Saturday, August 17, 2013

'दीवार' में नवीन निश्‍चल = 'वंस' में अक्षय कुमार

यश चोपड़ा जब 'दीवार' बना रहे थे तो उनके मन में इस फिल्म के लिए नवीन निश्चल और राजेश खन्ना के नाम थे। यह तय नहीं हुआ था कि छोटा कौन होगा और बड़ा कौन। फिल्‍म की स्क्रिप्ट सलीम-जावेद के पास थी। जब स्क्रिप्ट पूरी हुई तो सलीम और जावेद को महसूस हुआ कि बड़े भाई के रोल के लिए अमिताभ बच्चन फिट होंगे और छोटे के लिए शशि कपूर। यश चोपड़ा मान गए। इसके बाद अमिताभ और श्‍ाशि भी। दीवार आपके सामने है। कल्पना कीजिए जिन संवादों को अमिताभ बच्चन ने बोला था उन्हें नवीन निश्‍चल या राजेश खन्ना अपने चिरपरिचति अंदाज में बोल रहे होते। "जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ"। इस संवाद को पहले राजेश खन्ना के मुंह में डालकर देखिए फिर नवीन के। फिल्म का यह चेहरा सोचकर ही घबराहट होती है।

जो गलती यश चोपड़ा करते-करते बच गए थे वही गलती मिलन लूथरिया ने वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा में कर दी है। इस बार रजत अरोड़ा ने उन्हें रोका भी नही। वह सिर्फ इस खुमार में जीते रहे कि उनके लिखे डायलॉग इतने दमदार हैं कि वे किसी से भी बोलवा लिए जाए फिल्‍म में समां बांध देंगे। वंस अपान एक के बाद एक कई गलतियां करती है। पहली गलती कहानी की। आप एक ऐसे गैंगस्टर को क्लाइमेक्स में सड़क पर फाइट करते नहीं दिखा सकते जो भारत का मोस्ट वांटेड अपराधी हो। बची कसर गैंगस्टर के प्यार में पड़ जाने के बाद पूरी हो जाती है। पर फिल्म खराब इसलिए नहीं क्योंकि वह अतार्किक है।

अगर तार्किकता की वजह से भारत में फिल्में फ्लॉप होतीं तो जब तक है जान तीन करोड़ और चेन्नई एक्सप्रेस पांच करोड़ कमा रही होतीं। यानी कि मामला तार्किक होने या न होने का नहीं है। वंस अपॉन की मूल कमजोरी पात्रों को गलत तरीके से चुनकर उन्हें पर्दे पर पेश करने का है। उम्दा अभिनेता अक्षय कुमार गैंगस्टर की एक बिना मतलब वाली बॉडी लैंग्वेज के साथ पूरी फिल्म में डायलॉग डिलवरी करते रहे। समझ ही नहीं आता कि वह कब गुस्सा हैं और कब अपना सेंस ऑफ ह्रयूमर पिद्दी से नायक पर बखार रहे हैं। मिलन लूथरिया को यह बात शायद एडटिंग टेबल पर भी समझ नहीं आई कि ‌सिर्फ अक्षय कुमार के मुंह में अच्छे संवाद ठूस कर उगला देने से वह गैंगस्टर नहीं लगेंगे।

इससे बुरा हाल छोटे गैंगस्टर का रहा है। इमरान खान से फिलहाल जाने तू या जाने न और एक मैं हूं और एक तू जैसी फिल्में ही करायी जा सकती है। विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरू की बिजली का मनडोला यदि एक बड़ी फिल्म नहीं बन पाती है तो उसकी कमजोर कड़ी इमरान खान हैं। मटरू या वंस अपॉन जैसे रोल के लिए इंडस्ट्री के पास बेहतर अभिनेता हैं। वह ऐसा अभिनेता हैं जो शायद सिर्फ इन्हीं भूमिकाओं के लिए फिल्मों में बने हुए हैं।

सोनाक्षी सिन्हा इन दोनों से इसलिए बेहतर लग जाती हैं क्योंकि उनका किरदार उनके रोल के आसपास का था। यदि आप एक मैं हूं और एक तू फिल्म में करीना को हटाकर सोनाक्षी को कर दें तो उनकी भी हालत वंस अपॉन के इमरान जैसी हो जाएगी। अच्छे से अच्छा संवाद हमें तब अखरने लगता है जब उसके लिए खराब चरित्र चुना जाए। यही फिल्म के साथ लगातार होता है। यह फिल्म अपनी मिसमैच कॉस्टिंग के लिए हमेशा याद रखी जाएगी। साथ ही यह फिल्म ऐसी फिल्म के रूप में भी याद की जाएगी जिस फिल्म के पास हीरो था ही नहीं। था तो बस विलेन, नायिका और विलेन का हेल्पर।

Saturday, August 3, 2013

यह एडल्ट फिल्म सेक्स के प्रति हमारा मोहभंग करती है

यह फिल्मकारों का भारतीय दर्शकों की रुचि और उनकी प्राथमिकता पर पूर्वाग्रह और अविश्वास ही है कि उन्हें बीए पास जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण फिल्म को भी सेक्स फिल्म कहकर प्रचारित करना पड़ता है। यदि ऐसा न किया गया होता तो निश्चित ही रात 11 बजे का शो 50 फीसदी भरा न होता। सेक्स का रैपर दर्शकों को थिएटर तक खींचकर लाता है। लेकिन इस रैपर के खुलने के बाद अलग दुनिया है। यकीनन इस फिल्म का ढांचा सेक्स के इर्द-गिर्द ही बुना गया है, भले ही फिल्म के ज्यादातर दृश्य सेक्स और उसकी रूपरेखा में ही बीतते हो बावजूद इसके यह फिल्म एक जगह भी सेक्स को मजे के रूप में पेश नहीं करती। यह फिल्म सेक्स के प्रति दर्शकों की संवेदनाएं वहां भी नहीं जगाती जहां फिल्म का मजबूर नायक मजबूरी में ही सही पर हो रहे सेक्स में मजे के चंद पल तलाशता है। इस फिल्म में सेक्स से बड़ी नायक की दुश्‍वारियां हैं। दर्शक पर्दे पर सेक्स देखने जाते जरूर हैं लेकिन फिल्म खत्म होते-होते उन्हें उन पात्रों से नफरत होने लगती है जो सेक्स के मजे लूट रहे होते हैं। यह हिंदी की शायद पहली फिल्म है जो पुरुष वेश्या को इस तरह से पेश करती है। गिनाने को तो देशी ब्वॉयज सहित कुछ और फिल्में भी पुरुष वेश्या की कहानी अलग-अलग तरीकों से कह चुकी हैं। लेकिन उनमें क्या है यह बताने की जरूरत नहीं। फिल्म का अंत बहुत यथार्थपरक और कष्ट देने वाला है। हालांकि अंत को पूरी तरह से न दिखाकर भी फिल्म खत्म की जा सकती थी। जरूरी नहीं था कि हम नायक को खत्म होता ही दिखा देते। ऐसा भी हो सकता था हम नायक को कुछ न कर पाने वाले हालत में ही छोड़कर चले जाते। उसके फोन की घंटी बजाकर करती और पुलिस उसे चारो तरफ घेर हुए होती। सुखांत या ड्रामेटिक क्लाइमेक्स के आदी हो चुके दर्शकों को फिल्म का क्लाइमेक्स जड़ कर देता है। हॉल छोड़ने पर जब दर्शक अपनी निजी जिंदगी में आता है तो उसे इस बात की तसल्ली मिलती है कि ‌थैंक्स गॉड यह एक फिल्म थी और मेरी जिंदगी ऐसी नहीं हैं। फिल्म कुछ और बातों पर कुछ कहने की कोशिश करती है। खासकर सेक्स से अतृप्त अधेड़ महिलाओं की अवसरवादिता हमें मोहभंग की स्थिति तक ले जाती है। इस फिल्म के कलाकारों का अभिनय एक बार फिर बताता है कि फिल्म एक निर्देशक का माध्यम है। वह अपने अनुसार कलाकारों से अभिनय करवा लेता है। परिवार के अलग-अलग सदस्यों द्वारा अलग-अलग जरूरी तौर पर देखी जाने वाली एक वयस्क फिल्म

Saturday, July 13, 2013

समीक्षकों के लुटाए स्टारों पर न जाइए, यह फिल्म आपको मिल्‍खा सिंह का सरकारी विज्ञापन भी लग सकती है

'भाग मिल्‍खा भाग' बहुत मेहनत और ईमानदारी से बनायी हुई फिल्म है। ईमानदारी के साथ एक समस्या होती है। वह खूब सारी अच्छाईयों के साथ कुछ कमियां भी जुटा लेती है। जैसे कि जब हम ईमानदार होते हैं तब हम यह परवाह करना बंद कर देते हैं कि सामने वाला ईमानदारी से किए हुए हमारे काम को सराहेगा या नहीं। कुछ-कुछ ऐसा ही 'भाग मिल्‍खा भाग' के साथ होता है।
'भाग मिल्‍खा भाग' मिल्‍खा सिंह को बताने में इतनी ईमानदार हो जाती है कि वह भूल जाती है कि आखिरकार वो है एक फिल्म। दर्शक जब टिकट खरीद रहा होता है तो उसके जेहन में एक फिल्‍म होती है। दर्शक टिकट मिल्‍खा सिंह की जिंदगी को देखने को देखने के लिए नहीं बल्कि उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म देखने के लिए टिकट खिड़की पर खड़ा होता है। फिल्म में एकमात्र खटकन इस फिल्म में फिल्म में 'फिल्म' का न होना है। 'भाग मिल्‍खा भाग' कई जगहों पर मिल्‍खा सिंह का सरकारी विज्ञापन नजर आती है। मिल्‍खा सिंह से जुड़े हुए छोटे-छोटे किस्सों को ‌इतना डिटेल कर दिया है कि कहीं-कहीं पर लगता है कि यह हीरो हम पर थोपा जा रहा है। कि साहब मिल्‍खा सिंह पर ताली बजाइए। वह एक रेस और जीत आया है। हीरो को हीरो न दिखाकर भी उसे हीरो बनाने की तीन फिल्मों का जिक्र करता हूं। एक फिल्म राकेश मेहरा की 'रंग दे बसंती' ही है। आमिर खान उस फिल्म के हीरो होते हैं। फिल्म का मीटर आमिर ही तय कर रहे होते हैं लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि आमिर हम पर थोपे जा रहे हैं। दूसरी फिल्म राजकुमार हिरानी की है। आमिर यहां भी हैं। 'थ्री इडिट्स' का हीरो तमाम सारी खूबियां रखता है लेकिन फिल्म उसे हीरो के रूप में महिमामंडित नहीं करती। हीरो प्रतिभाशाली है लेकिन उसमें एक इंसान के रूप कई सारी कमियां हैं। 'पान सिंह तोमर' का हीरो भी हम पर थोपा नहीं गया। हम सहज की उसकी विवशताओं के संग हो लेते हैं और उसे हीरो बना देते हैं। 'भाग मिल्‍खा भाग' के कई सीन ऐसे हैं जहां हीरो को एक हीरो के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। कुछ किस्से हमें अच्छे लगते हैं, हम उनमें भावुक होते हैं और उस हीरो को नमन करते हैं, लेकिन हम हर बार उसे हीरो बनता नहीं देखना चाहते। तमाम अच्छाईयों के साथ 'भाग मिल्‍खा भाग' की एक कमी यह भी है कि यह फिल्म दर्शकों के रोमांच और जिज्ञासा के शिखर पर लाकर उन्हें स्‍खलित होने का सुख नहीं देती। यह फिल्म कभी रोमांच के पहाड़ को सतत न चढ़कर कहीं-कहीं बिल्कुल फ्लैट हो जाती है। चूंकि फिल्‍म का मुख्य विषय दौड़ ही है इसलिए कई जगह यह अपने को दोहराती भी है। 'मौसम' फिल्म की तरह इस फिल्म का संपादन करने वाले संपादक शायद राकेश ओमप्रकाश मेहरा के बौ‌द्घिक आतंक और आग्रह से घबराए रहे होंगे। यह फिल्म आसानी से 40 मिनट छोटी हो सकती थी। कुछ नयी उपकथाएं जोड़ी जा सकती थी। कुल मिलाकर भाग मिल्‍खा भाग एक अच्छी फिल्म है जो यदि ईमानदारी से संपादित की जाती तो मनोरंजक भी हो सकती थी। इस फिल्म को देखते वक्त आशुतोष गौरवीकर की 'खेलें हम जी जान से' याद आती है।

Saturday, February 16, 2013

'मर्डर 3' बताती है कि बेडसीन के बगैर भी एक सस्पेंस फिल्म बनायी जा सकती है।

भट्ट कैंप की फिल्मों में कहानी (ज्यादातर कॉपी की हुई) एक ऐसी खूंटी होती है जिस पर अच्छे गाने, हॉट सीन, विदेशी लोकशन से सजे कुछ भव्य दृश्य, लाउड रोमांस और थोड़े-बहुत रहस्य के ताने-बाने टांगे जाते हैं। 'मर्डर 3' इस लिहाज से थोड़ी बेहतर फिल्म है। फिल्‍म की कहानी खुद में इतनी सक्षम है कि उसे एक्सपोजर जैसे कास्मैटिक की जरूरत नहीं पड़ती। भले ही यह हॉलीवुड फिल्म 'हिडेन फेस' की कॉपी हो लेकिन इसका 'बॉलीवुडीकरण' ऐसा होता है कि वह दर्शकों का मनोरंजन करती हैं। भट्ट कैंप की दूसरी फिल्म की तरह इस फिल्म में न तो लंबे-लंबे जुनूनी स्मूच हैं और न ही अंतरंग दृश्य। फिल्म में उतना ही एक्सपोजर है जितना कि इन दिनों बन रही फिल्मों में रिवाज है। 'मर्डर 3' की कहानी का 'मर्डर' और 'मर्डर 2' से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक पूरी तरह से नयी फिल्म है। 'मर्डर 3' जिस जल्दबाजी में लगभग अधूरी छोड़कर खत्म की गयी है उससे यह संकेत जरूर मिलता है कि 'मर्डर 4' बनेगी और वह सही मायने में 'मर्डर 3' की सीक्वल फिल्म होगी। महेश, मुकेश और विक्रम भट्ट के बाद विशेष भट्ट, भट्ट कैंप के नए चेहरे हैं। अपने निर्देशन में बनी इस पहली फिल्म से उन्होंने साफ कर दिया है कि वह भी भट्ट कैंप की कॉपी-पेस्ट नीति पर चलते रहेंगे। जब फिल्म की लागत महज पांच करोड़ हो तो वह हिट के खांचे में आसानी से आ भी जाएगी। कहानी में बांध रखने का हुनर था फिल्म तीन पात्रों विक्रम (रणदीप हुड्डा), रोशनी (अदिति राव) और निशा (सारा लोरेन) के इर्द-गिर्द घूमती है। अपनी गुम हो चुकी प्रेमिका की तलाश में शराब के नशे में डूब रहे विक्रम को निशा मिलती है। वह निशा के साथ नयी जिंदगी की शुरुआत करना चाहता है। विक्रम और निशा मुंबई से बाहर एक म्यूजियमनुमा घर में रहना शुरू कर देते हैं। निशा को उस म्यूजियम में अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती हैं। उस घर में रहते हुए निशा को एहसास होता है कि घर में कोई बंद है। वह अपनी कल्पना लगाकर उससे बात करना शुरू करती है। यहां एक बड़े रहस्य का खुलासा होता है। विक्रम की प्रेमिका रोशनी मरी नहीं होती है ‌बल्कि वह उसी घर में कैद होती है। वह कैद कैसे होती है और फिर उसे कैद से निकालता कौन है यही 'मर्डर 3' का सस्पेंस है। कहानी की एक कमजोर कड़ी यह है कि जब क्लाइमेक्स में दर्शक अच्छा ड्रामा देखने के लिए खुद को तैयार कर चुके होते हैं तभी अचानक फिल्म खत्म हो जाती है। शायद मर्डर 4 की गुजांइश बनाने के लिए फिल्म बहुत सी बातों को दर्शकों के साथ साझा नहीं करना चाहती। अभिनय सब थोड़ा बहुत कर ही लेते हैं भट्ट कैंप की फिल्मों के पुरुष पात्रों की खासियत यह होती है कि एक नहीं कई लड़कियां उन पर बारी-बारी से फिदा होती हैं। नायक खूससूरती के साथ अपने इस मल्टीअफेयर को मैनेज करता है। इसी के चलते कुछ गुनाह भी होते हैं। 'मर्डर 3' में यह काम रणदीप हुड्डा करते हैं। चूंकि इमरान हाशमी लंबे समय से ऐसी भूमिकाएं करते आ रहे हैं इसलिए रणदीप की बड़ी चुनौती उन्हें हाशमी जैसा दिखना था। हाव-भाव से नहीं बल्कि अच्छी डायलॉग डिलवरी से रणदीप ने उनकी जगह ले तो ली पर वह वैसे रोमांटिक लवर नहीं लगे जैसे कि भट्ट कैंप की फिल्मों को जरूरत होती है। रणदीप वैसे ही लगे जैसे वह दूसरी फिल्मों में लगते हैं। इंटरवल के पहले पर्दे से नदारद रहीं अदिति राव इंटरवल के बाद पूरी तरह से छायी रहती हैं। प्रेमी छिन जाने के डर से जी रही प्रेमिका का किरदार तो उन्होंने बड़े औसत तरीके से निभाया है पर रहस्यमयी कोठरी में बंद हो जाने के बाद तड़पते हुए जिंदगी जीने के किरदार में वह बेहतर लगी हैं। सारा लोरेन को एक सजावटी प्रेमिका की भूमिका करनी थी वह उन्होंने ठीक-ठाक ही निभा दिया है। विशेष की पहली फिल्म, गंदगी कम करने की कोशिश भट्ट कैंप की अगली पीढ़ी निर्देशन में आ गयी है। मुकेश भट्ट के बेटे विशेष भट्ट, इस फिल्म को निर्देशित कर रहे हैं। एक इंटरव्यू में विशेष भट्ट ने भट्ट कैंप की फिल्मों की क्वालिटी पर प्रश्‍न खड़ा करते हुए कहा था कि हमारी फिल्में पैसे तो जरूर कमा रही हैं पर उनकी गुणवत्ता गिरी है। इस लिहाज से देखें तो 'मर्डर 3' में बेडरूम और किसिंग सीन का उस तरह सहारा नहीं लिया गया है जैसे कि भट्ट कैंप की आदत और पहचान रही है। क्वॉलिटी बेहतर करने के‌ लिए किया गया यह काम हो सकता है कि कई दर्शकों को रास न आए। कुछ अच्छी बाते भी हैं। 'मर्डर 3' के पास एक अदद कहानी, एक जिज्ञासा और एक रहस्य है जिसकी वजह से दर्शक फिल्म से चिपके रहते हैं।फिल्म के संवाद भी अच्छे हैं। फ्लैशबैक और वर्तमान जिंदगी को दिखाने का क्रम भी बेहतर है। फिल्म के किरदार भले ही ग्लैमरस वर्ल्ड में रह रहे होते हैं पर वह बोलते उर्दू मिश्रित हिंदी हैं। यह कई बार फिल्म को अच्छा बनाता है। इस बारे गानों में वह मजा नहीं संगीत भट्ट कैंप की फिल्मों का मजबूत पक्ष माना जाता है। उनकी फ्लाप फिल्मों के गाने भी हिट रहते हैं। इस लिहाज से 'मर्डर 3' थोड़ा निराश करती है। प्रीतम के संगीत में विविधता तो है पर गाने ऐसे नहीं हैं जिन्हें याद रखा जाए या फिल्म के साथ भी गुनगुनाया जाए। फिल्म के सभी गानों में "तेरी झुकी नजर" और "मत आजमा रे" सुनने में बेहतर लगते हैं। क्यों देखें एक अच्छी सस्पेंस फिल्म के लिए। थोड़े-बहुत रहस्य के लिए और थोड़ा एक्सपोजर देखने के लिए। क्यों न देखें यदि आप भट्ट कैंप के फिल्में बनाने के तरीके से ही नाराज चल रहे हों।

Saturday, December 22, 2012

दर्शक कब तक अपने आईक्यू का मजाक दबंग जैसी फिल्मों से उड़वाते रहेंगे

पिछले पखवाड़े कानपुर से दिल्ली की यात्रा में साहित्यकार सेरा यात्री मिल गए। होते-होते बातें फिल्मों तक पहुंच गईं। यात्री साहब ने पिछले कई सालों से हिंदी फिल्मों तो नहीं देखी थीं लेकिन उनकी एक बात रह-रह कर दबंग 2 देखते समय लगातार मेरे जेहन में घूमती रही। सेरा यात्री साहब का कहना था कि भारत के जो भी इंजीनियर, मैजनमेंट, मेडिकल, सीए या दूसरे जो भी लुभावने क्षेत्र हैं यह युवाओं की कार्य करने की क्षमता तो बढ़ा रहे हैं पर उसके अलावा उनकी सोचने और समझने की शक्ति को खत्म कर रहे हैं। खासकर सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर। जब वह वीकेंड में फिल्म देखने जाते हैं तो फिल्म की बुनावट या उसके स्तर पर कोई दिमाग नहीं लगाना चाहते। उन्हें बस ऐसी चीज दिख जाए जिसे वह स्वयं नहीं भोगते तो वह उन्हें बेहतर और मनोरंजक लगती है। भले ही चाहे वह कितनी हल्की क्यों न हो। दबंग 2 के एक सीन में सलमान खान, अपने भाई अरबाज से एक पहेली पूछते हैं। अरबाज उसका जवाब नहीं दे पाते। यह सीन लगभग एक मिनट का है। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दो सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने जा रही और 2012 में बनी इस फिल्म में इतने घटिया स्तर के सीन हो सकते हैं। इससे ज्यादा आश्चर्य इस बात का हुआ कि इस सीन पर तमाम लोग हंस-हंसकर कर सीट में दोहरे हुए जा रहे थे। उन्हें यह सीन बड़ा दिलचस्प, मौलिक और हंसाने वाला लगा था। यह 2012 का सिनेमा है और यह 2012 के दर्शक हैं। मल्टीप्लेक्स का यह सीन किसी कस्बे का नहीं बल्कि भारत की राजधानी दिल्ली का है। सलमान खान अपनी पिछली कई फिल्मों से इस बात का एहसास करा रहे हैं कि भारत के दर्शक का आईक्यू स्तर बहुत ही कम है। उनके पास इस बात के सुबूत भी हैं। बॉडीगार्ड फिल्म का नायक लवली सिंह यह भी अंदाज नहीं लगा पाता कि उसको उसी घर से फोन किया जा रहा है जहां वह रह रहा है। एक लड़की कहती है कि वह उससे प्यार करती है और लवली सिंह मान जाता है। मजे की बात यह है कि दर्शक उस चरित्र के साथ जुड़ते हैं। बार-बार हर फिल्म में। इस बात की गवाही देने के लिए यह आंकड़े काफी हैं कि यह फिल्में 100 करोड़ से ऊपर का कारोबार कर रही है। अभिनेता इरफान खान कहते हैं कि फिल्म कैसी बनेगी यह दर्शक तय करते हैं। स्वाभाविक कि दर्शकों का शिष्टमंडल ‌फिल्मकारों से शिष्टाचार भेंट करके इस बात का ज्ञापन तो देगा नहीं कि कैसी फिल्में बनाई जाएं। फिल्मों यह देखकर बनेंगी कि कैसी फिल्में दर्शक पसंद कर रहे हैं। और दर्शक दबंग 2 के जोक और उसके कम कॉमन सेंस वाले नायकों को नायक मान रहे हैं। मल्टीप्लेक्स में एक ही समय दो फिल्में चल रही हैं। तलाश और दबंग 2। इन दोनों फिल्मों में कॉमन बात यह है कि इन दोनों के ही नायक पुलिस वाले हैं। अब दोनों फिल्मों के ट्रीटमेंट के अंतर को देख लीजिए। आमिर खान ने यह इस फिल्म के लिए दो साल का समय लिया। जहां-तहां से ट्रेनिंग ली। रोल के मुताबिक घनी मूंछे रखी। पुलिस अधिकारियों का उठना बैठना, बात करना और कमजोरियां सीखी। उसी की बगल की ऑडी में चल रही दबंग 2 का पुलिसवाला नकली मूंछे लगाता है। फिल्म में एसपी का किरदार निभाने वाले शख्स की ऊंचाई पांच फिट से भी कम है। थाने में चुटकुले चला करते हैं। थाना दिवस पर कहा जाता है कि पांडेय जी अब हम सब का मनोरंजन करेंगे। दोनों के परिणाम देखिए। दबंग 2, तलाश से बड़ी फिल्म साबित होगी। समझ मे नहीं आता कि दोष फिल्मकारों का है कि दर्शकों का। पहली नजर में तो दर्शकों का ही लगता है। जब तक दर्शक चाहेंगे सलमान खान और दबंग जैसी फिल्में दर्शकों के आईक्यू लेवल का मजाक बनाती रहेंगी।

Tuesday, November 27, 2012

खामोश! यश चोपड़ा हमें प्यार करना सिखा रहे हैं, चुपचाप सी‌खिए, तभी फिल्म 100 करोड़ क्लब में शामिल होगी

यश चोपड़ा की यह महान फिल्म उन दर्शकों के लिए है जिन्होंने यह फिल्म देखने के पहले सिर्फ फिल्मों के बारे में सुन रखा था उन्हें देखा नहीं था। उन्हें यह फिल्म बहुत ही खूबसूरत लगेगी। और जैसा कि बताया जाता है कि इस मुल्क को मोहब्बत करना यश चोपड़ा ने ही सिखाया है दर्शक इस फिल्म से मोहब्बत करने के कुछ ट्रिक सीख भी सकते हैं। पर फिर से यह प्रतिबंध लगाया जाता है कि दर्शक की यह पहली हिंदी फिल्म ही हो। यदि इसके पहले उसने कोई भी हिंदी फिल्म देख रखी है तो उसे यह फिल्म अपने जमाने से 20 से 50 साल पुरानी लग सकती है। उसे फिल्म के हर कलाकार का सामान्य ज्ञान कम लग सकता है। नायिका एक मोटी बुद्घि की लड़की लग सकती है और फिल्म के नाटकीय मोड़ जिसे लोग यशराज सिनेमा ट्वीस्ट कहते हैं बहुत ही भद्दे और बचकाने लग सकते हैँ। फिल्म के नायक शाहरुख को जब-जब प्यार होता है उन्हें एक गाड़ी टक्‍कर मार देती है जबकि वह बहुत सावधानी से रुल ऑफ द रोड को फालो करते हुए सड़क पार कर रहे होते हैं। टक्कर के पहले प्यार बरसाने वाली नायिका इस‌लिए शाहरुख से नहीं मिलती है क्योंकि कि उसने क्राइस्ट से शाहरुख का जीवन बचाने के बदले उससे कभी न मिलने की कसमें खाई होती हैं। आगे फिल्म और भी दिलचस्प है। शाहरुख खान नफरत करने की मौन कसमें खाते हुए भारतीय सेना में शामिल हो जाते हैं। उन्होंने दाढ़ी रख ली होती है और वह साथियों से बहुत काम बात करते हैं। इन सबके बीच वह बस डिफ्यूज करने का काम करते रहते हैं। शाहरुख यहां दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तर्ज पर भगवान से मोर्चा भी खोले हुए होते हैं। कि वह उन्हें मारकर दिखाए। इस बीच एक जर्नलिस्ट शाहरुख को कवर करने के लिए आती है। शाहरुख उससे दिन में रुखा व्यवहार करते हैं और रात में अकेले बैठकर फिल्मी गाने गाते हैं। ऐसी हालत में लड़की बिना प्यार किए रह नहीं पाती है। देश को प्रेम करना सिखाने वाला यश चोपड़ा ऐसा होने देते हैं। इसे उनका मास्टर स्ट्रोक कह सकते हैं। इस दूसरी लड़की (जिसे अभी अभी उन्हें प्यार हुआ होता है) के बुलाने पर वह लंदन जाते हैं। कुछ होने वाला होता ही है कि दुनिया को प्रेम करने के तरीके सिखाने वाले यश चोपड़ा शाहरुख को फिर से एक दुर्घटना का शिकार बनवा देते हैं। यानी पिछली दुर्घटना से शाहरुख ने कुछ नहीं सीखा होता है।
अब मजा देखिए। शाहरुख की याददास्त उस समय के दौर में चली जाती है जब वह पहली वाली लड़की से प्रेम फरमाने के समय चोट खा गए थे। देखिए कितना भयंकर किस्म का ट्वीस्ट। दर्शक तो बिल्कुल दांतों तले उँगलियां दबा लेगा। अब फिल्म की दोनों नायिकाएं एक चुलबुली और दूसरी ऐसी जैसे किसी की मयंत में आई हो मिलकर शाहरुख का जीवन सफल कर रही होती हैं। एक और महान घटना के साथ शाहरुख की याददाश्त वापस आ जाती है। वह दोनों लड़कियों को छोड़कर फिर से अपने फुल टाइम जॉब (बस डिफ़यूज करने वाला) में लग जाते हैं।अब फिल्म का क्लाइमेक्स आता है। जब वह बहुत महत्वपूर्ण बम डिफ्यूज कर रहे होते हैं उसी समय पहली वाली नायिका(वही जिसने क्राइस्ट को कुछ वजन दिया था) अपना वचन तोड़कर शाहरुख के साथ रहने आ जाती है। फिल्म की हैपी इंडिंग हो जाती है। कसम खाने वाली नायिका कैटरीना कैफ हैं और शाहरुख पर डाक्यूमेंट्री बनाने वाली अनुष्का शर्मा। इस फिल्म को देखने के बाद सबकुछ समझ में आता है पर यह समझ में नहीं आता कि 20 साल से अधिक फिल्मी दुनिया में रहने वाले शाहरुख खान की हिम्मत यश चोपड़ा से यह पूछने की नहीं हुई कि हम कर क्या रहे हैं। फिल्म का हर पात्र इतना बचकाना, उसके संवाद इतने हल्के और कहानी के ट्वीस्ट इतने जाने पहचाने कि लगता है कि यशराज कि किसी पुरानी फिल्म की फोटोकॉपी देख रहे हों। याददाश्त खो जाने का प्लाट इतना बचकाना और हल्का है कि हमें यश की कल्पना शक्ति पर संशय प्रकट करने का मन होता है। फिल्म में कैटरीना कैफ की भूमिका निहायत बचकानी है। वह जब-जब फिल्म में आती हैं फिल्म बैठती से लगी है। इस दम तोड़ती फिल्म की एकमात्र उम्मीद है अनुष्का शर्मा हैं। फिल्‍म में गुलजार और रहमान जैसे हस्तियां होने के बाद भी फिल्‍म का संगीत औसत है। यदि 2012 में दर्शकों को ऐसी ही कम बुद्घि वाली फिल्में दिखानी हैँ तो बेहतर है कि नई फिल्म बनाने के बजाय पुरानी फिल्मों को ही रीशूट करके रिलीज कर दें।

Friday, October 26, 2012

प्रकाश झा कहते हैं कि नक्सली जो कर रहे हैं वह दरअसल उनकी मजबूरी है

यदि हम नक्‍सल आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं तो फिर उसके साथ हैं। इस विचारधारा से देखने पर प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह नक्सलियों की हर उस सोच या वारदात को जायज और जरूरत बताने का प्रयास करती है जिसे समाज बुरा मानता है। पूरी फिल्म में नक्‍सलियों के तौर-तरीकों को बुरा मानकर उसके खिलाफ लड़ने वाला फिल्म का नायक फिल्म के अंतिम सीन में नक्सलियों की सोच के साथ खड़ा दिखता है। फिल्म किसी अंजाम या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती है। ऐसा जानबूझ कर ‌किया जाता है। फिल्मकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं कि वह किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े न दिखें। फिल्‍म के अंत में आया एक वाइसओवर बताता है कि नक्‍सल समस्या कैसे अपना आकार बड़ा कर रही है। समस्या हल होने के बजाय उसका चक्रव्यूह गहरा होता जा रहा है। फिल्म चक्रव्यूह नक्‍सल समस्‍या और सरकार के साथ उसके ट्रीटमेंट को भले ही बहुत बेहतर तरीके से न दिखा पाई हो लेकिन यह दो दोस्तों की मानसिक उलझन को बेहतर तरीके से दर्शाती है। यह प्रकाश झा की सफलता है उन्होंने नक्‍सल आंदोलन जैसे जटिल विषय को मनोरंजक और रोचक बनाकर पेश किया। इस विषय को फिल्मी बनाने की कोशिश कहीं-कहीं बचकानी भी लगती है। कभी-कभार फिल्‍म के नक्‍सली वैसे ही बनावटी दिखते हैं जैसे करण जौहर की फिल्मों के स्कूल गोइंग स्टूडेंट। कहानीः चूंकि फिल्म का विषय बड़ा और जटिल था इसलिए इसे दो दोस्तों की कहानी बताकर दिखाने का प्रयास किया गया। इन दो दोस्तों के माध्यम से सरकार और नक्‍सलियों का पक्ष रखने की कोशिश की गई है। आईपीएस पुलिस अधिकारी आदिल(अर्जुन रामपाल) की पोस्टिंग नक्सल समस्या से पीड़ित क्षेत्र नंदीगांव में होती है। यहां पुलिस का नेटवर्क पूरी तरह से तबाह हो चुका है। एक उद्योगपति उस क्षेत्र में अपना उद्योग लगाना चाहते हैं। सरकार की कोशिश के बाद नक्सलियों की वजह से उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। आदिल को इस काम का जिम्‍मा सौंपा जाता है। आदिल का दोस्त कबीर(अभय देओल) जिसने कभी आदिल के साथ पुलिस की ट्रेनिंग भी की थी नक्‍सलियों के बीच आदिल का मुखबिर बनकर शामिल हो जाता है। वह मुखबिर इसलिए बनता है ताकि वह नक्सलियों की मूवमेंट की हर खबर आदिल को दे सके। फिल्म वहां से रोचक होनी शुरू होती है जब कबीर का मन नक्सलियों के पक्ष में बनना शुरू हो जाता है। एक साथी महिला नक्सली जूही(अंजलि पाटिल) के प्रति उसके मन में एक प्रेम भी पैदा होता है। नक्‍सल के पक्ष या विपक्ष की यह वैचारिक लड़ाई इंटरवल के बाद दो दोस्तों की लड़ाई में तब्दील हो जाती है। स्थितियां बदलती जाती हैं। नक्सलियों के बड़े नेता रहे राजन(मनोज बाजपेई) के गिरफ्तार होने के बाद कबीर नक्सलियों का एक बड़ा नेता बनकर उभरता है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि यह दोनों दोस्त अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाते हैं या अपनी वैचारिक सोच को। अभिनयः अभिनय के लिहाज से अर्जुन रामपाल और अभय देओल दोनों ने ही बेहतरीन काम किया है। राजनीति फिल्म में नाना पाटेकर की भूमिका जिस तरह से अंडरप्ले हो गई थी कुछ वैसा ही हाल मनोज बाजपेई का इस फिल्म में रहा है। उनके हिस्से न तो ज्यादा फुटेज आए हैं और न ही संवाद। अपनी संक्षिप्त भूमिका में ही सही वह रोल के खांचे में फिट बैठते हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की गोल्ड मेडलिस्ट रहीं अं‌जलि पाटिल ने इस फिल्म से अपना डेब्यू किया है। उनके पास फिल्म की नायिका ईशा गुप्ता से ज्यादा मौके रहे हैं। वह प्रभावित भी करती हैं। ईशा गुप्ता औसत रहीं हैं। मधुर भंडारकर और प्रियदर्शन की तरह प्रकाश झा के पास जूनियर कलाकारों की अपनी टीम है। गंगाजल से लेकर चक्रव्यूह तक वही सारे किरदार अलग-अलग रूप में दिखते हैं। कोई किसी फिल्‍म में पुलिसवाला बन जाता है तो कोई नेता। इन कलाकारों ने अभिनय तो अच्छा किया है पर एक बासीपन इनके साथ जुड़ता जा रहा है। छोटी सी भू‌मिका में ओमपुरी भी अपनी इमेज के अनुरूप ही रहे हैं। निर्देशनः एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने का मतलब वहां पर तंबू लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। उस चोटी से उतरना ही होता है। मृत्युदंड, अपरहण और राजनीति जैसी फिल्में प्रकाश झा का शिखर रही हैं। यह फिल्म उस शिखर पर उन्हें दोबारा नहीं लौटा पाती। पर हां दर्शकों को निराश भी नहीं करती। पूरी फिल्म खामोशी से नक्‍सल समस्या के लिए सरकार को दोषी और नक्सलियों को जायज ठहराने का प्रयास करती है। यह प्रकाश की खूबी है ‌कि वह संवाद और घटनाओं से चुपचाप दर्शकों को अपनी इस सोच के साथ कर लेते हैं। नक्सल समस्या को बहुत कम या न जानने वाले दर्शक जब फिल्म देखकर निकलते हैं तो वह नक्सलियों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके जैसा सोच रहे होते हैं। फिल्म के अच्छे संवादों के लिए अंजुम राजाबली और सागर पांड्या को भी बधाई मिलनी चाहिए। संगीतः यह प्रकाश झा की पहचान बनती जा रही है कि इंटरवल के बाद जब फिल्म थोड़ी गंभीर होती है तो वह उसे एक आइटम नंबर डालकर थोड़ा फिल्‍मी करते हैं। यह फिल्मी कोशिश चक्रव्यूह में निराश करती है। समीरा रेड्डी पर फिल्माया गाना पूरी तरह से बेझिल है। टाटा, बिरला, अंबानी और बाटा बोल वाला चर्चित गीत प्रभावित तो जरूर करता है पर गीत में वैसी कशिश और विट देखने को नहीं मिली जैसी गुलाल में ‌पीयूष मिश्रा ने अपने लिखने और गाने में पैदा की थी। क्यों देखे फिल्म चर्चित और गंभीर विषय पर बनी है इसके लिए इसे देखा जाना चाहिए। इसके अलावा य‌दि आपकी दिलचस्पी नक्सल की समस्या या उसके समाधानों पर जाने की नहीं है तो भी इसे दो दोस्तों की बनती-बिगड़ती कहानी के लिए देख सकते हैं। क्यों न देखें यह एक सार्थक सिनेमा है। कई जगह फिल्मी होने के बाद भी संभव है कि इसका विषय आपको अपने साथ कनेक्‍ट न करे। हल्के विषयों पर कुछ दूसरी फिल्में भी आपके लिए ही हैं।