Friday, October 26, 2012

प्रकाश झा कहते हैं कि नक्सली जो कर रहे हैं वह दरअसल उनकी मजबूरी है

यदि हम नक्‍सल आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं तो फिर उसके साथ हैं। इस विचारधारा से देखने पर प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह नक्सलियों की हर उस सोच या वारदात को जायज और जरूरत बताने का प्रयास करती है जिसे समाज बुरा मानता है। पूरी फिल्म में नक्‍सलियों के तौर-तरीकों को बुरा मानकर उसके खिलाफ लड़ने वाला फिल्म का नायक फिल्म के अंतिम सीन में नक्सलियों की सोच के साथ खड़ा दिखता है। फिल्म किसी अंजाम या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती है। ऐसा जानबूझ कर ‌किया जाता है। फिल्मकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं कि वह किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े न दिखें। फिल्‍म के अंत में आया एक वाइसओवर बताता है कि नक्‍सल समस्या कैसे अपना आकार बड़ा कर रही है। समस्या हल होने के बजाय उसका चक्रव्यूह गहरा होता जा रहा है। फिल्म चक्रव्यूह नक्‍सल समस्‍या और सरकार के साथ उसके ट्रीटमेंट को भले ही बहुत बेहतर तरीके से न दिखा पाई हो लेकिन यह दो दोस्तों की मानसिक उलझन को बेहतर तरीके से दर्शाती है। यह प्रकाश झा की सफलता है उन्होंने नक्‍सल आंदोलन जैसे जटिल विषय को मनोरंजक और रोचक बनाकर पेश किया। इस विषय को फिल्मी बनाने की कोशिश कहीं-कहीं बचकानी भी लगती है। कभी-कभार फिल्‍म के नक्‍सली वैसे ही बनावटी दिखते हैं जैसे करण जौहर की फिल्मों के स्कूल गोइंग स्टूडेंट। कहानीः चूंकि फिल्म का विषय बड़ा और जटिल था इसलिए इसे दो दोस्तों की कहानी बताकर दिखाने का प्रयास किया गया। इन दो दोस्तों के माध्यम से सरकार और नक्‍सलियों का पक्ष रखने की कोशिश की गई है। आईपीएस पुलिस अधिकारी आदिल(अर्जुन रामपाल) की पोस्टिंग नक्सल समस्या से पीड़ित क्षेत्र नंदीगांव में होती है। यहां पुलिस का नेटवर्क पूरी तरह से तबाह हो चुका है। एक उद्योगपति उस क्षेत्र में अपना उद्योग लगाना चाहते हैं। सरकार की कोशिश के बाद नक्सलियों की वजह से उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। आदिल को इस काम का जिम्‍मा सौंपा जाता है। आदिल का दोस्त कबीर(अभय देओल) जिसने कभी आदिल के साथ पुलिस की ट्रेनिंग भी की थी नक्‍सलियों के बीच आदिल का मुखबिर बनकर शामिल हो जाता है। वह मुखबिर इसलिए बनता है ताकि वह नक्सलियों की मूवमेंट की हर खबर आदिल को दे सके। फिल्म वहां से रोचक होनी शुरू होती है जब कबीर का मन नक्सलियों के पक्ष में बनना शुरू हो जाता है। एक साथी महिला नक्सली जूही(अंजलि पाटिल) के प्रति उसके मन में एक प्रेम भी पैदा होता है। नक्‍सल के पक्ष या विपक्ष की यह वैचारिक लड़ाई इंटरवल के बाद दो दोस्तों की लड़ाई में तब्दील हो जाती है। स्थितियां बदलती जाती हैं। नक्सलियों के बड़े नेता रहे राजन(मनोज बाजपेई) के गिरफ्तार होने के बाद कबीर नक्सलियों का एक बड़ा नेता बनकर उभरता है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि यह दोनों दोस्त अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाते हैं या अपनी वैचारिक सोच को। अभिनयः अभिनय के लिहाज से अर्जुन रामपाल और अभय देओल दोनों ने ही बेहतरीन काम किया है। राजनीति फिल्म में नाना पाटेकर की भूमिका जिस तरह से अंडरप्ले हो गई थी कुछ वैसा ही हाल मनोज बाजपेई का इस फिल्म में रहा है। उनके हिस्से न तो ज्यादा फुटेज आए हैं और न ही संवाद। अपनी संक्षिप्त भूमिका में ही सही वह रोल के खांचे में फिट बैठते हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की गोल्ड मेडलिस्ट रहीं अं‌जलि पाटिल ने इस फिल्म से अपना डेब्यू किया है। उनके पास फिल्म की नायिका ईशा गुप्ता से ज्यादा मौके रहे हैं। वह प्रभावित भी करती हैं। ईशा गुप्ता औसत रहीं हैं। मधुर भंडारकर और प्रियदर्शन की तरह प्रकाश झा के पास जूनियर कलाकारों की अपनी टीम है। गंगाजल से लेकर चक्रव्यूह तक वही सारे किरदार अलग-अलग रूप में दिखते हैं। कोई किसी फिल्‍म में पुलिसवाला बन जाता है तो कोई नेता। इन कलाकारों ने अभिनय तो अच्छा किया है पर एक बासीपन इनके साथ जुड़ता जा रहा है। छोटी सी भू‌मिका में ओमपुरी भी अपनी इमेज के अनुरूप ही रहे हैं। निर्देशनः एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने का मतलब वहां पर तंबू लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। उस चोटी से उतरना ही होता है। मृत्युदंड, अपरहण और राजनीति जैसी फिल्में प्रकाश झा का शिखर रही हैं। यह फिल्म उस शिखर पर उन्हें दोबारा नहीं लौटा पाती। पर हां दर्शकों को निराश भी नहीं करती। पूरी फिल्म खामोशी से नक्‍सल समस्या के लिए सरकार को दोषी और नक्सलियों को जायज ठहराने का प्रयास करती है। यह प्रकाश की खूबी है ‌कि वह संवाद और घटनाओं से चुपचाप दर्शकों को अपनी इस सोच के साथ कर लेते हैं। नक्सल समस्या को बहुत कम या न जानने वाले दर्शक जब फिल्म देखकर निकलते हैं तो वह नक्सलियों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके जैसा सोच रहे होते हैं। फिल्म के अच्छे संवादों के लिए अंजुम राजाबली और सागर पांड्या को भी बधाई मिलनी चाहिए। संगीतः यह प्रकाश झा की पहचान बनती जा रही है कि इंटरवल के बाद जब फिल्म थोड़ी गंभीर होती है तो वह उसे एक आइटम नंबर डालकर थोड़ा फिल्‍मी करते हैं। यह फिल्मी कोशिश चक्रव्यूह में निराश करती है। समीरा रेड्डी पर फिल्माया गाना पूरी तरह से बेझिल है। टाटा, बिरला, अंबानी और बाटा बोल वाला चर्चित गीत प्रभावित तो जरूर करता है पर गीत में वैसी कशिश और विट देखने को नहीं मिली जैसी गुलाल में ‌पीयूष मिश्रा ने अपने लिखने और गाने में पैदा की थी। क्यों देखे फिल्म चर्चित और गंभीर विषय पर बनी है इसके लिए इसे देखा जाना चाहिए। इसके अलावा य‌दि आपकी दिलचस्पी नक्सल की समस्या या उसके समाधानों पर जाने की नहीं है तो भी इसे दो दोस्तों की बनती-बिगड़ती कहानी के लिए देख सकते हैं। क्यों न देखें यह एक सार्थक सिनेमा है। कई जगह फिल्मी होने के बाद भी संभव है कि इसका विषय आपको अपने साथ कनेक्‍ट न करे। हल्के विषयों पर कुछ दूसरी फिल्में भी आपके लिए ही हैं।

Saturday, October 6, 2012

इंगलिश स्पोकन कक्षाओं से भारत में बनता रहेगा आत्मविश्वास, फिल्म भी प्रमाणित करती है

कस्बों और गांवों के लडक़े जब लल्लू लाल, करमा देवी, अहिल्या देवी या रघुराज प्रताप सिंह जैसे नामों वाले महाविद्यालयों से पढ़ाई करके निकलते हैं तो उनकी प्राथमिकता सबसे पहले आत्मविश्वास प्राप्त करने की होती है। जो कि वह मानकर चल रहे होते हैं कि वह उनके पास नहीं है। उनका अनकॉसेस माइंड मानता है कि आत्मविश्वास नाम की चीज शहर के लोगों में पाई जाती है। उनकी निगाह में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो आत्मविश्वासी होते हैं। यह सभी आत्मविश्वासी लोग अंग्रेजी में बात करते हैं। आत्मविश्वास पाने की यह फैक्ट्रियां इंगलिश स्पोकन क्लास के नाम से जानी जाती हैं। हर साल इन फैक्ट्रियां से फुटकर और थोक में आत्मविश्वास निकल कर यहां वहां पहुंचता है। यह कहां पहुंचता है इससे हमारा कोई लेना देना नहीं है। हमारी मान्यताओं में अंग्रेजी को कभी भी सिर्फ भाषा के रूप में नहीं देखा गया है। इसे ज्ञान के रूप में माना जाता है। यह माना जाता है कि यदि आप अंग्रेजी में बोल रहे तो यह संभव ही नहीं कि आप गलत बोल रहे हो। अंग्रेजी के प्रति हमारे अतिरिक्त सम्मान की धारणा को फिल्म अंत में जाकर तोड़ती है। इसके पहले फिल्म की नायिका तब-तब खुश होती है जब वह अपनी अंग्रेजी से बात कहने में सफल हो जाती है। यह फिल्म की फिलॉसफिकल असफलता है। एक फिल्म के रूप में इंगलिश-विंगलिश एक प्रभावी फिल्म है। फिल्म सिर्फ अंग्रेजी के ज्ञान की नहीं हमारी मनोविज्ञान की भी परीक्षा लेती चलती है। हमारी एक मनोवृति होती है कि अपने करीबी की जो जिस कमी की वजह से उस पर दया करते हैं जब वह व्यक्ति उस कमी को ठीक करने के लिए गंभीर होता है तो हम उसके प्रति ईष्या का भाव रखना शुरू कर देते हैं। फिल्म उन रिश्तों की भी समीक्षा करती चलती है कि जो एक समय के बाद सिर्फ प्रेम बरसाते हैं सम्मान नहीं। चीनी कम की तरह आर बल्कि कई फिलॉसिफी देने में सफल रहे हैं।

Friday, September 28, 2012

हम फिल्म का मुहूर्त पंडित से पूछकर तय करेंगे लेकिन दर्शकों तुम धर्म के आडम्बरों को न मानना

सब टीवी के हंसो-हंसो टाइप धारावाहिक जैसी शुरू हुई यह फिल्म अपने बीतने जाने के साथ एक हैरत भरी गंभीरता ओढ़ती जाती है। इस देश में जहां धर्म के नाम पर वाटर फिल्म की शूटिंग नहीं हो पाती, कुछ फिल्में बनने के बाद रिलीज नहीं हो पाती और जहां तेली जैसे सामान्य जातिसूचक शब्दों पर सेंसर बोर्ड वीप चस्पा करके रिलीज करता है वहां यह फिल्म धर्म के नाम पर इतनी खुली और तटस्थ होकर बहस कैसे कर लेती है इस बात का सुखद आश्चर्य होता है। हिंदू धर्म की मूर्ति पूजा पर पूरी तरह प्रश्न खड़ा करती और इस प्रक्रिया में खुद भगवान को शामिल करती हुई यह फिल्म दर्शकों को मनोरंजक लगने के साथ आंखे खोलने वाली भी लगती है। फिल्म देखकर दर्शक उन कुरुतियों पर हंसते हैं जिन्हें वह करते हैं और करते आए हैं। मेरे पास फिल्म देखकर कुछ दर्शक ऐसे थे जिन्होंने धार्मिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करने वाले संवादों पर ठहाके लगाए लेकिन तत्काल ही वह मल्टीप्लेक्स की छत को ताड़ते हुए एक अंनत: शक्ति को नमन करते दिखे। यह धर्म को लेकर दोहरापन है। हम धर्म की कुरुतियों को खारिज तो करना चाहते हैं पर भीड़ के साथ। जैसे भीड़ में कुछ भी कर दो भगवान को पता नहीं चलेगा। अकेले होते ही हम वैसे ही तेल का अर्पण करना चाहेंगे जैसे कि करते आए हैं। हरिशंकर परसाई कहते हैं कि जब यह कहा जाएं कि महिलाएं घरों से बाहर निकलें तो इसका मतलब होता है कि अपने घर की नहीं दूसरों के घरों की। यही इस फिल्म का भी एजेंडा है। इस फिल्म के मुहूर्त के समय भी भगवान की पूजा हुई होगी। प्रसाद में पेड़े और गरी के टुकड़े बांटे गए होंगे। पंडित से पूछकर ही मुहूर्त निकाला गया होगा और फिल्म पूरी होने के बाद फिल्म रोल पर स्वास्तिक का प्रतीक बनाया गया होगा। इतना ही नहीं गणेश पूजा से लोगों को कनेक्ट करने के लिए एक आइटम नंबर भी फिल्म में डाला गया। और यही फिल्म दर्शकों से आडम्बरों से बचने की बात करती है। जब मैं किशोर हो रहा था तो भारत के हर कस्बे में बुफे सिस्टम इंट्रोड्यूस हो रहा था। हर मोहत्ले के दुबे जी, शुक्ला जी, अग्रवाल जी और वर्मा जी बुफे सिस्टम को कुतों का भोज कहकर उसकी आलोचना करते लेकिन पोते के मुंडन में वही इस सिस्टम से दूसरों को खाना खिलाते दिखते। तर्क वही कि यह सिस्टम गलत है लेकिन बदलाव दूसरे से शुरू हो। अच्छी फिलासिफी है। फिल्म के संवाद और परेश रावल की अदाकारी उत्कृष्ट है। भगवान के हिस्से अच्छे संवाद नहीं आए हैं।

Saturday, September 15, 2012

लगता है कि सारे किरदार दार्जलिंग में ही रहे हैं, फिल्म से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है

बर्फी फिल्म एक नशे की तरह दिमाग में चढ़ती जाती है। यह धीमा नशा इतना तेज है कि फिल्म देखते वक्त यह हमारे उन तर्कों को खारिज करता चलता है जिनके सहारे हम किसी फिल्म के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करते हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि हम फॉर्मूला फिल्म देखने के आदी हो चुके हैं । यह इस फिल्म की खूबसूरती है कि जहां यह फिल्म गैर फिल्मी या गैर पारंपरिक होती है वह अपने भव्यतम रूप में पहुंच जाती है। फिल्म में कहीं कोई तरतीब या क्लाइमेक्स जैसा कुछ नहीं। जो घटनाएं फिल्मों में सबसे बाद के लिए बचाकर रखी जाती हैं वह इस फिल्म में कहीं भी प्रयोग कर दी गईं। गूंगे-बहरे का किरदार न तो उसके लिए आपसे दया मांगता है और न ही अतिरिक्त ध्यान देने की अपील करता है। इस फिल्म को देखते-देखते हमें अचानक ही लगता है कि हमको इस छल-कपट की दुनिया हो हमेशा के लिए बाय बोल देना चाहिए। आशीष विद्यार्थी जहां-जहां फिल्म में आते हैं उनसे दर्शकों को ढेर सारे कोफ्त होती है। फिल्म में वही एक ऐसा चेहरा हैं जो बर्फी को फिल्म होने का एहसास कराते हैं। बाकी के किरदार ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वह दार्जलिंग में अभी भी रह रहे होंगे। फिल्म का मुख्य किरदार आपको अपने साथ पहले मिनट से कर लेता है। उसकी शरारतें, उसकी खुशी और उसकी दुखों में हम उसके साथ रहते हैं। बर्फी मोहब्बत की दिलचस्प कथा है।
रणवीर इस फिल्म अपना नाम बोलने के अलावा कुछ भी न बोलते दिखते हैं और न ही बोलने का प्रयास करते हैं। फिर भी दर्शकों को एक बार भी उनका गूंगापन अखरता नहीं है। फिल्म की एक बहुत बड़ी खूबसूरती उसका संगीत है। हर गाने जितना अच्छे से लिखा गया है उससे बढक़र उसे फिल्माया गया है। कुछ फिल्में इंडस्ट्री को १०० करोड़ भले ही न दे पाएं पर कुछ ऐसी चीजें देती हैं जिन पर हम १०० साल तक गर्व करते रहें। बर्फी ऐसी ही फिल्मों में से एक है। अनुराग शायद अब काइट की असफलता को अच्छे से भुला सकेंगे।

Friday, August 31, 2012

६ साल बाद सिर्फ एक कदम बढ़ पाए हैं शिरीष

जोकर फिल्म इस बात का गहराई से एहसास कराती है कि कई अच्छी फिल्मों से जुड़े फिल्मकार मिलकर एक घटिया फिल्म भी बना सकते हैं। फिल्म के निर्देशक शिरीष कुंदर ने अपने अकेले के बूते सिर्फ एक ही फिल्म जानेमन बनाई है। उस उलझी हुई फिल्म के ६ साल बाद उन्होंने जोकर का निर्देशन किया है। शिरीष का निर्देशन इस फिल्म में एक पायदान ऊपर चढ़ता है पर फिल्म विषय के स्तर पर इतनी कमजोर है कि बेहतर निर्देशन, ठीक-ठाक ऐक्टिंग और आयटम सॉन्ग भी फिल्म को बचा नहीं पाते। कहीं यह फिल्म पीपली लाइव हो जाना चाहती है तो कहीं कोई मिल गया। अब कोई न कह पाए कि यह फिल्म पूरी तरह से किसी फिल्म की नकल है तो कुछ अपनी मौलिकता डालने की भी घटिया कोशिश की गई है। अक्षय कुमार एक जैसी ही ऐक्टिंग करते हैं। सोनाक्षी सिन्हां पूरी फिल्म में अक्षय कुमार की चापलूसी करती रही हैं। पिताबश त्रिपाठी जैसे कलाकार का घटिया उपयोग किया गया है।

Friday, August 24, 2012

लगा कि पारसी बचाओ एसोसिएशन की फिल्म चल रही है और सारे पारसी जमकर ओवरएक्टिंग कर रहे हैं।

इसे कुछ इस तरह से समझिए। टेलीफोन बनाने वाले ग्राहम बेल और बिजली बल्ब बनाने वाले थामस एडीसन कहें कि मैं एक प्रयोग करूंगा। बरसात की बूंदे जब धरती पर टकराएंगी तो उनके घर्षण से जो ऊर्जा निकलेगी उससे मैं बिजली बनाऊंगा। लोग उनकी बात माने या न माने पर हवा में उड़ाकर खारिज नहीं करेंगे। चूंकि यह दोनों वैज्ञानिक हैं और बिजली बनाने के इस प्रयोग के पहले वह दुनिया को कुछ दे चुके हैं। बिजली तो खैर नहीं बनेगी पर ऐसी प्रयोगों से एतबार उठेगा। बिजली बनाने की कुछ ऐसी ही कोशिश संजय लीला भंसाली, फराह खान और बोमेन ईरानी ने की है। शीरी फरहाद फिल्म न तो संजय के जीवन का माइल स्टोन थी, न फराह के और न ही बोमेने के। इस कोशिश का निष्कर्श कैसा भी होता उनके करियर पर इसका कोई फर्क नहीं पडऩे वाला था। फराह नियमित ऐक्टिंग नहीं करने लगतीं, उनकी जोड़ी बोमेन के साथ रिपीट नहीं होने लगती, मेच्योर कलाकरों को लेकर प्रेम कहानियां बननी नहीं शुरू हो जातीं, संजय के नाम की स्तुती नहीं गायी जाने लगती। जब इसके हिट होने से कुछ बदलने वाला नहीं था तो ऑफबीट के नाम पर किसी भी व्यक्ति ने फिल्म में अपना बहुत दिमाग नहीं लगाया। सबने उतना ही किया जितना की वह प्रोफेशनली अभ्यस्त हो गए हैं।
एक बहुत ही स्तरीय कहानी को घटिया पटकथा में तब्दील कर दिया गया। बोमेन जैसे दिग्गज कलाकार ने एक औसत से परफार्सेंस दे दी। सालों कैमरे के पीछे रहने वाली फराह के लिए ऐक्टिंग थोड़ा फन हो गया। बेला सहगल के नाम पर एक फिल्म का निर्देशन दर्ज हो गया और संजय लीला भंसाली भंसाली ने कुछ पैसे कमाने के साथ अपने निर्माण में बनने वाली फिल्मों की संख्य बढ़ा ली। नुकसान सिर्फ उन दर्शकों का हुआ जो इस ऑफबीट फिल्म देखने के लिए पूरी संजीदगी से आए थे। है। फिल्म बनाने की ऐसी घटिया कोशिशें समांतर सिनेमा के उस ढंाचे पर चोट पहुंचाती हैं जिस पर धीमे-धीमे आम दर्शकों का विश्वास जमने लगा है। संजय लीला भंसाली की फिल्मों में पारसी परिवेश के दृश्यों की झलक मिलती रहती है। इस बार उन्होंने हद की है। अन्य फिल्मों के सारे जाने-पहचाने पारसी चेहरे इस फिल्म में एक जगह आ गए हैं। पारसी शायद लाऊड तरीके से बोलते ही हैं या कोई और वजह, हर किरदार ने जमकर ओवरऐक्टिंग की है। एक्टिंग के साथ बोलने की टोन में भी, कपड़ों में, शौक और रहन सहन में भी कहीं-कहीं तो यह फिल्म अखिल भारतीय पारसी बचाओ एसोसिएशन की फिल्म लगने लगती है। उसको श्रृद्धांजलि देती हुई।

Friday, August 17, 2012

मेरे पापा की उम्र के सलमान खान फिल्म में लव इन फस्र्ट साइट वाला प्रेम कर रहे हैं और फिल्म को ३३ करोड़ की ऐतिहासिक ओपनिंग मिल रही है

हिंदी फिल्म उद्योग शादी को अभी कठिन ही बनाए रखना चाहता है। समय के साथ कठिनाई के तरीके बदलते रहे हैं। अमीर किंतु बेरोजगार लडक़े के सिगार पीते पिता, घर पर सिलाई करके बेटी को स्वाभिमानी बनाए रखने वाली मां, कभी जाति तो कभी एक छोटी सी घटना विवाह में अड़ंगा बनती रही है। एक था टाइगर शादी के इसी पारंपरिक अवरोध की कहानी है। चूंकि फिल्मों में मां-बाप तो अब रहे नहीं इसलिए इस फिल्म में नायक-नायिका की शादी में दो राष्ट्रों की गोपनियता और उनकी सामरिक नीतियां आड़े आ रही हैं। १५ अगस्त पर सुबह से बजते देशभक्ति के गीतों और टीवी पर आ रहीं देशभक्ति की फिल्मों की वजह से हम थोड़ा बहुत देशप्रेमी हो जाते हैं। एक था टाइगर अपने प्रोमो और डायलॉग से यही साबित करती थी कि यह एक खांटी देशभक्ति की फिल्म है जिसमें कैटरीना-सलमान की प्रेम कहानी बीच-बीच में दर्शकों के मनोरंजन के लिए आएगी। फिल्म में होता इसका उल्टा है। सलमान की पूरी जाबांजी नायिका से विवाह रचाने के अवरोधों को निपटाने में व्यर्थ होती है। इस फिल्म को रिलीज करने में मल्टीप्लेक्सों के साथ छोटे और मछोले शहरों के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों ने भरपूर उत्साह दिखाया है। इन सिनेमाघरों को बदले पर आधारित फिल्में हमेशा रास आई हैं। वह बदला मिथुन चक्रवर्ती का हो, सन्नी देओल का हो या फिर सलमान खान का। इस बदले को देखने आए दर्शकों को फिल्म से कुछ नहीं मिला। वह एक प्रेमी के रूप में ही नजर आए। चूंकि फिल्म ३३ करोड़ की ओपनिंग कर चुकी है तो यह फिल्म को खराब कहना वैसा ही होगा कि जैसे कहा जाए कि भारत की सडक़ों पर दाएं चलिए, केले के छिलके सडक़ पर छितराइए।
सलमान खान और मेरे पापा की उम्र में बस इतना अंतर है कि जब मेरे पापा दसवीं कर रहे होंगे तो सलमान दूसरी या तीसरी क्लस में रहे होंगे। सलमान की फिल्मों को जिस उम्र के युवा देखने आते हैं उनके पापाओं और डैडियों की उम्र सलमान खान के लगभग बराबर होगी। १६ साल की लड़कियों के पिता तो सलमान से छोटे भी हो सकते हैं। दो-तीन सालों में ५० की सरहद छूने वाले सलमान खान यदि ऐसी प्रेम भरी सफल फिल्में कर सकते हैं तो यह २५ से ३० साल के नए कलाकारों के लिए अफसोस और चिंतन का विषय होना चाहिए। एक फिल्म जो अपनी डायलॉग, स्क्रीनप्ले, अभिनय और कहानी से इतनी औसत है वह अब तक सबसे बड़ी फिल्म कैसे बन जाती है यह हम सबके सोचने का विषय है। दबंग और बॉडीगार्ड के विपरीत इस फिल्म की अच्छाई यह है कि यहां फूहड़ सहकलाकारों की जगह गिरीश कर्नाड और रणीवर शौरी जैसे कलाकार हैं। कर्नाड को तो और भी फिल्में लगातार करनी चाहिए।