट पैसों के बदले भरपूर मनोरंजन और एक कल्पनाई फंतासी दुनिया में जाना चाहते हैं अक्टूबर उनको निराश कर सकती है। ऐसे दर्शक पूरी फिल्म अब कुछ होने वाला है कि फीलिंग के साथ जीते हैं और आखिरकार बिदा हो जाते हैं। वो बाद में इंतजार करते हैं उस रिपोर्ट को जो बताती है कि अक्टूबर फ्लॉप हो गई।


अक्टूबर सिर्फ हीरो-हीरोइन की कहानी नहीं है। होटल और अस्तपताल की दुनिया के साथ-साथ फिल्म तमाम सारे किरदारों पर भी बात करना चाहती हैं। शिवली और डैन की मां, शिवली के अंकल, होटल में डैन के बॉस उसकी फीमेल कलीग, उसका दोस्त ये सब सिनेमाई किरदार नहीं थे। ये सब हमारे आसपास के लोग हैं जिन्हें फिल्मों के कैमरे ने कभी डिकोड करने की कोशिश ही नहीं की। हीरोइन की दोस्त सोचती क्या है सिनेमा के पास इसे अंडरलाइन करने की कभी फुर्सत नहीं रही है। अक्टूबर के पास ये फुरसत है। शायद ये फुरसत इसलिए भी कि उसके पास बताने के लिए और कुछ है भी नहीं। हम किरदारों से इतना कनेक्ट हो जाते हैं कि वो हमें कहीं मिल जाएं तो हमें उनके पास जाकर पूछने का मन होगा कि उन्होंने आखिर ऐसा क्यों किया था?

अक्टूबर एक डरावना प्रयोग है। सिनेमा में जहां फिल्मकार एक-एक मिनट को रंगीन और जवां बना देने की जीतोड़ कोशिश करते हैं। सुजीत का कैमरा कोहरे में डूबी दिल्ली की सुबह दिखाने में व्यस्त है। उसे होटल के बगल से मेट्रो को गुजरता दिखाने में आनंद आता है। हरश्रंगार के गिरते फूलों में  उसे दिलचस्पी है।अस्पताल के आईसीयू वार्ड, डॉक्टर के कनवरशेसन और वहां की नर्स की जिंदगी को भरपूर दिखा देने की जानलेवा चाहत है। इस बात की परवाह किए बगैर की एक घंटे के बाद भी फिल्म की कहानी वहीं की वहीं हैं और दर्शक एक प्रेम कहानी देखने आया था। उसे नहीं पता था कि फिल्म की हीरोइन बाल मुंडवा के आईसीयू में लेटी हुई मिलेगी।


फिल्म में जिस किस्म का सेंस ऑफ हयूमर है अब ये बाजारों में नहीं मिलता। जो चीजें नहीं बिकती दुकानदार उन्हें रखना बंद कर देते हैं। सुजीत के लिए ये चीजें जूही ने जुटाई हैं। छोटे-छोटे दृश्यों में हल्का सा हास्य हमें हंसा देता है। ये वाली हंसी डेविड धवन, नीरज वोरा, प्रियदर्शन की हंसी से अलग होती है। हम बहुत तेज नहीं हंसते और बहुत देर तक नहीं हंसते। लेकिन जो हंसते हैं वो याद रहता है।

अक्टूबर अपेक्षाओं के बोझ से दबी हुई फिल्म थी। सुजीत पिछले कुछ समय में अलग लेवल पर का एक बहुत अच्छा सिनेमा रच रहे थे। अक्टूबर जैसी फिल्में तभी दिमाग में आती हैं जब आप पूरी तरह से आत्मविश्वास से भरे हुए हों। सुजीत की बाकी फिल्मों से तुलना करने पर ये फिल्म थोड़ी कमजोर है। कमजोर इसलिए नहीं कि ये अक्टूबर है। अक्टूबर जैसी फिल्में तो एकबार ही बनती हैं। ना उसके पहले बनी होती हैं और ना बाद में बनेंगी।

Saturday, February 24, 2018

इश्क से ज्यादा जरुरी है बेवफाई करना या बेवफाई से गुजरना, क्यों??



अपने करेंट प्रेमी/प्रेमिका के माथे पर 'मौके पर काम आएगा' लिख उसे स्टैंडबाई मोड पर रखकर दूसरे के बिस्तर में घुस जाना एक नई तरह की बेवफाई है। इसमें रिश्ते पूरी तरह से खत्म नहीं होते बस रिश्तों को लेकर लैबिलेटी वाली फीलिंग खत्म हो जाती है। जब चाहें तब इसे एक फोन कॉल से रिन्वूय भी कर सकते हैं। बेवफाई की दुनिया में ये एडवांस प्रैक्टिस है। ये बात मुझे पिछले दिनों किसी ने बताई थी। 'हम हमारे बीच कुछ रहा नहीं, इसे और कॉम्पलीकेटेड नहीं करते, यहीं खत्म करते हैं' बेवफाई की दुनिया की ये आउटडेटेड लाइन है। ये बात भी।

 बेवफाई की दुनिया इश्क से बड़ी दुनिया है। सम्मोहन भी इश्क से ज्यादा है। हिंदी फिल्में और उर्दू शायदी इस दुनिया का एक आसान और लोकप्रिय चेहरा पेश करती रही हैं। उर्दू की शायरी प्रेमी को पवित्र और बड़े दिल वाला दिखाती रही है तो वहीं हिंदी सिनेमा का मकसद इस रिश्तें में हालातों को विलेन बनाने का रहा है। फिल्मों की बेवफाई इतनी स्पष्ट रही है कि उसे पकौड़े तलने वाला स्कील्ड युवा भी समझ जाए और रिक्शा चलाने वाला नॉन स्कील्ड भी।

लव रंजन अपनी फिल्मों में बेवफाई की उन्हीं लेयर्स को दिखाने की कोशिश करते हैं जो अब तक सिनेमा में उस तरह एप्रोच नहीं की गईं। या उनकी मैपिंग बेवफाई के रुप में हुई ही नहीं। प्यार का पंचनामा के दो पार्ट के बाद सोनू के टीटू की स्वीटी भी उसी मिजाज या सोच की फिल्म है जिसके लिए लव जाने जाते हैं। शहरी बैकड्रॉप वाली ये फिल्में एक बहुत बड़े वर्ग को अपनी आवाज सी लगती हैं। लव के निशाने पर लड़कियां ही रही हैं। वे लड़कों के उस बड़े तबके की आवाज बनने की कोशिश करते रहे हैं जिन्हें ये लगता है कि इश्क के मामले में लड़कियां लड़कों से ज्यादा क्लीयर और अपारचुनिस्ट होती हैं।


प्यार का पंचनामा की दोनों फिल्मों में लव ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि लड़कियां किस तरह से लड़कों का शोषण करती हैं। उनके किस्से मनोरंजक होते हैं। कुछ हकीकत कुछ फसाने जैसे। प्रेमी-प्रेमिका साथ बैठकर ये फिल्में देखते हैं और दोनों एंज्वाय करते हैं। लड़का बीच में उठकर पॉपकॉर्न भी लाता है। हॉल खाली होने पर पप्पी भी ले लेता है। यानी बिगड़ता कुछ नहीं है। लड़कियों को भी लगता है कि हां उन्होंने कभी ना कभी तो ऐसा किया है। फिल्म के क्लाइमेक्स में लड़कियां, लड़कों से दूर हो जाती हैं और हॉल में बैठी आडियंश को यह जस्टिस लगता है।

सोनू के टीटू की स्वीटी में फर्क ये है कि लव के पास वो तर्क और किस्से खत्म हो गए हैं जिनसे वह ये बात साबित करते रहे हैं कि लड़कियां बुरी होती हैं। इस बार लव ने सिक्स सेंस को चुना। दोस्त का सिक्स सेंस कह रहा है कि लड़की गलत है और फिल्म के आखिरी सीन में सिक्स सेंस की ही जीत होती है। यहां दोस्ती और लड़की में शर्त लगी होती है। फिल्म के एक सीन में स्वीटी बनीं नुसरत भरुचा कहती हैं कि दोस्ती और लड़की में हमेशा लड़की जीतती रही है।

नुसरत की ये बात कुछ अलग तरीके से मुझे किसी ने 12वीं में बताई थी। कॉलेज में एक लड़ाई हुई थी। मेरे एक दोस्त ने समोसा खाते हुए दार्शनिक अंदाज में बताया था कि कॉलेज में होने वाली 99 फीसदी लड़ाइयां लड़कियों के लिए ही होती हैं। बस लड़कियों के नाम बदल जाया करते हैं। इस बार लड़ाई रेखा चौधरी के लिए हुई थी। रेखा चौधरी में पता नहीं ऐसा क्या जादू था कि उन्हें बहुत लड़के अलग-अलग और सामूहिक रुप से प्यार करते थे। इस घटना के बाद मैंने रेखा को 100 मीटर से लेकर 10 मीटर तक की दूरी से देखा। मुझे रेखा से इश्क नहीं हो सका। इस बात अफसोस मुझे बीएससी पार्ट 2 तक था। बाद में सुनने में आया कि रेखा चौधरी, राकेश सिंह के साथ भाग गई थीं। भागी हुई लड़कियों को लेकर मेरे मन बहुत सम्मान रहा है। मैं उनके साथ बैठकर इडली सांभर खाना चाहता हूं। मुझे खाती हुई लड़कियों को देखना बहुत पसंद है। वो खाएं और मैं उनके देखूं। बाद में वह अपने खाए हुए के पैसे खुद दें।



सोनू के टीटू की स्वीटी की सबसे अच्छी बात ये है कि इस फिल्म के पास कोई कहानी ना होते हुए भी ये अपने किस्से और दृश्यों से दर्शकों को उलझाए रखती है। कार्तिक तिवारी, नुसरत भरुचा और सनी सिंह तीनों ने ही सिचुवेशनल कॉमेडी की है। कार्तिक तो लाजवाब लगते हैं। लेकिन इस फिल्म का सरप्राइज पैकेट आलोक नाथ हैं। जब आदमी जिंदगी भर शराब नहीं पीता या पोर्न नहीं देखता तो उसे बाद में ये काम बहुत मात्रा में करने पड़ते हैं। आलोक नाथ के साथ वही हुआ है।

संस्कारी आलोक नाथ के इस फिल्म में जितने भी सीन हैं उसमें में वह लगातार शराब पीते दिखें। क्या मजेदार तरीके से शराब पीते हैं और उसी मजेदार तरीके से टाइमिंग के साथ वनलाइनर बोलते हैं। ये आलोक नाथ के लिए सबसे बड़ी फिल्म है। इस फिल्म ने आलोक नाथ से आलोक नाथ का पीछा छुटवाया है।

लव रंजन की यह फिल्म देखी जानी चाहिए। लेकिन यह एक चिंता का विषय यह है कि बेवफाई की इस सब्जेक्ट में लव खाली होते दिख रहे हैं। उनकी फिल्मों में यदि बेवफाई अपने मजबूत रुप में दिखे इसके लिए जरुरी है कि समाज में नई स्टाइल की बेवफाई क्वाइन की जाए। जाते-जाते साहिर लुधयानिवी के इस शेर का मजा लीजिए...

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं
तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी

Friday, February 9, 2018

पैडमैन: एक बहुत जरुरी फिल्म, जो थोड़ा और पहले बननी चाहिए थी




पैडमैन एक अच्छी फिल्म है। ईमानदार। बस मुझे यह थोड़ी सी लेट आई हुई लगी। एक जगह पर ये फिल्म खुद बताती है कि यह 2001 का भारत है 2018 नहीं। ये फिल्म यदि 2001 में आती तो यह मुझे अपने आसपास की कहानी लगती। जब मैं अपने आसपास कह रहा हूं मेरे दिमाग में निश्चित ही उड़ीसा, छत्तीसगढ़ या झारखंड अति पिछड़े गांव नहीं हैं। मेरे आसपास का एक मध्यमवर्गीय संसार हैं। उत्तर भारत के गांवों और कस्बों का संसार। जो अब शहर बनना चाहता हैं। ऑनलाइन शॉपिंग करना चाहता है। वह मध्यम वर्ग जहां तक यह फिल्म या फिल्म की पायरेटेड की डीवीडी पहुंच पाएंगी। 

यह एक काल्पनिक सिनेमा नहीं है। ये एक ऐसी कहानी है जिसे आप देखते हुए खुद को भी टटोलते चलते हैं। मैंने 2001 का भारत देखा है। वैसा ही गांव देखा है जैसा फिल्म में है। मैंने वह सोच देखी है जब महिलाएं अपने इनर वियर ब्लाऊज या किसी दूसरे सम्मानित कपडे़ के नीचे सुखाती थीं। पता नहीं किस शर्म से? उसे वह किससे छिपाना चाहती थी? पैड तब भी घरों में आते थे लेकिन वह बहुत छिपाकर रखे जाते थे। पीरियड में घर से बाहर तो नहीं लेकिन रसोई से बाहर करने के रिवाज देखे हैं। फिर मैंने इसी गांव और कस्बे को बदलते देखा है। पीरियड पर खाने बनाते हुए देखा है। लड़कियों को दुकान में जाकर पैड मांगते देखा है। भले ही वह आज भी चाहती हैं कि पैड उन्हें काली पॉलीथिन या अखबार में लपेटकर मिलें।



बाल्की 2018 में 2001 की बात कहना चाह रहे हैं। यही बात मुझे फिल्म से डिसकनेक्ट करती है। 2018 के जिस परिवेश में मैं या मेरे जैसा उम्र के युवा हैं उस परिवेश में मेरी फीमेल दोस्त जरुरत पड़ने पर बताती हैं कि वो आज डाऊन हैं। कई बार उस पर जोक भी कर देती हैं। ऐसा बताने वाली ये लड़कियों की अपब्रिगिंग मुंबई या पुणे की नहीं है। वह भी उप्र, मप्र या बिहार की हैं। उन्होंने वह समय देखा है और उसे बदलते हुए भी। लड़कियां कई बार छुटटी की मेल में ये बात मेंशन कर देती हैं कि वह पीरियड की वजह से नहीं आफिस नहीं आ पा रही हैं। और उन्हें यह सब सामान्य लगता है। वह पीरियड आने का डिडोरा नहीं पीटना चाहतीं लेकिन इसे वह अब एक टैबू नहीं मानतीं।  


लेयर्स में बंटे इस देश में शर्म भी अपने केचुल अलग अलग समय पर छोड़ती है। कस्बे और छोटे शहरों की दुकानों में ये पैड अभी भी काली पॉलीथिन या अखबार में लपेट कर मिल रहे होंगे लेकिन शहरों और महानगरों में शॉपिंग की ट्राली में ये  पैड रिफाइंड की बोतल के बगल में रखे हुए होते हैं। कोई हिचक नहीं कोई अनईजी नेस नहीं। ये बदलता हुआ भारत है जिसने लड़कियों को बदला है। लड़कियों को लेकर लोगों की सोच बदली है। 

बाल्की इंसान के अंदर के काम्लेक्स को दिखाने में माहिर हैं। उनकी एक असफल मानी गई फिल्म शमिताभ मुझे बेहद पसंद है। इंगलिश विंगलिश अपने समय की फिल्म है और की एंड का समय से आगे की। लेकिन ये फिल्म समय से पीछे की फिल्म है। 

धर्म और परंपराओं को लेकर जो पात्र फिल्म में दिखते हैं वो थोड़े नकली लगते हैं। एक लड़का या लड़की अपने जकड़े हुए परिवेश से बाहर निकलकर जब थोड़ी खुली हवा पाते हैं तो वह उस हवा को उस परिवेश में भी भरना चाहते है जहां की रिवाजों से उन्हें अब घुटन महसूस होती है। 2001 में बदलाव का विरोध होता था अब बदलाव का स्वागत होता है। कम से कम मेरे जानने वाले परिवेश में। मैंने बहुत लोगों को अपने बच्चों के अनुसार अपनी सोच को बदलते देखा है। लव मैरिज को अरेंज मैरिज में कनवर्ट होते देखा है। ये बदलता समाज है। लड़की मां से झगड़कर पैड खरीद लेगी। गंदा कपड़ा नहीं लगाएगी। अव्वल तो मां इसकी नौबत ही नहीं आने देगी। 


पैडमैन एक अच्छी कोशिश है। फिल्म से ज्यादा उसे इस बात की तारीफें मिलनी चाहिए कि ऐसे विषय पर कर्मिशयल सिनेमा बनाने का प्रयास किया गया है। संवेदनशील विषय होने के बाद भी इसे कहीं से भी फूहड़ नहीं बनने दिया गया। हां, इंटरवल के बाद यह फिल्म अपने किरदार को स्थापित करने की कोशिशों में ज्यादा व्यस्त होती दिखती है। लेकिन यह खटकता भी नहीं है। 

मुझे अक्षय कुमार से अधिक राधिका आप्टे का अभिनय प्रभावित करता है। राधिका आप्टे में सिनेमा की कितनी बड़ी रेंज है यह देखने के लिए एक ही दिन में पार्च्ड, हंटर, बदलापुर और शोर इन द सिटी फिल्में देखनी चाहिए। अक्षय कुमार एक ही जैसी रोल करते जा रहे हैं। उन्हें अब एक ऐसी फिल्म करनी चाहिए जिसमें वह एक चोर या बने हों। वह सक्षम अभिनेता हैं उन्हें अपनी रेंज के दर्शन कराते रहना चाहिए।

Sunday, January 14, 2018

ये फिल्म पहले आ गई होती तो बहुत सारे लोग अपनी मर्जी का काम करे होते...


ये 2000 की जनवरी के आखिरी हफ्ते की बात रही होगी। मैं 11वीं क्लास में था। फिजिक्स और मैथ्स की कोचिंग पढ़कर मुझे 11 बजे तक लौट आना था लेकिन मैं साढ़े 3 तक नहीं लौटा। पापा परेशान हुए तो कुछ शुभचिंतक मुझे खोजने के लिए निकले। ये मोबाइल का दौर नहीं था। खोजने वाले कुछ दूर ही गए होंगे कि उन्हें मैं आता दिखा।

एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा चलो पापा इंतजार कर रहे हैं। घर में क्या होना था मुझे पता था। मैं उसका लोड नहीं ले रहा था। टपकते कोहरे भरी उस शाम में पापा ने जूते पहने हुए थे। पापा कभी हाथ या डंडे से नहीं मारते थे। सर्दी इतनी थी कि उन्होंने अपने जूते उताकर मारने के बजाय पास पड़ी सफेल नीली रुपानी चप्पल से मुझे मारा। ये वाली चप्पलें जब थोड़ी पुरानी हो जाती हैं तो वह बहुत लगती थीं। बाद में सुबह के भूखे लड़के को मम्मी ने खाना दिया मैं रो-रोकर खाना खाता गया।

अगर वो फिल्म आमिर खान की मेला न होकर अनुराग कश्यप की मुक्केबाज रही होती तो मैं रो लेने के बाद पापा से कहता कि पापा मुझे फिल्में देखना अच्छा लगता हैं। ये फिल्में मुझे बनाएंगी, बिगाड़ेंगी नहीं। मैं पापा को जानता हूं वो मान जाते और शायद मैं फिल्मों में कुछ अदना सा ही सही काम कर रहा होता। पर ये मुक्केबाज तब नहीं अब आई...

अनुराग कश्यप की यह फिल्म उन लाखों युवाओं को अपना वो 'सो कॉल्ड खराब' काम करते रहने की ताकत देती जिसके लिए वे बने हुए होते हैं। फिल्म के एक सीन में विनीत सिंह अपने बाप से कहते हैं कि मेरे पास दिमाग नहीं है। मुझे नहीं समझ में आई पढ़ाई। कहां से आता दिमाग? आपके पास दिमाग है? मम्मी के पास दिमाग है? पापा चुपचाप पेंचकस से टेबल फैन का पेंच कसते रहे। पापा को सच्चाई पता है। जिंदगी भर टेबुल फैन के पेंच कसने, बिजली के फ्यूज बनाने वाले बाप या सिर्फ चावल में कंकड़ खोजने वाली और होली में चिप्स बनाने में दिमाग खपाने वाली मां के बच्चे दिमाग कहां से लाएं? ये तो जेनेटिक मामला होता है।

 मैं ऐसे 20 से 25 लड़को को निजी तौर पर जानता हूं जो जिन्होंने अपने बाप की इच्छा पर इंजीनियरिंग, बीबीए या एमबीए किया। वह नौकरियां उनके लिए नहीं थीं। बाद में वे लौटकर आए और प्राइमरी स्कूल की सुरक्षित नौकरी में लग गए। मिलने पर कहते हैं कि इस नौकरी में 'रिस्क' नहीं है। वे अब साल में एक बार वैष्णों देवी और तीन बार ससुराल घूमने जाते हैं। वे खुश हैं। मुक्केबाज फिल्म हर शहर, कस्बे या गांवों के उन 25-30 के लिए नहीं है। उनके लिए जुड़वा 2 थी जिसने 100 करोड़ कमाए हैं।

मैंने स्टूडेंट लाइफ की तमाम सारी फिल्में 8 से 10 रुपए के टिकट वाले 'फर्स्ट क्लास' में बैठकर देखी हैं। मेरे आसपास कई बार रिक्शा, टैंपो या ऑटो चलाने वाले भी होते थे। मिथुन या गोविंदा की फिल्में देखकर जब वह निकलते थे तो कम से कम उस पूरा दिन वह सवारी से इस लहजे में बात करते थे कि वह उनके नौकर नहीं है और उनसे भी तमीज से बात की जाए। उनको ये वाला आत्मविश्वास मिथुन देते थे और कई बार गोविंदा भी।  यही वाला आत्मविश्वास मुक्केबाज उन तमाम श्रवण सिंह या सुनैना मिश्रा को देती है जो एक साथ जिंदगी के कई पाटों में पिस रहे होते हैं। ये कोई स्पोटर्स फिल्म नहीं है। एक जिंदगी की फिल्म है। जिसे लोगों को घोटकर पी लेनी चाहिए।

मुक्केबाजी का एक खेल जीतने के बाद यह जन गण मन बजाकर यहां हैपी इंडिग नहीं होती है। एक मैच के बाद जिंदगी की एक रिंग होती है जिसमें एक साथ कई हालात मुक्केबाज बनकर आप पर टूटते हैं। ये हालत सिर्फ विलेन भगवान दास मिश्रा के जने हुए नहीं हैं। ये हालात हमारे घरों के भी हैं। जहां एक बीवी पूरा दिन इस इंतजार में रहती है कि दिनभर अकेली रहने के बाद उसका पति शाम को लौटकर उससे रोमांटिक बातें करेगा और तमाम सारे ना पूरे हो पाने वाले ख्वाब उसे दिखाएगा। एक मां होती है जो ये सोचती है कि उसकी बहू उसके पैर दबाएगी। एक बाप होता है जो ये सोचता की उसका लड़का कहीं सरकारी नौकरी में फिट हो जाएगा। और एक ख्वाब होता है जो इन 'जरुरी ख्वाबों' के बीच कहीं फिट नहीं होता।

मुक्केबाज आपको प्रेम करना सिखाती है। फिल्मों में जो प्रेम, चोपड़ा, जौहर या घई हमें दिखाते रहे हैं उनके नकली प्रेमों को तमाचा जड़ती हुई यह फिल्म बताती है कि अपने हालातों के बीच अपनी रुटीन जिंदगी और कर्तव्य पूरा करते हुए किस तरह से प्रेम किया जा सकता है। प्रेम करने के लिए जरुरी नहीं है कि अंबेडकर पार्क या लोदी गार्डन में हाथ पकड़कर डुएट गाए जाएं। शिमला जाएं और घोड़े जैसे किसी जानवर पर बैठकर फोटो खिंचवाए जाएं...

ये एक कॉमेडी फिल्म भी है। अनुराग कश्यप की फिल्म का हास्य उनके अनुभवों और रेंज का रिफलेक्शन दिखाता है। वह जोक के सहारे आपको नहीं हंसाते। बहुत कम चर्चित हुई उनकी एक फिल्म अग्ली का एक पुलिस स्टेशन का सीन देखिए। जिसमें पुलिस इंसपेक्टर अपनी खोई हुई बच्ची की कंपलेन लिखाने आए पिता से लगभग 6 मिनट तक बात करता है। उस सीन की कुरुपता का हास्य देखिए। ऐसे कई सारे कॉमिक सीन सिर्फ अनुराग कश्यप रच सकते हैं। बेहद तनाव और दर्द भरे हालातों के बीच किरदारों की बातचीत आपको हंसा देती है। जॉनी लीवर की जरुरत यहां नहीं है। बुरे से बुरे हालात में फंसा आदमी भी हंसता है। वैसा ही स्वाभाविक हंसी या पर्दे पर आती है।

जाति ऊंची हो या नीची, जातिवाद में जकड़कर किस तरह से नुकसान कर रही हैं ये बताना हो तो अनुराग कश्यप की यह फिल्म भारत के गांव गांव में वैसे ही दिखाए जानी चाहिए जैसे किसी जमाने में निरोध की जरुरत बताने वाले विज्ञापनों की वाल पेटिंग हुई थी। लोग निरोध का इस्तेमाल करने लगे थे या नहीं लेकिन उसके बारे में या उसके फायदों के बारे में जान जरुर गए थे।

फिल्म की कास्टिंग कैसे होती है इसे देखने के लिए भी अनुराग की फिल्में देखनी चाहिए। भोजपुरी फिल्मों के अशलील और बेहूदा रोल करने वाले रवि किशन जब यहां एक लिबरल दलित कोच बनते हैं तो लगता है कि रवि किशन हमेशा से ही एक कोच रहे हैं। वो एक्टिंग तो सिर्फ पार्ट टाइम करते हैं। गैंग्स ऑफ वासेपुर में जो लाइन नवाज ने खींची थी विनीत उसे बहुत ऊपर ले गए। पहली फिल्म कर रहीं जोया हुसैन का अभिनय बताता है कि फिल्म निर्देशक का ही माध्यम है। जोया हुसैन चुप रहकर भी फिल्म में सबसे ज्यादा बोलती हैं।

अनुराग कश्यप की यह फिल्म उसी तरह से लाइफ टाइम राष्ट्रीय फिल्म घोषित कर देनी चाहिए जैसी महात्मा गांधी को राष्ट्रीय पिता और मोर को लाइफ टाइम के लिए राष्ट्रीय पखेरु घोषित किया गया है...

Friday, February 24, 2017

'रंगून' को खराब कहना अपराध होगा, पर हुजूर ये अच्छी भी नहीं है...


फिल्मी बिरादरी में इमेज की अपनी एक कीमत होती है। इमेज बन जाए तो उसको तोड़ना मुश्किल और इमेज को बचाकर रखना भी मुश्किल। विशाल भारद्वाज की हिंदी सिनेमा में एक इमेज है। रंगून जब शुरू होती है और आगे बढ़ती है तो फिल्म के साथ-साथ विशाल की इमेज दर्शक के साथ चल रही होती है। दृश्य कहीं औसत तो कहीं बेहतर होते हैं लेकिन विशाल की इमेज उन सबके ऊपर होती हे। हम इस फिल्‍म को विशाल की फिल्म के रुप में देख रहे होते हैं। वो विशाल जो मकबूल, ओमकारा और कमीने में हमें प्रभावित करते हैं और हैदर आते-आते चमत्कृत।

रंगून जैसे जैसे आगे बढ़ती जाती है दर्शक फिल्म के बेहतर होने का इंतजार करते जाते हैं। कुछ अच्छे दृश्य आते हैं और हमें लगता है कि अब कुछ होने वाला है लेकिन ये दृश्य लौट जाते हैं। 'अब कुछ होने वाला है' की फीलिंग के सा‌थ इंटरवल आ जाता है। ये फिल्म इंटरवल तक अपना इरादा जाहिर नहीं कर पाती। इरादा यूं कि उसे कौन सा पक्ष हाईलाइट करना है और किसे ब्लर। ये एक उपन्यास जैसी लगती है जिसका कोई मध्यांतर या क्लाइमेक्स नहीं होता। जहां पर चाहे पन्ने का एक किनारा मोड़ कर रख दें।

हां, इंटरवल तक किरदार जरुर याद रह जाते हैं। किरदार जो बहुत ठहरकर लिखे गए हैं और उन्हें स्टेबिलिस भी किया गया है। किरदारों के साथ फिल्म गाने न सिर्फ इतने अच्छे लिखे गए है बल्कि तहजीब से गाए भी गए हैं। अच्छा अभिनय, बड़ा बैकड्रॉप, बेहद सुंदर कैमरा वर्क, शानदार लोकेशन ये सब कुछ फिल्‍म के मेन्यू में है लेकिन में वह गोंद ‌थोड़ा कम है जो एक निर्देशक या उसकी फिल्म को दर्शक के साथ जोड़ता है।

इंद्र कुमार गुजराल एक बात कहते थे। वे कहते थे कि एवरेस्ट में चढ़ने का मतलब वहां पर टेंट लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। हमें वहां पहुंचकर उतरना भी होता है। रंगून, फिल्‍म ये बताती है कि ये विशाल की उतार वाली फिल्म है। हो सकता है कि वह फिर कभी चढ़ें।  फिल्म का कैनवास बड़ा है। इतना बड़ा कि हम दर्शक उसे संभाल नहीं पाते। फिल्म में प्यार है पर वह गहरा होते-होते इतना भारी हो गया है कि हम उससे जुड़ नहीं पाते। फिल्‍म में देश प्रेम है लेकिन वह उस स्टाईल का है कि हम उससे खुद को कनेक्ट नहीं कर पाते। फिल्म में जन गण मन है लेकिन हमें हम उस पर खड़े नहीं हो पाते। फिल्म के गाने सम्मोहक हैं लेकिन जहां पर आए हैं वह आंखों को रास नहीं आते।

कई जगहों या दृश्यों में  यह फिल्म, फिल्म कम निर्देशक की बौद्विक जुगाली ज्यादा लगती है। बौद्विक जुगाली जिसे समय-समय पर हर स्टेबलिस निर्देशक करते हैं। एक नजरिए से अनुराग कश्यप की फिल्म बांवे वेलवेट क्रिएशनके स्तर पर बुरी फिल्म नहीं थी लेकिन वह दर्शकों से कनेक्ट नहीं पैदा कर पाई। कनेक्‍शन का यही तार रंगून में भी ढीला है। इस तार को जिस पेंचकस से कसते हैं वह पेंचकस विशाल के पास है। शायद वह इसे फिर कसें। विशाल की इस फिल्म की बुराई करना एक अपराध जैसा लगता है, पर माफ करें यह एक अच्छी फिल्म भी नहीं है। और प्लीज ये फिल्मों में बार-बार जनगण मन दिखा-सुनाकर जबरन देश प्रेम मत पैदा कीजिए। हम पहले से ही देश प्रेम में ओवरलोडेड हैं...



Saturday, February 11, 2017

सलमान को कभी एक शाम कुमुद मिश्रा के साथ शराब पीते हुए बितानी चाहिए...


जावेद अख्तर कहते हैं कि क्रिएटिव काम दो तरह के होते हैं। पहले काम में इंसान काम कर-करके भरता जाता है और दूसरे काम में खाली होता जाता। फिल्म का निर्देशन दूसरे तरह का काम है और लेखन पहले तरह का। जॉली एलएलबी 2 सुभाष कपूर की फिल्म है। जिन्होंने जॉली 1 देखी है वह जावेद अख्तर की इस बात से सहमत होंगे। जॉली एलएलबी 2 खराब फिल्म नहीं है लेकिन यह फिल्म सीक्वल का वैसा जादू नहीं रच पाती है जैसा तनु वेड्स मनु करती है। तनु वेड्स मनु अपने हिट हो चुके जॉनर से निकलकर एक अलग क्राफ्ट बनाने का प्रयास करती है। उन्हीं कलाकारों की उन्हीं स्टाईलों के साथ। सुभाष कपूर वैसा नहीं करते हैं। वे फिर से उस कोर्ट रुम ड्रामा का दोहराते हैं‌ जिसे वह जॉली 1 में बहुत शानदार तरीके से दिखा चुके होते हैं। वह वकील बदलते हैं, शहर बदलते हैं , विषय बदलते हैं पर स्टाईल और फिल्म को पकड़ने का अंदाज नहीं बदलते। एक लाइन में कहें तो वह हिट हो चुका अपना कंफर्ट जोन नहीं बदलते, उसी को फ्राई राइस की तरह फिर से तलने का प्रयास करते हैं।

इंटरवल के बाद के कोर्ट रुम दृश्यों को हटा दें तो जॉली 2 एक औसत फिल्म है। फिल्म अपने को स्‍थापित करने में इंटरवल तक का समय ले लेती है। इसके बाद फिल्म बेहतर होती है। कोर्ट रुम के ड्रामें हमें हंसाते हैं। दोनों वकीलों की बहसें हमें कोई एक पाला चुनने के लिए प्रेरित करती है। हर वकील के पास अपने प्रभावी तर्क होते हैं। लेकिन जैसे ही यह फिल्म तर्क-वितर्क करने के ठेठ तरीके की तरफ बढ़ती है हमें पुरानी फिल्म की याद आने लगती है। अक्षय कुमार और अन्नू कपूर इस नई फिल्म में अरशद वारसी और बोमन ईरानी को रिप्लेस करते हैं। सभी कलाकार समृद्घ हैं लेकिन पता नहीं क्यों राजपाल बने बोमन ईरानी बार-बार याद आते हैं।


इस नई फिल्म में उनका बार-बार याद आना इसलिए भी लाजिमी था क्योंकि सुभाष कपूर ने फिल्म में वकील और शहर तो बदले थे लेकिन फिल्म को पकड़ने का अंदाज हूबहू वैसा ही रखा था। जज वही होता है और कुछ अलग करने के चक्कर में ज्यादा ड्रामेटिक हो जाता है। सौरभ शुक्ला में अभिनय की बहुत बड़ी रेंज हैं लेकिन जब वह प्रमोद माथुर को चुप होकर बैठाते हैं तो वह लगभग खुद को रिपीट करते हुए दिखते हैं। चश्में को उतारने चढ़ाने, कागज पढ़ने, उस पर कुछ लिखने का अंदाज हूबहू वैसा है। "माथुर साहब मैं एलाऊ कर रहा हूं ना बस बात खत्म" वाला डायलॉग, "राजपाल साहब मैं एलाऊ कर रहा हूं ना" कि खराब फोटोकॉपी लगता है। दृश्य अच्छा है पर हम देख चुके हैं। एक अच्छे निर्देशक से उम्मीद होती है कि वह कलाकार को भी उसके कंफर्ट जोन और स्टाईल से बाहर निकाले।

जॉली 2, दर्शकों को जोड़ने के लिए हिंदू, मुस्लिम, आतंकवाद, आतंकवाद पर सही गलत-गलत जैसे फिल्मी और टची मुद्दे का सहारा भी लेती है। दर्शक जब कुछ ही देर पहले जन गण मन करके ही बैठा हो तो वह जाहिर है कि देश के सेंटी ही होगा। चुनाव चल रहे हैं तो हिंदू-मुसलामन भी उसके दिमाग में घुसा ही है। सुभाष आतंकवाद और ‌हिंदू-मुसलमान के मुद्दे पर सेंटी हो जाने को फिल्म में भुनाने का प्रयास करते हैं। पिछली फिल्म में ये टोटके प्रयोग में नहीं आए थे। वहां बस तर्क ही आपको सही या गलत के पाले में खड़ा करने के लिए काफी थे।

फिल्म में अक्षय कुमार अच्छा अभिनय करते हैं। कॉमेडी के दृश्यों में  उनका हाथ मजबूत है। कॉमेडी वाली टाइमिंग वे यहां भी प्रयोग करते हैं। अन्नू कपूर एक बेहतरीन अभिनेता है लेकिन फिल्म में वे वहां नहीं पहुंच पाते जहां जॉली 1 में बोमन पहुंच चुके होते हैं। सह कलाकारों का चयन भी अच्छा है। कुमुद मिश्रा हर तरह के रोल में खुद को कैसे फिट कर लेते हैं कभी मौका मिले तो सलमान खान को उनके पास बैठकर दो चार पैग पीते-पीते यह बात पूंछनी चाहिए। 

Sunday, December 25, 2016

दंगलः ये हमारे पापाओं और डैडियों की भी कहानी है, भले ही हम गीता-बबिता नहीं थे...



मैं दसवीं में था और उन दिनों मेरे पापा के पास रेड चीफ की एक पुरानी सैडिंल हुआ करती थी। भूरे कलर की उस सैंडिल का शेप बिगड़ चुका था। पापा अब उसे पहनते नहीं थे। वह अब दूसरे कामों में आ रही थी। जब मैं पढ़ता तो मेरे बैठने के बगल में ही वह सैंडिल रखी होती। रेड चीफ की उस सैंडल से मानों सैकड़ों मर्तबा मार खाई है। सुबह के 6 बजे भी और रात के 11 बजे भी। पापा जब मारते तो बहुत मारते। वह जाड़ा गर्मी और बरसात का अंतर न करते।  पढ़ाई में मेरा मन तब नहीं लगा जब उसमें लगाने की जरूरत थी। पापा मेरे फोकस न करने से चिंतित थे और हर बाप की तरह चाहते थे कि मैं इतना काबिल तो बन ही जाऊं कि रोटी कमा सकूं। पापा का सपना मुझे गोल्ड मेडल जितवाना नहीं था और न ही कोई अपने कोई अधूरे सपने मुझ पर थोप रहे थे। पर एक संतान के भविष्य के साथ उनका जुड़ाव दंगल के महावीर फोगाट से कम नहीं था। ये मेरी नहीं हर मध्यमवर्गीय बेटे और पिता की कहानी होगी या हो सकती है। हमारे पिता महावीर फोगाट ही थे हम भले ही गीता या बबिता न बन सके। 

दंगल फिल्म वाकई गीता-बबिता की  फिल्म नहीं है। ये एक पिता की फिल्म है। उसकी कमजोरी और आशाओं की फिल्म है। आमिर अपनी फिल्‍मों में वैसे भी खुद को लगातार पर्दे पर ना दिखाने के समर्थक होते हैं इस बार वह गौण रहकर भी फिल्म के नायक होते हैं। क्लाइमेक्स के उस सीन में जहां गीता गोल्ड के लिए लड़ रही होती हैं, कैमरा, गीता और हमारा मन आमिर को खोज रहा होता है। गीता ने भले ही देश के लिए गोल्ड जीता हो लेकिन दरअसल वह गोल्ड अपने बुढ़ा रहे पिता के लिए जीत रही होती है। एक फिल्म के रुप में दंगल एक मजबूत फिल्म है। पर फिल्म से ज्यादा यह एक पिता और बेटी के संबंधों का सत्य दस्तावेज है। फिल्म बिना प्रगतिशील हुई बाप-बेटी के इन संबंधों को हमारे सामने रखती है। दर्शक के रुप में अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम कौन सा हिस्सा पकड़े और किसे जाने दें...

जिस दौर में मैं या मेरी उम्र के लोग बड़े हो रहे थे उस दौर में हमारे पिता हमारे दोस्‍त नहीं हुआ करते थे। जिंदगी को थोड़ा और पीछे ले जाएं तो पिता को दरअसल पुत्र का विरोधी सा माना या देखा जाता है। पिता यानीकि उसके हर शौक और इच्छाओं का विरोधी। पिता और पुत्र आपस में बात नहीं करते थे। आदेश दिए और लिए जाते थे। पिता और पुत्र के बीच का शारीरिक स्पर्श सिर्फ पैर छूने के दौरान होता था। मेरी उम्र् लगभग  15 साल थी। मैं कानपुर रेलवे स्टेशन पर किसी ट्रेन के इंतजार में था। एक पिता और पुत्र मेरे बगल में आकर खड़े होते हैं। 23 या 24 साल की उम्र का लड़का अपने पिता को डैड कह रहा  था। पिता पुत्र की वह जोड़ी प्लेटफार्म पर बेंच पाने की आश में थोड़ा मूव करती है। कुछ कदम चलने के बाद पिता अपने हाथ बेटे के कंधे पर दोस्त के अंदाज में रख लेता है। बाप अपने बेटे के कंधे पर भी हाथ रखकर चल सकता है यह मेरे लिए नया अनुभव था। फिल्मों में उस समय अमीर घरानों के बेटे-बेटियां अपने पिताओं को डैड या डैडी कहकर बुलाते थे। ये निष्कर्ष निकालकर की अमीर पिता और बेटे के बीच संबंध ऐसे ही होते होंगे मैंने अपना फोकस इस बात से हटा लिया था। दंगल, सालों पुरानी उस छोटी सी बात को ताजा करती है। 

दरअसल दंगल की सबसे बड़ी खूबी बेटी और बाप के खुरदरे संबंध ही हैं। एक बाप जो अपने बेटियों से मजाक नहीं करता, उनके साथ हंसता नहीं, गले लगाकर उन्हें शाबासी नहीं देता है। उनसे उतनी ही बात करता है जितनी करनी बेहद जरुरी है।  जिस परिवेश से फोगाट आते हैं ऐसा होने स्वाभाविक भी था। बेटे होने के लिए पुत्र जाप के लिए तैयार हो जाने वाले फोगाट से उम्‍मीद भी इससे ज्यादा नहीं होती। फिल्म की खूबसूरती यही है कि वह रियल रहती है। फोगाट को जबरन प्रगतिशील नहीं बनाया गया। फोगाट तब बनावटी जरुर लगते हैं जब वह सीढ़ियों में बैठकर अपनी बेटी को स्‍त्री सशक्कतीकरण की शिक्षा दे रहे होते हैं। फिल्म में आमिर खान की वह स्पीच गैर जरुरी लगी। फोगाट अपनी बेटियों को इसलिए आगे लेकर नहीं आए थे कि वह स्‍त्री सशक्कतीकरण में अपना हाथ बंटाना चाहते थे। 



  मैंने अपने जिंदगी में बहुत कम ऐसे बाप देखे हैं जो किशोरी से जवां हो रही बेटियों से खुलकर बात करते हैं। जब मैं यह बात लिखकर रहा हूं तो मेरे दिमाग में निश्चित ही 2016 न होकर 2000 के आसपास का कस्बाई माहौल है। अपवाद को छोड़कर मध्यमवर्गीय संस्कार में जी रहे किसी पिता को अपने बेटी को गले लगाते नहीं देखा है।  फोगाट इस परंरपरा जो कि एक संस्कार से लगती है का निर्वाह करते हैं। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहां दर्शकों को लगता है कि अब बेटी फोगाट के सीने से लग जाएगी। ऐसा कई जगह पर हुआ पर ऐसा होता नहीं है। फोगाट गोल्‍ड जीतने वाली बेटी से गले न लगकर उसका हाथ से मेडल लेकर उसे देखते हैं। यह बेहद अटपटा तो है लेकिन रियल है। यही ईमानदारी दंगल की खूबसूरती है। 

 दंगल खुद को फिल्म बनाने की बहुत कोशिश नहीं करती। बॉयोपिक फिल्में कई बार इस उपापोह से जूझती हैं कि उन पर छेड़छाड़ करने का आरोप भी न लगे और सिनेमा भी सधा रहे। किसी एक की जिंदगी में इतना मसाला कभी नहीं होता कि उस पर एक मुक्कमल फिल्म बना दी जाए। फिल्म बनाने के लिए फिल्मी होना पड़ता है। दंगल भी कई जगह पर फिल्मी हुई है पर उसका फिल्मी होना अच्छा लगता है। कोचिंग एकेडमी पहुंचने के बाद गीता का बदलाव और पिता के रुप में इसकी कुढ़न फिल्म का सबसे बेहतर हिस्सा है। आमिर और उस नई नवेली लड़की दोनों ने ही इस बदलाव को शानदार तरीके से पर्दे पर उकेरा है। 

यहां फोगाट हमारे पारंपरिक पिताओं से अलग हटते हैं। आमतौर पर एक पिता अपने आप को तब पीछे खींचने लगता है जब  उसे लगता है कि उसकी संतान उससे ज्यादा काबिल हो रही है। दोनों की काबलियतों के बीच कभी मुकाबला नहीं होता। कहावत भी है कि संसार में सिर्फ बाप का ही एक रिश्ता ऐसा होता है जो यह चाहता है कि उसका बेटा उससे भी ज्यादा काबिल हों। यहां फोगाट बेटी की तरक्की से बहुत सहमत नहीं होते। यह जानते हुए भी कि बेटी कुछ नया सीख रही है। 

चूंकि फिल्म आमिर खान की होती है इसलिए कुछ समय के लिए बेटी को 'भटक गई' के रुप में दिखाया जाता है। पिता को सार्वजनिक रुप से अपमानित करने के बाद जब गीता एक के बाद एक मैच हार रही होती है तो दर्शकों को एक अजीब सा खलसुख मिलता है। दर्शक तब राहत की सांस लेते हैं जब गीता को अपनी गलती मानता हुआ दिखाया जाता है। फिल्म यहां पर गीता के साथ नाइंसाफी करती है। काबिल हो जाना किसी का अपमान करना होता है। फोगाट गीता के काबिल हो जाने को अपने अपमान से जोड़ते हैं। और बाद में फिल्म इसे जस्टीफाई भी करती है। कुल मिलाकर दंगल हिंदी सिनेमा की सबसे संपन्न फिल्मों में से एक है। जिसे एक जरुरी काम की तरह देखा जाना चाहिए।