Sunday, August 21, 2011

अच्छी नहीं पर एक अलग फिल्म



फिल्म समीक्षा: नाट ए लव स्टोरी

रामगोपाल वर्मा अपनी फिल्मों के बारे में यह सुनना ज्यादा पसंद करते हैं कि उन्होंने एक अलग फिल्म बनाई है बनस्पित इसके कि उन्होंने एक अच्छी फिल्म बनाई है। नाट एक लव स्टोरी उनकी अलग फिल्मों की श्रृंखलाओं में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गई है। फिल्म बहुत ही कम बजट और संसाधनों के बीच बनाई गई है। कलाकार भी दीपक डोबरियाल और माही गिल जैसे। इन आत्मविश्वासी और प्रतिभावान कलाकारों के लिए फिलहाल मेहनताना से अधिक इनके रोल की गंभीरता अधिक महत्वपूर्ण लगती है। २००८ में हुए नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर आधारित इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी वही है जो इसकी यूएसपी है। सत्य घटना से जुड़े होने की वजह से यदि इसका कथानक दर्शकों को बांधे रखता है तो इसे फिल्म के रूप में न पेश करना पाना सबसे बड़ी कमी के रूप में भी उभरता है। फिल्म थोड़ी फिल्मी होनी चाहिए थी। आमतौर पर जिस मोड़ पर फिल्मों में इंटरवल होता है यह फिल्म वहां आपको बाए-बाए बोल देती है। माही गिल अब तक के अपने सबसे लंबे रोल में दिखी है। रोल लंबा के बावजूद इस फिल्म में वह वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाती जैसा कि उन्होंने देव डी या गुलाल फिल्म के अपेक्षाकृत छोटे रोल में छोड़ा था। दीपक डोबरियाल के लिए अच्छे संवाद नहीं रखे गए। एक खीझे हुए आशक्त प्रेमी के रूप में वह उतना नहीं जमे जितनी की उनसे अपेक्षा की जाती है। पुलिस तहकीकात और न्यायालय में बहस के दृश्यों को बढ़ाए और प्रभावी बनाए जाने की जरूरत थी। अच्छी फिल्म के रूप में नहीं पर एक अलग फिल्म के रूप में नाट ए लव स्टोरी देखी जा सकती है।

Friday, August 12, 2011

फिल्म का नाम आरक्षण नहीं शिक्षा माफियाओं का गोरखधंधा होना चाहिए।




फिल्म समीक्षा: आरक्षण

आरक्षण देखकर समाज और फिल्म इंडस्ट्री के उस तबके की बात सही जान पड़ रही है जिसके अनुसार प्रकाश झा चाहते थे कि फिल्म प्रदर्शित होने से पहले विवादित हो जाए क्यों कि फिल्म वैसी नहीं है जैसा कि उसको लेकर पूर्वाग्रह बनाए गए हैं। फिल्म आरक्षण में आरक्षण विषय उतना और उसी तरह से है जितना भट्ट कैंप की फिल्मों में सेक्स होता है। दर्शक को थोड़ा बहुत बांधने के लिए। इंटरवल तक आरक्षण की प्रासंगिकता और उसके नुकसान पर चर्चा करने वाली यह फिल्म इंटरवल के बाद अचानक फैमिली ड्रामा हो जाती है। यह ड्रामा आरक्षण जैसे संवदेशनील विषय पर नहीं बल्कि एक नायक की अच्छाईयों और खलनायक की बुराईयों के बीच है। विषय जातिवाद से उठकर निजी कोचिंग संस्थानों के मनमानेपन और शिक्षा के व्यवसायीकरण की ओर हो चलता है। इंटरवल के बाद अमिताभ बच्चन एक तबेला में कोचिंग शुरू करते हैं और उनके प्रतिद्धंदी मनोज बाजपेई की कोचिंग की साख गिरने लगती है। इंटरवल के पहले तक वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रींसपल हुआ करते थे और मनोज कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल। आरक्षण विवाद की वजह से उन्होंने कॉलेज से इस्तीफा दे दिया होता है। इंटरवल के पहले अमिताभ से बिदक गए उनके छात्र सैफ अली खान और प्रतीक बब्बर भी कोचिंग में उनका हाथ बंटाते हैं। यह आप जानते ही हैं कि दीपिका पादुकोन हैं तो वह किसी न किसी से प्यार करेंगी ही। प्रतीक फिल्म इंडस्ट्री में बहुत जूनियर हैं इसलिए वह दलित दीपक कुमार बने सैफअली खान से प्यार करती हैं। मोहब्बते के उलट अमिताभ ने अपनी बेटी प्यार करने की अनुमति दे रखी है। फिल्म के क्लाइमेक्स दृश्य पर गौर कीजिए। अमिताभ बच्चन के तबेला कोचिंग इंस्टीट्यूट को तोडऩे के लिए पूरी सरकारी मिशनरी मौजूद है। पर वह टूटता नहीं है क्यों कि उसके समर्थन कुछ सौ छात्र खड़े हैं। कुछ होने वाला ही होता है कि कॉलेज की संस्थापक ट्रस्टी हेमामालिनी ३२ साल बाद पहाड़ से अपना एकांतवास त्यागकर अमिताभ के समर्थन में आती हैं। एक राज्य का मुख्यमंत्री उनसे एक चपरासी की तरह फोन पर भी झुक कर बात करता है। यह है महान आरक्षण फिल्म का शानदार क्लाइमेक्स

इस पर भी गौर फरमाइए।
- फिल्म में अमिताभ बच्चन के हिस्से में आया एक संवाद (चुप हो जा। मैं तेरी एक नहीं सुनुगां अब तक मैने तेरी बहुत सुन ली है। मेरे पास आत्मबल है जो तुम्हारे पास नहीं है) कायदे से इस संवाद पर दर्शकों को तालियां बजानी चाहिए पर वह हंस रहे होते हैं।
-चालीस साल के हो चुके सैफ अली खान कुछ दृश्यों में दीपिका पादुकोन के दूर के चाचा लगते हैं। सैफअली खान फिल्म के नायक हैं पर उनके चेहरे के एरोगेंट भाव उनके लगातार खलनायक जैसा दिखाते हैं।
-यह फिल्म कतई राजनीतिक नहीं है। इस पर आपत्ति देश के हर बड़े कोचिंग इंस्टी्टयूट को होनी चाहिए।
- फिल्म का नाम आरक्षण के बजाय कोचिंग का गोरखधंधा या शिक्षा का व्यवसायीकरण होना चाहिए था। लो गए शिक्षा माफिया भी चलेगा।
- मनोज बाजपेई ने अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। पर उनकी भूमिका कुछ वैसी ही दबी-दबी रह गई है जैसे कि राजनीति में अजय देवगन की। खुलकर संवाद बोलने या अदाकारी दिखाने के मौके सिर्फ अमिताभ के पास थे।

Wednesday, August 3, 2011

अच्छे विषय का हास्यास्पद फिल्मांकन

फिल्म समीक्षा: गांधी टू हिटलर




रायपुर के पांच में से तीन मल्टीप्लेक्सों में यह फिल्म ४ शो में चल रही है। औसतन हर शो में १० दर्शक आ रहे हैं। यानि कि कम से कम ४० दर्शक गांधी टू हिटलर को देखने के लिए रोज आ रहे हैं। इन ४० दर्शकों में से अधिसंख्य को पहले से पता है कि फिल्म में कोई नायक-नायिका नहीं है, गीत-संगीत नहीं है, कॉमेडी नहीं है, एक्शन नहीं है, द्विआर्थी संवाद नहीं हैं और बोल्ड सीन नहीं है। यानि की एक परंपरागत मसाला फिल्म जैसा कुछ भी नहीं। जो दर्शक फिल्म के आ रहे हैं उन्हें वाकई गांधी और हिटलर जैसे चर्चित नायकों से जुड़ा कुछ जानने में दिलचस्पी है। ऑफबीट फिल्मों पर औसम से कम दिलचस्पी और समझ रखने वाले इस शहर में भी एक ऐसी नई पीढ़ी विकसित हो रही है जो गंभीर और लीक से अलग हटकर बनी फिल्मों में दिलचस्पी लेती है। गांधी टू हिटलर देखने वाले दर्शकोंं में भी ज्यादातर युवा थे। जिस फिल्म को भीड़ न देख रही हो उसे देखना एक ब्रांड के रूप में भी उभरा है। यह प्रयोगात्मक फिल्म उद्योग के लिए अच्छा संकेत है। अब यहां जिम्मेदारी फिल्मकार बनती है कि कैसे वह आए हुए इन१० दर्शकों का आना जस्टीफाई करे। और कोशिश करे कि कम से कम यह १० अगली फिल्म में फिर आएं। कैसे वह एहसास कराए कि वह दर्शक कुछ अलग और नया देखकर गए हैं। और क्यों उन्होंने सिंघम, जिंदगी न मिलेगी दोबारा, हैरी पॉर्टर जैसी फिल्मों के विकल्प रहते गांधी टू हिटलर का चुनाव किया। गांधी टू हिटलर के पास इन किसी क्यों का जवाब नहीं है। निर्माता-निर्देशक फिल्म को बनाता तो अपने नजरिए से है पर वह होती है दर्शक के लिए। फिल्म देखकर लगा कि निर्माता अनिल कुमार शर्मा और निर्देशक राकेश रंजन यह फिल्म सिर्फ अपने लिए बनाई है। चलो फिल्म बनाते हैं जैसा। इन फिल्मकारों की फिल्में से जुड़ी सीमित जानकारी और कूपमंडूकपन पूरे फिल्म में चीखता रहा है। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें फिल्माते वक्त निर्देशक ने सोचा होगा कि ऐस दृश्य फिल्म में बहुत जरूरी हैं वह पहली बार ऐसे दृश्यों को फिल्मों में जगह दे रहे हैं।
गांधी टू हिटलर में तीन कहानियां समांतर चलती हैं। पहली हिटलर और जर्मनी की। दूसरी गांधी और उनके उपदेशों की और तीसरी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज के कुछ साथियों और उनके परिवारों की। फिल्म में जहां-जहां हिटलर से जुड़े दृश्य आए हैं दर्शकों का उनसे जुड़ावा होता है। युद्ध में डूबे हुए जर्मनी को उबारने में लगे हिटलरी कोशिशों को अधिक से अधिक जानने की दिलचस्पी उनमें लगातार बनी रहती है। यह दृश्य थोड़ी देर चलते है कि पर्दे पर उपदेश देते गांधी आ जाते हैं। इन दृश्यों में वही शिक्षाएं हैं जो भारत का हर बच्चा कक्षा तीन-चार से ही नैतिक शिक्षा से जुड़ी किताबों मेें पढ़ता आया है। यह दृश्य बहुत ही घटिता तरीके से फिल्माए गए हैं। फिल्म का सबसे खराब हिस्सा आजाद हिंद फौज की एक टुकड़ी की कहानी का है। इस कहानी से जुड़े महाघटिया और उबाऊ फ्लैशबैक हैं। शादी और होली के दृश्य हैं। इस टुकड़ी के सैनिकों का आपस में झगडऩा और समझाने के बाद एक-दूसरे के लिए जान न्योझावन कर देना। सब कुछ बहुत बचकाना और नानसेंस सा। फिल्म में हिटलर का किरदार रघुवीर यादव ने निभाया है और उनकी प्रेमिका नेहा धूपिया बनी हैं। फिल्म इतनी हास्यास्पद है कि हिटलर और उनकी प्रेमिका सहित पूरे जर्मनी का उर्दू मिश्रित ठेठ हिंदी बोलना भी व्यंग्य पैदा नहीं करता। एक अच्छे विषय की महादुर्गति देखने के लिए फिल्म देख सकते हैं। अच्छे फिल्मकारों की हिटलर और द्धितीय विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका जैसे विषयों पर फिल्म बनानी चाहिए।

Tuesday, July 26, 2011

फिल्म को बुरी बताने पर पाप लग जाएगा।

फिल्म समीक्षा सिंघम:



सिंघम को बुरी फिल्म बताने से पाप लग सकता है। जिस फिल्म को हर शहर में इतनी आस्था और भक्तिभाव के साथ देखा जा रहा हो वह खराब कैसे हो सकती है। सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में हाउसफुल के जिन तख्तियों पर दबंग के बाद धूल जम गई थी सिंघम ने उस धूल को झाड़ा है। सिनेमाघरों में कतार बनाकर टिकट लिए गए है। इन लंबी कतारों से बीच-बीच में नारे लगाने जैसे शोर उठे हैं। धक्का-मुक्की हुई है, जेबी कटी हैं एक-दूसरे को उसकी औकात बताई गई है। यह फिल्म शुरू होने के पहले के जश्न है। फिल्म छूटने के बाद सडक़ों पर जाम जैसे नजारे बने हैं। दर्शकों ने सिंघम के संवादों का प्रयोग एक-दूसरे पर किया है। हलचल और उत्सव की तरह आई इस फिल्म को खराब कैसे बताया जा सकता है। सिंघम एक फिल्म नहीं बल्कि एकनजरिया है। नजरिया दर्शक को समझने और आंकने का। जहां धोबीघाट, लक बाइ चांस, ये साली जिंदगी, आईएम, शैतान और जिंदगी न मिलेगी दोबारा जैसी फिल्मे दर्शकों को समझदार मान रही हैं तो वहीं दबंग, वांटेड, रेडी डबल धमाल और अब सिंघम जैसी फिल्में दर्शकों को भावुक और बेवकूफ। इन फिल्मों को बनाने के पीछे सिर्फ एक नजरिया है कि दर्शक पर्दे पर हीरो को हीरो जैसा ही देखना चाहता है। एक थप्पड़ मारने पर आदमी ६ फुट ऊपर जाकर फिर मारने वाले के पैरों पर गिरे ऐसा सिर्फ हीरो ही कर सकता है। सिंघम इस नायक को पर्दे पर स्थापित करती है। दर्शक सिंघम के किरदार से पूरी तरह से जुड़ता है। उसके आक्रोश, विवशता और पराक्रम से भी । सिंघम २०१० में इसी नाम से आई आई साउथ की फिल्म का रीमेक है। इंटरवल के पहले तक सिंघम साउथ की ही फिल्म लगती है। इंसपेक्टर के बेवकूफ शार्गिद के सड़े हुए चुटकले, नंदू जैसा मोटा किरदार, उसकी ओवर ऐक्टिंग, सोने की मोटी चेन पहने काले रंग के गुंडों की पिटाई, नायक द्वारा पिटाई का दृश्य देखने के बाद नायिका का आत्मसमर्पण जैसे दृश्य ऑडी में बैठे आधे दर्शकों को इरीटेट कर रहे होते हैं। निर्देशक यह मान रहा है कि फोन पर शीला की जवानी की मिमिक्री करने वाला नंदू और भूत बनकर सब को डरा रही नायिका दर्शकों को हंसा रही है। पर यह बात भी इतनी ही सत्य कि यह दृश्य आधों का मनोरंजन कर रहे होते हैं। सीटियां और टिप्पणियां तो अब मल्टीप्लेक्सों में सुनाई देने लगी है। इंटरवल के पहले तक सिंघम दबंग से भी घटिया है। इंटरवल के बाद यह कुछ देखने लायक बनती है। शूल, गंगाजल, इंडियन के अलावा पुलिसिया बैकग्राउंड पर बनी कुछ फिल्मों की झलक और संवाद यहां देखने को मिले हैं। सार वही कि पुलिस अगर चाहे तो क्या नहीं कर सकती । डायलॉग की जो कमी दर्शक पहले ऑफ में महसूस कर होते हैं सेंकेंड हॉफ उसकी भरपाई करता है। कुछ मनोरंजन के साथ आपकी चेतना को भी जगाते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स प्रैक्टिकल और मीनिंगफुल है। अजय देवगन और प्रकाश राज ने बेहतरीन अभिनय किया है। प्रकाश राज जैसा हंसाने वाला खलनायक ९० के दशक में परेश रावल की याद दिलाता है। काजल अग्रवाल से जो काम कहा गया उन्होंने किया। गोवा जैसे शहर में पूरी बाह का सलवार- शूट पहनकर वह अच्छी लगी है। उन्होंने सत्तर के दशक की नायिकाओं की तरह समय-समय नायक का मार्गदर्शन किया है। प्यार तो वह उससे टूटकर करती ही हैं। फिल्में अब नेताओं को भी ओबलाइन करने लगी हैं।ठाकरे परिवार खुश हो जाए इसलिए फिल्म में बहुत संवाद मराठी में रखे गए हैं इस बात की परवाह किए बिना कि दर्शक माझी सटकले का क्या अर्थ लगाएगा।

Thursday, July 21, 2011

समझदारों द्वारा समझदारों के लिए बनाई गई फिल्म

फिल्म समीक्षा: जिंदगी न मिलेगी दोबारा




फरहान अख्तर को दोस्त मनोविज्ञान का फिल्मकार कहा जा सकता है। दिल चाहता है और रॉक ऑन के बाद जिंदगी मिलेगी न दोबारा उनकी ऐसी तीसरी फिल्म है जिसमे वह दोस्तों के बीच की किस्सागोई को एक संदेशात्मक अंदाज में पेश करते हैं। कहानी को कहने में कहींं कोई बनावटीपन या उपदेशात्मक प्रपंच नहीं हैं। फरहान इस फिल्म में निर्माता, अभिनेता और एक गायक की हैसियत से जुड़े हुए हैं। फिल्म की निर्देशक फरहान की जुड़वा बहन जोया अख्तर हैं। जोया इसके पहले लक बाय चांस जैसी खूबसूरत फिल्म का निर्देशन कर चुकी हैं। तीन इंटलैक्चुवल दोस्तों की कहानी कहने वाली फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा एक अच्छे उपन्यास को पढऩे जैसा संतोष देती है। तीन मुख्य पात्रों की यह दोस्ती शोले के जय-वीरू अंदाज वाली दोस्ती नहीं हैं। वह दोस्त इसलिए हैं क्यों कि वह एक-दूसरे की फ्रीक्वेंसी को समझते हैं। कहां पर और कितना दूसरे की जिंदगी में इनवाल्व हुआ जाए उन्हें यह मालूम है। यहां एक-दूजे कि खिल्ली भी उड़ायी जाती है और मोहब्बत भी की जाती है। पूरी फिल्म साफ्ट कॉमेडी के ताने-बाने पर बुनी है। फिल्म में हास्य के जो पल हैं वह बहुत ही सहज तरीके से आते-जाते रहते हैं। हंसाने के लिए किसी सीन को क्रिएट नहीं किया गया है। स्वाभाविक संवादों से हंसी निकलती है। दोस्ती के साथ-साथ फिल्म दार्शनिक अंदाज में जीने के तरीके को भी परिभाषित करती है। फिल्म दिखाती है कि इंटलैक्चुवल व्यक्ति जरूरी नहीं कि अपनी हर समस्या या कमजोरी को पहचान कर उसे खत्म करने की क्षमता रखता है। दूसरे की दृष्टि से भी जिंदगी को समझा जा सकता है। जिंदगी मिलेगी न दोबारा समझदारों की फिल्म है। दबंग, रेडी और सिंघम जैसी फिल्मों के माहौल के बीच ऐसी फिल्म बनाना साहसिक काम है। अच्छी बात यह है कि फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी साहसिक लोग बढ़ रहे हैं। प्यार का पंचनामा के बाद जिंदगी मिलेगी न दोबारा ऐसी दूसरी फिल्म है जिसमे लडक़ी के किरदार को चिपकू बनाकर पेश किया गया है। वह चिपकू किरदार गर्लफ्रेंड या पत्नी किसी रुप में हो सकता है जो आपके जीवन की उन्मुक्तता या स्वतंत्रता को खत्म कर दे। यह फिलासफी बड़े शहरों से जल्दी ही छोटे शहरों में आएगी। फिलहाल यहां चिपकने वालों की कमी महसूस की जा रही है। फरहान अख्तर, रितिक रोशन और अभय देओल के अलावा कैटरीना कैफ मुख्य भूमिका में हैं। सभी ने अपनी पात्रों के अनुरूप अभिनय किया है। अपनी टाइमिंग डायलॉग डिलवीरी की वजह से फरहान दर्शकों के सबसे प्रिय चेहरे बनते हैं। हां एक और बात रितिक रोशन ने कई दृश्यों में आमिर खान की कॉपी की है।

Tuesday, July 12, 2011

दर्शक बहुत भावुक होता है वह डरेगा भी और रोएगा भी




फिल्म समीक्षा: मर्डर:२



दिन का समय हो और आपका पैर नदी, नाले या कहीं और पानी में सड़ रही लाश पर पड़ जाए। आपके मन में डर बाद में पैदा होगा घिन पहली आएगी। मुकेश भट्ट की फिल्म मर्डर:२ दर्शकों को कुछ ऐसा ही एहसास कराती है। जो दृश्य डराने के लिए फिल्माए गए हैं वह आपके मन में एक लिजलिजापन पैदा करते हैं। जोर-जोर से प्रचारित की गई इस सेक्स थ्रिलर में थ्रिल के नाम पर कुछ ऐसे ही घिनौने दृश्य हैं जिन्हें यह मानकर फिल्म में रखा गया है कि वह दर्शकों को रोमांचित कर देंगे। ऐसी पटकथा जिस पर एक अच्छी साइक लॉजिकल थ्रिलर फिल्म बन सकती थी को एक चालू फिल्म बनाकर पेश किया गया है। मर्डर का सीक्वेल कही गई इस फिल्म में न तो मर्डर जैसा संस्पेस और न ही उसके जैसा रोमांस। एक मनोरोगी जो लड़कियों की हत्याएं करता है को फिल्म का मुख्य खलनायक बनाया गया है। दर्शक अंत तक इंतजार करते रहते हैं कि इस फिल्म का असल विलेन कोई और होगा और यह उनके लिए शॉकिंग होगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह मनोरोगी फिल्म का मुख्य खलनायक निकला जिसे दर्शकों ने फिल्म शुरु होने के २५ मिनट के भीतर जान लिया था। यह वैसा ही है कि कहानी का नाम हो बाप ने मारा और कहानी खत्म होने पर हत्यारा बाप ही निकले। अंत के पांच मिनट को छोडक़र वह पात्र जिसे निर्देशक खलनायक के रूप में पेश कर रहे होते हैं दरअसल दर्शकों का मनोरंजन कर रहा होता है। इमराश हाशमी के अलावा फिल्म में जैकलीन फर्नाडीज और प्रशांत नारायण मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म के नायक भले ही इमरान रहे हों पर दर्शकों को याद प्रशांत नारायण का अभिनय रह जाता है जिन्होंने विक्षिप्त मनोरोगी की भूमिका निभाई है। प्रशांत नारायण को दर्शक ये साली जिंदगी में छोटे और भिंडी बाजार में फतेह की भूमिका में हम देख चुके हैं। जिन-जिन दृश्यों में इमरान हाशमी और प्रशांत नारायण आमना-सामना होता है इमरान के सीमाएं स्पष्ट दिखती हैं। अभिनय के मामले में प्रशांत निश्चित ही दीपक डोबरियाल और इमरान खान की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। एक बात अंत तक समझ में नही आती ्र कि जैकलीन फर्नाडीज को फिल्म में लिया क्यों गया। यह भूमिका किसी उभरती हुई मॉडल को मिलती तो वह जैकलीन से ज्यादा ही एक्सपोज कर देती। जैकलीन फर्नाडीज की ऐक्टिंग देखकर रोमांस या सेक्स तो नहीं जागता पर उनकी ऐक्टिंग पर हंसी जरूर आती है। फिल्म में जैसे ही इमरान हाशमी उनके पास आते हैं वह कपड़े उतारना शुरू कर देती हों। मानो इमरान कोई धोबी हों । सेक्स जैसे कुछ दृश्यों को फिल्माने में जैकलीन के चेहरे पर न कोई भाव और न ही उत्तेजना। सब कुछ लिखी हुई पटकथा की तरह कि अब टॉप उतारना और अब जींस उतारना है। कुछ अन्य दृश्यों में भी तय पटकथा के अनुसार कि अब रोना है, अब शराब पीना है और अब शराब के नशे में सडक़ पर गिरना है। भट्ट कैंप की फिल्मों में संगीत उसका सबल पक्ष होता है मर्डर:२ में यह पक्ष भी कमजोर रहा है। मुकेश और महेश भट्ट की इस फिल्म में कहीं-कहीं तीसरे भट्ट विक्रम साहब की भी छाप देखने को मिलती है। निर्देशक मोहित सूरी के बारे में क्या कहा जाए। फिल्म के कुछ दृश्यों को देखकर लगा कि वह दर्शकों को बिल्कुल बेवकूफ भावुक मानते हैं।

Wednesday, July 6, 2011

डेल्ही बेली एहसास कराती है कि दर्शक परिपक्व हो गए हैं

फिल्म समीक्षा: डेल्ही बेली

खुशवंत सिंह कोई बहुत अच्छे अफसानानिगार या स्तम्भकार नहीं हैं। वह इसलिए अधिक चर्चित हुए हैं क्यों कि उन्होंने ऐसे विषयों पर लिखा है जिन पर दूसरे लेखक अश्लील कहकर नाक-भौं सिकोड़ते रहे हैं। आमिर खान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के खुशवंत सिंह हो सकते हैं। हो सकता है कि इस फिल्म की सफलता के बाद एक साथ कई खुशवंत सिंह पैदा हो जाएं। आमिर की फिल्म डेल्ही बेली मुख्य धारा की पहली ऐसी हिंदी फिल्म है जिसमे खुलेपन के साथ सेक्स को प्रदर्शित किया गया है। सेक्स दृश्यों या संवाद को दिखाने में कहीं कोई कुंठा या असमंजस मन में नहीं दिखा है। आमिर किसी असमंजस के साथ इस फिल्म को लेकर आए भी नहीं थे। फिल्म बनाने से पहले ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि वह एक सेक्स कॉमेडी फिल्म बना रहे हैं, कहीं कोई धोखा देने का इरादा नहीं। मल्टीप्लेक्सों में टिकट भी सिर्फ एडल्ट को दिए जा रहे हैं। प्रदर्शन के बाद फिल्म चर्चित हो गई। अब मजा देखिए। चर्चा इस बात पर हो रही है कि फिल्म के दृश्य और संवाद अश्लील हैं। लोग कह रहे हैं फिल्म में गालियां हैं। कहा जा रहा है कि टट्टी-पेशाब के दृश्यों को अश्लील तरीके से चित्रित किया गया है। विडंबना। चर्चा इस बात पर नहीं हुई कि फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है। कुछ गुंडों के साथ हीरे की खोज में पगलाया गैंगस्टर और हीरों से छुटकारा पाने की जुगत में नायकों की टीम पहले भी कई फिल्मों में देखी जा चुकी है। डेल्ही बेली में उसी को एक बार फिर दोहराया गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इन दृश्यों से रिसते हास्य को सेक्स कॉमेडी से पगा दिया गया है। कहानी के स्तर पर कोई नयापन नहीं। चर्चा इस बात पर भी नहीं हुई कि आमिर अपने भानजे इमरान से सर्वश्रेष्ठ नहीं निकलवा पाएं। अच्छी अदाकारी और टाइमिंग वाले एक्टर विजय राज को बहुत अच्छे संवाद नहीं मिले हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत प्रभावकारी नहीं बन पाया। पर इन बुराईयों में फिल्म की अच्छाइयां भारी पड़ती हैं। अर्से बाद कोई ऐसी कॉमेडी फिल्म आई है कि जिसे रात में दो बजे या ट्रैफिक के रेड सिग्नल में याद करके हंसा जा सके। बिल्कुल नवीन और मौलिक दृश्य। फिल्म के गाने भी सुनने में मनोरंजक कम मनोरंजक नहीं हैं। ऐसा बहुत कम होता है। हां फिल्म में गालियों कुछ कम की जा सकती थीं। स्वाभाविक जिंदगी में तो हम और भी बहुत कुछ करते हैं जब उसे फालतू और रूटीन मानकर फिल्म में शामिल नहीं किया जाता तो गालियों को क्यों। अपनी कमियों और सीमाओं के बावजूद फिल्म आलोचना से अधिक तारीफ का हक रखती है। और हां हिंदी भाषा अपने बढ़ते वर्चस्व पर पीठ थपथपा सकती है। पहले सिर्फ अंग्रेजी में आ रही इस फिल्म को बाद मे हिंदी में डब किया गया और यह अंग्रेजी से ज्यादा हिंदी के प्रिंटों में रिलीज की गई।