Friday, November 9, 2018

विजय कृष्ण आचार्य के हाथ काट लेने चाहिए, वह मना करें तो उनका लिंग काट लेना चाहिए


ठग्स ऑफ हिंदुस्तान दरअसल बहुत बुरी फिल्म नहीं है। दरअसल ये एक निर्देशक की सिनेमाई लिमिटेशन की कहानी है। ऐसा लगा है कि कोई अपना पैर अलग-अलग साइज के दूसरों के जूतों में डालकर चलने की कोशिश कर रहा है। चलने में कभी जूता आगे घिसक जाता है तो कभी पांव। ठग... जैसा बचकानापन जीवन में भी होता है। एक आदमी जब अंदर से बिलो एवरेज होकर पैसों के दम पर बड़ा  दिखना चाहता है तो वह अपने उन कॉम्पलेक्स को महंगे लिबास, महंगी विदेशी घडियों,  लग्जरी गाड़ियों या फोर बेड रुम  फ्लैट से ढकने की कोशिश करता है। वह आपको महंगी विदेशी शराब ऑफर  करता हूं लेकिन उस शराब दो घूंट निगलने के बाद जब वह बोलता तो उसकी कलई घुल जाती है। उसका सतहीपन उभरकर उतराने लगता है।

एक फिल्माकर के  तौर पर यही खालीपन विजय कृष्ण आचार्य निर्देशित ठग्स ऑफ हिंदुस्तान के हर सीन में दिखता है। वह अपनी सीमाओं और बचकानेपन को बडे सितारों के आभामंडल, वीएफएक्स तकनीक, बड़े-बड़े सेट से ढकने की कोशिश करते हैं। हर एक सीन में जहां इमोशन दिखने चाहिए, किरदार के लेयर्स दिखने चाहिए उन्होंने उसे बस वैसे ही ड्रामेटिक बना दिए जैसे स्टार प्लस में आने वाले धारावाहिकों के सीन। जहां आप किसी किरदार से कनेक्ट नहीं हो पाते बस उसे होते हुए देखते रहते हैं। चूंकि वहां ब्रेक होते हैं, एपीसोड की लेंथ 22 मिनट की होती है इसलिए आप उसे झेल लेते हैं लेकिन तीन घंटे की फिल्म को लगातार झेलना कठिन हो जाता है। आपका मन करता है कि आप यहां से निकल जाएं और फील करें कि आपकी रियल दुनिया उतनी बोरिंग नहीं है जितनी की ये फिल्म।

कई जगहों पर ये फिल्म कॉमेडी की तरह होती है जो निर्देशक की नजर में भव्य एक्शन होता है। अमिताभ बच्चन बहुत बुजुर्ग आदमी के मेकअप में हैं। चेहरे पर इतनी घनी दाढी है कि समझ में नहीं आता कि आवाज कहां से निकल रही है। वह एक लडकी के साथ कुछ कुछ देर में अंग्रेजों के जहाज लूटने लगते हैं। लडकी की अपनी एक अलग कहानी है। वह हर समय गुस्से में होती है। जब वह युद्व नहीं भी कर रही होती है, शाम को समंदर की तरफ निहार रही होती है तब भी वह उतनी ही नाराज दिखती है।  नाराजगी ऐसी की जैसे मम्मियां गुस्से वाला मुंह बनाकर बच्चे को डराएं और बच्चा डर के मारे दूध पीले। उधर अमिताभ जब वह युद्व के लिए जा रहे होते हैं तो एक चील या बाज जैसा कोई जीव उडकर आने की दस्तक देता है और एक खास तरह की आवाजें बैकग्राउंड से निकलने लगती है। ऐसा 90 दशक की कई घटिया फिल्मों में दर्शक देख चुके होते हैं।

गुस्से वाली ये लडकी है हर बार एक तरह से फिसलकर तीर चलाती है। अमिताभ मुंह से भें भें की आवाज निकालते हैं और सामने वााले जहाज में गोले बरसने लगते हैं। जब गोले फूटने लगते हैं तो वह हेया हेया जैसी आवाज दो बार निकालते हैं। जहाज लूटने के ये सीन फिल्म में कई बार हैं। अमिताभ बच्चन हर बार वैसा ही करते हैं। लाल पोशाक पहने कंपनी के सैनिकों की भर्ती की जांच होनी चाहिए। उनको भर्ती किसने किया था? उन्हें कभी भी कोई भी मार सकता है। एक नॉन प्रोफेशनल सैनिक भी सात से आठ लाल कपडों वालों को मार देता है। वह किसी को मार रहे हैं ऐसा फिल्म में कभी नहीं दिखाया गया है। लंदन को इस फिल्म पर ऐतराज जताना चाहिए।

मजे की बात ये है कि अमिताभ अपना गिरोह छिपाकर रखते हैं तो जहाज लूटकर वह करते क्या हैं। वह खुद भी जहाज से चलते हैं लेकिन कई बार वह नाव से भी चलते हैं। लडकी के विपरीत अमिताभ जहाज लूटने के बाद शांत हो जाते हैं। और शाम को बंजर जमीन में खेती करने लगते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स हास्यास्पद है। आचार्य जी 2018 में आप जहर वाले लडडू खिलाकर सैनिकों को बेहोश करता हुआ दिखाओगे? फिल्म बनाने का आपका लाइसेंस क्यों न रदद कर दिया जाए। आपके हाथ क्यों ना काट लिए जाएं और आप मना करें तोआपका लिंग क्यों ना काट लिया जाए?

आपको आमिर खान को वेस्ट करने में भी शर्म आनी चाहिए। साथ में फातिमा सना शेख को भी। इनकी दंगल देखिए और आठ दस बार देखिए। हो सकता है कि शूटिंग के बाद आमिर हंसते रहे हों कि वह कर क्या रहे हैं। लेकिन उन्हें ये भी पता था कि दीवाली वीकेंड में  ये फिल्म उनके कैरियर की सबसे बडी फिल्म बनने वाली है। आपने कैटरीना कैफ को बहुत सेक्सी दिखाया है। उनसे एक्टिंग नहीं करवाई है। ये आपका एकमात्र ठीक काम है। उनको देखकर कंपनी के सैनिकों के साथ साथ दर्शकों का भी मन सेक्स करने का हो सकता है।

सिनेमा में कहानी कुछ नहीं होती। वह हमेशा एक पेज  की होती है। निर्देशक और लेखक की ताकत इस बात में होती है कि कैसे उस एक पेज की कहानी को 100 पन्नों की पटकथा में बदलें। उन पन्नों में किरदार हों, सीन हों। कहानी उसमें एक स्वेटर की तरह बुनी हो जिसमें कंधा भी हो, बांह भी। पेट और पीठ भी। ठग्स ऑफ हिंदुस्तान में ऐसा कुछ  भी नहीं है। इस फिल्म के बाद विजय कृष्ण आचार्य बस उस जमात में आकर खडे हो जाते हैं जहां प्रभुदेवा,  साजिद वााजिद,  साजिद खान,  अभिनव कश्यप, शिरीष कुंदर  जैसे जैसी घटिया निर्देशक पहले से खडे हुए होते हैं। जब आप ये लाइन पढकर  होंगे उस समय इस फिल्म के सबसे जल्दी सौ करोड कमाने की खबरें भी आ चुकी होंगी। एक सप्ताह बाद आप इस फिल्म की सक्सेज पार्टी की तस्वीरें भी दिखेंगे। भारतीय सिनेमा को अभी और जलील होना है...

Friday, October 19, 2018

मिडिल क्लास को भी किसी भी उम्र में सेक्स करने का पूरा हक है, और हां शराब पीने का भी



शराब पीना और सेक्स करना जैसे 'बुरे काम' कितने बुरे हैं इनकी डिग्री परिवेश तय करता है। मध्यमवर्गीय आदमी के लिए ये दोनों ही टैबू हैं। वो ये दोनों काम करता तो है गिल्ट के साथ। सेक्स तो बहुत ही बुरी चीज है। शादी के बाद जब  लड़की
 प्रेगनेंट होती है तो उसे ये बात अपने भाई और पिता से बताने में झिझक होती है। झिझक की वजह ये होती है कि वह मां बनने वाली है तो इसका मतलब ये है कि उसने सेक्स किया होता है। ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों में ये बातें आज भी वाया मां परिवार  के मेल मेंबर तक पहुंचती हैं । बधाई हो एक ऐसे विषय पर बनी फिल्म है जिसमें एक युवा इस झिझक के साथ जीता है कि उसकी मां 'फिर से मां' बनने वाली है। वो भी तब जब वह खुद अफेयर में  है और शादी करने वाला है। जाहिर है कि बच्चा जूठा आम खाने से तो वजूद में आया नहीं होगा तो ज्यादा शर्म की बात ये है कि उसके मां बाप अभी भी सेक्स करते हैं। उसके मां-बाप भी अनजाने में हुए इस पाप को कवर करते हुए चलते हैं। घर में, मोहल्ले में, ऑफिस में। चूंकि एबॉर्शन करना उनके लिए इससे बडा पाप है इसलिए वह बच्चा रखने के अपेक्षाकत छोटे पाप के साथ सरवाइव करने का फैसला लेते हैं। फिल्म कॉमिक अंदाज में बहुत ही कठिन और डिस्कश ना करने वाली चीजों की चर्चा करती हुई चलती है। एक शानदार भावुक क्लाइमेक्स के  साथ।

सेक्स को मुख्य विषय बनाकर भारत में कुछ बहुत अच्छी फिल्में बनाई गई हैं। इसमें से कुछ गुमशुदा हैं और कुछ को चर्चाएं मिलीं। दिल कबडडी, मिक्सड डबल, रात गई बात गई जैसी फिल्में गुमशुदा और असफल रही हैं। विक्की डोनर, शुभ मंगल सावधान को आप सफल की कैटेगरी में रख सकते हैं। बधाई हो इन सभी फिल्मों से  एक कदम आगे की फिल्म है। बिना अश्लील हुए और मुंह छिपाए ये फिल्म सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बात करती है। घर की दादी के मुंह से जब निरोध शब्द निकलता है तो हमें अटपटा नहीं लगता है। हम हंसते हैं। फिर फिल्म खत्म होते होते खुद शादी की दहलीज में खड़े लडके को अपने मां बाप का सेक्स करना बुरा नहीं लगता। जो कुछ समय पहले बहुत ही लिजलिजा सा ख्याल लगता है। और लडका शर्मिंदगी में अपनी 'अपरक्लास प्रेमिका' से बात करना तक बंद कर देता है क्योंकि उसे डर है वह उसे जज करेगी।

बधाई हो इधर समाज और खासकर शहरी कल्चर में आई एक नई टेंडेंसी पर भी बात करती है। लड़की और उसकी फैमिली को मिडिल क्लास का लड़का तो पसंद आता है पर उसे फैमिली उसे 'डाउन मार्केट' लगती है। लड़का इसलिए पसंद आता है क्योंकि वह महसूस करती हैं कि लड़के को खुद भी 'मिडिल क्लास' होने पर शर्म है और वह मिडिल क्लास से 'वाया अपर मिडिल क्लास' अपर क्लास में शिफ्ट हो रहा है। शादी के बाद लड़की उसकी इस शिफिटिंग में  मदद करेगी। एक्चुअली ये एक अनकही डील होती है। मैंने आसपास हाल ही में अमीर हुए बहुत से ऐसे मध्यमवर्गीय लडके देखे हैं जो अपनी ससुराल के स्टेटेस का ख्याल रखते हुए ऐसे मां बाप से उचित दूरी बना लेते हैं जिन्हें मॉल के एक्सीलेटर में पैर रखने में डर लगता है या वह हाथ से ही रेस्टोरेंट में दाल चावल खाने लगते हैं। पत्नी के सामने उनकी अपनी उस बोली में बात करने में झिझक होती है जिसे वह सालों से बोलते आ  रहे हैं।

फाइनेंसियल डिफरेंस को फिल्म दुनिया में पहले भी दिखाया जाता रहा है पर जरा फिल्मी अंदाज से। प्यार झुकता नहीं है से लेकर राजा हिंदुस्तानी जैसी फिल्में में ये डिस्कोर्स आए हैं। यहां भी कटघरे में 'लडके का क्लास' है। लडकी का पाप सिगार पीते हुए लडके की मासिक कमाई पूछता है और फिर अकडकर अपनी बेटी के एक दिन का खर्च बताता है। पर इधर अमीर लोग भी जरा 'संस्कारी और मॉडेस्ट' हो गए हैं। इसका रिफ्लेक्शन फिल्मों में आया है। उन्हें मिडिल क्लास से बू तो आती है लेकिन उसके आगे वह एक किस्म का सेफ्टी वाल्वलगा देते हैं। 'शिफ्टिंग इन फ्यूचर' का सेफ्टी वाल्व। बधाई हो इस टेंडेसी को बहुत 'क्लासी' तरीके से दिखाती है, बगैर अपर क्लास को जलील किए। खासकर मिडिल क्लास  के लडके का मिडिल क्लास में घर वापसी का सीन।

फिल्म का सबसे खूबसूरत पक्ष किरदारों की ऐक्टिंग और उनके किरदार का गठन है। आयुष्मान खुराना, नीना गुप्ता और गजराज राव मंझे हुए अभिनेता है। उन्होंने तो अच्छा किया ही दादी के रोल में सुरेखा सिकरी ने बेहद उम्दा काम किया है। बधाई हो एक जरुरी तौर पर देखी जाने वाली फिल्मों में है। हम हिंदी सिनेमा के सबसे सुनहरे दौर में जी रहे हैं। इसके टेस्ट को चख लेना चाहिए। कोई ठिकाना नहीं कि पांच साल के बाद हमें क्या मिलने लगे। कई बार मनमोहन को हटाने के चक्कर में हम क्या चुन लेते हैं।

Wednesday, October 3, 2018

'पटाखा' टीवी सीरियलों की लोकप्रिय कहानियों का 'इंटलेक्चुअल वर्जन' है

विशाल भारद्वाज की पटाखा देखते हुए आपको दूरदर्शन में 'चिक शैंपू पेश करते हैं' के दौर वाली फिल्में याद आ सकती हैं। ऐसी फिल्में जो सबकी समझ में आ जाएं। मेरे घर में जब भी अनोखा बंधन, प्यार झुकता नहीं, स्वर्ग या फिर इधर बाद में विवाह या बागबान जैसी फिल्में आईं तो बुश टीवी वाला कमरा हाउसफुल चला। उसी कमरे ने वह बुरा दौर भी देखा जब टीवी पर हू तू तू, जख्म, फिजा, क्या कहना जैसी फिल्में आईं। विशाल की पटाखा 'टीवी की इन सर्वमान्य फिल्मों' से दो मामलों में अलग है। पहली उसमें  कोई जाना-पहचाना चेहरा या स्टार नहीं है। दूसरा उसमें बीच-बीच में 'भारद्वाज स्कूल ऑफ फिल्म मेकिंग' के इंटलेक्चुअल छींटे और शटायर हैं। फिल्म के एक सीन में खुद को परेशान कर रहे है  युवक से नायिका बोलती है कि मारुंगी एक तो गुजरात में  जाकर गिरोगे। परेशान करने वाले को गुजरात में जाकर गिराना यूपी या बिहार में नहीं यही विशाल का पॉलिटिकल कमेंट है।

विशाल एक ऐसे फिल्मकार हैं जिनकी राजनीतिक समझ उनकी फिल्मों में रिफ्लेक्ट होती है। उनके सिनेमा का एक छोटा सीन या संवाद एक बहुत बडी बात या विडंबना को कहने की कोशिश करता है। देशकाल और राजनीतिक विचार उनकी फिल्मों में बार-बार आते जाते रहते हैं। पटाखा इस मामले में अलग है। इस बार केंद्र में वाकई एक मनोरंजक कहानी है जो भदेस है। देशी है। कहानी किस कालखंड की है ये नहीं मालूम। फिल्म में दिखाई गईं रेलगाडियों के डिब्बे नीले हैं तो यह मान लेते हैं कि ये इसी दौर की बात है। इस बार जोर सिनेमा की भव्यता पर ना होकर एक सामान्य कहानी को डायलॉग, सीन और अभिनय से चमत्कारिक बनाने में है। अगर इस आधार पर चीजों को परखा जाए तो वे सफल रहे हैं। यह फिल्म दर्शकों को लगातार इंगेज्ड रखती है। पर ये उन लोगों को कुछ निराश कर सकती है जिनके लिए विशाल,  हैदर, मकबूल, मटरु, या रंगून  जैसा सिनेमा रच चुके थे। ये कुछ वैसा ही है कि निर्मल वर्मा अपनी कोई कहानी शरदचंद या कुछ हद तक जैनेंद्र की तरह लिख दें। या फिर महेश भटट कुछ नया करने के लिए रोहित शेटटी की स्टाईल में एक कॉमेडी फिल्म बनाएं और जिसका नायक उनकी मेकिंग स्टाईल के अनरूप ही अवैध संतान हों। ये सब अच्छा रचते या बनाते हैं पर अपनी तरह से।

सिनेमा में इमेज एक ताकत भी है और कमजोरी भी। दो बहनों की लड़ाई वाली यह फिल्म विशाल के लिए कुछ वो दर्शक जोड सकती है जिन्हें रंगून बहुत हैवी लगी हो,  हैदर लेफ्ट धारा के आसपास और मटरु शुद्व राजनीतिक। पर विशाल की कुछ और फिल्में जैसे ओमकारा, सात खून माफ और कमीने विशुद्व रुप से मनोरंजक फिल्में थीं जिनका कैनवास बहुत बडा था और  घटनाएं एक परिवार  के बीच की। इन फिल्मों से तुलना करने पर पटाखा पीछे छूट जाती है और लगता है कि हम नेशनल न्यूज चैनल में कोई लोकल खबर देखने लगे। उनके इस सिनेमा में फिलॉसफी कम है और घटनाएं ज्यादा। फिलॉसिफी का पूरा जिम्मा फिल्म में सूत्रधार बने सुनील ग्रोवर पर ही है। वह मसखरे अंदाज में लोकल से ग्लोबल और ग्लोबल से इंटलैक्चुअल बातों की तरफ बढ जाते हैं। बहनों की लडाई की निरर्थकता को भारत-पाकिस्तान से जोडना उसी कवायद का हिस्सा है। ऐसे कई सारे कमेंट हैं जो फिल्म के ह्रयूमर को डार्क बनाकर ये बताने की कोशिश करते हैं कि यह अनोखा बंधन या प्यार झुकता नहीं जैसी नहीं है।

सिनेमा में सही तरीके से गांव को ना दिखाना खटकता है। गांव की लडकियां सुंदर भी हो सकती हैं और गोरी भी। ऐसी बहुत सी लडकियां मैंने देखी हैं जिनके दांत बहुत सुंदर और चमकदार होते हैं। फिल्म उन्हें टाइप्ड दिखाती है। जब वीडियो कॉलिंग है तो जींस भी हो सकती है और छोटे बालों वाली हेडर स्टाईल भी।  महिलाएं ही घर को तोडती हैं पुरूषों की इसी बनी बनाई मानसिकता को भी विशाल हवा देते हैं। जाहिर है आज से बीस साल के बाद जब विशाल सिनेमा नहीं बना रहे होंगे तब उनको हैदर के लिए ही याद रखा जाएगा ना कि पटाखा के लिए। आप देखना चाहें तो देख सकते हैं  क्योंकिफिल्म बुरी नहीं है। बस ये बदले हुए विशाल की है। जो शायद बटर चिकन और नॉन खा-खाकर थक गए थे और उन्होंने बटर खिचडी का ऑर्डर दिया हो।

Monday, September 17, 2018

चूहे बिल बनाते हैं और सांप उसमें रहते हैं, इस बार चूहे ने बिल नहीं बनाया


चूहे बिल बनाते हैं और सांप उनमें रहा करते हैं। सांप आलसी होते हैं वो काटते भी तब हैं जब उन्हें खुद अपने लिए डर लगता है। चूहे पूरे दिन काटते हैं बिना किसी डर के। अनुराग कश्यप फिल्मी दुनिया के चूहे रहे हैं उनका दूसरों के बनाए बिलों में  गुजारा नहीं हुआ है। डिब्बाबंद 'पांच' से  लेकर 'मुक्काबाज'  तक सब उन्हीं के बिल हैं। ये बिल इतने संकरे और स्टाइलिश हैं कि अगर कोई सांप उसमें घुसना चाहे तो उसकी चमड़ी छिल जाए। मनमर्जिंया अनुराग की पहली  ऐसी फिल्म है जब अनुराग दूसरों के बिल में घुसे हैं। इस फिल्म में उन्होंने कुछ रचा नहीं। ना ही किरदार, ना वातावरण, ना कहानी और ना ही नई भाषा। बस बने बनाए पहले के फॉर्मूलो को जरा अपने ढंग से एडिट भी कर दिया। जैसे एक सब एडिटर डेस्क पर बैठकर रिपोर्टर की एक कॉपी को एडिट कर देता  है। कुछ अपने शब्द डाल देता है और उसके हटा देता है।

फिल्म में कई सारे सीन ऐसे हैं जहां अनुराग कश्यप की झलक मिलती तो है लेकिन यह उनकी फिल्म नहीं लगती। इसकी कई वजह हो सकती हैं। सबसे बड़ी शायद ये  कि अनुराग शायद अपने आइसोलेशन से उकता गए हों और उन्हें अब मेनस्ट्रीम की शोहरत आकर्षित करने लगी हो। या उनको लगने लगा हो कि फिल्में अब फिल्म फेस्टिवल के लिए नहीं बल्कि भारतीय  फेस्टिवल के अनुरूप बनानी चाहिए। फैमिली ऑडियंश का एक बडा वर्ग जो उनसे चिढता है उसे वे अपने करीब बैठाना चाहते हों। चाहते हों कि उनकी फिल्में परिवार को लोग देखने आएं और फिल्म देखकर खुशी खुशी खाना ऑर्डर करें और फिल्म को भूल जाएं।


सेक्स के बाद सलवार में  नाड़ा बांधती तापसी पन्नू के उस सीन को छोड दे तों फिल्म ज्यादातर जगहों पर संस्कारी ही है। बस थोडा थोडा वैसा ही  साहस दिखाने की कोशिश करती है जैसे यूपी या मप्र के किसी स्कूल मास्टर, या बैंक कैशियर की लडकी जब पहली बार सिगरेट का  कश  खींचती है या वोदका का पहला घूंट भरती है तो उसे लगता है कि उसने बहुत बडी बगावत कर ली। इस फिल्म को देखते हुए मुझे आडवाणी का जिन्ना की मजार में जाना याद आ गया। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहना याद आया। याद आया कि कैसे 2003 में अटल बिहारी बाजपेई  ने हज यात्रियों के लिए बडी छूट की घोषणा की थी। फिर राहुल गांधी के वे चित्र भी दिमाग में आए जिसमें वे रामनामी ओढे मंदिरों के चक्कर लगा रहे  थे। ये भी याद आया कि प्रणब दा संघ के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गए  थे।

मनमर्जियां लंबी फिल्म है पर बुरी नहीं। किरदार अच्छे लगते हैं। पर कुछ कुछ टाइप्ड भी। क्लाइमेक्स का तो ऐसा है कि आप पहले से दो दिन लिख लें, फिर अक्कड़ बक्कड़ खेल लें। उसी में से कोई एक निकलेगा। टाइप्छ ऐसे कि प्रेमी, प्रेम अच्छा करेगा, सेक्स जुनूनी करेगा। बिल्कुल संतुष्ट कर देगा। लडकी को सिगरेट और शराब पीने की लिबर्टी देगा, जीवन की छोटी छोटी बातों में जज नहीं करेगा। लेकिन यही प्रेमी जिम्मेदार नहीं होगा।  पैसा नहीं कमाएगा। पति के रूप में जिम्मेदार नहीं दिखेगा। लडकी जो एक सुरक्षा चाहिए होती है वह नहीं देगा। इसके उलट फिल्म के पास एक पति भी होगा। और लगेगा कि वह पति के रुप में ही पैदा हुआ है। वह बहुत भयंकर किस्म का जिम्मेदार  होगा। संवेदनशील होगा लेकिन ठीक से सेक्स नहीं कर पाएगा। शायद सेक्स में प्रयोग बिल्कुल ना करें। 69 पोजीशन उसे पता ना हो। फ्लेवर्ड कंडोम का यूज ना करता हो। क्योंकि उसका जन्म जिम्मेदारी उठाने के लिए हुआ था ना कि सेक्स करने के लिए। मनमर्जियां ये  सब बहुत पुरानी मानसिकतााओं की हवा देती हैं, बस जरा नए तरीके से।


फिल्म के किरदार खासकर अभिषेक बच्चन का किरदार ना चाहते हुए भी 'हम दिल दे चुके सनम' के अजय देवगन और 'तनु वेडस मनु' के माधवन जैसा ही लगता है। तापसी पन्नू के किरदार का कन्फयूजन  इम्तियाज अली से चुराया हुआ लगता  है। कहीं कहीं ये करण जौहर की फिल्म भी लगने लगती है। कहीं शाद अली की तो कहीं दिबाकर बनर्जी की। बस अनुराग की नहीं लगती। जिंदगी में हमें किसी के जैसा नहीं बनना चाहिए। रन वीवीएस लक्ष्मण भी बनाते हैं और वीरेंद्र सहवाग भी। दोनों के अपने चाहने वाले हैं। लेकिन दोनों के रन बनाने के तरीके अलग अलग हैं। अनुराग की फैन फालोइंग खानों जैसी नहीं है लेकिन उनके सिनेमा को पसंद  करने वाले हैं और बढ रहे हैं। इसकी उनको कद्र होनी चाहिए।

कुछ फिल्मों से  तापसी पन्नू वैसी ही लग रही हैं जैसे एक समय परिणिती चोपडा लगती थीं। अपने कोस्टार पर चढी हुई। बिस्तर पर भी और सीन में भी। ये अच्छा लगता है लेकिन कई  बार जबरिया भी। हमारे आसपास ऐसी लडकियां नहीं हैं जो  अपनी स्कूटी से प्रेमी के घर चली जाएं या अपनी बुलेट से अरेंज्ड मैरिज वाले दूल्हे के घर जाएं और उसे मना कर आएं।  ये फेमेनिज्म का एक नया तरीका है। अच्छा लगता है कई लडकियों को। लेकिन बहुत सारी लडकियां इसे ओवरडोज मानती हैं और मानती हैं कि ये फेमेनिज्म नहीं है।

अभिषेक इस फिल्म में एक सरप्राइज पैकेज हैं। अभिषेक के खराब दिनों में भी मैंने उन्हें एक अच्छा कलाकार माना। ऐसा  कलाकार जिसे अच्छे निर्देशक कम मिले। जो मिले उन्होंने रिपीट नहीं किया। मनमर्जियां में अभिषेक का मॉडेस्ट होना बनावटी नहीं लगता। लगता  है कि ये बंदा इतना बर्दाश्त तो कर ही लेता है। 'एक दूसरे को खा जाओ, घुसे रहो एक दूसरे में' वाला सीन 'कभी अलविदा  ना कहना' का बी पार्ट लगता है। इस सीन को और लंबा होना चाहिए  था। इतना था कुछ था उस आदमी के पास उस हालात में कहने के लिए  पर जाने क्यों उस सीन को एक मिनट में ही समेट दिया गया।

इधर दो चार साल में जो  कलाकार प्रकट हुए हैं उनमें विक्की कौशल की रेंज सबसे बडी है। मनमर्जिया देखते हुए मुझे लस्ट स्टोरी और राजी वाले  विक्की याद  आ रहे थे। एक बहुत लंबी रेंज वाला ये अभिनेता वाकई  बहुत दूर तक जाने वाला है। सबकुछ ठीक है फिल्म में। बस ये कुछ लंबी कम होती और आखिरी में डायरेक्टेड बाई में अनुराग की जगह कोई  और नाम चमक गया होता। 

Friday, August 3, 2018

मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है, 'मुल्क' चाहता है कि ये टूटे


मुसलमान एक परसेप्शन बेस्ड जीव है। परसेप्शन यूं ही नहीं बना। इसके बनने और मजबूत होने में सालों लगे हैं। कश्मीर में हुई एक घटना गोरखपुर के किसी सुबोध शुक्ला का परसेप्शन और मजबूत कर देती है। या कोई चंदन मार दिया जाता है। मुसलमान का आतंकी होना एक अलग डिग्री का परसेपशन है। लेकिन वह अनपढ होता है, जाहिल है, कई सारी शादियां करता है। वह किसी के साथ भी सेक्स कर सकता है, बहुत सारे बच्चे पैदा करता है। गंदगी में रहता है और इस्लाम को छोडकर हर धर्म  का विरोधी होता है। और सबसे बडी बात ये है कि वह विश्वास करने का पात्र नहीं है। ये ऐसे परसेप्शन है जो रोजमर्रा की जिंदगी में हर रोज मुसलमान अपने सामने वालों की आंखों में खुद के लिए देखता है।

अब तो यूज्ड टू है। यही परसेप्शन उसे 'हम और वो' में बांटते रहे हैं। दर्दनाक पहलू ये है कि मुसलमाानों ने खुद को लेकर बन रहे इस परसेप्शन का विरोध नहीं किया, बल्कि उनका ही विरोध करने लगे जो इस तरह के परसेप्शन के साथ जी रहे होते हैं। मेरा अपना फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस हैं कि प्रगतिशील और आर्थिक रुप से बहुत सक्षम मुसलमान खुद को इस 'सो कॉल्ड गंदगी' से दूर कर लेते हैं। और वो ये बात कहते भी हैं कि 'हम' उनके जैसे नहीं हैं। मुल्क फिल्म में एसएसपी का किरदार निभाने वाले दानिश जावेद मुसलमानों के इसी तबके की सोच की नुमाइंदगी करते हैं।


मुल्क मुसलमानों को लेकर बने इन्हीं परसेप्शन की बात करती है। फिल्म के एक सीन में जब आतंकवादी के पूरे परिवार को ही सरकारी वकील आतंकी साबित कर रहे होते हैं तो उसी क्रम में वह मुसलमानों के यहां बहुत बच्चे होने का तंज कसते हैं। इस  तंज पर  कोर्ट रुम में बैठे हुए लोग ही नहीं हंसे थे। मेरे बगल में बैठे लोगों के चेहरे और शरीर में भी हल्की सी हरकत हुई थी। बावजूद इसके वे पढे लिखे लोग थे और कई सारी मसाला फिल्मों को छोडकर मुल्क देखने आए थे। उनके शरीर की ये हरकत बताती है कि धर्म को लेकर बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो अब उनके कंटोल में नहीं हैं। उनका अनकांसेस माइंड इन चीजों पर रिक्शन दे देता है। 

मुल्क ऐसे ही परसेप्शन को खारिज करने का प्रयास करती है। पर तकरीर से नहीं। वो ये कोशिश करती है कि हम बनारस के उस मुसलमान परिवार का हिस्सा बनकर सोचे जिसके घर का एक लडका आतंकवादी बन जाता है। उस घर के लोगों पर क्या बीतती है जिसके घर की दीवारों पर गो बैक पाकिस्तान के नारे लिख दिए जाते हैं। उसी घर में जिसके यहां दो दिन पहले हुई दावत में हिंदू मुसलमान दोस्तों ने साथ बैठकर खाना खाया था। एक मां अपने आतंकी बेटे की लाश लेने से मना कर देती है। किसी सामाजिक दबाव में नहीं बल्कि उसकी अंतरआत्मा इस बात को गंवारा नहीं करती। ये भारत देश ऐसे मुसलमानों से भरा पडा है।

हो सकता है कि इस देश में ऐसे मुसलमाान भी हों तो पाकिस्तान की जीत पर पटाखे बजाएं। हो सकता है कि ओसामा बिन लादेन की तकरीरे सुनते हों। हो सकता है कि उवैसी उनको एक काबिल और उनकी बात कहने वाला नेता लगता हो। लेकिन ऐसे मुसलमान कितने हैं। क्या इन चंद मुसलमानों की वजह से पूरी कौम को कटघरे में रख दिया जाएगा? फिल्म इस बारे में आपसे से सोचने के लिए कहती है। फिल्म कतई नहीं कहती कि मुसलमान कटटर नहीं है। उनके अंदर भी कटटरता है। दूसरे कौमों के लिए जहर है। धर्म को लेकर वह जाहिल हैं, लेकिन कितने फीसदी? दो- चार फीसदी की सजा 100 प्रतिशत को तो नहीं मिलनी चाहिए।

एक मैसेज देने के अलावा फिल्म, फिल्म के रुप में भी बहुत सक्षम है। कैमरावर्क बेहद शानदार है। हर एक किरदार की एक्टिंग लाजवाब है। पूरी जिंदगी मसखरी भरे रोल करने वाले मनोज पहवा ने एक आतंकी बेटे के बाप का क्या खूबसूरत रोल किया है। तापसी एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री बनकर उभरी हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज बहुत बेहतरीन है। अमिताभ बच्चन की तरह ही रिषी कपूर जवानी से बेहतर फिल्में अब कर रहा हैं। आशुतोष राणा को प्लीज हिंदी फिल्में दीजिए। नहीं तो ये फिर से साउथ इंडिया की फिल्में करने लगेंगे। अनुभव सिन्हा के सारे पाप इस फिल्म ने धो डाले हैं। उम्मीद है कि वह अब जिद जैसी फिल्म बनाने की जिद नहीं करेंगे। मुल्क एक जरुरी तौर पर देखी जाने वाली फिल्म है। देखे जाने के बाद  पूरी रात बैठकर चर्चा की जाने वाली फिल्म है। कोशिश करें....

Friday, June 29, 2018

संजू: जीवन में पहली बार आमिर खान का कम लंबा होना अखरा है



राजू की फिल्म थ्री इडियटस के समय ऐसी खबरें आती थीं कि आमिर हिरानी के काम में काफी दखल देते हैं और स्क्रिप्ट में बदलाव सेट पर ही करवा देते हैं। राजू इसे खारिज नहीं किया करते  थे और मीडिया से कहते कि आमिर सीनियर और  संजीदा कलाकार हैं और हमें उनके क्रिएटवि सजेशन अच्छे लगते हैं। बाद के एक इंटरव्यू में आमिर ने ऐसे ही सवालों का एक लैंडस्केप आंसर दिया था। आमिर ने कहा था कि वे स्क्रिप्ट नहीं बदला रहे थे दरअसल उस फिल्म में  राजू ने उनका जो किरदार गढा  था वह बहुत ही आदर्शवादी थी। इतना कि उसे हर सीन में अच्छे होने को स्टेबलिस करना होता। मैं उस किरदार के अच्छे होने का लोड नहीं उठा पा रहा था। मैंने बस उस किरदार  के अच्छे होने को माइल्ड किया है। और वो जो माइल्ड हुआ तो वह राजू को भी अच्छा लगा।

जो गलती हिरानी थ्री इडियटस में  आमिर की वजह से करते  करते बच गए थे वही गलती संजू में कई बार दिखती है। राजकुमार हिरानी अपने दोस्त संजय को एक अच्छे इंसान के तौर पर स्टेबलिस करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि कोर्ट से संजय को जो  सजा मिली है वो तो  वह काट ही चुके हैं पब्लिक परसेप्शन में भी उनकी इमेज बदले। राज कुमार हिरानी संजय के समर्थन में इतना एकतरफा हैं कि उन्हें उनकी हर हरकत को जस्टीफाई  करते चलना पडा है। फिल्म संजय की अच्छाई से कहीं कहीं दब सी जाती है। फिल्म बाकी कलाकार उसे  निकालते  दिखते हैं।

फिल्म के दो हिस्से हैं। पहला डग्स लेने वाला संजय दत्त और दूसरा आतंकी संजय दत्त। पहले हिस्से में यह फिल्म थोडी चुलबुली है। वह संजय को एक 'नेक लापरवाह' के रुप में  स्थापित करती हुई  चलती है। अगर वो डग्स ले रहे हैं तो उसका दुष्परिणाम कितने गहरे हैं फिल्म इस पर वह बात नहीं करती। बस इसे एक आदत मान लेती है। लेकिन  इस गंदी आदत से निकलकर  एक आदमी बनने की कोशिशों को वह 'मैदान फतेह' के रुप में दिखाती है। नशा करने वाला संजय दत्त आम आदमी बन जाते हैं और  इंटरवल हो जाता है।


इंटरवल के  बाद हिरानी संकेतों में बात नहीं कहते। वो सीधे उनके बचाव में उतर आते हैं। संजय दत्त का आर्म्स रखना, उनके आतंकियों के साथ में मेलजोल रखना, उनका गिरफतार  होना, जेल जाना। फिल्म इन सबका दोष संजय पर 25 प्रतिशत डालती है और बाकी 75 प्रतिशत कसूर  मीडिया पर। ये फिल्म सिर्फ संजय को ही स्टेबलिस नहीं करती। वो उन्हें एक अच्छे पुत्र, अच्छे दोस्त, अच्छे पति और अच्छे पिता के रुप में दावेदारी करती हुई चलती है। पिता और पुत्र के संबंधों को बहुत आदर्श तरीके से पेश करने में राजू ने बहुत सारे सीन खर्च कर डाले हैं। आपके इमोशन को वे पूरा निचोडना चाहते हैं। लेकिन ये सब कुछ 25 प्रतिशत स्वाभाविक लगती है और 75 प्रतिशत बलात।


ये एक बडी फिल्म है और अच्छी भी। दो सौ करोड से उपर कमाने वाली फिल्म। लेकिन ये फिल्म हिरानी की फिल्म नहीं है। पीके और थ्री इडियटस बनाने वाले हिरानी फिल्म। जब हिरानी इस फिल्म में अपनी ही एक फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस का जिक्र ले आते हैं तो कहीं कहीं  ये बचकाना भी लगता है। और भी यहीं पर आमिर खान याद आ जाते हैं।

आमिर खान यदि इतने लंबे होते तो कि वह संजय दत्त जैसे दिख सकते तो यकीनन संजू एक बेहतर फिल्म होती। आमिर  का कम लंबा होना मुझे मेरे  कम लंबे होने से ज्यादा जीवन में पहली बार अखरा। और शुक्रिया अनुराग कश्यप और नीरज घेवान। बॉलीवुड को विक्की कौशल जैसा अभिनेता देने के लिए।

Thursday, June 14, 2018

काला: यहां पर ये डिस्केलमर लगा देना चाहिए कि ये फिल्म सिर्फ दलित- मुसलमानों के लिए है, यह बेहद डरावना है


यह हिंदी सिनेमा की  खूबसूरती है दर्शक जब किसी फिल्म को  देखने का चुनाव करता  है तो उसके जेहन में यह बात नहीं आती कि फिल्म के नायक का धर्म क्या है, यदि वह हिंदू है तो उसकी जाति क्या  है, दर्शक ये भी पता करने की कोशिश नहीं करता कि उसके हीरो ने पर्दे पर जो रोल निभाया है वह किस जाति का है। या वह किस जाति के खलनायक का  विरोध कर रहा है। सिनेमा की यह खूबसूरती 'काला' में कई जगह बारीक तरीके से तहस नहस की गई। इसका ये तहस नहस किया जाना भविष्य के  के  प्रति डर पैदा करता है। वैसा ही डर जैसे हमनें वोट देने के लिए पार्टियां  चुनी हैं वैसे ही हमें  फिल्म देखने के लिए हीरो चुनने  होंगे।

मैं तमिलनाडु की राजनीति को करीब से नहीं जानता। वहां पर दलित मुसलमान के गठजोड की क्या संभावनांए हैं या सवर्ण जातियों  का विरोध करने पर  किस किस्म की गोलबंदी हो सकती है ये भी नहीं पता। लेकिन ऐसा लगता  है कि यह फिल्म फ्रेम दर  फ्रेम  फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे रजनीकांत के राजनीतिक एजेंडे को कलात्मक तरीके से रखती चल रही है। रजनी नई पार्टी का एलान कर चुके हैं। जिसे कुछ समय के बाद अस्थिर तमिलनाडु  की राजनीति में उतरना है, जहां जयललिता मर चुकी हैं और करुणानिधि बूढे होने की हद तक बूढे हो चुके हैं।

 सिनेमा एक्सप्रेसन का एक माध्यम है लेकिन काला उसका मिसयूज करती दिखती है। एक  खास उदेश्य की  पूर्ति के लिए। सिनेमा में जमींदार, लाला, मुनीम, पंडित जैसे किरदार कहानियों के हिस्से रहे हैं। लेकिन इन्हें इनकी गंदी मानसिकता के होने से जोडा गया ना कि इनकी जाति से। ऐसा नहीं कहा गया और ना ही दिखाया गया  कि सभी क्षत्रिय, ब्राहाम्ण या श्रीवास्तव घटिया लोग हैं। जमींदार होने को एक सोच का नाम दिया गया ना कि जाति का। यदि जमींदार  क्लाइमेक्स  में हीरो से पिटता है तो सिनेमा ने इसे क्षत्रियों की हार के तौर पर नहीं दिखाता रहा है।

काला इसके उलट खडी होती है। इस फिल्म का नायक दलित समुदाय से आता है, वह मुंबई की उस धारावी बस्ती का नेता है जहां मुसलमान और दलित रहते हैं। इस नेता की पहली प्रेमिका मुसलमान होती है। शादी उससे नहीं हो पाती है। शादी दलित से होती है। इसे दोनों तबको का समर्थन प्राप्त है। यहां तक तो ठीक होता है।  लेकिन फिल्म में इन दो जातियों के अलावा समाज की बाकी जातियों का हर आदमी विलेन है। यदि वो ब्राहाम्ण है तो उसकी एकमात्र ख्वाहिश लोगों से पैर छुलवाने की है। मेरी अपनी जानकारी में  ये पहला ऐसा सिनेमा है जहां पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर का बार-बार  इरादतन लाया गया। वह फिल्म के एक किरदार  हैं। उनके विचार तक बताए गए। और ऐसा महसूस कराया गया कि यह फिल्म सिर्फ दलितों के लिए बनाई गई। दलित चेतना के लिए। सिनेमा से इसका कोई सरोकार  नहीं है।


फिल्म के क्लाइमेक्स सीन में एक सवर्ण के घर में रामचरित मानस की कथा चल रही होती है। एक ऐसे सीन का वर्णन हो रहा होता है जहां राम, रावण को मार रहे होते हैं। मुझे थोडा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि मेरा किसी धर्म  से कोई लगाव नहीं है। लेकिन उस सीन में राम द्वारा रावण के  मारने की पूरी प्रक्रिया को  को ना सिर्फ गलत ठहराया गया  बल्कि उस पर मजाक भी किया गया। वो रावण जिसे राम मार देते हैं वह कुछ देर बाद और मजबूत तरीके से उभर आता है। और इसे रावण की जीत के तौर पर दिखाया जाता है। मुझे सतयुग के राम और रावण में रुचि नहीं है। मुझे गलत और सही चुनने में रुचि है। फिल्म गलत को सिर्फ इसलिए गलत नहीं कहती कि वह सोच से गलत है बल्कि यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि उस इसलिए गलत है क्योंकि वह उंची जातियों से है।

एक खास उदेश्यों के तहत बनाया गया यह सिनेमा, सिनेमा को तो कहीं नहीं ले जाता लेकिन एक बात जरूर बताकर चला जाता है कि एक्सप्रेशन के इस माध्यम से अपने राजनीतिक हित भी साधे  जा सकते हैं। मैं रजनीकांत या साउथ पैटर्न की फिल्मों का समर्थक नहीं रहा हूं। उनके विषय और उनकी  मेकिंग  स्टाइल से। मुझे ये फिल्म चिढाती हुई सी लगी। कि आप यदि उंची जाति में पैदा  हुए हैं  तो  आपने पाप किया है और आप बाई डिफाल्ट गलत हैं।  सिनेमा का यह तरीका हमें गलत तरीके  से  आगे ले जाएगा क्योंकि उनका जवाब देने के लिए उतने ही संकीर्ण मानसिकता के उंची जातियों के  लोग सिनेमा की दुनिया  में बैठे हुए हैं। फिल्म देखकर मुझे कई बार लगा कि इस फिल्म के साथ डिस्कलेमर लगाया जाना चाहिए कि यह सिर्फ मुसलमान और दलितों के लिए है। जिन्हें आगे चलकर अलग अलग चुनावों में अलग अलग पार्टियों के लिए वोट करना है।