Saturday, September 21, 2019

एक बीवी की निगाह से देखिए कि उसका जासूस पति क्या अहमियत रखता है...


अमेजॉन प्राइम पर स्ट्रीम हुई वेब सीरिज 'द फैमिली मैन' आप देख सकते हैं, बशर्ते इसे एक स्पाई की कहानी के नजरिए से नहीं, बल्कि एक भारतीय मुसलमान, आतंक से लड़ रहे सरकारी सिस्टम और एक स्पाई की बीवी के नजरिए से देखने की कोशिश कीजिए...

"भारत पर कोई आतंकी हमला होने वाला है। जिसके कुछ कोड वर्ड्स हमें मिल गए हैं। हमले के मास्टरमांइड पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर में बैठे हैं। उनके तार अफगानिस्तान, सीरिया, यूएई, सूडान, यूंगाडा जैसे इस्लामिक देशों से होते हुए सोवियत रुस और यूएएस तक पहुंचते हैं। इस खेल में सिर्फ आतंकी नहीं हैं। इसमें सरकार बनाने बिगाड़ने की हैसियत रखने वाले पॉवरफुल लोग हैं, दुनिया भर को हथियार सप्लाई करने वाली कंपनियों के ब्रोकर्स हैं, कई सारे बड़े कार्पोरेट्स हैं। भारत खुफिया एजेंसी के अधिकारी अपनी लगन, समर्पण और कूटनीति से इन चालों को नाकाम कर देते हैं।"  ये सिनेमा का वो प्लाट है जिसे बुनियाद बनाकर दर्जनों हिंदी फिल्में रची जा चुकी हैं।

कहानी के ये प्लाट भी उनके ओरिजनल नहीं रहे हैं। पश्चिम में सेकेंड वर्ल्ड वॉर, यहूदी दमन, ईराक, वियतनाम, अफगानिस्तान, इजराइल फिलिस्तीन युद्घ जैसे बड़े मामलों पर ढेरों अच्छी और बुरी फिल्में बनी हैं। वर्ल्ड वॉर के बाद शुरू हुए कोल्ड वॉर के दौरान जासूसी की दुनिया शुरू होती है। उन फिल्मों का एक अलग जॉनर हैं। श्रीराम राघवन जैसे सक्षम फिल्मकारों ने भी स्पाई और युद्घ फिल्मों के कॉकटेल को मिलाकर सिर्फ संदर्भ बदलकर परोस देने की कोशिश की है। हमारे पास काबुल एक्प्रसेस और फैंटम जैसी भी बेहद घटिया फिल्‍में भी हैं और मद्रास कैफे जैसी बेहतरीन फिल्‍म भी।


 तो क्या अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हुई फिल्म द फैमिली मैन ऐसी ही दर्जनों फिल्मों में से एक है जिसका हीरो भारतीय है और वह भारत के बचाने के मिशन में लगा हुआ है? पहले दो एपीसोड देखकर ऐसा ही लगता है। पर खत्म होते-होते ऐसा नहीं लगता। यह वेब सीरिज तब बड़ी लगने लगती है जब यह आतंकवाद और आतंकवादी बनने की प्रक्रिया को एक नए ढंग से देखने लगती है। इस बार ये बिल्कुल जरुरी नहीं कि आतंकवादी समंदर के रास्ते भारत में घुसे।

फैमिली मैन बताती है कि भारत पर हमला करने के लिए आतंकी यहीं के ही हैं, सिर्फ वहां से प्लान आया है। वह मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हुए, कॉलेज में पढ़ाई करते हुए, यू ट्यूब में वीडियो देखते हुए, किसी हिंदू प्रेमिका को डेट करते हुए भी वह आतंकवादी बने हुए हैं। वह जन्नत पाने के लिए, कश्मीरियों को हक दिलाने के ‌लिए या बाबरी मसजिद का बदला लेने के लिए आतंक के रास्ते नहीं चले हैं बल्कि वह इसलिए इस राह में है क्योंकि उन्हें अपने ऊपर हो रहे जुल्‍म् का बदला लेना है। वह भारत की सरकारों और यहां के बहुसंख्यक लोगों को सबक सिखाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। गुजरात दंगे, गौ हत्या, मॉब लिंचिंग, हिंदू वादी नेताओं के बयान उनकी प्रतिक्रिया के प्रमुख स्रोत हैं।

फिल्म अपने टैग लाइन से ही यह बताने की कोशिश करती है कि यह किसी सत्य घटना से प्रेरित नहीं बल्कि अखबारों में आमतौर पर छपने वाली खबरों से इंस्पायर्ड है। निर्देशक ने कोशिश की है आतंकवाद से लड़ने वाले सिस्टम, सरकारों के पक्ष के साथ उनका पक्ष भी रखा जाए जो कई बार सरकार की निगाह में तो गुनाहगार हैं लेकिन हर बार वह गुनाहगार नहीं होते। वैसे ही जैसे हर बार वह मासूम नहीं होते। कुछ फर्जी एनकाउंटर, मामूली शक में गोली मार देने या घर से उठा लेने जैसी घटनाएं भी फिल्म का हिस्सा बनती हैं और विमर्श के कुछ परागकण को छोड़कर आगे बढ़ जाती हैं।

यह वेब सीरिज आतंकवाद को देखने के नजर‌िए के साथ-साथ इस मायने में भी एक अलग है कि वह अपने जासूस को एक कूल, दिलफेंक, बॉडी बिल्डर की तरह पेश नहीं करती। मौका पड़ने पर वह हवाई जहाज भी नहीं उड़ा  सकता और पानी का जहाज भी। उसका नाम किसी फिल्‍मी के हीरो जैसा नहीं है। एक मीडिल क्लास का आदमी जिसका नाम श्रीकांत तिवारी(मनोज बाजपेई) है इस बार हमारा हीरो है। 'श्रीकांत तिवारी' नाम की अपनी सीमाएं हैं। ना तो वह जेम्स बॉड की तरह फ्लर्ट कर सकते हैं और दूसरा उनका मालूम है कि वह टॉम क्रूज भी नहीं है। उन्हें अपने बच्चों की पैरेंट्स मीटिंग में भी जाना है और किचन में अपनी बीवी की हेल्प भी करनी हैं। श्रीकांत तिवारी के पास ऐसे गुर्दे भी नहीं हैं जो लगातार शराब और सिगरेट पीने से खराब ना हों। श्रीकांत तिवारी को उन्हीं लिमिटेशन में देश भी बचाना है और परिवार भी।


आमतौर पर जासूसों की जिंदगी में बदलती हुई प्रेमिकाएं होती हैं। हॉट और मौकापरस्त।  श्रीकांत तिवारी की जिंदगी में बीवी है। एक बीवी और दो बच्चे । फिल्म की खूबसूरती उस एंगल को एक्सप्लोर करने की है जिस एंगल से श्रीकांत की बीवी अपने पति और उसकी नौकरी को देखती है। फैमिली को लेकर उसकी अवेलबिलटी को जज करती है। उसकी सेलरी की तुलना में उसके काम के घंटे कंपेयर करती है। उसकी पुरानी कार भी फिल्‍म में एक किरदार की तरह है।  एक जासूस की जिंदगी में ये एंगल नए हैं जो इस सीरिज को आतंकवाद पर बनी बाकी फिल्‍म से दूर खड़ा कर‌ते हैं।  श्रीकांत की बीवी के तौर पर तेलगू और मलयालम फिल्म की एक्ट्रेस प्रियमनी कमाल का काम करती हैं।

सुचित्रा अय्यर उर्फ सुचि का उनका किरदार बेहद खूबसूरती, ईमानदारी और सावधानी से लिखा गया है। जिन्हें आतंकवाद, पाकिस्तान, बम और जासूसी की दुनिया में रत्ती भर रुचि नहीं है उन्हें सिर्फ सुचि के किरदार के बदलाव और उसकी लेयर्स देखने के लिए यह फिल्म देखनी चाहिए। अघोषित तौर पर पति से होपलोस हो चुकी सुचि जब अपने एक कलीग की तरफ मुड़ती हैं तब फिल्म का वह हिस्सा अचानक बेहद रचनात्मक और खतरनाक हो उठता है। जिंदगी में कई बार पति और पति दोनों को लगता है कि दोनों की स्ट्रेंथ का सही आकलन एक-दूसरे नहीं कोई तीसरा कर रहा है। फैमिली मैन में ये तीसरा विलेन ना होकर भी विलेन से बड़ी हैसियत रखता है। इसकी हेल्प करने की नियत हमेशा कटघरे में होती है।


सुचि और उसके एक कलीग अरविंद (शरद केलकर)के बीच के ये रिश्ते प्रोफेशनल और प्लूटोनिक प्रेम के होते हैं या जिस्मानी? इसे राज और डीके ने बहुत ही संकेतों में कहने की कोशिश की है। दोनों किस तरह एक-एक स्टेप करीब आते हैं यह दिखाने में निर्देशक ने कई सारे मजेदार सीन गढ़े हैं जो कि बहुत सारे जिम्मेदारी भरी समझदारी लिए हुए हैं। जिन लोगों ने हैपी इंडिग फिल्‍म देखी होगी उन्हें सैफ और इलियाना डीक्रूज के बीच होटल में बने सेक्स रिलेशनशिप का वह सीन याद होगा। इस बार भी होटल है और दो होटल के कमरे के दो किरदार हैं। फर्क यह है कि दोनों मिडिल क्लास से आते हैं और मैरिड हैं।

 लोनेवाला के एक होटल कमरे में बेड पर लेटी सुचि और उसी कमरे के सोफे पर लेटे अरव‌िंद की आधी रात में होने वाली वाट्सअप चैट आपको अलग से बार-बार देखनी चाहिए। चैट के खत्म होने का प्वाइंट, उसके बाद कमरे की हलचल, यहीं सीन का खत्म हो जाना, गाड़ी में बैठे दोनों के सख्त चेहरे फिर बाद में एक लाइन में हुई उनकी चैट वालों हिस्सों को बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है। जिसके मायने आप निकालना चाहें तो निकाल लें, निर्देशक साफ-साफ कुछ नहीं कहता।


राज निधिमोरु और कृष्‍णा डीके निर्देशकों की जोड़ी ने इस फिल्‍म को डायरेक्ट किया है। ये सक्षम फिल्मकार हैं। 99, शोर इन द सिटी, गो गोवा गॉन, हैपी इंडिंग, जेंटलमैन और स्‍त्री फिल्मों को यह साथ-साथ निर्देशित कर चुके हैं। निर्देशकों की इस जोड़ी ने पहली बार इस तरह के जॉनर में हाथ आजमाया है। अच्छी बात ये है कि उन्हें अपनी स्ट्रेंथ पता है। वह आतंकवाद या जासूसी फिल्‍मों वाले कोर जोन में जाने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय उनकी कोशिश कुछ नए तरह के किरदार गढ़ने में होती है। राज और डीके की फिल्‍मों के किरदार आपको याद रहते हैं। ये फिल्म जितनी मनोज बाजपेई की फिल्‍म है उतनी ही यह शारिब हाशमी, नीरज माधव, प्रियमनी, दर्शन कुमार की भी फिल्म है।

दस ऐपीसोड वाली यह वेब सीरिज ऐसी जगह पर खत्म होती है जहां पर यह निश्चित है कि इसका सीजन 2 जरुर आना है। गूगल पर सर्च करने पर पता चलता है कि शायद ये तीन सीजन में बनने वाली सीरिज है। तो भातर पर केमिकल हमला हो पाता है या नहीं इसके लिए आपको इसके नए सीजन का वेट करना होगा। भारत पर एक और हमला सेक्रेड गेम्स में भी पेडिंग पड़ा है। सब मिलाकर भारत पर बहुत सारे हमले तो सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के बाकी हैं...

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